KRIYA YOG Indore

KRIYA YOG Indore Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from KRIYA YOG Indore, Medical and health, Kriya Yoga Center, 10 Gulmohar Colony, Saket Nagar, Indore.

जैसा आप सोचते हैं, वैसे ही आप बन जाते हैं। जैसा आपका दृष्टिकोण है, वैसा ही आपका जीवन है। यदि आप मेरी ओर देखेंगे, तो मेरी...
29/12/2024

जैसा आप सोचते हैं, वैसे ही आप बन जाते हैं। जैसा आपका दृष्टिकोण है, वैसा ही आपका जीवन है। यदि आप मेरी ओर देखेंगे, तो मेरी आध्यात्मिक ऊर्जा आपकी आँखों के माध्यम से प्रवेश करेगी और सीधे आपके मस्तिष्क में जाएगी। भगवान ने आपको आत्मा को देखने के लिए ही आँखें दी हैं। यदि आप बुरी संगत में रहेंगे, तो आप बुरे बन जाएँगे। जब भी आप अच्छी संगत में हों, तो अपनी आँखें खुली रखें, ताकि आपका शरीर और आपका जीवन शुद्ध हो जाए। सबसे पहले आपको आसन की तलाश करनी चाहिए, आसन की तरह नहीं, बल्कि आत्मा में बैठने की तरह। आपको इसमें गहराई से जाना चाहिए, क्योंकि आपका प्रकाश, आपकी आत्मा, ईश्वर की शक्ति, निराकार, यहाँ फॉन्टानेल में रहती है। वह बोल रहा है, देख रहा है और सुन रहा है। यदि निराकार साँस नहीं लेता, तो आपका भौतिक रूप दुनिया में नहीं रहेगा। तो आप आकार और निराकार दोनों का ध्यान कर रहे हैं। बिना साँस और आत्मा के, आपके जीवन में कोई गतिविधि नहीं होगी। -

- - परमहंस हरिहरानंदजी महाराज - - -

15/12/2024

“क्रिया” योग
श्वास और मुक्ति का विज्ञान

क्रियायोग एक सरल, लेकिन असाधारण रूप से शक्तिशाली ध्यान तकनीक है। यह उच्च चेतना की स्थिति तक पहुँचने और मन, शरीर, बुद्धि और आत्मा की जागरूकता को विकसित करके जीवन को बदलने की सशक्त विधि है। क्रियायोग सांप्रदायिक नहीं है, कठिन तपस्या की आवश्यकता भी नहीं है। यह आधुनिक दैनिक जीवन में व्यस्त लोगों के लिए भी वैसा ही उपयुक्त है, जैसा कि हिमालय की शांत गुफाओं में ध्यान करने वालों के लिए है।
'क्रिया' शब्द अपने आप में “कार्य और उपासना” एवं “गतिविधि और दिव्यता” की एकता को दर्शाता है। अंतर्निहित आत्मा की शक्ति की निरंतर जागरूकता हमारे सभी कार्यों को चाहे वह कितना भी साधारण क्यों न हो, उपासना में बदल सकती है और हमारा पूरा जीवन दिव्य बनाया जा सकता है।
शांति, आनंद, प्रेम और करुणा अभ्यास के फल हैं, जो सभी सच्चे और विनम्र अभ्यार्थियों के लिए उपलब्ध हैं। श्वास के विज्ञान पर आधारित, क्रियायोग सभी आध्यात्मिक अभ्यास को अत्यधिक बढ़ाता है। तकनीक श्वास और मन के बीच संबंध पर जोर देती है। श्वास मन को प्रभावित करती है और साथ ही यह परस्पर संबंध मन को नियंत्रित करने का रहस्य खोलता है: 'श्वास नियंत्रण स्व-नियंत्रण है। जब श्वास पर नियंत्रण पा लिया जाता है, तो दिव्यता का अनुभव किया जा सकता है।
एक सच्चा आध्यात्मिक साधक जो प्रेम और भक्ति के साथ क्रियायोग के मार्ग पर चलता है और आध्यात्मिक विकास की इच्छा रखता है, इसी जीवन में आत्म-ज्ञान या जागृति प्राप्त कर सकता है।

क्रियायोग का प्राचीन इतिहास रहस्यपूर्ण एवं विस्मयकारी है। मानवीय चेतना के विकास के प्रारंभिक काल में विद्यमान् धार्मिक, एतिहासिक एवं वैज्ञानिक ज्ञान के मिश्रित रहस्य से इसकी उत्पत्ति हुई है। भारत के साधु संतो ने एक लंबे समय तक इस योग विद्या का अभ्यास और प्रचार किया।

