Astro Ganesha

Astro Ganesha Jyotish paramarsh, Astrology (Vedik Astrology, Nadi Astrology, Jaimini Astrology)

ॐ शान्ति ॐ परम पूज्य जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज जी का देवलोक गमन सनातन धर्म की अपूर्णीय क्षती ह...
11/09/2022

ॐ शान्ति ॐ
परम पूज्य जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज जी का देवलोक गमन सनातन धर्म की अपूर्णीय क्षती हुई, हम परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उनकी पवित्र आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान देवे।
श्री चरणों में शत शत नमन

20/05/2022

शुक्रकुजकेतुषु स्वभाग्यदारेषु स्थितेषु राजान:

शुक्र मंगल व केतु यदि आत्मकारक के साथ अथवा द्वितीय या चतुर्थ स्थान में स्थित हों तो मुनष्य राजयोग वाला होता है ।

If venus , ketu or mars is postied with Atmakaraka or 2nd and 4th from Atmakarak that person will get Rajyoga fruits.

64th Navamsha/ 64वा नवांशThe 64th Navamsa maps into 4th house of Navamsa Kundali. The 4th House of Navamsa is called Kha...
07/10/2021

64th Navamsha/ 64वा नवांश

The 64th Navamsa maps into 4th house of Navamsa Kundali. The 4th House of Navamsa is called Khara Navamsa. The name Khara means to destroy and ruin. Khara was demon general of Ravana. Where ever he went he killed everyone. It was only Shri Ram who defeated and killed Khara.

The Khara Navamsa is manifestation of 8th house of the Rasi chart. It was all the killing power, so many astrologer see the 64th Navamsa for death.
The 4th house of Navamsa it the most malefic house of Navamsa and is very dangerous. It has the power to activate Khara the demon. Because when it is activated deadly diseases or death like suffering will occur.

Malefic planets there make the Khara very bad and that planet has the ability to bring down destruction of the Native. While benefics will fight Khara but they have to be very strong.

The 4th house Navamsa is the combined energy of death. The 4th house, 8th house and 12th house of Rasi chart maps into 4th house of Navamsa and it is also called moksha ayana. Once your dead your free.

The Khara from Navamsa Lagna and Chandramsa (Moon in Navamsa) is eqaully important and dangerous.
The Lagna khara destroys body and can also get activated my places that do not suit the native. While on the other hand Khara from Chandramsa is what we do to destroy ourselves. Malefic planets there in both tells a trouble health and weak longevity.
It is very difficult to fight Khara, but remedies of
Maha vidhya and Vishnu helps the native a lot.

64वां नवांश नवांश कुंडली के चौथे घर में आता है। नवांश के चौथे भाव को खारा नवांश कहा जाता है। खारा नाम का मतलब नष्ट करना और बर्बाद करना होता है। खर रावण का राक्षस सेनापति था। वह जहां भी गया, उसने सभी को मार डाला। खर को हराकर मारने वाले श्रीराम ही थे।

खरा नवांश रासी चार्ट के आठवें घर का प्रकटीकरण है। यह सब मारक शक्ति थी, इसलिए कई ज्योतिषी मृत्यु के लिए 64वें नवांश को देखते हैं।
नवांश का चौथा भाव नवांश का सबसे अशुभ भाव है और बहुत ही खतरनाक होता है। इसमें खारा दानव को सक्रिय करने की शक्ति है। क्योंकि इसके सक्रिय होने पर घातक रोग या मृत्यु जैसी पीड़ा होगी।

वहां के अशुभ ग्रह खारा को बहुत खराब करते हैं और वह ग्रह जातक के विनाश को कम करने की क्षमता रखता है। जबकि लाभार्थी खारा से लड़ेंगे लेकिन उन्हें बहुत मजबूत होना होगा।

