15/12/2024
“क्रिया” योग
श्वास और मुक्ति का विज्ञान
क्रियायोग एक सरल, लेकिन असाधारण रूप से शक्तिशाली ध्यान तकनीक है। यह उच्च चेतना की स्थिति तक पहुँचने और मन, शरीर, बुद्धि और आत्मा की जागरूकता को विकसित करके जीवन को बदलने की सशक्त विधि है। क्रियायोग सांप्रदायिक नहीं है, कठिन तपस्या की आवश्यकता भी नहीं है। यह आधुनिक दैनिक जीवन में व्यस्त लोगों के लिए भी वैसा ही उपयुक्त है, जैसा कि हिमालय की शांत गुफाओं में ध्यान करने वालों के लिए है।
'क्रिया' शब्द अपने आप में “कार्य और उपासना” एवं “गतिविधि और दिव्यता” की एकता को दर्शाता है। अंतर्निहित आत्मा की शक्ति की निरंतर जागरूकता हमारे सभी कार्यों को चाहे वह कितना भी साधारण क्यों न हो, उपासना में बदल सकती है और हमारा पूरा जीवन दिव्य बनाया जा सकता है।
शांति, आनंद, प्रेम और करुणा अभ्यास के फल हैं, जो सभी सच्चे और विनम्र अभ्यार्थियों के लिए उपलब्ध हैं। श्वास के विज्ञान पर आधारित, क्रियायोग सभी आध्यात्मिक अभ्यास को अत्यधिक बढ़ाता है। तकनीक श्वास और मन के बीच संबंध पर जोर देती है। श्वास मन को प्रभावित करती है और साथ ही यह परस्पर संबंध मन को नियंत्रित करने का रहस्य खोलता है: 'श्वास नियंत्रण स्व-नियंत्रण है। जब श्वास पर नियंत्रण पा लिया जाता है, तो दिव्यता का अनुभव किया जा सकता है।
एक सच्चा आध्यात्मिक साधक जो प्रेम और भक्ति के साथ क्रियायोग के मार्ग पर चलता है और आध्यात्मिक विकास की इच्छा रखता है, इसी जीवन में आत्म-ज्ञान या जागृति प्राप्त कर सकता है।
क्रियायोग का प्राचीन इतिहास रहस्यपूर्ण एवं विस्मयकारी है। मानवीय चेतना के विकास के प्रारंभिक काल में विद्यमान् धार्मिक, एतिहासिक एवं वैज्ञानिक ज्ञान के मिश्रित रहस्य से इसकी उत्पत्ति हुई है। भारत के साधु संतो ने एक लंबे समय तक इस योग विद्या का अभ्यास और प्रचार किया।
क्रियायोग अत्यंत प्राचीन एवं प्रभावशाली विद्या है, जो हमारे ऋषियों तथा साधु संतो की अनादि काल से चली आ रही परंपरा से जुड़ी हुआ है। यहाँ तक कि हमारे धर्मशास्त्रों के अनुसार भगवान राम एवं श्रीकृष्ण ने भी इस योग साधना का अभ्यास किया था एवं इसकी शिक्षा दी थी। क्रियायोग के अभ्यासों की विवेचना उपनिषद काल के ऋषियों द्वारा भी की गई है। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने योगवासिष्ठ में तथा ऋषि पतंजलि ने योगसूत्र में इस विद्या की विस्तृत विवेचना की है। भगवद्गीता (अध्याय- ४, श्लोक-१) में कहा गया है कि ईश्वर ने सर्वप्रथम इस योग विद्या विवस्वान (सूर्य) को दिया। सूर्य ने यह ज्ञान अपने पुत्र मनु को दिया जो उनके चौदह पुत्रों में से सातवें थे, जिन्होंने सृष्टि का पुनर्निर्माण किया।
मनु ने यह विद्या अपने पुत्र इक्ष्वाकु को दी। इक्ष्वाकु को सूर्यवंश का प्रथम राजा कहा गया है, तब से यह विद्या पिता से पुत्र को अथवा गुरू शिष्य को मौखिक रूप से मिलती रही है। बाद के युग में यह आध्यात्मिक विद्या विलुप्त हो गई।
अंततः इसका पुनरुद्धार महावतार बाबाजी ने सन १८६१ में श्री श्यामाचरण लाहिड़ी के माध्यम से किया। गुरु की यह गौरवशाली परंपरा श्री श्यामाचरण लाहिड़ी के बाद क्रमशः स्वामी श्रीयुक्तेश्वर जी, परमहंस योगानंद, श्री भूपेंद्रनाथ सान्याल, स्वामी सत्यानंद गिरि, परमहंस हरिहरानंद एवं परमहंस प्रज्ञानानंद के माध्यम से निरंतर प्रवाहमान है।