Osho Utsav Commune

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"परमात्मा हजार-हजार ढंग से तुम्हारे द्वार पर दस्तक देता है। तुम हजार-हजार ढंग से अपने को समझा लेते हो, कुछ और होगा, कोई ...
08/10/2021

"परमात्मा हजार-हजार ढंग से तुम्हारे द्वार पर दस्तक देता है। तुम हजार-हजार ढंग से अपने को समझा लेते हो, कुछ और होगा, कोई राहगीर होगा, या कोई भिखमंगा आ गया होगा, या हवा का झोंका आया होगा। उसकी पगध्वनियां बहुत बार तुम्हारे करीब आती हैं। तुम्हारे हृदय की धड़कन से भी ज्यादा करीब उसकी पगध्वनियां हैं। सत्य तुम्हारे तुमसे भी ज्यादा करीब है, क्योंकि सत्य तुम्हारा स्वभाव है। एस धम्मो सनंतनो। लेकिन तुम अपने ऊहापोह में ऐसे उलझे हो कि जो निकटतम है, समीपतम है, वह भी सुनाई नहीं पड़ता।"
*OSHO - SATSANG *
आज सत्संग की कुछ बात करें। इन सूत्रों में सत्संग की ही आधारशिला है। सत्संग से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ और नहीं है। अंधे को जैसे आंख मिल जाए, या गूंगे को जबान; या मुर्दा जैसे जग जाए और जीवित हो जाए, ऐसा सत्संग है। सत्संग का अर्थ है : तुम्हें पता नहीं है; किसी ऐसे का साथ मिल जाए जिसे पता है, तो जैसे तुम्हें ही पता हो गया; तो जैसे तुम्हारे हाथ में अंधेरे में मशाल आ गई।

सत्संग का अर्थ है जैसे तुम अंधकार में हो और अचानक बिजली कौंध जाए। एक रोशनी चारों तरफ फैल जाए। फिर चाहे अंधेरा घिर जाए लेकिन तुम दुबारा वही न हो सकोगे। तुम फिर अंधेरे में न हो सकोगे। अब तुम जानते हो कि रास्ता है। अब तुम जानते हो कि मंजिल है। सत्संग में न केवल तुम्हें रास्ते का पता चलता है, मंजिल का पता चलता है। तुम्हें उस आदमी का भी स्वाद मिल जाता है, जो मंजिल पर पहुंच गया है। तुम्हें अपने भविष्य की झलक मिलती है। तुम जो हो सकते हो, उसका सपना जगता है। तुम जो नहीं हो पा रहे हो उसकी पीड़ा पैदा होती है।

सत्संग परम सुख भी है, परम पीड़ा भी।

पीड़ा-कि गंवाया बहुत। पीड़ा-कि अब तक व्यर्थ ही भटके। पीड़ा-कि अब तक चले तो बहुत, लेकिन पैर मार्ग पर न पड़े। पीड़ा-कि जन्मों-जन्मों में कितनी यात्रा की, और इंचभर मंजिल से दूरी कम न हुई।

और सुख, एक महासुख, कि भला हम न पहुंचे हों, कोई और हम जैसा पहुंच गया। भला हम न पहुंचे हों, लेकिन पहुंचना संभव है। भला हम न पहुंचे हों, लेकिन मनुष्य पहुंच सकता है, यह भरोसा।

पीड़ा बड़ी है, लेकिन सत्संग का सुख उससे भी बड़ा है। पीड़ा के उन्हीं कीटों के बीच सत्संग का गुलाब खिलता है, फूल खिलता है। अपने लिए तुम रोते हो, लेकिन अब किसी और के लिए, और किसी और में अपने भविष्य की झलक पाकर अपने लिए भी नाचते हो।

सत्संग कुछ ऐसी बात है, जिसका पूरब को पता है, पश्चिम को पता ही नहीं। वह आयाम पश्चिम से अपरिचित ही रह गया। और आधुनिक मनुष्य, चाहे पूरब में हो चाहे पश्चिम में, करीब-करीब पश्चिम का है, पाश्चात्य है। इसलिए आधुनिक मनुष्य को भी सत्संग का राज चूका जाता है। पूरब में हमने एक अनूठी बात जानी, कि कुछ ऐसे राज हैं कि अगर तुम जानने वाले आदमी के पास बैठ भी जाओ तो तुम्हें रूपांतरित कर देते हैं।

सदगुरु केटालिटिक है। कुछ करता नहीं और तुम्हारे भीतर कुछ हो जाता है। उसकी मौजूदगी काफी है। उसकी मौजूदगी करती है। तुममें भर इतना साहस चाहिए कि तुम अपने द्वार-दरवाजे थोड़े उसके लिए खोलो। तुममें इतना साहस चाहिए कि तुम अपनी आंख को मींचकर न बैठे रहो। आंख थोड़ी खोलो। तुममें इतना साहस चाहिए कि तुम उसका स्वागत करो कि आओ मेरे भीतर, पधारो।

तुम्हारी तरफ से इतना आमंत्रण-और ऐसी रोशनी जो तुमने कभी नहीं जानी, अचानक तुम्हारे भीतर उतरने लगती है। ठीक होगा कहना, उतरती नहीं, तुम्हारे भीतर जगती है। तुम्हारे भीतर सोई पड़ी थी। समान-समान से आंदोलित हो जाता है। समान -समान से आकर्षित हो जाता है। समान की समान पर कशिश है।

तो जब किसी व्यक्ति के भीतर रोशनी का सागर होता है, तो तुम्हारे भीतर का सोया सागर भी करवट लेने लगता है। दूसरे की वासना तुम्हारी वासनाओं को जगा देती है। दूसरे की कामना तुम्हारी कामनाओं में अंकुरण कर देती है। दूसरे का कामना-मुका जीवन, तुम्हारे भीतर भी नए आयाम की शुरुआत होती है। दूसरे का करुणा से भरा हुआ हृदय तुम्हारे भीतर भी क्षणभर को उन ऊंचाइयों पर तुम्हें उठा देता है, जिन पर तुम अभी गए नहीं। जैसे छोटा बच्चा अपने बाप के कंधों पर बैठकर बाप से भी ऊंचा हो जाता है। जहां तक बाप को भी नहीं दिखाई पड़ता, वहां तक छोटे बच्चे को दिखाई पड़ने लगता है-बाप के कंधों पर।

सत्संग का अर्थ है किन्हीं के चरणों में इतना झुक जाना, किन्हीं के प्रति इतना समर्पित हो जाना, कि तुम उन कंधों पर बैठने के हकदार बन सको। गुरु तुम्हें कंधों पर उठा लेता है। लेकिन उस उठाने के पहले जरूरी है कि तुम छोटे बच्चे की तरह झुक जाओ। तुम छोटे बच्चे की तरह निर्दोष हो जाओ।

सत्संग की बड़ी कीमिया है, अल्केमी है। उसका अपना पूरा शास्त्र है। बाहर से खड़ा कोई देखता रहे तो उसे पता भी न चलेगा। यह कोई जोर-जोर से होने वाली वार्ता नहीं है। यह तो दो दिलों के बीच होने वाली गुफ्तगू है। यह तो दो दिलों के बीच होने वाली फुसफुसाहट है। कानों-कान इसकी किसी को खबर भी नहीं होती। बात कही भी नहीं जाती और पहुंच जाती है। कुछ किया भी नहीं जाता और क्रांति घट जाती है। बस, इतना ही चाहिए कि तुम आंख खोलकर देखने को तैयार हो।

सदगुरु यानी सत्संग।

सदगुरु का कुछ और उपयोग नहीं है। एक अर्थ में सदगुरु बिलकुल ही गैर-उपयोगी है। तुम अगर संसार में उसका उपयोग खोजने जाओ तो कुछ भी उपयोग नहीं है। तुम उसे बेचने जाओ संसार में तो कुछ मूल्य न पा सकोगे। बाजार में उसकी कोई कीमत नहीं। क्योंकि सदगुरु कोई कमोडिटी, कोई बाजार की दुकान पर बिकने वाली चीज नहीं है। वस्तुत: उपयोगिता के जगत में उसका कोई भी मूल्य नहीं।

