Srishti ayurved and Jyotish

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15/05/2023

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जब जीवन में संकट आने लगे तो क्या उपाय करना चाहिए,समस्याएं जीवन का अंग हैं,कई बार आती और जाती हैं,वृहस्पति यदि कुंडली...

29/09/2021

श्राद्ध और पितृपक्ष का वैज्ञानिक महत्व
लेखक:- डॉ. ओमप्रकाश पांडे
(लेखक अंतरिक्ष विज्ञानी हैं)

श्राद्ध कर्म श्रद्धा का विषय है। यह पितरों के प्रति हमारी श्रद्धा प्रकट करने का माध्यम है। श्राद्ध आत्मा के गमन जिसे संस्कृत में प्रैति कहते हैं, से जुड़ा हुआ है। प्रैति ही बाद में बोलचाल में प्रेत बन गया। यह कोई भूत-प्रेत वाली बात नहीं है। शरीर में आत्मा के अतिरिक्त मन और प्राण हैं। आत्मा तो कहीं नहीं जाती, वह तो सर्वव्यापक है, उसे छोड़ दें तो शरीर से जब मन को निकलना होता है, तो मन प्राण के साथ निकलता है। प्राण मन को लेकर निकलता है। प्राण जब निकल जाता है तो शरीर को जीवात्मा को मोह रहता है। इसके कारण वह शरीर के इर्द-गिर्द ही घूमता है, कहीं जाता नहीं। शरीर को जब नष्ट किया जाता है, उस समय प्राण मन को लेकर चलता है। मन कहाँ से आता है? कहा गया है चंद्रमा मनस: लीयते यानी मन चंद्रमा से आता है। यह भी कहा है कि चंद्रमा मनसो जात: यानी मन ही चंद्रमा का कारक है। इसलिए जब मन खराब होता है या फिर पागलपन चढ़ता है तो उसे अंग्रेजी में ल्यूनैटिक कहते हैं। ल्यूनार का अर्थ चंद्रमा होता है और इससे ही ल्यूनैटिक शब्द बना है। मन का जुड़ाव चंद्रमा से है। इसलिए हृदयाघात जैसी समस्याएं पूर्णिमा के दिन अधिक होती हैं।
चंद्रमा वनस्पति का भी कारक है। रात को चंद्रमा के कारण वनस्पतियों की वृद्धि अधिक होती है। इसलिए रात को ही पौधे अधिक बढ़ते हैं। दिन में वे सूर्य से प्रकाश संश्लेषण के द्वारा भोजन लेते हैं और रात चंद्रमा की किरणों से बढ़ते हैं। वह अन्न जब हम खाते हैं, उससे रस बनता है। रस से अशिक्त यानी रक्त बनता है। रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से मज्जा और मज्जा के बाद अस्थि बनती है। अस्थि के बाद वीर्य बनता है। वीर्य से ओज बनता है। ओज से मन बनता है। इस प्रकार चंद्रमा से मन बनता है। इसलिए कहा गया कि जैसा खाओगे अन्न, वैसा बनेगा मन। मन जब जाएगा तो उसकी यात्रा चंद्रमा तक की होगी। दाह संस्कार के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में होगा, मन उसी ओर अग्रसर होगा। प्राण मन को उस ओर ले जाएगा। चूंकि 27 दिनों के अपने चक्र में चंद्रमा 27 नक्षत्र में घूमता है, इसलिए चंद्रमा घूम कर अ_ाइसवें दिन फिर से उसी नक्षत्र में आ जाता है। मन की यह 28 दिन की यात्रा होती है। इन 28 दिनों तक मन की ऊर्जा को बनाए रखने के लिए श्राद्धों की व्यवस्था की गई है।
चंद्रमा सोम का कारक है। इसलिए उसे सोम भी कहते हैं। सोम सबसे अधिक चावल में होता है। धान हमेशा पानी में डूबा रहता है। सोम तरल होता है। इसलिए चावल के आटे का पिंड बनाते हैं। तिल और जौ भी इसमें मिलाते हैं। इसमें पानी मिलाते हैं, घी भी मिलाते हैं। इसलिए इसमें और भी अधिक सोमत्व आ जाता है। हथेली में अंगूठे और तर्जनी के मध्य में नीचे का उभरा हुआ स्थान है, वह शुक्र का होता है। शुक्र से ही हम जन्म लेते हैं और हम शुक्र ही हैं, इसलिए वहाँ कुश रखा जाता है। कुश ऊर्जा का कुचालक होता है। श्राद्ध करने वाला इस कुश रखे हाथों से इस पिंड को लेकर सूंघता है। चूंकि उसका और उसके पितर का शुक्र जुड़ा होता है, इसलिए वह उसे श्रद्धाभाव से उसे आकाश की ओर देख कर पितरों के गमन की दिशा में उन्हें मानसिक रूप से उन्हें समर्पित करता है और पिंड को जमीन पर गिरा देता है। इससे पितर फिर से ऊर्जावान हो जाते हैं और वे 28 दिन की यात्रा करते हैं। इस प्रकार चंद्रमा के तेरह महीनों में श्येन पक्षी की गति से वह चंद्रमा तक पहुँचता है। यह पूरा एक वर्ष हो जाता है। इसके प्रतीक के रूप में हम तेरहवीं करते हैं। गंतव्य तक पहुँचाने की व्यवस्था करते हैं। इसलिए हर 28वें दिन पिंडदान किया जाता है। उसके बाद हमारा कोई अधिकार नहीं। चंद्रमा में जाते ही मन का विखंडन हो जाएगा।