चौथा घर नवांश मृत्यु की संयुक्त ऊर्जा है। रासी चार्ट का चौथा घर, आठवां घर और बारहवां घर नवांश के चौथे घर में मैप करता है और इसे मोक्ष अयन भी कहा जाता है। एक बार जब आप मर जाते हैं तो आप मुक्त हो जाते हैं।

नवांश लग्न और चंद्रमसा (नवमांश में चंद्रमा) से खारा समान रूप से महत्वपूर्ण और खतरनाक है।
लगन खर शरीर को नष्ट कर देता है और मेरे उन स्थानों को भी सक्रिय कर सकता है जो जातक को शोभा नहीं देते। जबकि दूसरी ओर चंद्रमसा से खरा वह है जो हम खुद को नष्ट करने के लिए करते हैं। दोनों में स्थित अशुभ ग्रह एक परेशानी स्वास्थ्य और कमजोर दीर्घायु को बताते हैं।
खारा से लड़ना बहुत मुश्किल है, लेकिन महाविद्या और विष्णु के उपाय जातक की बहुत मदद करते हैं।

07/10/2021
06/10/2021

जन्मलग्नान्शकाच्चन्द्रनवंशादथ वापि वा |
राहौ चतु: षष्टिमिते निघनंच विनिर्दिशेत् ||

अर्थ :- मृत्यु (किसी निकट संबंधी की) का संकेत तब देना चाहिए जब राहु ६४वें नवमाशा में या तो नवमाशा में लग्न या चन्द्रमा से गोचर करे

Meaning :- death (of a near relative) should be indicate when rahu transit the 64th navamasha either navmasha occupied by ascendent or the moon

29/09/2021

आज पढ़ रही थी एक श्लोक अच्छा लगा आप सभी के साथ शेयर कर रही हू ।

Today I was reading Veda I like the shloka want to share with you

।।प्रथमेनार्जिता विद्या द्वितीयेनार्जितं धनं।
तृतीयेनार्जितः कीर्तिः चतुर्थे किं करिष्यति।।

अर्थ : जिसने प्रथम अर्थात ब्रह्मचर्य आश्रम में विद्या अर्जित नहीं की, द्वितीय अर्थात गृहस्थ आश्रम में धन अर्जित नहीं किया, तृतीय अर्थात वानप्रस्थ आश्रम में कीर्ति अर्जित नहीं की, वह चतुर्थ अर्थात संन्यास आश्रम में क्या करेगा?

Meaning :- One who has not earned knowledge in the first ie Brahmacharya ashram, the second did not earn wealth in the householder ashram, the third has not earned fame in the vanaprastha ashram, what will he do in the fourth ie sannyasa ashram?

28/09/2021

homosexual relationship / होमो सेक्सुअलिटी

According to the Jaimini astrology, a person falls into a homosexual relationship in the state of all these planets.

Saturn-Venus should be 2-12 from each other in the horoscope.

The sixth lord, in conjunction with Rahu, forms a relationship with the Ascendant, or the Moon is in an even sign and Mercury is in an odd sign and both of them have a vision of Mars.

The Ascendant should be of an even sign and the Moon is in the Navamsha of an odd sign and Mars should be seen on it.

If both the Ascendant and Moon are in an odd sign and aspected by the Sun. Venus and Saturn are in the tenth or eighth house, together or in a debilitated sign, or Saturn in the debilitated sign is situated in the sixth house. Feather.
Or if Moon is in conjunction with Saturn and Mars is in the fourth or tenth house, such yogas are formed.

From the point of view of astrology, homosexuality can be cured by fixing Lagnesh, Panchmesh, Seventh lord, Ashtmesh, Dwadashesh or by taking remedies.

Note: This article has been written keeping in view the hypothesized situation. Homo sexuality is a psychosis and psychic disease and its treatment is possible through psychiatry, psychology and astrology.