सदगुरु का मूल्य निर-उपयोगिता के जगत में है। या उस जगत में है, जहा हम उपयोगिता के भी पार उठते हैं। अतिक्रमण होता है फूलों के जगत में, सुगंधों के जगत में। जहा होना ही आनंद है। जहां हम किसी और क्षण के लिए नहीं जीते। जहा जीवन एक साधन नहीं है, परम साध्य है। जहां प्रतिक्षण मोक्ष है, मुक्ति है।

सदगुरु के पास होना सदगुरु का उपयोग है।

सत्संग का अर्थ है पास होना।

उपनिषद शब्द का भी यही अर्थ है। उपनिषद का अर्थ है गुरु के पास होना। उपनिषद की वर्षा हुई उन लोगों पर, जो गुरु के पास हो गए। उन पर फूल ही बरस गए। उनके जीवन में नए चांद-तारों का आविर्भाव हुआ।

पास कैसे होओगे? समर्पण की कला सीखो, तो सत्संग उपलब्ध होता है। समर्पण के बीज से ही सत्संग का फूल खिलता है।

बुद्ध के ये सूत्र सत्संग के सूत्र हैं। पहला

‘यदि मूढ़ जीवनभर पंडित के साथ रहे तो भी वह धर्म को वैसे ही नहीं जान सकता है, जैसे कलछी दाल के रस को नहीं जानती।

रहती जीवनभर साथ है। कलछी दाल में ही पड़ी रहती है। लेकिन दाल का रस उसे कभी पता नहीं चलता।

न सो धम्म विजानाति दब्‍बी सूपरसं यथा।

ऐसे ही मूढ़-वही छू है बस, जो सत्संग का अवसर पाकर भी वंचित रह जाए। ऐसा अपूर्व अवसर मिले और जो कलछी की तरह दाल में पड़ा रह जाए और जिसे स्वाद न आए।

मूढ़ता का एक ही अर्थ है कि जो अपने को खोले न, बंद रखे।

ऐसे मूढ़ तो अपने मन में यही समझता है कि बड़ा होशियार है। वह मूढ़ का लक्षण है, कि वह अपने को होशियार समझता है। अपनी होशियारी में ही मरता है। होशियारी ही ले डूबती है।

मैंने यही देखा। नासमझों को पार होते देखा, समझदारों को डूब जाते देखा। नासमझी नाव भी बन जाती है। लेकिन समझदारी तो सिर्फ डुबाती है, सिर्फ डुबाती है। क्योंकि अहंकार वजनी चट्टान है। गर्दन से बांध ली तो नदी पार न हो सकोगे। अकेले तो पार हो भी जाते। बिना नाव के भी पार हो जाते। नदी नहीं डुबाती, नदी ने कभी किसी को नहीं डुबाया। गर्दन में बंधी चट्टान डुबाती है। और तुम अपनी कुशलता में, अपनी समझदारी में बड़ी से बड़ी चट्टानों को ढोने का आग्रह रखते हो। तुम्हारी चेष्टा यही है कि तुम परमात्मा में ‘तुम’ रहते प्रविष्ट हो जाओ। बस, यह ‘तुम’ ही गले में बंधी चट्टान है। यह अहंकार ही ले डूबेगा।

मूढ़ का अर्थ है : जो अपनी समझदारी में अपने को बचाए चला जाता है। थोड़ा समझना, क्योंकि थोड़ी न बहुत मूढ़ता सभी के भीतर है। कम ज्यादा हो, मात्रा में फर्क हो, है तो जरूर। तो समझने की कोशिश करना। मूढ़ता का अर्थ है : तुम सोचते हो कि तुम बड़ी बहुमूल्य चीजें बचा रहे हो।

कल एक युवती ने मुझे कहा कि वह बगावती है, विद्रोही है। तो कुछ भी उसे कहा जाए, उससे उलटा करती है।

अब यह मूढ़ता का लक्षण हुआ। लेकिन वह अंकड़ी है। उसका खयाल है, रसके पास कुछ बेजोड़ व्यक्तित्व है। बगावती है, विद्रोही है।

अहंकार बड़ी तरकीबें खोजता है। बगावत के आभूषण खोजता है। विद्रोह के आवरणों में छिप जाता है। अच्छे-अच्छे नारे लिख लेता है अपने चारों तरफ। उनके बीच सुरक्षित हो जाता है। अब यह भी मूढ़ता की बात हुई कि जो भी कहा जाए, उसी को ही कहने में कठिनाई मालूम पड़ती है।

जरूर न कहने की तैयारी रखो। बहुत कुछ है जिंदगी में जिसको न कहना है। अगर न कहना नहीं जानते तो तुम्हारे ही कहने का कोई भी अर्थ नहीं, कोई मूल्य नहीं। तुम्हारी हा कचरा है। तुम्हारे न से ही बल आता है, शक्ति आती है। जरूर न कहने की तैयारी रखो, लेकिन न कहने की तैयारी का मतलब इतना ही है कि हां कहने की तैयारी में सहयोगी हो। नकार अपने आप में मूल्यवान नहीं है। जरूर घास-पात को काटो, लेकिन फूलों के बीज भी बोओ। जरूर व्यर्थ को जलाओ, लेकिन सार्थक को सम्हालो भी। कंकड़-पत्थर को छोड़ो, निश्चित छोड़ना ही है, लेकिन हीरों को मत फेंक देना। न कहो, लेकिन हर चीज के लिए न कहोगे? तब तो आत्मघात हो जाएगा। तुम्हारा इंकार बगावत न हुई, आत्महत्या हुई।

जरूर न कहो, पर तुम्हारी न तुम्हारे अत्यंत विवेक से निकले, विद्रोह से नहीं। न कहने के मजे से नहीं, न कहना है इसलिए नहीं, न कहने के लिए नहीं। हां की तलाश में बहुत न भी कहनी पड़ेगी। हीरों की खोज में बहुत पत्थर छोड़ने पड़ेंगे। लेकिन खोज पर नजर रहे। ध्यान विधेय पर हो; नकार का उपयोग कर लेना है। उपनिषद कहते हैं, नेति-नेति विधि है ब्रह्म को पाने की। न कहना.? न कहना विधि है ब्रह्म को पाने की : यह भी नहीं, वह भी नहीं। लेकिन ध्यान रखना, खोजते चले जाना। यह तो न कहना तो सिर्फ उपाय है, ताकि व्यर्थ का इंकार हो जाए, सार्थक बच रहे, सार्थक में डुबकी लग जाए।

अब अगर न कहना ही जीवन की आदत हो जाए, यह जीवन की शैली बन जाए, कि तुम ही कहने में असमर्थ हो जाओ, पंगु हो जाओ, कि ही तुमसे निकल ही न सके, कि हा की गरदन तुम घोंट दो भीतर, तो फिर तुमने आत्महत्या कर ली। यह फिर मूढ़ता हो गई। फिर नहीं ने तुम्हें मारा। फिर नहीं तुम्हारी कब्र बन गई। फिर तुम नहीं का उपयोग न कर सके। नहीं ने ही तुम्हारा उपयोग कर लिया।

मत कहो इसे विद्रोह। मत कहो बगावत। बगावत बड़ी बात है। विद्रोह कीमती शब्द है। ऐसी क्षुद्रता के लिए उसका उपयोग मत करो। यह सिर्फ अहंकार है। और अहंकार मूढ़ता है। मैं तुम्हें न कहना सिखाता हूं? ताकि तुम हा कह सको किसी दिन। मैं चाहता हूं कि तुम्हारी न इतनी प्रगाढ़ हो जाए कि जब तुम ही कहो तो तुम्हारी हा की कोई सीमा न रहे। न जरूर कहो, ताकि हां में धार आ जाए। लेकिन न पर ही धार मत देते रहना। अन्यथा खुद की ही गरदन काट लोगे। कोई और न कटेगा इससे, खुद ही कटोगे।