पिंडदान कराते समय पंडित लोग केवल तीन ही पितरों को याद करवाते हैं। वास्तव में सात पितरों को स्मरण करना चाहिए। हर चीज सात हैं। सात ही रस हैं, सात ही धातुएं हैं, सूर्य की किरणें भी सात हैं। इसीलिए सात जन्मों की बात कही गई है। पितर भी सात हैं। सहो मात्रा 56 होती हैं। कैसे? इसे समझें। व्यक्ति, उसका पिता, पितामह, प्रपितामह, वृद्ध पितामह, अतिवृद्ध पितामह और सबसे बड़े वृद्धातिवृद्ध पितामह, ये सात पीढियां होती हैं। इनमें से वृद्धातिवृद्ध पितामह का एक अंश, अतिवृद्ध पितामह का तीन अंश, वृद्ध पितामह का छह अंश, प्रपितामह का दस अंश, पितामह का पंद्रह अंश और पिता का इक्कीस अंश व्यक्ति को मिलता है। इसमें उसका स्वयं का अर्जित 28 अंश मिला दिया जाए तो 56 सहो मात्रा हो जाती है। जैसे ही हमें पुत्र होता है, वृद्धातिवृद्ध पितामह का एक अंश उसे चला जाता है और उनकी मुक्ति हो जाती है। इससे अतिवृद्ध पितामह अब वृद्धातिवृद्ध पितामह हो जाएगा। पुत्र के पैदा होते ही सातवें पीढ़ी का एक व्यक्ति मुक्त हो गया। इसीलिए सात पीढिय़ों के संबंधों की बात होती है।
अब यह समझें कि 15 दिनों का पितृपक्ष हम क्यों मनाते हैं। यह तो हमने जान लिया है कि पितरों का संबंध चंद्रमा से है। चंद्रमा की पृथिवी से दूरी 385000 कि.मी. की दूरी पर है। हम जिस समय पितृपक्ष मनाते हैं, यानी कि आश्विन महीने के पितृपक्ष में, उस समय पंद्रह दिनों तक चंद्रमा पृथिवी के सर्वाधिक निकट यानी कि लगभग 381000 कि.मी. पर ही रहता है। उसका परिक्रमापथ ही ऐसा है कि वह इस समय पृथिवी के सर्वाधिक निकट होता है। इसलिए कहा जाता है कि पितर हमारे निकट आ जाते हैं। शतपथ ब्राह्मण में कहा है विभु: उध्र्वभागे पितरो वसन्ति यानी विभु अर्थात् चंद्रमा के दूसरे हिस्से में पितरों का निवास है। चंद्रमा का एक पक्ष हमारे सामने होता है जिसे हम देखते हैं। परंतु चंद्रमा का दूसरा पक्ष हम कभी देख नहीं पाते। इस समय चंद्रमा दक्षिण दिशा में होता है। दक्षिण दिशा को यम का घर माना गया है। आज हम यदि आकाश को देखें तो दक्षिण दिशा में दो बड़े सूर्य हैं जिनसे विकिरण निकलता रहता है। हमारे ऋषियों ने उसे श्वान प्राण से चिह्नित किया है। शास्त्रों में इनका उल्लेख लघु श्वान और वृहद श्वान के नाम से हैं। इसे आज केनिस माइनर और केनिस मेजर के नाम से पहचाना जाता है। इसका उल्लेख अथर्ववेद में भी आता है। वहाँ कहा है श्यामश्च त्वा न सबलश्च प्रेषितौ यमश्च यौ पथिरक्षु श्वान। अथर्ववेद 8/1/19 के इस मंत्र में इन्हीं दोनों सूर्यों की चर्चा की गई है। श्राद्ध में हम एक प्रकार से उसे ही हवि देते हैं कि पितरों को उनके विकिरणों से कष्ट न हो।
इस प्रकार से देखा जाए तो पितृपक्ष और श्राद्ध में हम न केवल अपने पितरों का श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहे हैं, बल्कि पूरा खगोलशास्त्र भी समझ ले रहे हैं। श्रद्धा और विज्ञान का यह एक अद्भुत मेल है, जो हमारे ऋषियों द्वारा बनाया गया है। आज समाज के कई वर्ग श्राद्ध के इस वैज्ञानिक पक्ष को न जानने के कारण इसे ठीक से नहीं करते। कुछ लोग तीन दिन में और कुछ लोग चार दिन में ही सारी प्रक्रियाएं पूरी कर डालते हैं। यह न केवल अशास्त्रीय है, बल्कि हमारे पितरों के लिए अपमानजनक भी है। जिन पितरों के कारण हमारा अस्तित्व है, उनके निर्विघ्न परलोक यात्रा की हम व्यवस्था न करें, यह हमारी कृतघ्नता ही कहलाएगी।
पितर का अर्थ होता है पालन या रक्षण करने वाला। पितर शब्द पा रक्षणे धातु से बना है। इसका अर्थ होता है पालन और रक्षण करने वाला। एकवचन में इसका प्रयोग करने से इसका अर्थ जन्म देने वाला पिता होता है और बहुवचन में प्रयोग करने से पितर यानी सभी पूर्वज होता है। इसलिए पितर पक्ष का अर्थ यही है कि हम सभी सातों पितरों का स्मरण करें। इसलिए इसमें सात पिंडों की व्यवस्था की जाती है। इन पिंडों को बाद में मिला दिया जाता है। ये पिंड भी पितरों की वृद्धावस्था के अनुसार क्रमश: घटते आकार में बनाए जाते थे। लेकिन आज इस पर ध्यान नहीं दिया जाता।
(वार्ताधारित)
✍🏻साभार भारतीय धरोहर