जैमिनी ज्योतिष सिद्धांतानुसार इन सभी ग्रहों की अवस्था में व्यक्ति समलैंगिक संबंधों में पड़ता है।

कुंडली में शनि-शुक्र एक दूसरे से 2-12 हों।

षष्ठेश बुध राहू संग युत होकर लग्न से संबंध बनाए या चंद्र सम राशि में व बुध विषम राशि में हो व दोनों पर मंगल की दृष्टि पड़े।

लग्न सम राशि का हो व चंद्र विषम राशि के नवांश में हो व उस पर मंगल की दृष्टि पड़े।

अगर लग्न व चंद्र दोनों विषम राशि में हो व सूर्य से दृष्ट हो।
शुक्र व शनि दसवें या आठवें भाव में हों, एक साथ युत हों या नीच राशि में हों, या नीच राशि शनि छठे भाव में स्थित हो।

कुंडली में शुक्र वक्री ग्रह की राशि में हो व लग्नेश स्वराशि में हो व सप्तम भाव में शुक्र होने पर। या चंद्र शनि की युति हो व मंगल चौथे या दसवें भाव में होने पर ऐसे योग बनते हैं।

ज्योतिष की दृष्टि से समलैंगिकता का निवारण लग्नेश, पंचमेश सप्तमेश, अष्टमेश, द्वादशेश को ठीक करके या उपाय करके किया जा सकता है।

नोट: यह लेख परिकल्पित स्थिति को देखकर लिखा गया है। होमो सेक्सुअलिटी एक मनोविकार तथा साइकिक रोग है तथा इसका उपचार साइकेट्री, मानसशास्र व ज्योतिषशास्त्र के माध्यम से संभव है।

28/09/2021

संतान प्राप्ति में बाधा

"संतानधिपते: पञ्चषष्ठरि: फस्थिवेखले।
पुत्रोभावो भवेत्तस्य यदि जातो न जीवति।।"

पंचमेश से 5/6/10 में यदि केवल पापग्रह हो तो उसको संतान नहीं होती, हो भी तो जीवित नहीं रहती हैं।

"मंदस्य वर्गे सुतभाव संस्थे निशाकरस्थेऽपि च वीक्षितेऽमिन्।
दिवाकरेणोशनसा नरस्क पुनर्भवासंभव सूनुलब्धे:।।"

पंचम भाव में शनि के वर्ग हों तथा उसमें चंद्रमा बैठा हो और रवि अथवा शुक्र से दृष्ट हो तो उसको पौनर्भ व (विधवा स्त्री से विवाह करके उत्पन्न) पुत्र होता है।

नवांशका: पंचम भाव संस्था यावन्मितै : पापखगै:द्रदृष्टा:।
नश्यंति गर्भ: खलु तत्प्रमाणाश्चे दीक्षितं नो शुभखेचरेंद्रे :।।

पंचम भाव नवमांश पर जितने पापग्रह की दृष्टि हो उतने गर्भ नष्ट होते हैं किन्तु यदि उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो।

भूनंदनों नंदनभावयातो जातं च जातं तनयं निहन्ति।
दृष्टे यदा चित्र शिखण्डिजेन भृगो: सुतेन प्रथमोपन्नम्।।

पंचम भाव में केवल मंगल का योग हो तो संतान बार-बार होकर मर जाती है। यदि गुरु या शुक्र की दृष्टि हो तो केवल एक संतति नष्ट होती है और अन्य संतति जीवित रहती है। बंध्या योग, काक बंध्या योग, विषय कन्या योग, मृतवत्सा योग, संतित बाधा योग एवं गर्भपात योग स्त्रियों की कुंडली में होकर उन्हें संतान सुख से वंचित कर देते हैं।

इस प्रकार के कुछ योग निम्रलिखित हैं :

लगन और चंद्र लगन से पंचम एवं नवम स्थान से पापग्रहों के बैठने से तथा उस पर शत्रु ग्रह की दृष्टि हो। लगन, पंचम, नवम तथा पुत्रकारक गुरु पर पाप प्रभाव हो लगन से पंचम स्थान में तीन पाप ग्रहों और उन पर शत्रु ग्रह की दृष्टि हो। आठवें स्थान में शनि या सूर्य स्वक्षेत्री हो। तीसरे स्थान पर स्वामी तीसरे ही स्थान में पांचवें या बारहवें में हो और पंचम भाव का स्वामी छठे स्थान में चला गया हो।