लेकिन जिस युवती ने मुझे यह कहा, वह अपने को बुद्धिमान समझती है। सुशिक्षित है। लेकिन सुशिक्षित होने से कहीं कोई बुद्धिमान हुआ? अन्यथा दुनिया में इतने बुद्धिमान होते, जिसका हिसाब न रहता। सुशिक्षित लोग तो बहुत हैं। पढ़े-लिखे लोग तो बहुत हैं। लेकिन पढ़े-लिखे होने से, साक्षर होने से सुबुद्धि का कोई भी संबंध नहीं। निरक्षर होकर भी सुबुद्धि हो सकती है, साक्षर होकर भी न हो। अक्सर ऐसा ही होता है कि साक्षर अपनी साक्षरता में ही सुबुद्धि को खो देता है। समझ लेता है कि बस, विश्वविद्यालय की उपाधियों में सब ज्ञान मिल गया। इसलिए तो संसार में बुद्धों का होना कम होता चला गया है। क्योंकि ज्ञान के नाम पर छूता ने घर बना लिए हैं। शान के नाम पर मूढ़ता ने इतना इंतजाम कर लिया है, विश्वविद्यालयों की इतनी उपाधियां इकट्ठी कर ली हैं अपने चारों तरफ, कि बुद्धत्व के जन्म की संभावना न रही।

बुद्धत्व के जन्म का पहला सूत्र है : अपने अज्ञान को समझना।

मूढ़ वही है, जो सोचता है कि तानी है। और अमूढ़ वही है, जिसने समझा कि मैं अज्ञानी हूं। अमूढ़ सत्संग को उपलब्ध हो सकेगा। मूढ़ दाल में कलछी की तरह पड़ा रहे जीवनभर, तो भी उसे कुछ स्वाद न लगेगा।

ऐसे लोगों को मैं जानता हूं, जिनसे मेरा संबंध वर्षों का है, लेकिन वे कलछी की भाति ही मुझसे जुड़े रहे। उन्हें कुछ स्वाद नहीं लगा। उन पर दया आती है। उनके लिए आंसू बहते हैं, लेकिन कोई उपाय नहीं। कलछी-कलछी है। जब तक वही राजी न हो बदलने को, तब तक कुछ भी किया नहीं जा सकता।

‘यदि मूढ़ जीवनभर पंडित के साथ रहे तो भी वह धर्म को वैसे ही नहीं जान सकता है, जैसे कलछी दाल के रस को नहीं जानती है।’

कलछी बड़ी कठोर है, सख्त है। उसकी सख्ती के कारण ही संवेदना-शून्य है। तुम कलछी की भाति मत रहना। सख्त मत रहना। थोड़े संवेदनशील बनो। अपने चारों तरफ एक पर्त को मत खड़ी करो। उस पर्त के कारण न तुम रो सकते हो, न तुम हंस सकते हो। उस पर्त के कारण तुम्हारा सब झूठा हो गया है, अप्रामाणिक हो गया है। सूरज उगता है, लेकिन तुम्हें दिखाई नहीं पड़ता। फूल खिलते हैं, लेकिन तुम्हारे प्राणों से उनका कोई संबंध नहीं जुड़ता। हवाएं आती हैं, लेकिन तुम्हें बिना छुए गुजर जाती हैं।

परमात्मा हजार-हजार ढंग से तुम्हारे द्वार पर दस्तक देता है। तुम हजार-हजार ढंग से अपने को समझा लेते हो, कुछ और होगा, कोई राहगीर होगा, या कोई भिखमंगा आ गया होगा, या हवा का झोंका आया होगा। उसकी पगध्वनियां बहुत बार तुम्हारे करीब आती हैं। तुम्हारे हृदय की धड़कन से भी ज्यादा करीब उसकी पगध्वनियां हैं। सत्य तुम्हारे तुमसे भी ज्यादा करीब है, क्योंकि सत्य तुम्हारा स्वभाव है। एस धम्मो सनंतनो। लेकिन तुम अपने ऊहापोह में ऐसे उलझे हो कि जो निकटतम है, समीपतम है, वह भी सुनाई नहीं पड़ता।

संवेदनशील बनो। सत्संग का पहला सूत्र है, संवेदनशील बनो। अगर तुम परमात्मा की हवाओं के लिए मुका नहीं, अगर परमात्मा की सूरज की किरणें तुम पर पड़ती हों लेकिन तुम अछूते रह जाते हो, तो तुम परमात्मा के लिए भी खुले नहीं हो। और जब परमात्मा किसी सदगुरु में तुम्हारे बीच खड़ा हो जाएगा, तब तुम हजार तरह की व्याख्याएं कर लोगे। तुम्हारी व्याख्याएं ही तुम्हारे और सदगुरु के बीच में दीवालें बन जाएंगी। तुम्हारे शब्द, तुम्हारी समझदारी ही तुम्हारी आंख पर पर्दा डाल देगी। और तुम वही समझ लोगे, जो तुम समझ सकते थे। सत्संग वहीं चूक जाता छै। वह समझो, जो सदगुरु है। वह मत समझो, जो तुम समझ सकते हो।

अपनी समझ को थोड़ा किनारे रखो। अपनी समझ को थोड़ी बाद दो। अपनी समझ को कभी-कभी छोड़ भी आए घर। जहां जूते उतारते हो, वहीं उसे भी उतार-आए। कभी-कभी बुद्धि को छोड़कर भी जीयो। हृदय से ही, कभी-कभी प्रेम से ही देखो, विचार से नहीं।

कभी संवेदनशीलता में ऐसे डूब जाओ, कि भूल ही जाओ कौन हो तुम-स्त्री था पुरुष, गरीब या अमीर, काले या गोरे, बच्चे या बूढ़े, सुंदर या कुरूप, बुद्धिमान। क बुद्धिहीन। कभी प्रेम में ऐसी डुबकी लगाओ कि ये सब कोटियां भूल ही जाएं। सा रहो, कोई कोटि तुम्हारे आसपास न हो। कोई लेबल न रह जाए, कोई विशेषण न शो। हिंदू नहीं, मुसलमान नहीं, ईसाई नहीं, जैन नहीं, बस तुम-खाली, निर्विकार, कोरे कागज की भाति।

तत्क्षण तुम्हारे ऊपर वेद उतरने शुरू हो जाते हैं। तुम उपलब्ध हो गए। तुम खुल गए। उपनिषदों की वर्षा होनी शुरू हो जाती है।

प्रश्न: भगवान! कभी झील में खिला कमल देख आंदोलित हो उठता हूं। कभी अचानक कोयल की कूक सुनकर हृदय गदगद हो जाता है। कभी बच्चे...
07/10/2021