24/08/2021

द्वादश भावस्थ मंगल की अशुभता
:-सामान्यतया इस भाव से व्यय, यात्रा, शैय्या सुख, क्रयशक्ति, भोग त्याग, निद्रा आदि का विचार होता है। यदि शुभ ग्रहों की युति या दृष्टि न हो तो द्वादश भावस्थ मंगल , सप्तम भाव पर पूर्ण अष्टम दृष्टि के फलस्वरूप दाम्पत्य सुख को सीधे सीधे बाधित करता है। जिसका परिणाम उसके जीवन साथी
के स्वास्थ्य की हानि, व्यसन की लत, भाइयों से विरोध की स्थितियां प्रवृत्तियां विकसित होती हैं । कामुकता की अधिकता के कारण यौन जीवन पर से अनुशासन के बंधन क्षीण हो जाते हैं। ऐसा जातक आमतौर पर जातक क्रूरता, दूसरों के दोष निकालने में रत, और घूर कर देख के अपना दवाब बनाने की प्रवृत्ति अपनाता है। उसके बारे में झूठी अफवाहें फैलती रहती हैं । इस योग के जातक बहुमती, कामुक, बनस्पतिशास्त्र एवं प्राणिविज्ञान में रुचि लेने वाले, क्रोधी, विद्रोही, न्यूनसंतति, व्यभिचारी होते हैं। धन का जीवन में विशेष क्षय एवं अभाव होता है। दुर्घटना,
विष बाधा, अपघात, सिर दर्द, आधा सीसी दर्द, खून में एलर्जी,इन्फेक्शन,, गुप्त रोग, अपच जैसी
आधियों व्याधियों का प्रकोप रहता है।अपनी शक्ति दूसरों के काम मे लगाता है।
कल्याणवर्मा के अनुसार जातक नेत्ररोगी,
पतित, अपमानित, पत्नीघाती एवं अपराधी होता है.-
• नयनविकारी पतितो जायाघ्नः सूचकचव ।
द्वादशगे परिभूतो बन्धनभाक् भवति भूपुत्रे ।'
अशुभ फलों की मात्रा वृश्चिक और मकर में सर्वाधिक होती है। मेष, सिंह, धनु कर्क मीन में अशुभता मध्यम एवं मिथुन, तुला, कुंभ में अशुभ फल कम होते हैं। उपाय के तौर पर जातक मंगल देव् का स्तवन करे। मीठा जल सूर्य देव को प्रतिदिनअर्घ्य के रूप में अर्पित करे।घर मे जंग लगा हथियार न रखे।
सम्पर्क व्हात्सप्प 7400635055

24/08/2021

*रोजाना ये 3 चीजें खाएं घुटनों की ग्रीस अर्थात लुब्रिकेशन को 1 महीने में बढ़ाए*


*उम्र बढ़ने के साथ-साथ घुटनों की ग्रीस कम होने लगती है। लेकिन आजकल कम उम्र की महिलाओं को भी इस समस्‍या से जूझना पड़ता है। अगर घुटनों की ग्रीस खत्म हो जाए तो उनका चलना, उठना और सीढ़ी चढ़ना मुश्किल हो गया हो आज हम इस आर्टिकल में कुछ ऐसी चीजों के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्‍हें रेगुलर खाने से आप अपने घुटनों की ग्रीस को आसानी से बढ़ा सकती हैं। तो चलिए किस बात की आइए ऐसी ही 3 चीजों के बारे में जानें। लेकिन सबसे पहले ये जान लें कि आखिर घुटनों में ग्रीस कम होने का असली कारण क्‍या है?*