क्रियायोग अत्यंत प्राचीन एवं प्रभावशाली विद्या है, जो हमारे ऋषियों तथा साधु संतो की अनादि काल से चली आ रही परंपरा से जुड़ी हुआ है। यहाँ तक कि हमारे धर्मशास्त्रों के अनुसार भगवान राम एवं श्रीकृष्ण ने भी इस योग साधना का अभ्यास किया था एवं इसकी शिक्षा दी थी। क्रियायोग के अभ्यासों की विवेचना उपनिषद काल के ऋषियों द्वारा भी की गई है। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने योगवासिष्ठ में तथा ऋषि पतंजलि ने योगसूत्र में इस विद्या की विस्तृत विवेचना की है। भगवद्गीता (अध्याय- ४, श्लोक-१) में कहा गया है कि ईश्वर ने सर्वप्रथम इस योग विद्या विवस्वान (सूर्य) को दिया। सूर्य ने यह ज्ञान अपने पुत्र मनु को दिया जो उनके चौदह पुत्रों में से सातवें थे, जिन्होंने सृष्टि का पुनर्निर्माण किया।

मनु ने यह विद्या अपने पुत्र इक्ष्वाकु को दी। इक्ष्वाकु को सूर्यवंश का प्रथम राजा कहा गया है, तब से यह विद्या पिता से पुत्र को अथवा गुरू शिष्य को मौखिक रूप से मिलती रही है। बाद के युग में यह आध्यात्मिक विद्या विलुप्त हो गई।

अंततः इसका पुनरुद्धार महावतार बाबाजी ने सन १८६१ में श्री श्यामाचरण लाहिड़ी के माध्यम से किया। गुरु की यह गौरवशाली परंपरा श्री श्यामाचरण लाहिड़ी के बाद क्रमशः स्वामी श्रीयुक्तेश्वर जी, परमहंस योगानंद, श्री भूपेंद्रनाथ सान्याल, स्वामी सत्यानंद गिरि, परमहंस हरिहरानंद एवं परमहंस प्रज्ञानानंद के माध्यम से निरंतर प्रवाहमान है।

10/12/2024

“क्रिया” योग
श्वास और मुक्ति का विज्ञान

क्रियायोग एक सरल, लेकिन असाधारण रूप से शक्तिशाली ध्यान तकनीक है। यह उच्च चेतना की स्थिति तक पहुँचने और मन, शरीर, बुद्धि और आत्मा की जागरूकता को विकसित करके जीवन को बदलने की सशक्त विधि है। क्रियायोग सांप्रदायिक नहीं है, कठिन तपस्या की आवश्यकता भी नहीं है। यह आधुनिक दैनिक जीवन में व्यस्त लोगों के लिए भी वैसा ही उपयुक्त है, जैसा कि हिमालय की शांत गुफाओं में ध्यान करने वालों के लिए है।

'क्रिया' शब्द अपने आप में “कार्य और उपासना” एवं “गतिविधि और दिव्यता” की एकता को दर्शाता है। अंतर्निहित आत्मा की शक्ति की निरंतर जागरूकता हमारे सभी कार्यों को चाहे वह कितना भी साधारण क्यों न हो, उपासना में बदल सकती है और हमारा पूरा जीवन दिव्य बनाया जा सकता है।

शांति, आनंद, प्रेम और करुणा अभ्यास के फल हैं, जो सभी सच्चे और विनम्र अभ्यार्थियों के लिए उपलब्ध हैं। श्वास के विज्ञान पर आधारित, क्रियायोग सभी आध्यात्मिक अभ्यास को अत्यधिक बढ़ाता है। तकनीक श्वास और मन के बीच संबंध पर जोर देती है। श्वास मन को प्रभावित करती है और साथ ही यह परस्पर संबंध मन को नियंत्रित करने का रहस्य खोलता है: 'श्वास नियंत्रण स्व-नियंत्रण है। जब श्वास पर नियंत्रण पा लिया जाता है, तो दिव्यता का अनुभव किया जा सकता है।

एक सच्चा आध्यात्मिक साधक जो प्रेम और भक्ति के साथ क्रियायोग के मार्ग पर चलता है और आध्यात्मिक विकास की इच्छा रखता है, इसी जीवन में आत्म-ज्ञान या जागृति प्राप्त कर सकता है।