प्रश्न: भगवान! कभी झील में खिला कमल देख आंदोलित हो उठता हूं। कभी अचानक कोयल की कूक सुनकर हृदय गदगद हो जाता है। कभी बच्चे की मुस्कान देख विमुग्ध हो जाता हूं—तब ऐसा लगता है जैसे सब कुछ थम गया है—न विचार, न कुछ...। भगवान, लगता है ये क्षण कुछ संदेश लाते हैं। वह क्या होगा?
प्रदीप चैतन्य! पूछा कि चूकना शुरू किया। उन क्षणों में जहां विचार रुक जाते हैं वहां भी संदेश खोजोगे? तो तुम विचार की खोज में लग गए। जहां विचार थम जाते हैं, अब प्रश्न मत बनाओ, नहीं तो ध्यान से गिरे और चूके। अब तो निष्प्रश्न डुबकी मारो।
ये सब ध्यान के बहाने हैं। उगता सूरज सुबह का, प्राची लाली हो गई, पक्षियों के गान फूट पड़े, बंद कलियां खुलने लगीं—सब सुंदर है! सब अपूर्व है! सब अभिनव है! इस क्षण अगर तुम्हारा हृदय आंदोलित हो उठे तो अब पूछा मत कि ऐसा क्यों हो रहा है? क्योंकि तुमने क्यों पूछा कि मस्तिष्क आया—और मस्तिष्क आया कि हृदय का आंदोलन समाप्त हुआ।
हृदय में प्रश्न नहीं होते, सिर्फ अनुभव होते हैं! और मस्तिष्क में सिर्फ प्रश्न होते हैं, अनुभव नहीं होते। यह मस्तिष्क की तरफ से बाधा है। तुमने रात देखी रातों—भरी, विराट आकाश देखा, कुछ तुम्हारे भीतर स्तब्ध हो गया, विमुग्ध हो गया, विस्मय—लीन हो गया। डूब जाओ, मारो डुबकी! छोड़ो सब प्रश्न! अब यह मत पूछो कि इसका संदेश क्या है। ये सब बातें व्यर्थ की हैं।
यह शून्य ही संदेश है। यह मौन ही संदेश है। यह विस्मय—विमुग्ध भाव ही संदेश है। और क्या संदेश? तुम चाहते हो कोई आयत उतरे कि कोई ऋचा बने, कि शब्द सुनाई पड़े, कि परमात्मा तुम से कुछ बोले, कि प्रदीप चैतन्य, सुनो यह रहा संदेश? वह सब फिर तुम्हारा मन ही बोलेगा। चूक गए। आ गए थे मंदिर के द्वार के करीब और चूक गए। प्रश्न उठा कि द्वार बंध हो गया। निष्प्रश्न रहो तो द्वार तो खुला है।
ऐसा समझो कि बुद्धि के पास प्रश्न ही प्रश्न हैं, हृदय के पास उत्तर ही उत्तर हैं, और दोनों का कभी मिलन नहीं होता। अगर उत्तर चाहते हो तो प्रश्न मत पूछो। अगर प्रश्न ही चाहते हो तो प्रश्न पूछते रहो, प्रश्नों से प्रश्न लगते रहेंगे।
यह सुंदर हो रहा है, शुभ हो रहा है। सौभाग्यशाली हो।
तुम कहते हो: तब ऐसा लगता है कि सब कुछ थम गया। उसी को तो मैं ध्यान कह रहा हूं, जब सब थम जाता है। एक क्षण को कोई तरंग नहीं रह जाती—विचार की, वासना की, स्मृति की, कल्पना की। एक क्षण को न समय होता, न स्थान होता है। एक क्षण को तुम किसी और लोक, किसी और आयाम में प्रविष्ट हो जाते हो। तुम कहीं और होते हो। एक क्षण को तुम होते ही नहीं, कोई और होता है! यही तो ध्यान है।
और ध्यान साधन नहीं है, साध्य है। ध्यान किसी और चीज के लिए रास्ता नहीं है—ध्यान मंजिल है।
इसलिए अब यह मत पूछो कि इन क्षणों में कोई संदेश होना चाहिए, वह संदेश क्या होगा? तुम खराब कर लोगे इन क्षणों को। इन कोरे निर्दोष क्षणों को गूद डालोगे व्यर्थ की बकवास से। अस्तित्व का कोई संदेश नहीं है। अस्तित्व का संदेश अगर कुछ है तो शून्य है, मौन है; शब्द नहीं।
ध्यान मुझको तुम्हारा प्रिये,
चांद और चांदनी का मिलन देख आने लगा,
जिंदगी का थका कारवां सैकड़ों कंठ से प्यारे के गीत गाने लगा।
रात का बंद नीलम किवाड़ा डुला।
लो क्षितिज—छोर पर देव—मंदिर खुला,
हर नगर झिलमिला हर डगर को खिला
हर बटोही जिला ज्योति प्लावन चला;
कट गया शाप, बीती विरह की अवधि,
ज्वार की सीढ़ियों पर खड़ा हो जलधि
अंजली अश्रु भर—भर किसी यक्ष सा,
प्यार के देवता पर चढ़ाने लगा।
आरती थाल ले नाचती हर लहर,
हर हवा बीन अपना बजाने लगी,
हर कली अंग अपना सजाने लगी,
हर कली अंग अपना सजाने लगी,
हर अली आरसी में लजाने लगी,
हर दिशा तक भुजाएं बढ़ाता हुआ,
हर जलद से संदेसा पठाता हुआ
विश्व का हर झरोखा दिया बाल कर,
पास अपने पिया को बुलाने लगा।
ज्योति की ओढ़नी के तले तो तिमिर
की युवा आज फिर साधना हो गई,
स्नेह की बूंद में डूबकर प्राण की
वासना आज आराधना हो गई;
आह री! यह सृजन की मधुर वेदना,
जन्म लेती हुई यह नयी चेतना,
भूमि को बांह भर काल की राह पर,
आसमां पांव अपने बढ़ाने लगा।
यह सफर का नहीं अंत विश्राम रे,
दूर है दूर अपना बहुत ग्राम रे,
स्वप्न कितने अभी हैं अधूरे पड़े,
जिंदगी में अभी तो बहुत काम रे;
मुस्कुराते चलो, गुनगुनाते चलो
आफतों बीच मस्तक उठाते चलो,
ध्यान मुझको तुम्हारा प्रिये,
चांद और चांदनी का मिलन देख देख आने लगा,
जिंदगी का थका कारवां
सैकड़ों कंठ से प्यार के गीत गाने लगा।
हर क्षण, जब तुम चुप हो तो परमात्मा और प्रकृति का मिलन हो रहा है। हर क्षण, जब तुम सन्नाटे में हो तब पृथ्वी आकाश में लीन हो रही है। हर क्षण जब तुम्हारे भीतर मौन का फूल खिला है, तब द्वंद्व समाप्त हुआ है; निर्द्वंद्व घड़ी आई तुम्हारे भीतर मौन का फूल खिला है, तब द्वंद्व समाप्त हुआ है; निर्द्वंद्व घड़ी आई है; पदार्थ और चेतना का भेद मिटा है; सृष्टि और स्रष्टा में अंतर नहीं हरा है। अब और क्या संदेश?
तृप्त हो जाओ इस क्षण में, आंख बंद कर लो, जी भर कर पी लो इस क्षण को! पूछोगे, चूकोगे। प्रश्न उठा कि क्षण तुम्हारे हाथ से छिटक गया। तुम्हें जानना होगा कि अब प्रश्न नहीं उठाना है। अब तुम्हें प्रश्न से सावधान होना पड़ेगा। वह पुरानी आदत तुम्हें त्यागनी होगी। ध्यान सीख सकता है वही जो विचार की पुरानी आदत को त्यागने को तत्पर है।
और तुम सौभाग्यशाली हो प्रदीप चैतन्य, कि ध्यान कि ये छोटी—छोटी झलकें आने लगीं, झरोखे खुलने लगे, बिजली कौंधने लगी। अब मत उठाओ। प्रश्न। रसमय हो जाओ। नाचा तो नाच लो, प्रश्न मत उठाओ। गीत उठे तो गा लो, प्रश्न मत उठाओ। नाद उठे भीतर तो गुंजार करो, प्रश्न मत उठाओ। सम्हाल ही न सको अपने को। बांसुरी बजानी आती हो बांसुरी बजाओ, सितार बजाना आता हो सितार बजाओ, और कुछ भी न आता हो तो नाच तो सकते ही हो! और नाचने के लिए कोई कला की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह तुम किन्हीं दर्शकों के लिए नहीं नाच रहे हो। अपनी मस्ती में, अपनी अलमस्ती में! मगर प्रश्न मत उठाओ।
प्रश्न द्वार नहीं, दीवाल बन जाता है। और प्रश्न उठता है, पुराना संस्कार है। हर चीज पर प्रश्न उठता है!
मेरे पास लोग आते हैं। वे कहते हैं: ध्यान में बड़ा आनंद आ रहा है, क्यों? आनंद को भी निष्प्रश्न न ले सकोगे? आनंद को भी झोली भरकर न ले सकोगे? आनंद से भी डरे—डरे! पहले प्रश्न पूछोगे, पूछताछ करोगे, जानकारी कर लोग कहां से आता है, क्या है, क्या नहीं है—तब लोगे! इतनी देर आनंद तुम्हारे लिए रुकेगा नहीं। आनंद आता है लहर की तरह और तुम अगर इस पूछताछ में लग गए कि कौन आता, कहां से आता, क्यों आता, क्या है—तो गए काम से! जब तक तुम पूछताछ कर पाओगे तब तक आनंद जा चुका, झोली खाली की खाली रह जाएगी।
और पूछताछ से पाओगे क्या? परिभाषाएं तृप्ति तो नहीं देंगी। कोई कह भी देगा कि आनंद का क्या अर्थ है, तो भी तुम्हारे हाथ अर्थ तो न लगेगा।
नहीं, पुरनी यह आदत छोड़ो।
रात का बंद नीलम किवाड़ा डुला,
लो क्षितिज छोर पर देव—मंदिर खुला,
हर नगर झिलमिला हर डगर लो खिला
हर बटोही जिला ज्योति प्लावन चला;
कट गया शाप, बीती बिरह की अवधि,
ज्वार की सीढ़ियां पर खड़ा हो जलधि
अंजली अश्रु भर—भर किसी यक्ष सा,
प्यार के देवता पर चढ़ाने लगा।
रोओ, कुछ न कर सको तो! मगर प्रश्न मत उठाओ। झर—झर बहने दो आंसू, झर—झर झरने दो आंसू—जैसे पतझर में पत्ते झरें, कि जैसे सांझ दिनभर खिला फूल अपनी पंखुरियां को वापस पृथ्वी में लौटाने लगे।
आरती थाल ले नाचती हर लहर,
हर हवा बीन अपना बजाने लगी,
हर कली अंग अपना सजाने लगी,
हर अली आरसी में लजाने लगी,
हर दिशा तक भुजाएं बढ़ाता हुआ,
हर जलद से संदेशा पठाता हुआ,
विश्व का हर झरोखा दिया बालकर,
पास अपने पिया को बुलाने गला।
और तुम पूछ रहे हो संदेशा क्या! परमात्मा ने तुम्हें पुकारा, पिया ने तुम्हें पुकारा, जिसकी तलाश थी उसके पास आ गए अचानक—अब तुम पूछते हो संदेशा क्या! तुम्हें परमात्मा भी मिल जाए तो तुम पहले पूछोगे: आइडेंटिटी कार्ड? पासपोर्ट? कहां से आते कहां जाते? क्या प्रमाण है कि तुम ही परमात्मा हो?
और बेचारा परमात्मा क्या करेगा? कहां से पासपोर्ट लाएगा? कौन उसे पासपोर्ट देगा? और आइडेंटिटी कार्ड, कौन उसका बनाएगा? बड़ा मुश्किल में पड़ जाएगा। वह कहेगा: भाई तो फिर रहने ही दो। क्षमा करो, भूल हो गई। आपके दर्शन हुए यही धन्यभाग! अब दुबारा ऐसी भूल न करेंगे।
जब ऐसी शुभ घड़ियां आएं तो प्रश्न जैसी क्षुद्र बातें मत उठाओ। तब थोड़े निष्प्रश्न श्रद्धा का रस लो।
ज्योति की ओढ़नी के तले तो तिमिर
की युवा आज फिर साधना हो गई,
स्नेह की बूंद में डूबकर प्राण की
वासना आज आराधना हो गई;
आह री! यह सृजन की मधुर वेदना,
जन्म लेती हुई यह नयी चेतना,
भूमि को बांह भर काल की राह पर,
आसमां पांव अपने बढ़ाने लगा।
ये क्षण हैं, जब आसमान पृथ्वी की तरफ आने लगता है। ये क्षण हैं, जब अज्ञात ज्ञात की तरफ हाथ फैलाता है। ये क्षण हैं, जब उस विराट का आलिंगन तुम्हारे लिए उपलब्ध होता है! गिर पड़ो! उसकी गोदी पास है, गिर पड़ो! अब व्यर्थ के प्रश्न न पूछो।
स्नेह की बूंद में डूबकर प्राण की
वासना आज आराधना हो गई;
आह री! यह सृजन की मधुर वेदना,
जन्म लेती हुई यह नयी चेतना!
और तुम प्रश्नों में उलझे हो। तुम पूछते हो, संदेश! तुम शब्दों में ही कुछ समझोगे तभी समझोगे? शब्दों के बिना तुम कोई सेतु नहीं बना सकते? और चांदत्तारे बोलते नहीं, सूरज को कोई भाषा नहीं आती। फूल मौन हैं—या कि मौन की ही उनकी भाषा है! तुम उनकी ही भाषा सीखो। मौन के साथ मौन रह जाओ। जहां दो मौन होते हैं वहां दो नहीं रह जाते, क्योंकि दो मौन मिलकर एक हो जाते हैं। जहां दो शून्य होते हैं वहां दो नहीं रह जाते, क्योंकि दो शून्य मिलकर एक हो जाते हैं।
और ध्यान रखना, ये जो छोटे—छोटे झरोखे खुल रहे हैं, यह तो सिर्फ शुरुआत है। यह तो बांसुरी का पहला स्वर है, अभी तो बहुत बजने को, बहुत होने को है!
यह सफर का नहीं अंत, विश्राम रे,
दूर है दूर अपना बहुत ग्राम रे,
स्वप्न कितने अभी हैं अधूरे पड़े
जिंदगी में अभी तो बहुत काम रे;
मुस्कुराते चलो, गुनगुनाते चलो
आफतों बीच मस्तक उठाते चलो
ध्यान मुझको तुम्हारा प्रिये,
चांद और चांदनी का मिलन देख आने लगा,
जिंदगी का थका कारवां
सैकड़ों कंठ से प्यार के गीत गाने लगा।