*घुटनों की ग्रीस कम होने के कारण*

1 रात को जागने की आदत
2 अधिक चिंता करना
3 गिरने से चोट लगना
4 अधिक वजन होना
5 कब्ज रहना
6 खाना जल्दी-जल्दी खाने की आदत
7 फास्ट-फूड का अधिक सेवन
8 तली हुई चीजें बहुत ज्‍यादा खाना
9 कम मात्रा में पानी पीना या खड़े होकर पानी पीना
10 बॉडी में कैल्शियम की कमी

*अखरोट*
घुटनों की ग्रीस बढ़ाने के लिए अखरोट काफी फायदेमंद होता है। आप हर रोज दो अखरोट का सेवन जरूर कीजिये। ऐसा करने से घुटनों का ग्रीस बढ़ने लगता है। ऐसा इसलिए क्‍योंकि अखरोट में प्रोटीन, फैट, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन ई, बी-6, कैल्शियम और मिनरल भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इसके अलावा अखरोट में एंटी-ऑक्‍सीडेंट के साथ-साथ ओमेगा-3 फैटी एसिड पाया जाता है। यह एक प्रकार का फैट है जो सूजन को कम करने में हेल्‍प करता है।

*हरसिंगार के पत्‍ते*
हरसिंगार जिसे पारिजात और नाइट जैस्मिन भी कहते हैं। इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। इसके पौधे आपको अपने घर के आस-पास भी देखने को मिल जाएंगे। इस पेड़ के पत्‍ते जोड़ों के दर्द को दूर करने और घुटनों की ग्रीस बढ़ाने में मददगार होते हैं। इसके पत्तों में टेनिक एसिड, मैथिल सिलसिलेट और ग्लूकोसाइड होता है ये द्रव्य औषधीय गुणों से भरपूर हैं। घुटनों की ग्रीस बढ़ाने के लिए हरसिंगार के 3 पत्तों को पीसकर पेस्ट बना लें। फिर इस पेस्ट को 1 बड़े गिलास पानी में मिलाकर धीमी आंच पर पकाएं। जब पानी आधा से भी आधा रह जाये तब इसे छानकर हल्‍का ठंडा करके पियें। इस काढ़े का सेवन सुबह खाली पेट करें।

*नारियल पानी*
खाली पेट नारियल का पानी पीने से भी घुटनों में लचीलापन आता है। एक महीना इस उपाय को करके देखें। आपको बहुत फायदा मिलेगा! जरूरी विटामिन और मिनरल के अलावा यह मैग्नीज जैसे तत्वों से भरपूर है। सूखने के दौरान इसमें नेचुरल ऑयल बनने लगता है जो हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूत करता है।

*अगर आपके घुटनों में भी ग्रीस की प्रॉब्लम है और चलते समय आपको दर्द होता है। तो आज से ही इन चीजों का सेवन करना शुरू कर दीजिये। यकीन मानिये ये उपाय आपके लिए बहुत फायदेमंद होता है।*
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24/08/2021

*ज्योतिष और विवाह टूटने की समस्या*
विवाह एक संस्कार है जो अधिकतर विच्छेद होता है राहु शनि मंगल और केतु के कारण।अगर हम मेष राशि की बात करें तो सप्तम भाव तुला राशि का बनता है और यह शुक्र का घर है जिसमें शनि की सर्वोच्च स्थिति होती है यानी शनि जब गोचरवश वहां आएगा,तब तक विवाह बिल्कुल बढ़िया रहेगा, कोई गड़बड़ नहीं होती लेकिन जैसे इस लग्न में अधिकतर जब जैसे ही शनि की दृष्टि सप्तम भाव पर पड़ती है तो वैचारिक मतभेद इस कदर होंगे कि एक पूर्व पश्चिम हो जाता है। शनि न्याय का करता है और न्यायालय तक ले भी जाता है। लेकिन जैसे ही विवाहित जीवन में न्यायालय ,कोर्ट कचहरी का प्रवेश होता है, विवाहित जीवन जीर्ण शीर्ण हो जाता है ।इसलिए घर की बात घर मे ही रहे तो बहुत अच्छा।यदि वृषभ वालों की बात कर बात करें तो सप्तम भाव वृश्चिक राशि का बनता है। वृश्चिक यानी पाताल लोक ।वृश्चिक में कारकत्व वृहस्पति को मिलता है । बृहस्पति यानी *स्थान हानि करो जीवा* यद्यपि सूर्य चंद्र वृहस्पति को दोष नही लगता क्योंकि
रवि पावक सुरसरि की नाई
समरथ कहूँ नहिं दोष गुसाईं।
यहां तलाक बहुत कम होते हैं भगवान कृष्ण की 16108 रानियां थी।किसी से भी सम्बन्ध विच्छेद नही हुआ । सप्त ऋषियों में पांच ऋषि मानते हैं कि वृषभ में केतु उच्च का होता है। केवल याज्ञवल्क्य औए जेमिनी ने मिथुन का माना। फिर भी यदि वृषभ लग्न में यह समस्याएं आती हैं तो शुक्र के उपाय करना चाहिए। मिथुन लग्न में सप्तम वृहस्पति होते हैं। लेकिन काल पुरुष की कुंडली और लाल किताब के हिसाब से वृहस्पति को नवम भाव भी प्राप्त है ,इसलिए मिथुन वाले की किस्मत विवाह के बाद चमकती है।हालांकि वृहस्पति को यहां केंद्राधिपति दोष भी लगता।यदि मिथुन राशि या लग्न वाला आजीवन कुंवारा रहे और माँ दुर्गा को इष्ट बनाकर साधना करे तो सर्व सिद्धि प्राप्त कर सकता है। लेकिन मिथुन का जातक जिस दिन पत्नी का अपमान करता है, उस दिन बस वृहस्पति दूषित हो जाता है और फिर विवाह विच्छेदन कि स्थितियां बनती हैं ।विच्छेदन ना भी हुआ तब भी वैचारिक मतभेद और नफरत ही नफरत जीवन में भर जाती है।
कर्क में शनि सप्तमेष होते हैं ।और इस कारण ऐसा व्यक्ति संकल्पयुक्त होता है।रिश्तो को निभाने में सक्षम होते हैं ।अगर कोई गड़बड़ हो तो कमर तक जल में खड़े होकर सूर्य देव् को अर्घ्य दिया जाए तो विवाह विच्छेदन रुक जाता है।
क्रमशः........