जिस महिला जातक की कुंडली में लगन में मंगल एवं शनि इकट्ठे बैठे हों। लगन में मकर या कुम्भ राशि हो। मेष या वृश्चिक हो और उसमें चंद्रमा स्थित हो तथा उस पर पापग्रहों की दृष्टि हो।

पांचवें या सातवें स्थान में सूर्य एवं राहू एक साथ हों। पांचवें भाव का स्वामी बारहवें स्थान में व बारहवें स्थान का स्वामी पांचवें भाव में बैठा हो और इनमें से कोई भी पाप ग्रह की पूर्ण दृष्टि में हो।

आठवें स्थान में शुभ ग्रह स्थित हो साथ ही पांचवें तथा ग्यारहवें घर में पापग्रह हों। सप्तम स्थान में मंगल-शनि का योग हो और पांचवें स्थान का स्वामी त्रिक स्थान में बैठा हो।

पंचम स्थान में मेष या वृश्चिक राशि हो और उसमें राहू की उपस्थिति हो या राहू पर मंगल की दृष्टि हो। शनि यदि पंचम भाव में स्थित हो और चंद्रमा की पूर्ण दृष्टि में हो और पंचम भाव का स्वामी राहू के साथ स्थित हो।

नोट : _ यह योग शास्त्रों में लिखित है वर्तमान समय में संतान सुख के काफी वैदिक और वैज्ञानिक पद्धति के उपाय है। यदि इनमेसे कोई भी योग हो तो निराश न हो किसी योग्य ज्योतिषी से संपर्क करे एवं चिकित्सा की भी सहायता ले।

26/09/2021

"भाग्यो फलति सर्वत्र न विद्या न च पौरूषम् "
कोई भी व्यक्ति चाहे वह कितना ही होशियार, साहसी व बलयुक्त क्यों न हों, यदि उसका भाग्य बलवान नहीं है, तो सब बेकार है। भाग्यबली होना अत्यंत आवश्यक है।

26/09/2021

मनोकामना पूर्ण करने के लिए गणेश अनुष्ठान

श्री गणेश जी की प्रसन्नता के लिए सुख शान्ति समृद्धि , सर्व बाधाओ के निवारण के लिए अनुभूत प्रयोग बता रहे जो आपके जीवन सभी प्रकार की खुशियाँ प्रदान करने वाला है -

आर्थिक अभाव एवं दरिद्रतानाश ,कर्ज मुक्ति तथा धन संपदा प्राप्ति हेतु भगवान श्री गणेश जी की स्तुति एक अत्यंत प्रभावशाली उपाय है , भगवान गणेश स्यंम रिद्धि - सिद्धि के दाता है की प्रसन्नता का विधान इस प्रकार से है -

अनुष्ठान आरम्भ करने से पूर्व भगवान श्री गणेश जी का स्मरण करके यह संकल्प करे अपनी कामना सिद्धि एवं सर्व कार्य निविघ्न पूर्ती के लिए 108 दिन तक नित्य उक्त स्तुति करुंगा , श्री गणेश मेरी इच्छा को शीघ्र पूरी करे ।

विधि -

शुक्ल पक्ष के प्रथम बुधवार से यह प्रयोग आरम्भ करना चाहिए स्नानादि के पश्चात प्रातःकाल विध्न विनाशक गणपति का ध्यान करके पीली मिट्टी की डली ले आये अथवा पीली मिट्टी के अभाव मे एक साबुत सुपारी ले लें लाल रंग के आसन पर पीली मिट्टी अथवा सुपारी को गणेश जी का प्रति रुप मानकर सिन्दूर चढ़ावे , कलावा अथवा मौली लपेट दें के बाद श्री गणेश जी का रिद्धि सिद्धि सहित आवाहन निम्न मंत्र से करे -

