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कपूर,,,,, (संस्कृत : कर्पूर),,,,,,कपूर उड़नशील वानस्पतिक द्रव्य है। यह श्वेत रंग का मोम जैसा पदार्थ है। इसमे एक तीखी गंध...
14/02/2026

कपूर,,,,, (संस्कृत : कर्पूर),,,,,,

कपूर उड़नशील वानस्पतिक द्रव्य है।
यह श्वेत रंग का मोम जैसा पदार्थ है। इसमे एक तीखी गंध होती है। कपूर को संस्कृत में कर्पूर, फारसी में काफ़ूर और अंग्रेजी में कैंफ़र कहते हैं।

कपूर उत्तम वातहर, दीपक और पूतिहर होता है। त्वचा और फुफ्फुस के द्वारा उत्सर्जित होने के कारण यह स्वेदजनक और कफघ्न होता है। न्यूनाधिक मात्रा में इसकी क्रिया भिन्न-भिन्न होती है। साधारण औषधीय मात्रा मेंइससे प्रारंभ में सर्वाधिक उत्तेजन, विशेषत: हृदय, श्वसन तथा मस्तिष्क, में होता है। पीछे उसके अवसादन, वेदनास्थापन और संकोच-विकास-प्रतिबंधक गुण देखने में आते हैं। अधिक मात्रा में यह दाहजनक और मादक विष हो जाता है।

आज कपूर के पेड़ से संबंधित ये पोस्ट आपके लिए काफी उपयोगी साबित होगा। मैं कपूर का पौधा इसलिए कह रहा हू कि मेरा पौधा वर्तमान में मात्र 10 इंच के pot में लगा हुआ है और इसके पेड़ बनने के लिए इसको जमीन मिलना अभी बाकी है।

तो चलिए बात करते है कपूर के पौधे के बारे में...
वर्तमान समय में प्रचलित कपूर केमिकल्स के ही बने होते हैं। यह कमाल का तत्व प्रकृति में भी विद्यमान होता है। दरअसल कपूर एक विशालकाय पेड़ से प्राप्त होते हैं जिनका मेडिसिनल वैल्यू कमाल का होता है। केमिकल्स वाले कपूर में मेडिसिनल वैल्यू का कोई अता-पता नहीं होता।कपूर लगभग हर घर में प्रयोग में लाया जाता है। पूजा पाठ में तो खास तौर पर इसका इस्तेमाल होता है।

पूजा खत्म होने के बाद आरती के समय कपूर की अनिवार्यता हर किसी को पता है। कपूर सिर्फ फैक्ट्रियों में नहीं बनते, बल्कि पेड़ पर भी उगते हैं। यह बात बहुत कम लोगों को पता होगी। इसके साथ ही कपूर के गुणकारी फायदे और इसके कुछ अनछुए रहस्य भी हैं, जिससे लोग शायद अनभिज्ञ हैं।कपूर एक विशालकाय, बहुवर्षायु लगभग सदाबहार वृक्ष है।

इसका वृक्ष, एशिया के विभिन्न भागों में मसलन भारत, श्रीलंका, चीन, जापान, मलेशिया, कोरिया, ताइवान, इन्डोनेशिया आदि देशों में पाया जाता है। कपूर के वृक्ष की लम्बाई 50 से 100 फीट तक होती है। इसके सुन्दर, अति सुगन्धित पुष्प और मनमोहक फल तथा पत्तियाँ बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करते हैं। यही कारण है कि कहीं-कहीं इसे श्रृंगारिक वृक्ष के रुप में भी अपनाया गया है। पत्तियां बड़ी सुन्दर, चिकनी, मोमी, लालीमायुक्त हरापन लिए होती हैं। वसन्त ऋतु में छोटे-छोटे अति सुगन्धित फूल लगते हैं। इसके फल भी बड़े मोहक होते हैं।

कपूर वृक्ष की लकड़ियां सुन्दर फर्नीचर के काम में भी लायी जाती हैं। यह काफी मजबूत और टिकाऊ होती है। इसके पेड़ से प्राप्त लकड़ियों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर, तेज ताप पर उबाला जाता है फिर वाष्पीकरण और शीतलीकरण विधि से रवादार कपूर का निर्माण होता है। इसके अलावा, इससे अर्क और तेल भी बनाया जाता है, जिसका प्रयोग प्रसाधन एवं औषधी कार्यों में बहुतायत होता है।