23/08/2021

*बीड़ी-तम्बाकू की लत या धूम्रपान की आदत छुड़ाने के लिए*

१०० ग्राम अजवायन और १०० ग्राम सौंफ बड़ी लेकर दोनों को खूब साफ कर लें और इसमें ६० ग्राम काला नमक मिलाकर इन तीनों को पीस लें। तत्पश्चात् इस मिश्रण में दो नींबू का रस मिलाकर रात भर (पूर्णिमा की रात को चन्द्रमा की चांदनी
में सुरक्षित रखना अधिक अच्छा है) रखा रहने दें। दूसरे दिन प्रातः इस मिश्रण को तवे पर धीमी आंच पर सुखाकर साफ शीशी में भरकर रख लें अथवा गर्म पानी का छींटा देकर चने के बराबर गोलियां बनाकर सुरक्षित रख लें। बस, दवा तैयार है।
सेवन-विधि-जब भी धूम्रपान या तम्बाकू की इच्छा या तलब उठे तब थोड़ा चूर्ण लेकर मुंह में डालकर चबाएं अथवा बीड़ी-तम्बाकू की इच्छा जगने पर १-१ गोली दिन
में ४-६ बार चूसें। ऐसा कुछ दिन लगातार करने से यह बुरी आदत अपने-आप छूट जाएगी। साथ ही अन्य कई लाभ होंगे, जैसे गैस की तकलीफ मिटना, पाचनशक्ति
में वृद्धि होना, भूख खुलकर लगना, रक्त सुधरना, सुगन्ध और स्वाद से चित्त प्रसन्न रहना आदि-आदि। इसके सेवन से पान आदि में जर्दा या तम्बाकू सेवन से बिगड़े हुए दांत और दांत-दर्द में लाभ होगा तथा चालीस दिन तक सेवन से भीतर के तम्बाकू के दाग भी साफ हो जाएंगे।
*सहायक उपचार*-यदि इस औषधि के सेवन के साथ हल्का सुपाच्य व भूख से कम भोजन लें तथा प्रातः भ्रमण, योगासन व प्राणायाम करें तो शीघ्र लाभ होगा।
*विकल्प* (१)-आप यदि बीड़ी-सिगरेट तम्बाकू की लत छोड़ना चाहते हैं पर छूटती
न हो तो आप यदि एक छोटी हरड़ (काली, जंगी, जो हरड़ जो पंसारी से मिलती है) के छोटे-छोटे टुकड़े करके रख लें। जब भी इन चीजों की इच्छा या तलब उठे तब छोटी हरड़ का एक टुकड़ा मुंह में डाल लें और धीरे-धीरे चूसें। इससे कुछ ही दिनों में बीड़ी-सिगरेट तम्बाकू की बुरी आदत छूट जाती है।
विकल्प (२)-बीड़ी सिगरेट छुड़ाने के लिए-दालचीनी को बारीक पीसकर शहद में मिलाकर एक डिब्बी या कांच की शीशी में रख लें। जब बीड़ी सिगरेट की तलब लगे एक उंगली यह औषधि चाट लें।
*विकल्प* (३)-प्याज का रस (२५ ग्राम) नियमित रूप से नित्य एक बार सेवन करने से तम्बाकू विष उतर जाता है और तम्बाकू खाने की आदत धीरे-धीरे छूट जाती है।
*विकल्प* (४)–बिना दवा के इलाज-यदि आप उपरोक्त दवा की सहायता भी नही लेना चाहें और एकदम बीड़ी-तम्बाकू की लत छोड़ने के लिए आवश्यक दृढ़ता
न जुटा पाएं तो इसका विकल्प यह है कि धीरे-धीरे कम करते हुए बीड़ी या सिगरेट छोड़ दें। उदाहरणार्थ यदि आप रोजाना ४० सिगरेट पीते हैं तो प्रतिदिन एक-एक सिगरेट
कम करते जाए। इस प्रकार चालीस दिन बाद सिगरेट की बुरी आदत से सदा के लिए छुटकारा मिल जाएगा। तत्पश्चात् यह कसम खा लेंगे कि सिगरेट अथवा बीड़ी
कदापि नहीं छुएंगे। इसी प्रकार आप अफीम आदि नशीली वस्तुओं की आदत के चंगुल से भी मुक्ति, आप दृढ़ संकल्प शक्ति अथवा इच्छा शक्ति के बल पर, पा सकते हैं।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