🔥ओशो 🔥

लेकिन ध्यान की तलाश में भी लोग आते हैं, कोई शांति के लिए आ रहा है, कोई स्वास्थ्य के लिए आ रहा है। तरहत्तरह के लोग, लेकिन...
30/09/2021

लेकिन ध्यान की तलाश में भी लोग आते हैं, कोई शांति के लिए आ रहा है, कोई स्वास्थ्य के लिए आ रहा है। तरहत्तरह के लोग, लेकिन वासनाएं लेकर ही आते हैं। मंदिरों को भी हम वेश्यालयों से भिन्न व्यवहार नहीं करते, वहां भी हम वासना लेकर ही पहुंच जाते हैं। और जहां हम वासना लेकर पहुंचते हैं, वहीं वेश्यालय हो जाता है। क्योंकि खरीदने की इच्छा है वहां भी। वहां भी हम मंदिर में भी रुपए को जोर से पटक कर कुछ खरीदने पहुंचे हैं आवाज करके। मंदिर में भी लोग रुपया धीरे से नहीं रखते–देखा आपने? ऐसा जोर से पटकते हैं कि खनक की आवाज सब दीवारें सुन लें और अगर परमात्मा कहीं हो, तो उसको भी पता चल जाए कि एक रुपया फेंका है नगद। अब वहां भी हम खरीदने जा रहे हैं।
ताओ उपनिषाद (भाग–2)
आध्यात्मिक वासना का त्याग व सरल स्व का उदघाटन—(प्रवचन—बयालीसवां)

अध्याय 19 : सूत्र 2
लाओत्से जैसे आदमियों को बाजार में नहीं बेचा जा सकता। उनसे पूछो, क्या मिलेगा? तो वे कहेंगे कि अभी तुम इस योग्य भी नहीं कि तुम्हें उत्तर दिया जाए। तुम पूछ क्या रहे हो? तुम पूछ रहे हो, प्रेम से क्या मिलेगा? तो तुम प्रेम के संबंध में उत्तर पाने के भी अधिकारी नहीं हो। तुम जाओ और कौड़ियां बीनो और इकट्ठी करो। जो आदमी पूछता है कि प्रेम से क्या मिलेगा, उसको उत्तर देना चाहिए? और क्या उत्तर वह समझ पाएगा? और क्या उत्तर का कोई भी अर्थ निकल पाएगा? व्यर्थ होगा।

लोग पूछते हैं, ध्यान से क्या मिलेगा? प्रार्थना से क्या मिलेगा? धर्म से क्या मिलेगा? उन्हें पता ही नहीं है कि जब कोई व्यक्ति मिलने की भाषा छोड़ता है, तभी धर्म में प्रवेश होता है। जब तक वह पूछता है, क्या मिलेगा, क्या मिलेगा, क्या मिलेगा, तब तक वह संसार में दौड़ता है।

लेकिन हमको अगर कोई भरोसा दिलवा दे कि मिलेगा, वहां भी कुछ मिलेगा, तो फिर हम वहां भी दौड़ने को तत्पर हो जाते हैं। दौड़ चाहिए! ठहरने से मन घबड़ाता है। इसलिए लाओत्से जैसे लोग बहुत भयभीत करवा देते हैं।

कनफ्यूशियस बहुत भयभीत होकर लाओत्से के पास से लौटा था। और जब उसके शिष्यों ने पूछा कि कैसा था यह आदमी? तो कनफ्यूशियस ने कहा, वह कोई आदमी नहीं है। वह एक खतरनाक सिंह की भांति है। उसके पास जाओ, तो रोआं-रोआं कंप जाता है, पसीना आ जाता है। वह कोई आदमी नहीं है, वह एक सिंह है। उस तरफ जाना ही मत। वह भीतर आत्मा तक को कंपा देता है। वह इस ढंग से देखता है। एक क्षण उसकी आंख अगर रुक जाए ऊपर, तो प्राण का रोआं-रोआं कंपने लगता है।