""गणनां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम् । ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नःश्रण्वन्नूतिभिः सीद सादनम्"" ।।

( ऋग्वेद 2 / 23/1)

आवाहन के पश्चात श्री गणेश को दही ,दूर्वा , कुशाग्र , पुष्य , पान , अक्षत , कुंकुम , पीली सरसो , सुपारी तथा जायफल ,लौग जल अर्पित करे लड्डू का भोग लगावे श्री गणेश जी को लाल कमल पुष्प अधिक प्रिय है अर्पित करे ।

इस सम्पूर्ण विधि के दौरान ॐ गं गणपते नमः का मानसिक जप करते रहे धूप दीप करने के पश्चात गणेश के निम्नवत धनदायक स्त्रोत का पाठ लाल रंग के आसन पर लाल वस्त्र धारण करके करना चाहिए आराधना के दौरान सात्विक विचार रखना चाहिए -

धनदायक श्री गणेश स्त्रोत -

ॐ नमो विध्नराजाय सर्वसौख्य प्रदायिने ।

दृष्टारिष्ट विनाशाय पराय परमात्मने । ।

लम्बोदरं महावीर्य नागयज्ञोपशोभितम् ।

अर्धचंद्रधरं देवं विध्न व्यूहविनाशनम् ।।

ॐ हाँ हीं हूँ हैं हौं हः हेरम्बाय नमो नमः ।

सर्व सिद्धिप्रदोऽसि त्वं सिद्धि बुद्धिप्रदोभव। ।

चिन्तितार्थ प्रदस्त्वं हि सततं मोदकप्रियः।

सिन्दूरा रूपवस्त्रैश्च पूजितो वरदायकः ।।

इदं गणपतिस्तोत्रं यः पठेद् भक्तिमान नरः।

तस्य देहं च गेहं च स्वयं लक्ष्मीर्नमुञ्चति। ।

यह उपाय निरन्तर 108 दिन तक ग्यारह बार पाठ करना है जब तक उपाय करे तब तक सात्विक भोजन करे और सदाचार से रहे ।

श्री गणेश जी की स्थापना एक बार ही करनी है लेकिन धूप दीप तथा स्तोत्र पाठ नित्य करना है , दूसरे दिन पूजा करने से पूर्व पहले दिन अर्पित पुष्यादि को उतार कर अलग रख दे और पुनः ताजे पुष्पादि अर्पित करे उतारे गये पुष्यादि को किसी बहते हुए जल मे प्रवाहित कर दे ऐसा प्रयोग पूर्ण होने तक करना है ।

108 दिन बाद जब प्रयोग सम्पन्न हो जाये तब श्री गणेश के स्वरूप को अपने गल्ले अथवा पूजा स्थल मे स्थान देकर नित्य धूप दीप करते रहे , ऐसा करने से श्री गणेश जी की कृपा से लक्ष्मी जी अपना भरपूर आशीर्वाद प्रदान करती है तथा घर मे धन धान्य से परिपूर्ण रहता है ।

जय श्री गणेश 🙏🏼🙏🏼🙏🏼

25/09/2021

देवलोक (स्वर्ग)प्राप्ति योग

यदि शुभ ग्रह बारहवें भाव में शुभ होकर स्थित हों, अच्छे वर्ग में हों और शुभ ग्रह से दृष्ट हों तो जातक को स्वर्ग मिलता है।

यदि अष्टम भाव में केवल शुभ ग्रह हों तो मरणोपरांत शुभ गति प्राप्त होती है।

यदि बृहस्पति दशमेष होकर बारहवें स्थान में हो और शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो देवपद प्राप्त होता है। (सर्वार्थ चिंतामणि)

लग्न में उच्च का गुरु चंदको पूर्ण दृष्टि से देखता हो और अष्टम स्थान में कोई ग्रह न हो तो जातक सैकड़ों धार्मिक कार्य करता है और सदगति पाता है।