22/08/2021

*माथे पर तिलक और ज्योतिष*

तिलक लगाने की हमारी सनातन परम्परा रही है।एक तिल के बराबर भी यदि मस्तक पर चिन्ह बनाया जाए तो उसे तिलक कहा जाता है।तिल जिसे हम सब जानते हैं ।तिल गणित की इकाई ,मानक या मेजरमेंट भी है।तिल का दान हजारों यज्ञों के बराबर माना गया है । ज्योतिष में केतु ग्रह तिलक का प्रतीक है यानी न सिर ना पैर ,वही तिलक कहलाया।क्योंकि सामान्यतया तिलक का सिर और पैर नही होता। केतु को परमोच्च स्थिति में ले जाने के लिए वेदों में भूरी भूरी प्रशंसा की गई है। इसे मोक्ष का कारक भी माना गया है। अश्विनी नक्षत्र तिलक का प्रतीक है। इसके चार चरण होते हैं और चारों चरणों में तिलक की भूरी भूरी प्रशंसा की गई है। तिलक शांति ,संतुष्टि, और परमानंद की अवस्था को भी निरूपित करता है। कहा गया कि यदि मरणासन्न व्यक्ति को उसके मस्तक पर चंदन का लेप कर दिया जाए 8 घंटे 8 मिनट 8 वर्ष तक उसकी आयु बढ़ती है ।सर्वोत्तम तिलक केसर का माना गया है, जो गजकेसरी योग को निरूपित करता है ।हल्दी और चंदन का तिलक गुरु और शुक्र को रीप्रजेंट करता है ।जिसका केसर की तरह रंग हो जाता है।जिन जातकों का चंद्रमा कमजोर होता है, उनको सफेद चंदन या चावल का तिलक चंदन के साथ लगाना सर्वश्रेष्ठ माना गया है। यदि मंगल नीचस्थ हो लाल सिंदूर को सफेद चंदन के साथ मिलाकर लगाने से यह तिलक मंगल ग्रह की उच्चता को स्थापित कर देता है ।अगर जातक शनि से पीड़ित हो तो राख,भस्म या काला तिलक लगाने की व्यवस्था वेदों में दी गई है।इससे शनि की पीड़ा समाप्त होती है। चावल के साथ चंदन व हल्दी का तिलक शुक्र को मजबूत करता है। वैभव, लक्ष्मी व स्त्री प्राप्ति कराने वाला माना गया है। राशिनुसार मेष को लाल तिलक,वृष-सफेद तिलक,मिथुन -सफेद चंदन का तिलक,कर्क -चन्दन के साथ सफेद या लाल तिलक,सिंह- लाल तिलक, कन्या -वक्ष स्थल पर सफेद तिलक ,तुला- श्री प्राप्ति के लिए भूरे या मटमैले रंग का तिलक, वृश्चिक -लाल सिंदूर का तिलक लगाने से मंगल बलवान व व्यक्ति हृष्ट पुष्ट रहता है,धनु -केसर का तिलक,मकर- चमकता हुआ तिलक,कुम्भ -काला या भस्म , भभूति का तिलक ,मीन- चन्दन के साथ चावल अथवा रँगे हुए अक्षत का तिलक लगाने का विधान है।
For any consult 7400635055