क्रियायोग का प्राचीन इतिहास रहस्यपूर्ण एवं विस्मयकारी है। मानवीय चेतना के विकास के प्रारंभिक काल में विद्यमान् धार्मिक, एतिहासिक एवं वैज्ञानिक ज्ञान के मिश्रित रहस्य से इसकी उत्पत्ति हुई है। भारत के साधु संतो ने एक लंबे समय तक इस योग विद्या का अभ्यास और प्रचार किया।

क्रियायोग अत्यंत प्राचीन एवं प्रभावशाली विद्या है, जो हमारे ऋषियों तथा साधु संतो की अनादि काल से चली आ रही परंपरा से जुड़ी हुआ है। यहाँ तक कि हमारे धर्मशास्त्रों के अनुसार भगवान राम एवं श्रीकृष्ण ने भी इस योग साधना का अभ्यास किया था एवं इसकी शिक्षा दी थी। क्रियायोग के अभ्यासों की विवेचना उपनिषद काल के ऋषियों द्वारा भी की गई है। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने योगवासिष्ठ में तथा ऋषि पतंजलि ने योगसूत्र में इस विद्या की विस्तृत विवेचना की है। भगवद्गीता (अध्याय- ४, श्लोक-१) में कहा गया है कि ईश्वर ने सर्वप्रथम इस योग विद्या विवस्वान (सूर्य) को दिया। सूर्य ने यह ज्ञान अपने पुत्र मनु को दिया जो उनके चौदह पुत्रों में से सातवें थे, जिन्होंने सृष्टि का पुनर्निर्माण किया।

मनु ने यह विद्या अपने पुत्र इक्ष्वाकु को दी। इक्ष्वाकु को सूर्यवंश का प्रथम राजा कहा गया है, तब से यह विद्या पिता से पुत्र को अथवा गुरू शिष्य को मौखिक रूप से मिलती रही है। बाद के युग में यह आध्यात्मिक विद्या विलुप्त हो गई।

अंततः इसका पुनरुद्धार महावतार बाबाजी ने सन १८६१ में श्री श्यामाचरण लाहिड़ी के माध्यम से किया। गुरु की यह गौरवशाली परंपरा श्री श्यामाचरण लाहिड़ी के बाद क्रमशः स्वामी श्रीयुक्तेश्वर जी, परमहंस योगानंद, श्री भूपेंद्रनाथ सान्याल, स्वामी सत्यानंद गिरि, परमहंस हरिहरानंद एवं परमहंस प्रज्ञानानंद के माध्यम से निरंतर प्रवाहमान है।

*   If   one   fixes   one's   mind   on             the  soul  during  every  breath,             one   is   a   yogi.-...
07/12/2024

* If one fixes one's mind on

the soul during every breath,

one is a yogi.

--- Paramhamsa Hariharananda Ji
Maharaj

* जीवन के अनुभवों को अति गम्भीरता से मत लीजिये।  सर्वोपरि,  वे आपको  दु:ख न देने पाऍं,क्योंकि वास्तव में वे स्वप्निल अनु...
04/12/2024

* जीवन के अनुभवों को अति गम्भीरता से मत लीजिये। सर्वोपरि, वे आपको दु:ख न देने पाऍं,क्योंकि वास्तव में वे स्वप्निल अनुभवों के अलावा कुछ भी नहीं। ... यदि परिस्थितियाॅं खराब हैं और आपको उन्हें सहना ही पड़ रहा है, तो उन्हें अपनी चेतना का एक हिस्सा मत बनने दीजिये। जीवन में अपनी भूमिका अवश्य निभाइये परन्तु यह कभी न भूलिये कि वह एक नाटक की भूमिका मात्र है। आप संसार में जो खोयेंगे वह आपकी आत्मा का नुकसान नहीं होगा। ईश्वर में विश्वास रखिये और भय को नष्ट कर दीजिये। भय ठीक उन्हीं चीज़ों को आपकी ओर आकर्षित करता है जिनका आपको भय है और सफल होने के सब प्रयासों को बलहीन कर देता है।

