17/07/2025
आयुर्वेद में "मंत्र" का अर्थ अक्सर जप किए जाने वाले शाब्दिक मंत्रों से नहीं, बल्कि **स्वास्थ्य के सूत्रों, सिद्धांतों या स्मरणीय श्लोकों** से होता है। सावन (श्रावण) का महीना वर्षा ऋतु में आता है, जब वात दोष बढ़ता है और पाचन अग्नि (जठराग्नि) मंद हो सकती है। आयुर्वेद इस समय विशेष आहार-विहार की सलाह देता है।
यहां कुछ प्रासंगिक आयुर्वेदिक सूत्र/श्लोक और उनका हिंदी अनुवाद व अर्थ दिया गया है, जो सावन में स्वस्थ रहने के सिद्धांत बताते हैं:
**1. आहार संबंधी महत्वपूर्ण सूत्र:**
* **मंत्र (श्लोक):**
**"वर्षास्वग्निबलं हीनं दोषैरामैश्च पीडितम्।
वृद्धिमभ्येति कुपितं तस्माद्लघु हितं चरेत्॥"**
(अष्टांग हृदयम्, सूत्रस्थानम्, अध्याय ३)
* **शाब्दिक अनुवाद:**
वर्षा ऋतु में अग्नि (पाचन शक्ति) बलहीन होती है और दोष (वात, पित्त, कफ) आम (अपचा हुआ, विषैला पदार्थ) द्वारा पीड़ित होते हैं। ये कुपित होकर बढ़ जाते हैं। इसलिए (इस ऋतु में) लघु (हल्का) और हितकारी (उपयुक्त) आचरण करना चाहिए।
* **अर्थ व व्यावहारिक सलाह (सावन के लिए):**
* **हल्का व सुपाच्य भोजन:** पाचन शक्ति कमजोर होती है, इसलिए भारी, तैलीय, बासी, ठंडा, कच्चा भोजन न खाएं।
* **गर्म व ताजा भोजन:** ताजा पका हुआ, गर्म भोजन करें। सूप, दाल, खिचड़ी, गेहूं की रोटी, पुराने अनाज (जैसे जौ) अच्छे हैं।
* **हल्दी, अदरक, काली मिर्च:** इनका सेवन पाचन शक्ति बढ़ाने के लिए करें।
* **पानी उबालकर पियें:** पानी की शुद्धता जरूरी है। उबालकर या औषधीय जड़ी-बूटियों (जैसे तुलसी) से युक्त पानी पियें।
* **दही/कढ़ी से परहेज:** कफ बढ़ा सकता है। छाछ (मट्ठा) बेहतर विकल्प है।
**2. दिनचर्या संबंधी सूत्र:**
* **मंत्र (सिद्धांत):**
**"दिवास्वप्नं परित्यज्य व्यायामं चात्र वर्जयेत्।"**
(चरक संहिता, सूत्रस्थान, अध्याय ६ - ऋतुचर्या प्रकरण से संबंधित सामान्य सिद्धांत)
* **शाब्दिक अनुवाद:**
(वर्षा ऋतु में) दिन में सोना त्याग देना चाहिए और व्यायाम भी वर्जित है।
* **अर्थ व व्यावहारिक सलाह (सावन के लिए):**
* **दिन में न सोएं:** इससे शरीर में भारीपन, सुस्ती और कफ बढ़ता है।
* **कठोर व्यायाम न करें:** अत्यधिक पसीना आने वाला कठोर व्यायाम वात को बढ़ा सकता है। हल्के योगासन (जैसे भुजंगासन, पवनमुक्तासन), प्राणायाम (कपालभाति, अनुलोम-विलोम) और टहलना बेहतर है।
* **शरीर सूखा रखें:** भीगने से बचें। गीले कपड़े तुरंत बदलें। सिर ढककर रखें।
* **पैरों की सफाई:** बारिश के पानी या कीचड़ में चलने के बाद पैरों को अच्छी तरह धोकर सुखा लें।
**3. सामान्य स्वास्थ्य सूत्र (प्रकृति अनुसार):**
* **मंत्र (मौलिक सिद्धांत):**
**"देशकालबलात्मानं विचार्य सदा कुर्यादौषधं भेषजम्।"**
(यह सिद्धांत आयुर्वेद के मूल में निहित है)
* **शाब्दिक अनुवाद:**
देश (स्थान), काल (ऋतु/समय), और आत्मा (व्यक्ति की शक्ति/प्रकृति) का विचार करके ही औषधि या उपचार करना चाहिए।
* **अर्थ व व्यावहारिक सलाह (सावन के लिए):**
* **ऋतु के अनुसार आचरण:** सावन की विशेष परिस्थितियों (नमी, ठंडक, पाचन कमजोर) को ध्यान में रखकर ही खानपान और दिनचर्या तय करें। गर्मी के गुण वाली चीजें (जैसे तीखा, कसैला) थोड़ा फायदेमंद हो सकती हैं।
* **व्यक्तिगत प्रकृति (वात, पित्त, कफ):** जिसका वात दोष पहले से ही प्रकुपित हो, उसे वात बढ़ाने वाली चीजों (जैसे अधिक कच्ची सब्जियाँ, ठंडा पानी) से विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
* **स्थानीय उपलब्धता:** ताजे, स्थानीय और मौसमी फल-सब्जियों को प्राथमिकता दें।
**सावन में स्वस्थ रहने के लिए आयुर्वेदिक सार-संक्षेप:**
1. **पाचन का ख्याल रखें:** हल्का, गर्म, ताजा भोजन। भारी, तला, बासी, ठंडा न खाएं। पाचन अग्नि बढ़ाने वाले मसाले (अदरक, हल्दी, काली मिर्च) उपयोगी हैं।
2. **पानी शुद्ध पियें:** उबालकर या औषधीय पानी (जैसे तुलसी, सौंफ डालकर) पियें।
3. **दही/कढ़ी से बचें:** छाछ (मट्ठा) बेहतर है।
4. **दिन में न सोएं:** सुस्ती और कफ बढ़ाता है।
5. **कठोर व्यायाम न करें:** हल्के योग, प्राणायाम और टहलना करें।
6. **शरीर सूखा रखें:** भीगने से बचें, गीले कपड़े तुरंत बदलें।
7. **वात बढ़ाने वाली चीजें कम करें:** बैंगन, फूलगोभी, राजमा, उड़द दाल, ठंडे पेय।
8. **हर्बल चाय:** तुलसी, अदरक, दालचीनी की चाय फायदेमंद है।
9. **आयुर्वेदिक प्रक्रियाएँ:** अगर संभव हो तो पंचकर्म में "वमन" (उपचारात्मक वमन) इस ऋतु में फायदेमंद माना जाता है, पर यह विशेषज्ञ की देखरेख में ही करें।
याद रखें: ये "मंत्र" या सूत्र जादुई शब्द नहीं हैं, बल्कि **व्यावहारिक जीवन शैली के निर्देश** हैं। इन्हें अपनाकर सावन के महीने में स्वस्थ और तंदुरुस्त रहा जा सकता है। किसी विशेष स्वास्थ्य समस्या के लिए योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।