19/08/2021

शनिदेव् और उनके कारकत्व का सम्मान सफलता का सूचक

ज्योतिष शास्त्र में शनि विशेष प्रभावकारी ग्रह माना गया है। इसके देवता भैरवजी हैं। विशाल आकृति वाले, सुन्दर और वलय युक्त इस ग्रह को उसकी मंद गति के कारण शनिश्चर के नाम से जाना जाता है। इनका पक्का घर 10वां तथा श्रेष्ठ घर 2, 3, 7, 12 है। बुध, शुक्र, राहु मित्र तथा सूर्य, चंद्र व मंगल शत्रु ग्रह हैं। सम ग्रह केतु और बृहस्पति हैं। यह खांसी, नेत्र रोग व उदर पीड़ा पैदा करने वाला काला-स्याह रंग का ग्रह है। इसका दिन शनिवार तथा समय सारी रात का अंधकार है। शनि से आय, मृत्यु, धन, मकान, संतान प्राप्ति, हानि, मुकदमा आदि देखा जाता है। शनि शुभ होने पर जातक को मालामाल कर देता है, परंतु खराब होने पर सारे काम बिगाड़
दरिद्र बना देता है। भारतीय पुराणों के अनुसार सूर्य-पुत्र शनि को काफी प्रभावशाली तथा क्रूर ग्रह माना जाता
है। शनि के शुभ होने पर जातक मशीनरी, कारखाना, लोहा-लकड़ी, भट्ठा, चमड़ा, सीमेंट व तेल उद्योग से जुड़ा होता है तथा बिगड़ने पर पेट का रोगी तथा धन-सम्पत्ति का क्षय करने वाला बन जाता है।
शनि के मंदा होने पर मकान गिर पड़ता है, भैंस मर जाती है, अग्निकांड में सब कुछ जल जाता है। इसके मंदा होने की पहचान है आंख-कान की बीमारी का होना, जातक द्वारा मद्यपान एवं मांसाहार का सेवन करना,इश्कबाजी में समय तथा धन बरबाद करना।

अनुभव में आया है कि जब लग्न में शनि बैठा हो और अष्टम में
तो अष्टम में शनि हो तब वह साल बहुत कष्टमय हो जाता है।। लग्न का ग्रह अष्टम आए हुए ग्रह को टक्कर मार कर खराब देता है। प्राचीन ज्योतिष ने भी षड़ाष्टक दोष को बहुत खराब माना है उसको लाल किताब ने भी अपनाया है क्योंकि लग्न में बैठे ग्रह आठवें
भाव के ग्रह से छठे हो जाता है इसलिए लगन की कुर्सी पर बैठा होकर आठवें घर के ग्रह को खराब करना शुरू कर देता है और फिर आठवें घर ग्रह अपनी सहायता के लिए दौड़ता है सहायता उसके अपने से यानी पंचम घर से प्राप्त होती है अर्थात् अष्टम से पंचम 12 वां घर हुआ। अगर बारहवें में
मित्र बैठा है तो सहायता मिलेगी अगर शत्रु बैठा है तब सहायता नहीं
मिलेगी जब सहायता नहीं मिलेगी तब परेशानी पैदा होगी और इस उस परेशानी को दूर करने के लिए अष्टम में बैठे हुए ग्रह को हटाना होगा। जल प्रवाह करने से चौथे में चला जाएगा लेकिन जल प्रवाह करने के पहले यह देख लेना चाहिए कि उसका कोई शत्रु चौथे में न बैठा हो अगर चौथे में उसका शत्रु बैठा है तब उस ग्रह के प्रभाव को सप्तम या अष्टम में रहने दे।
सप्तम घर वीरान पड़ी हुई जमीन है वहां पर उस ग्रह की वस्तु को पहुंचा दे अर्थात कच्ची जमीन पर डाल दे जिसे कोडे-मकोडे खा लें । कुंडली का अष्टम घर है।
मरघट घाट या श्मशान घाट अतः उस ग्रह से सम्बंधित वस्तु शमशान के अन्दर कायम कर दे जैसे किसी का गुरु अष्टम घर में बैठा है तब वह जातक पीपल का पेड़ श्मशान घाट के अन्दर लगा दे। पीपल से छाया और लकड़ी मिलेगी और गुरु अच्छा फल करना शुरू कर देगा।
(कुंडली निर्माण, फलादेश,विश्लेषण ,समस्या समाधान उपाय 7400 635055 व्हात्सप्प)🙏🙏🙏🙏