कंपने ही लगेगा; क्योंकि लाओत्से जो कह रहा है, वह आत्यंतिक है, अल्टीमेट है। वह क्षुद्र बातों पर रुकने के लिए राजी नहीं है। वह क्षुद्र बातों के उत्तर भी नहीं देगा। वह यह भी नहीं कहेगा कि तुम्हें ध्यान से शांति मिलेगी। क्या है मूल्य अशांति का? शांति ही चाहिए, तो ट्रैंक्वेलाइजर से मिल जाएगी। क्यों ध्यान के पीछे पड़ते हैं! शांति चाहिए, तो नशा करके लेट जाइए।

लेकिन ध्यान की तलाश में भी लोग आते हैं, कोई शांति के लिए आ रहा है, कोई स्वास्थ्य के लिए आ रहा है। तरहत्तरह के लोग, लेकिन वासनाएं लेकर ही आते हैं। मंदिरों को भी हम वेश्यालयों से भिन्न व्यवहार नहीं करते, वहां भी हम वासना लेकर ही पहुंच जाते हैं। और जहां हम वासना लेकर पहुंचते हैं, वहीं वेश्यालय हो जाता है। क्योंकि खरीदने की इच्छा है वहां भी। वहां भी हम मंदिर में भी रुपए को जोर से पटक कर कुछ खरीदने पहुंचे हैं आवाज करके। मंदिर में भी लोग रुपया धीरे से नहीं रखते–देखा आपने? ऐसा जोर से पटकते हैं कि खनक की आवाज सब दीवारें सुन लें और अगर परमात्मा कहीं हो, तो उसको भी पता चल जाए कि एक रुपया फेंका है नगद। अब वहां भी हम खरीदने जा रहे हैं।

बोधिधर्म भारत के बाहर गया। और जब वह चीन पहुंचा, तो वहां के सम्राट ने कहा कि मैंने हजारों विहार बनवाए; लाखों भिक्षुओं को मैं भिक्षा देता हूं रोज; बुद्ध के समस्त शास्त्रों का मैंने चीनी भाषा में अनुवाद करवाया है; लाखों प्रतियां मुफ्त बंटवाई हैं; धर्म का मैंने बड़ा प्रचार किया है; हे बोधिधर्म, इस सब से मुझे क्या लाभ होगा? मुझे क्या मिलेगा इसका पुरस्कार? इसका प्रतिफल क्या है?

उसने गलत आदमी से पूछ लिया। और भिक्षु थे लाखों, जो उसकी भिक्षा पर पलते थे। वे कहते थे, तुम पर परमात्मा की बड़ी कृपा है। तुम्हारा मोक्ष सुनिश्चित है। हे सम्राट, तुम जैसा सम्राट पृथ्वी पर कभी न हुआ और न कभी होगा। तुम धर्म के परम मंगल को पाओगे। तुम पर आशीष बरस रहे हैं बुद्धों के। तुम्हें दिखाई नहीं पड़ते, देवता फूल बरसाते हैं तुम पर। उसने सोचा कि बोधिधर्म भी ऐसा ही भिक्षु है। गलती हो गई। बोधिधर्म जैसे आदमी कभी-कभी होते हैं, इसलिए गलती हो जाती है।

बोधिधर्म ने कहा, बंद कर बकवास! अगर पहले कुछ मिलता भी, तो अब कुछ नहीं मिलेगा। तूने मांगा कि खो दिया। सम्राट तो बेचैन हो गया। हजारों भिक्षुओं की भीड़ के सामने बोधिधर्म ने कहा कि कुछ भी नहीं मिलेगा। फिर भी उसने सोचा कि कुछ गलती हो गई समझने में बोधिधर्म के या मेरे। उसने कहा, इतना मैंने किया, फल कुछ भी नहीं! बोधिधर्म ने कहा, फल की आकांक्षा पाप है। किया, भूल जा! इस बोझ को मत ढो, नहीं तो इसी बोझ से डूब मरेगा। पाप के बोझ से ही लोग नहीं डूबते, पुण्य के बोझ से भी डूब जाते हैं। बोझ डुबाता है। और पाप से तो आदमी छूटना भी चाहता है; पुण्य को तो कस कर पकड़ लेता है। यह पत्थर है तेरे गले में; इसको छोड़ दे।

लेकिन सम्राट वू को यह बात पसंद न पड़ी। हमारी वासनाओं को यह बात पसंद पड़ भी नहीं सकती। इतना किया, बेकार! सम्राट वू को पसंद न पड़ी, तो बोधिधर्म ने कहा कि मैं तेरे राज्य में प्रवेश नहीं करूंगा, वापस लौट जाता हूं। क्योंकि मैं तो सोच कर यह आया था कि तूने धर्म को समझ लिया होगा, इसलिए तू धर्म के फैलाव में आनंदित हो रहा है। मैं यह सोच कर नहीं आया था कि तू धर्म के साथ भी सौदा कर रहा है। मैं वापस लौट जाता हूं।

और बोधिधर्म वू के साम्राज्य में प्रवेश नहीं किया, नदी के पार रुक गया। वू को बड़ी बेचैनी हुई, सम्राट को। बड़े दिनों से प्रतीक्षा की थी इस आदमी की। यह बुद्ध की या लाओत्से की हैसियत का आदमी था। और उसने इस भांति निराश कर दिया। उसने सब जार-जार कर दिया उसकी आकांक्षाओं को। अगर यह एक सील-मुहर लगा देता और कह देता, हां सम्राट वू, तेरा मोक्ष बिलकुल निश्चित है; सिद्ध-शिला पर तेरे लिए सब आसन बिछ गया है; तेरे पहुंचने भर की देर है। द्वार खुले हैं; स्वागत के लिए बैंड-बाजे सब तैयार हैं। तो वू बहुत प्रसन्न होता।

हमारी वासनाएं ही अगर हमारी प्रसन्नता हैं, तो धर्म के जगत में हमारे लिए कोई प्रवेश नहीं है। अगर निर्वासना होना ही हमारी प्रसन्नता है, तो ही प्रवेश हो सकता है। निर्वासना धर्म के लिए बहुत विचारणीय है। क्षुद्र वासनाओं के त्याग की बात नहीं है। गहन वासनाएं मन को पकड़े हुए हैं।

बुद्ध के पास एक आदमी आता है और वह कहता है, मैं ध्यान करूं, साधना करूं, आप जैसा कब तक हो जाऊंगा? बुद्ध ने कहा, जब तक तुझे यह खयाल रहेगा कि मेरे जैसा कब तक हो जाएगा, तब तक होना मुश्किल है। यही खयाल बाधा है। इस खयाल को छोड़ दे। ध्यान कर। इस खयाल से, इस वासना से नहीं कि बुद्ध जैसा कब तक हो जाऊंगा।

बुद्ध से कोई आकर पूछता है कि आपके इन दस हजार भिक्षुओं में कितने लोग ऐसे हैं, जो आप जैसे हो गए? तो बुद्ध कहते हैं, बहुत लोग हैं। तो वह आदमी कहता है, लेकिन उनका कुछ पता नहीं चलता। तो बुद्ध कहते हैं, उनको खुद अपना पता नहीं रहा है। तो वह आदमी पूछता है, लेकिन आपका तो पता चलता है और आप जैसा तो कोई नहीं दिखाई पड़ता! बुद्ध ने बड़े मजे की बात कही। बुद्ध ने कहा कि मैंने शिक्षक होने के लिए कुछ पाप-कर्म पिछले जन्म में किए थे, वे पूरे कर रहा हूं। शिक्षक होने के लिए–टु बी ए टीचर–वे पाप-कर्म मैंने किए थे।

जैनों में तो पूरा सिद्धांत है उसके लिए कि कुछ कर्मों के कारण व्यक्ति को तीर्थंकर का जन्म मिलता है–कुछ कर्मों के कारण। कुछ कर्मों का आखिरी बंधन उसको तीर्थंकर बनाता है। और तब अपना बंधन काटने के लिए उसे लोगों को समझाना पड़ता है।