--- श्री श्री परमहंस योगानन्द,

03/12/2024

* जीवन के अनुभवों को अति गम्भीरता से मत लीजिये। सर्वोपरि, वे आपको दु:ख न देने पाऍं,क्योंकि वास्तव में वे स्वप्निल अनुभवों के अलावा कुछ भी नहीं। .. यदि परिस्थितियाॅं खराब हैं और आपको उन्हें सहना ही पड़ रहा है, तो उन्हें अपनी चेतना का एक हिस्सा मत बनने दीजिये। जीवन में अपनी भूमिका अवश्य निभाइये परन्तु यह कभी न भूलिये कि वह एक नाटक की भूमिका मात्र है। आप संसार में जो खोयेंगे वह आपकी आत्मा का नुकसान नहीं होगा। ईश्वर में विश्वास रखिये और भय को नष्ट कर दीजिये। भय ठीक उन्हीं चीज़ों को आपकी ओर आकर्षित करता है जिनका आपको भय है और सफल होने के सब प्रयासों को बलहीन कर देता है।

--- श्री श्री परमहंस योगानन्द,

30/11/2024

साहस

* जीवन के अनुभवों को अति गम्भीरता से मत लीजिये। सर्वोपरि, वे आपको दु:ख न देने पाऍं,क्योंकि वास्तव में वे स्वप्निल अनुभवों के अलावा कुछ भी नहीं। ... यदि परिस्थितियाॅं खराब हैं और आपको उन्हें सहना ही पड़ रहा है, तो उन्हें अपनी चेतना का एक हिस्सा मत बनने दीजिये। जीवन में अपनी भूमिका अवश्य निभाइये परन्तु यह कभी न भूलिये कि वह एक नाटक की भूमिका मात्र है। आप संसार में जो खोयेंगे वह आपकी आत्मा का नुकसान नहीं होगा। ईश्वर में विश्वास रखिये और भय को नष्ट कर दीजिये। भय ठीक उन्हीं चीज़ों को आपकी ओर आकर्षित करता है जिनका आपको भय है और सफल होने के सब प्रयासों को बलहीन कर देता है।

--- श्री श्री परमहंस योगानन्द,

 #सादर
29/11/2024

#सादर

28/11/2024

सभी शास्त्रों में कहा गया है कि ईश्वर आपके भीतर है। इसे समझने के लिए आवश्यक आंतरिक जागृति के लिए आपको अपने निचले केंद्रों से ऊपर की ओर आना होगा। तभी आप अपने भीतर निवास करने वाले स्व को देख पाएंगे। शक्ति यहाँ, वहाँ और हर जगह है, लेकिन आप इसे अलग कर सकते हैं। जिस तरह आप गर्म दूध में नींबू निचोड़कर पनीर को पानी से अलग कर सकते हैं, उसी तरह आप अपने आप को स्थूल दुनिया और भौतिक शरीर से भी आसानी से अलग कर सकते हैं। ऐसा करने के लिए आपको निरंतर जागरूकता की आवश्यकता होगी। यदि आप केवल महसूस कर सकें कि वह कितना दयालु है - वह मेरी आँखों से देख रहा है, मेरे मुँह से बोल रहा है, दिन-रात मुझमें साँस ले रहा है - तो आपके पास अधिक करुणा और प्रेम होगा। इसलिए, आपको हर साँस में उसे देखना चाहिए। चूँकि वह दिन-रात आपके माध्यम से साँस ले रहा है, इसलिए आप अपनी साँस को देखकर दिव्य ध्वनि सुनेंगे। एक बार जब आप उसे खोज लेंगे और अपना जीवन बदल लेंगे, तो आप परिपूर्ण हो जाएँगे। परिणामस्वरूप, आप उस परिवर्तन से गुज़रेंगे जो आपको आंतरिक रूप से केंद्रित रहने की आवश्यक क्षमता देगा।
---- Paramhans Hariharanandaji Maharaj-

Human life is like a fallow land. It requires effective cultivation to reap a good harvest of peace, love and serenity. ...
26/11/2024

Human life is like a fallow land. It requires effective cultivation to reap a good harvest of peace, love and serenity. A peaceful mind is the door to realization and freedom.
Thus there is need of confidence in life. Any work to be done should be done with love, prayer, and surrender. It should be offered to God and Masters. With such thinking, there is a sense of freedom from ego and pride. Indeed confidence in life is necessary; it brings inner spiritual strength and ultimately success.

- - - Paramahamsa Prajnananandaji Maharaj - - -

Address

Kriya Yoga Center, 10 Gulmohar Colony, Saket Nagar
Indore

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when KRIYA YOG Indore posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share

Share on Facebook Share on Twitter Share on LinkedIn
Share on Pinterest Share on Reddit Share via Email
Share on WhatsApp Share on Instagram Share on Telegram