19/08/2021

*दमा (श्वास)की समस्या का घरेलू उपचार*
सुहागा का फूला (कच्चे सुहागे को गर्म तवे पर पिघलाकर बनालें) और मुलहठी का अलग-अलग खरल कर या कूटपीसकर, कपड़छान
कर, मैदे की तरह बारीक चूर्ण बना लें। फिर इन दोनों औषधियों को बराबर वजन
मिलाकर किसी शीशी में सुरक्षित रख लें। बस, श्वास, खांसी, जुकाम की सफल दवा तैयार है।
सेवन-विधि- [-साधारण मात्रा आधा ग्राम से एक ग्राम तक दवा दिन में दो-तीन बार शहद के साथ चाटें या गर्म जल के साथ लें। बच्चों के लिए १/८ ग्राम(एक रत्ती) की मात्रा या आयु के अनुसार कुछ अधिक दें। *परहेज-दही, केला, चावल, ठण्डे* *से सफल चिकित्सा कि सस्ता* आसानी से सर्वत्र उपलब्ध होने
वाला, बनाने में सरल, हानिरहित और शीघ्र प्रभावकारी है। २.ताजा जुकाम तो कोचुटकी भर दवा एक बूंट गर्म पानी में घोलकर दिन में तीन बार पिलाने से एक-दो दिन में ही समाप्त हो जाता है। इस योग का मुख्य घटक अकेला सुहागा (फूला हुआ)*
के बारीक चूर्ण का प्रयोग भी सर्दी-जुकाम में चमत्कारिक फल देने वाला है।कठिन खांसी,
क्रुप, काली खांसी, जीर्ण खांसी और खांसी की सभी अवस्थाओं में ‘सुहागा और
मुलहठी का चूर्ण' शहद के साथ लेना उत्तम औषधि सिद्ध हुई है। खांसी की
*खास औषधि होने के साथ वह उन श्वास-रोगियों के लिए अत्यन्त लाभदायक है जिन्हें*
*गाढा-गाढ़ा बलगम बनने की शिकायत है और इतना खांसना पड़ता है* *कि जब तक*
*बलगम बाहर नहीं निकलता* *चैन नहीं पड़ता।* उन्हें यह दवा शहद या मिश्री की चासनी
या केवल गला कत्था लगाये पान के साथ लेनी चाहिए। रात्रि सोते समय साधारण से दुगुनी मात्रा लेने से श्वास रोगी के रात्रि-कष्ट में काफी कमी हो सकती है।
*आवश्यकतानुसार तीन-चार सप्ताह लेने से साधारण दमा दूर हो जाता है।* यह बलगम को पाखाना के जरिए भी निकाल देती है। (घ) यदि बलगम कच्चा, थूक की तरह निकलता हो तो इस दवा की एक चुटकी मुंह में डालकर धीरे-धीरे चूसे। कफविकार ठीक होगा। जरूरत समझें तो बाद में एक घूंट कप सादा या गुनगुना पानी पिया जा सकता है। msg on 7400635055
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18/08/2021

*दशम भाव मे सूर्य और लाल किताब का फरमान व उपाय*

सूर्य इस घर में शनि से प्रभावित होगा और सूर्य के बैठने से शनि
पैतृ-ऋण का ग्रह बन जाएगा। इसलिए शनि जिन चीजों का कारक है उससे संबंधित वस्तु का नुक्सान करेगा। अर्थात् मकान दुकान बनाने में परेशानी आएगी इसलिए शनि का ऋण उतारे अर्थात् मजदूर की मजदूरी दिया करे। 100 मजदूरों को एक दिन खाना खिलायें यां आटे की 100
गोली बनाकर एक-एक करके हर साल चलते पानी में जल प्रवाह कर दिया करें। सूर्य को अच्छा रखने के लिए दूसरा उपाय लिखा है कि जातक अपने सिर पर (ताज) टोपी लगाये या पग बांधा करे लेकिन उसका रंग काला नीला न हो क्योंकि काला-नीला रंग राहु-शनि का है अब अगर
देखा जाए तो जब भी कोई पूजा करने के लिए बैठता है तब अपना सिर ढक लेता है कुछ लोग दूसरे केपास जाकर अपना पग उतार कर रख देते
हैं, और कहते हैं कि मेरी पग की लाज रखें। पुलिस और फौज में टोपी
की लाज होती है। राजा महाराजा अपने सिर पर ताज लगाकर रखते थे
और जब भी कोई राजा अपनी सन्तान को अपना वारिस बनाता था तब उसे अपनी टोपी, पग या ताज सौंप देते हैं। मुसलमान और ईसाई अपने सिर पर टोपी लगाकर रखते हैं। हिन्दू औरतें साड़ी पहनती हैं तब भी
अपना सिर ढक कर रखती थी सिक्ख अपने सिर पर पग बांध कर रखते
हैं और औरतें जूड़ा रख कर अपना सिर ढक कर रखती हैं। सिर ढक कर रखने से गुरु का प्रभाव अच्छा हो जाता है। इसलिए लाल किताब सिर
ढक कर रखने से रोजगार ठीक बना रहने के बारे में बताती है।
7400635055 whatsapo

16/08/2021

*भोजन की इच्छा न होना और भूख की कमी*
एक ग्राम से तीन ग्राम अदरक को छीलकर बारीक कतर लें और थोड़ा सा सैंधा
नमक (या साधारण नमक) लगाकर भोजन से आधा घंटे पहले दिन में एक बार आठ
दिन खायें। हाजमा ठीक होगा। भूख लगेगी। पेट की हवा साफ होगी।
विशेष-(१) भोजन में प्रथम नमक एवं अदरक का सेवन अग्नि दीपक, रुचिकारक
व जीभ तथा कंठ का शोधक है। पेट दर्द, अफारा, बदहजमी, पेचिश और कब्ज का
नाशक है। (२) अदरक और सेंधा नमक के मिश्रण पर यदि कुछ बूंदें नींबू का रस
भी निचोड़ कर मिला लें और भोजन के पहले खायें तो अफारा, गुल्म और उदर-शूल
नष्ट होता है। अजीर्ण नष्ट होकर अग्नि प्रदीप्त होती है और भोजन में रुचि पैदा
होती है। वायु, कफ, कब्ज एवं आमवात का नाश होता है।
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