तो बुद्ध ने कहा, मैंने कुछ कर्म किए थे कि शिक्षक होने का उपद्रव मुझे झेलना पड़ेगा। वह मैं झेल रहा हूं। अपने-अपने किए का फल है। उन्होंने नहीं किया था। वे बिलकुल खो गए हैं और शून्य हो गए हैं। समझाने के लिए भी उनके भीतर कोई नहीं है कि जो समझाए। सब खो गया है।

और जब इतना सब खो जाता है–वासना नहीं, कोई स्वार्थ नहीं–तब जिस शून्य का उदय होता है, वही स्वभाव है, वही ताओ है।

आज इतना ही। कल हम शेष बात करेंगे। रुकें, पांच मिनट कीर्तन करें।

घबड़ाओ मत कि टूट जाऊंगा। और घबड़ाओ मत कि मिट जाऊंगा। और घबड़ाओ मत कि मर जाऊंगा। क्योंकि मरना नए जीवन की शुरुआत है। जन्म शुर...
30/09/2021

घबड़ाओ मत कि टूट जाऊंगा। और घबड़ाओ मत कि मिट जाऊंगा। और घबड़ाओ मत कि मर जाऊंगा। क्योंकि मरना नए जीवन की शुरुआत है। जन्म शुरुआत है मृत्यु की और मृत्यु पुनः शुरुआत है जन्म की। टूटने से मत घबड़ाओ। टूटने को तैयार रहो। क्योंकि तुम टूट सकोगे तो नए हो जाओगे। नए होने का ढंग एक ही है कि हम बिखरना भी जानें, टूटना भी जानें, समाप्त होना भी जानें।

ताओ उपनिषाद (भाग–3) प्रवचन–
ताओ है झुकने, खाली होने व मिटने की कला—(प्रवचन—सैंतालीसवां)

अध्याय 22 : खंड 1

संघर्ष की व्यर्थता
लाओत्से कहता है, “खाली होना है भरे जाना।’

तुम अपने को भीतर से खाली करने की सोचो; भरने का काम प्रकृति पर छोड़ दो। वह सदा भर देती है। तुम सिर्फ गङ्ढे बनाओ, तुम सिर्फ खाली करो, तुम सिर्फ खाली करो।

“और टूटना, टुकड़े-टुकड़े हो जाना है पुनरुज्जीवन।’

और घबड़ाओ मत कि टूट जाऊंगा। और घबड़ाओ मत कि मिट जाऊंगा। और घबड़ाओ मत कि मर जाऊंगा। क्योंकि मरना नए जीवन की शुरुआत है। जन्म शुरुआत है मृत्यु की और मृत्यु पुनः शुरुआत है जन्म की। टूटने से मत घबड़ाओ। टूटने को तैयार रहो। क्योंकि तुम टूट सकोगे तो नए हो जाओगे। नए होने का ढंग एक ही है कि हम बिखरना भी जानें, टूटना भी जानें, समाप्त होना भी जानें।

हम पकड़ कर रखना चाहते हैं अपने को, कि कुछ मिटे न, कुछ टूट न जाए। हम जीवन की प्रक्रिया के विपरीत चल रहे हैं। यह जीवन की पूरी प्रक्रिया एक वर्तुल है। एक नदी सागर में गिरती है। सागर में धूप और सूरज की किरणें भाप बनाती हैं। वह भाप फिर आकर पहाड़ पर वर्षा कर जाती है। फिर गंगोत्री में भर जाता है पानी। फिर गंगा बहने लगती है। फिर गंगा जाकर सागर में गिर जाती है। एक वर्तुल है। गंगा अगर सागर में गिरते वक्त कहे कि अगर मैं सागर में गिरूं और बिखरूं तो नष्ट हो जाऊंगी, गंगा अपने को रोक ले, न जाए सागर में गिरने। उस दिन गंगा मर जाएगी। क्योंकि पुनरुज्जीवन का उपाय नहीं रह जाएगा। गंगा को सागर में खोना ही चाहिए। वही उसके नए होने का उपाय है। फिर ताजी हो जाएगी।

और ध्यान रखें, इतनी यात्रा में गंगा गंदी हो जाती है–स्वभावतः। सागर उसे फिर नया और ताजा कर देता है। बिखर जाती है, सब रूप खो जाता है। फिर निमज्जित हो जाती है मूल में। फिर धूप, फिर बादल बनते हैं। इन बादलों में गंदगी नहीं चढ़ सकती। बादल शुद्धतम होकर आकाश में आ जाते हैं। फिर हिमालय पर बरस जाते हैं। फिर गंगोत्री नई और ताजी है। फिर यात्रा शुरू हो जाती है।

लाओत्से कहता है, जीवन एक वर्तुल यात्रा है। टूटना पुनः होने का उपाय है; मिटना नए जीवन की शुरुआत है; मृत्यु नया गर्भाधान है। इसलिए घबड़ाओ मत कि टूट जाएंगे; टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे; अगर झुकेंगे, मिट जाएंगे; अगर खाली रहेंगे, क्या भरोसा, भरे गए, न भरे गए; किस पर विश्वास करें? अपनी रक्षा अपने ही हाथ करनी है! ऐसा बचाने की कोशिश जिसने की, वह सड़ जाएगा। उसकी गति अवरुद्ध हो जाएगी। गति का सूत्र है: मिटने की सदा तैयारी। जीवन का महासूत्र है: प्रतिपल मरने की तैयारी, प्रतिपल मरते जाना, प्रतिपल मरते जाना।

बायजीद रात जब विदा होता अपने शिष्यों से तो रोज नमस्कार करता और कहता, शायद सुबह मिलना हो, न हो मिलना, आखिरी प्रणाम! यह रोज आखिरी नमस्कार! सुबह उठ कर कहता कि फिर एक मौका मिला नमस्कार का। शिष्यों ने कई बार बायजीद को कहा कि आप यह क्या करते हैं रोज रात को? बायजीद कहता कि रोज रात मृत्यु में जाने की तैयारी होनी चाहिए। और तभी तो मैं सुबह इतना ताजा उठता हूं; क्योंकि तुम सिर्फ सोते हो, मैं मर भी जाता हूं। इतना गहरा उतर जाता हूं, सब छोड़ देता हूं जीवन को।

इसलिए बायजीद की ताजगी पाना बहुत मुश्किल है। सुबह बायजीद जब उठता तो वैसे ही जैसे नया बच्चा जन्मा हो। उसकी आंखों में वही निर्दोष भाव होता। क्योंकि सांझ जो मर सकता है, सुबह वह फिर से पुनरुज्जीवित हो जाता है। हम तो रात नींद में भी अपने को पकड़े रहते हैं कि कहीं खिसक न जाएं, सम्हाले रखते हैं कि कहीं कोई गड़बड़ न हो जाए। तो सुबह हम वैसे ही उठते हैं, जैसे हम रात भर सोते हैं।

“अभाव है संपदा। संपत्ति है विपत्ति और विभ्रम।’

अभाव है संपदा, न होना संपत्ति है। होना विपत्ति है। लाओत्से कहता है, जितना ज्यादा तुम्हारे पास होगा, उतनी तुम अड़चन और मुसीबत में रहोगे। क्योंकि भोग तो तुम उसे पाओगे ही नहीं, सिर्फ पहरा दे पाओगे। और जितना ज्यादा होता जाएगा, उतनी तुम्हारी चिंता का विस्तार होता चला जाएगा। जिसके पास कुछ भी नहीं है, वह प्रतिपल भारहीन, निर्भार होकर जी पाता है।

पांपेई का नगर जला, सारा गांव भागा। जो-जो बन सका जिससे ले जाते। ज्वालामुखी फूट पड़ा आधी रात। कोई अपनी तिजोरी ले जा रहा है। कोई अपने कागजात ले जा रहा है। कोई अपने बच्चे को, कोई अपनी पत्नी को। जिसको जो, जिस पर सुविधा थी, वह लेकर भागा। और सभी दुखी हैं। सभी दुखी हैं, क्योंकि सभी का बहुत कुछ छूट गया है। आग इतनी अचानक थी और क्षण भर रुकना मुश्किल था कि जो हाथ में लगा, वह लेकर भागा। सभी रो रहे हैं। सिर्फ एक आदमी पांपेई के नगर में नहीं रो रहा है, अरिस्टीपस नाम का एक आदमी नहीं रो रहा है। तीन बजा है रात का; अपनी छड़ी लिए उसी भीड़ में–पूरे नगर के लाखों लोग अपना सामान लेकर भाग रहे हैं–वह अपनी छड़ी लिए जा रहा है।