दरिद्र योग नीवारण 🙏🏼सभी लग्नो के लिए अति श्रेष्ट ग्रहो के अधिपति सूर्य देव जो सभी ग्रहो को ऊर्जा प्रदान करते हैं की आराध...
23/09/2021

दरिद्र योग नीवारण 🙏🏼

सभी लग्नो के लिए अति श्रेष्ट ग्रहो के अधिपति सूर्य देव जो सभी ग्रहो को ऊर्जा प्रदान करते हैं की आराधना करने से दरिद्रता से निवृत्त मिलती है का अद्भुत सिद्ध प्रयोग निम्नवत प्रकार से है -

रविवार शुक्ल पक्ष मे प्रातः सूर्योदय के समय स्नान से निवृत्त होकर ताम्र पत्र पर लाल चंदन के लेप से अनार वृक्ष की टहनी की कलम बनाकर सूर्य यंत्र का लेखन करे या ताम्र पत्र पर यंत्र उत्कीर्ण करवा ले , पूर्व निर्मित यंत्र भी लिया जा सकता है इस यंत्र को पंचामृत से शुद्ध कर ले , धूप दीप से पूजन कर यंत्र को लाल पुष्प चढाकर लाल वस्त्र के आसन पर विराजमान कर दे ।

ताँबे के पात्र मे जल लेकर उसमे लाल चंदन, श्वेत चंदन, तिल ,कुशाग्र, साठी, धान ,राई, लाल कनेर का पुष्प, गोरोचन, कुमकुम ,जौ आदि सामग्री डाल दे ऊनी आसन पर विराजमान होवे घी का दीपक जलावे ।

अब आंखे बन्द करके लाल रंग के कमल पर आसीन तीन नेत्रो वाले वेदत्रयमूर्ति अपने चारो हाथो मे कमल ,पद्म ,अभय तथा वर मुद्रा धारण किए हुए प्रकाश पुंज कांति वाले समस्त जगत को जीवन प्रदान करने भगवान सूर्य का ध्यान करे ।

ध्यान के पश्चात सूर्य मंत्र के देवता ,ॠषि आदि को विनियोग कर प्रणाम करे -

विनियोग -

अस्य श्री सूर्य मंत्रस्य भृगुऋषिः गायत्री छन्दः भगवान दिवाकरो देवता हीं बीज श्रीं शक्तिरात्मनोऽभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः ।।

ऋषियादि देवता का विनियोग करने के बाद लाल चंदन की माला से निम्नवत मंत्र का 1008 बार जाप कम से कम 108 दिन तक करें -

मंत्र- ॐ हीं घृणि सूर्य आदित्यः श्रीं

मंत्र जप के पश्चात घुटनो के बल बैठकर ताम्र पात्र को दोनो हाथो से सिर के ऊपर ले जाकर सूर्यदेव की ओर द्रष्टि करके अर्ग अर्पित दे ।

दूसरे दिन पुनः नई सामग्री लेनी चाहिए यंत्र एक बार ही निर्मित करना है पहले दिन की सामग्री को बेलवृक्ष की जड़ मे अथवा किसी नदी तालाब मे विसर्जित कर देना चाहिए।

नियमित रूप से मंत्र जप करने पर आपके आत्म बल, तेज मे वृद्धि होगी एवं धनागमन के नये स्रोत बनगे, आपका रोजगार सुचारु रुप से चलेगा दरिद्रता का समूल नाश हो जावेगा ।

उपरोक्त प्रयोग अपने आप मे विलक्षण है जन्म कुंडली मे विद्यमान सभी प्रकार के दरिद्र योगो का निवारण करने वाला सिद्ध प्रयोग है जो आय मे वृद्धि करने वाला सभी ग्रहो के नकारात्मक प्रभावो को क्षय करने वाला हे

मूल स्रोत - गुरुदेव का अनमोल ज्ञान (अनिल कुमार शर्मा )

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