आयुर्वेद में इसके अनेक औषधीय प्रयोगों का वर्णन है। एलोपैथी और होमियोपैथी दवाइयों में भी कपूर का प्रयोग होता है। यह शीतवीर्य है, यानी इसकी तासीर ठंडी है। भारतीय कर्मकांड और तन्त्र में तो कपूर रचाबसा है ही, कपूर की कज्जली और गौघृत से काजल भी बनाया जाता है। यह बड़ा गुणकारी होता है।
कपूर का पौधा हमारे लिए बहुत ही फायदेमंद होता है। इसकी सुगंध इतनी अच्छी होती है कि इसकी सुगंध से आसपास की सभी नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती हैं। कपूर का पौधा अपनी सुगंध से चारों ओर के वातावरण को खुशबूदार बना देता है।
कपूर के पौधे को हम अपने घर में,बाहर, कहीं भी किसी भी जगह पर लगा सकते हैं।इसे हम अपने घर में, गमले में,कहीं भी लगा सकते हैं। कपूर का पौधा केवल एक पौधा ही नहीं है अपितु यह हमारे लिए स्वास्थ्य रूपी खजाने का भंडार है।

ऐसा माना जाता है कपूर का पौधा लगाने से घर से बीमारियां दूर हो जाती हैं। अगर कोई व्यक्ति कपूर के पौधे के संपर्क में रहता है तो वह हमेशा स्वस्थ रहता है।
सबसे बड़ा फायदा कपूर का पौधा लगाने से जो हमें होता है वह यह है कि यह पर्यावरण को शुद्ध करने में बहुत बड़ी मदद करता है।
दोस्तों इस तरह से कपूर का पौधा हमारे लिए बहुत ही लाभकारी है।यह हमें जीवन वायु प्रदान करता है।

त्रिफला चूर्ण (Triphala Churna) आंवला, हरड़ और बहेड़ा का एक आयुर्वेदिक मिश्रण है, जो पेट से जुड़ी समस्याओं जैसे कब्ज, एस...
13/02/2026

त्रिफला चूर्ण (Triphala Churna) आंवला, हरड़ और बहेड़ा का एक आयुर्वेदिक मिश्रण है, जो पेट से जुड़ी समस्याओं जैसे कब्ज, एसिडिटी, और अपच के लिए रामबाण माना जाता है। यह एक प्रभावी पाचन सुधारक और प्राकृतिक डिटॉक्सिफायर है, जो बिना लत लगाए कब्ज से राहत देता है। रात में गुनगुने पानी या दूध के साथ 3-5 ग्राम सेवन सबसे उत्तम है।
त्रिफला चूर्ण के फायदे:
बेहतर पाचन और कब्ज: यह आंतों की सफाई करता है और मल त्याग को आसान बनाता है, जिससे कब्ज, एसिडिटी और ब्लोटिंग से राहत मिलती है।
वजन प्रबंधन: चयापचय (Metabolism) को बढ़ाकर वजन कम करने में मदद करता है।
आंखों की रोशनी: त्रिफला का नियमित सेवन आंखों की रोशनी बढ़ाने में सहायक माना जाता है।
प्रतिरक्षा और त्वचा: यह शरीर में एंटी-एजिंग (anti-aging) और डिटॉक्सिफायर के रूप में काम करता है, जो त्वचा को स्वस्थ रखता है और इम्यूनिटी को बढ़ाता है।
काटजू (Body Detox): यह शरीर के अंदर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालता है।
सेवन करने का सही तरीका:
मात्रा: वयस्कों के लिए, 3-5 ग्राम (लगभग एक चम्मच) की मात्रा अनुशंसित है।
समय: सबसे अच्छा समय रात में सोने से पहले है। इसे रात में गर्म पानी या दूध के साथ लेने से सुबह पेट अच्छी तरह साफ होता है।
सुबह का सेवन: सुबह खाली पेट भी इसे लिया जा सकता है।
सावधानी और साइड इफेक्ट्स:
गर्भावस्था: गर्भवती महिलाओं को इसका सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे गर्भपात का खतरा बढ़ सकता है।
अत्यधिक सेवन: बहुत अधिक मात्रा में लेने से दस्त या पेट में ऐंठन हो सकती है।
चिकित्सकीय सलाह: यदि आप किसी विशेष बीमारी या स्थिति के लिए इसका सेवन कर रहे हैं, तो डॉक्टर से सलाह लें।
त्रिफला चूर्ण के मुख्य घटक:
यह तीन औषधीय फलों का एक समान (1:1:1) या विशिष्ट अनुपात में मिश्रण है:
आंवला (Amalaki): विटामिन सी से भरपूर और कायाकल्प।
हरड़ (Haritaki): पाचन में सहायक और रेचक।
बहेड़ा (Bibhitaki): बलगम को कम करने वाला और पाचन क्रिया को ठीक करने वाला।
नोट: किसी भी चूर्ण का नियमित सेवन शुरू करने से पहले एक बार आयुर्वेदिक चिकित्सक से सलाह अवश्य लें।

श्री राजीव दीक्षित जी हेल्थ टिप्स
11/02/2026

श्री राजीव दीक्षित जी हेल्थ टिप्स

द्रोणपुष्पी (गुमा) एक सहज मिलने वाली लेकिन अत्यंत प्रभावशाली आयुर्वेदिक औषधि है। खेत-खलिहानों में उगने वाला यह पौधा अपने...
11/02/2026