अनेक लोग उससे कहते हैं, अरिस्टीपस, कुछ बचा नहीं पाए? अरिस्टीपस कहता है, कुछ था ही नहीं। हम इकट्ठा करने की झंझट में ही नहीं पड़े, बचाने की भी कोई झंझट नहीं रही। सारे लोग भाग रहे हैं और अरिस्टीपस टहल रहा है। लोग उससे पूछते हैं कि तू भाग नहीं रहा? अरिस्टीपस कहता है कि इतने वक्त हम रोज ही सुबह घूमने जाते हैं। वह अपनी छड़ी लिए घूमने जा रहा है। चिंतित नहीं हो? पीछे तुम्हारा मकान? अरिस्टीपस कहता है, अपने सिवाय अपने पास और कुछ भी नहीं है।

अपने सिवाय अपने पास और कुछ भी नहीं है, यह अर्थ है अभाव का। अपने सिवाय अपने पास और कुछ भी नहीं है। और इसलिए मौत भी अरिस्टीपस से कुछ छीन न पाएगी। इसका यह मतलब नहीं है कि आपके पास कुछ भी न हो। इसका यह मतलब भी नहीं है कि अरिस्टीपस के पास भी कुछ न था। कम से कम छड़ी तो थी ही। इसका मतलब कुल इतना है कि वह जो परिग्रह का भाव है कि मेरे पास यह है, यह है, यह है, वही दुख का कारण बनेगा। क्या है, क्या नहीं, यह महत्वपूर्ण नहीं है। भीतर संपत्ति को पकड़ने की जो वृत्ति है, कि मेरे पास है, मेरा है, वही दुख का कारण बनेगा। और वही चिंताओं का जन्म है।

“अभाव है संपदा।’

कुछ भी नहीं है; तो उसी के साथ सारी चिंताएं भी विलीन हो गईं। यह एक आंतरिक दशा है।

एक छोटी सी कहानी, जो मुझे बहुत प्रीतिकर रही है। एक सम्राट एक साधु के प्रेम में पड़ गया। साधु था भी अदभुत। मोह बढ़ता गया सम्राट का। आखिर सम्राट ने एक दिन कहा कि इस वृक्ष के नीचे न पड़े रहें, मेरे महल में चलें। साधु उठ कर तत्क्षण खड़ा हो गया। उसने कहा, चलो।

सम्राट बड़ा चिंतित हुआ। सोचा था, साधु कहेगा, कहां संसार में उलझाते हो! महल? हम महल नहीं जा सकते; हम सब त्याग कर दिए हैं। सम्राट भी प्रसन्न होता अगर साधु ऐसा कहता। और सम्राट और जोर से आग्रह करता कि नहीं महाराज, चलना ही पड़ेगा। पैर पकड़ता, हाथ-पैर जोड़ता और सोचता, महा तपस्वी है।

साधु खड़ा ही हो गया। भिक्षा का पात्र उठा लिया, जो थोड़े-बहुत पोटली में बंधे हुए कपड़े-लत्ते थे दो-चार, वे कंधे पर टांग लिए और कहा, कहां है रास्ता?

सम्राट के बिलकुल प्राण निकल गए। उसने कहा, कहां नासमझ, किस साधारण आदमी के पीछे मैंने इतने दिन गंवाए! यह तो तैयार ही बैठे थे। प्रतीक्षा ही थी। सिर्फ हमारी राह ही देख रहे थे। हम भी बुद्धू निकले।

लेकिन अब कह ही चुके थे, फंस ही गए थे, तो रास्ता भी बताना पड़ा, लेकिन बड़े बेमन से। महल पहुंचते-पहुंचते साधु तो विदा ही हो चुका था। साधु तो बचा ही नहीं–उसी क्षण, जब साधु खड़ा हो गया चलने के लिए। अब तो एक जबर्दस्ती का मेहमान था, बिना बुलाया मेहमान। लेकिन अब कह दिया था सम्राट को तो उसे ठहराना था। उसे ठहरा दिया। परीक्षा की दृष्टि से ही श्रेष्ठतम जो भवन था, उसमें ही ठहराया। अच्छे से अच्छे जो भोजन थे, वही व्यवस्था की। अच्छे से अच्छे कपड़े! और साधु गजब का था–साधु था ही नहीं सम्राट की नजरों में–जो भी कहता, करने को राजी हो जाता। कहा, ये कपड़े छोड़ दो, वह उतार कर तत्काल खड़ा हो गया। कीमती वेशभूषा पहना दी, पहन लिया। बड़े शानदार बिस्तरों पर सोने को कहा, मजे से सो गया। सुंदरतम स्त्रियां सेवा में लगाईं, पैर फैला दिए। सम्राट ने कहा कि बड़ी मुश्किल में पड़ गया। एक दफा तो यह न कहे!

पंद्रह दिन में ही सम्राट ऊब गया और घबड़ा गया। एक दिन सुबह आकर उसने कहा, महाराज, बहुत हो गया। मुझमें और आप में कोई फर्क ही नहीं है। साधु ने कहा, फर्क? जानना कठिन है। लेकिन अगर जानना चाहते हो तो मेरे पीछे आओ। साधु ने कपड़े सम्राट के वापस उतार कर रख दिए, अपने कपड़े पहन लिए, अपना डंडा उठा लिया, अपनी झोली, अपना भिक्षा-पात्र, बाहर निकल आया महल के। सम्राट पीछे-पीछे चला। नदी आ गई। सम्राट ने कहा, अब बता दें। उस फकीर ने कहा, जरा नदी के उस पार। नदी के पार भी निकल गया। सम्राट बोला, अब बता दें वह भेद। उसने कहा, थोड़ा और आगे। राज्य की सीमा आ गई। सम्राट ने कहा, अब? उस फकीर ने कहा, अब मैं पीछे नहीं जाना चाहता; अब तुम भी मेरे साथ ही चलो। सम्राट ने कहा, यह कैसे हो सकता है? मेरा महल है पीछे; मेरा राज्य है। उस फकीर ने कहा, अगर तुम्हें समझ में आ सके फर्क तो समझ लेना। मेरा कोई महल पीछे नहीं है, मेरा कोई राज्य पीछे नहीं है। मैं तुम्हारे महल में था, लेकिन तुम्हारा महल मुझमें नहीं है।

सम्राट पैर पकड़ लिया और कहा कि महाराज, बड़ी भूल हो गई। साधु ने कहा, लौट चल सकता हूं, कोई हर्जा मुझे नहीं है। लेकिन तुम फिर मुसीबत में पड़ जाओगे। अब तुम लौट ही जाओ, मुझे कोई अड़चन नहीं है, वापस…। जैसे ही उस साधु ने कहा वापस, सम्राट का पसीना छूट गया। साधु ने कहा, फिर तुम पूछोगे कि महाराज, फर्क क्या है? मुझे तुम जाने ही दो, ताकि तुम्हें फर्क याद रहे। अन्यथा और कोई कारण मेरे जाने का नहीं है। वापस चल सकता हूं।

क्या है आपके पास, यह सवाल नहीं है; कितना आपके भीतर चला गया है, यही सवाल है। भीतर न गया हो तो आप खाली हैं। अभाव है। उस अभाव में ही विश्रांति है, आनंद है, मुक्ति है।

“इसलिए संत उस एक का ही आलिंगन करते हैं; और बन जाते हैं संसार का आदर्श।’

इस एक नियम का, एक ताओ का, इस खाली होने के सूत्र का, इस झुक जाने की कला का, इस मिट जाने की तैयारी का, इस एक नियम का पालन करते हैं; और बन जाते हैं संसार का आदर्श।

बनना नहीं चाहते संसार का आदर्श, नहीं तो कभी नहीं बन पाएंगे। जो बनना चाहते हैं, वे कभी नहीं बन पाते। जो इन कलाओं को जानता है जीवन की, वह अनजाने संसार का आदर्श बन जाता है।

आज इतना ही।

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