द्रोणपुष्पी (गुमा) एक सहज मिलने वाली लेकिन अत्यंत प्रभावशाली आयुर्वेदिक औषधि है। खेत-खलिहानों में उगने वाला यह पौधा अपने ज्वरनाशक, पाचनवर्धक और रोगनाशक गुणों के कारण प्राचीन काल से घरेलू उपचारों में उपयोग होता रहा है। आयुर्वेद में इसके पंचांग को अनेक रोगों में लाभकारी माना गया है।

द्रोणपुष्पी (गुमा), जिसका वानस्पतिक नाम Leucas aspera या Leucas cephalotes है, आयुर्वेद में एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है। यह पौधा भारत में खेतों, बंजर भूमि और ग्रामीण क्षेत्रों में आसानी से पाया जाता है। इसके पत्ते, फूल, जड़ और पूरे पंचांग (पौधे के सभी भाग) का उपयोग विभिन्न रोगों के उपचार में किया जाता है। नीचे इसके औषधीय उपयोग और सेवन विधि का विवरण दिया गया है:

द्रोणपुष्पी के औषधीय गुण इसे कई स्वास्थ्य समस्याओं के लिए प्रभावी बनाते हैं। इसके प्रमुख उपयोग निम्नलिखित हैं:

बुखार (ज्वर).......
द्रोणपुष्पी को ज्वरनाशक के रूप में जाना जाता है। यह सामान्य बुखार, मलेरिया, टाइफाइड और विषम ज्वर में लाभकारी है।इसके पत्तों का रस निकालकर शरीर पर लगाने या काढ़े के रूप में सेवन करने से बुखार कम होता है।

पाचन समस्याएँ......
अपच, गैस, पेट फूलना, और दस्त जैसी समस्याओं में द्रोणपुष्पी उपयोगी है। यह पाचन अग्नि को बढ़ाकर भूख में सुधार करता है।पत्तों की सब्जी या काढ़ा बनाकर खाने से पाचन तंत्र मजबूत होता है।

गठिया और जोड़ों का दर्द:
द्रोणपुष्पी के पंचांग का काढ़ा बनाकर सेवन करने या जोड़ों पर लेप करने से गठिया और जोड़ों के दर्द में राहत मिलती है।इसके एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण सूजन और दर्द को कम करते हैं।

त्वचा रोग:
दाद, खुजली, घाव, और त्वचा संक्रमण में इसके पत्तों का रस या लेप लगाने से लाभ होता है। इसके एंटीसेप्टिक और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण त्वचा को तेजी से ठीक करते हैं।रोम छिद्र की सूजन में पत्तों का भस्म घोड़े के पेशाब के साथ मिलाकर लेप करने से लाभ मिलता है।

श्वसन समस्याएँ:
खांसी, सर्दी, और श्वास रोगों में द्रोणपुष्पी का काढ़ा या रस उपयोगी है। इसके पत्तों का रस अदरक और शहद के साथ मिलाकर पीने से खांसी में राहत मिलती है।

द्रोणपुष्पी के फूलों और काले धतूरे के फूलों को चिलम में रखकर धूम्रपान करने से श्वास रोगों में लाभ होता है।

पीलिया और लिवर रोग....
द्रोणपुष्पी की जड़ का चूर्ण पिप्पली चूर्ण के साथ मिलाकर 1-2 ग्राम मात्रा में सेवन करने से लिवर और तिल्ली के विकार ठीक होते हैं।

पत्तों का रस आंखों में डालने या काजल की तरह लगाने से पीलिया में लाभ होता है।

आँखों के रोग...
द्रोणपुष्पी के पत्तों का रस चावल के धुले पानी के साथ पीसकर 1-2 बूंद नाक में डालने से आंखों के रोगों में लाभ होता है।पत्तों का रस सिर पर लेप करने से सिरदर्द और आंखों की समस्याएँ कम होती हैं।

अनिद्रा (नींद न आना).....
द्रोणपुष्पी के बीजों का काढ़ा (10-20 मिली) पीने से अच्छी नींद आती है।

सर्पदंश और कीट काटने,,,,,
सर्पदंश के उपचार में इसका उपयोग पारंपरिक रूप से किया जाता है। पत्तों का रस या लेप प्रभावित स्थान पर लगाया जाता है।

अन्य उपयोग.....
यह अनिमिया, मधुमेह, स्नायविक विकार, और मिर्गी जैसे रोगों में भी लाभकारी है।इसके एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण संक्रमण को रोकने और प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में मदद करते हैं।

सेवन विधि,,,,,
प्रमुख सेवन विधियाँ निम्नलिखित हैं:

काढ़ा.....
25-30 ग्राम द्रोणपुष्पी के पंचांग को 200 मिली पानी में उबालें, जब तक पानी चौथाई रह जाए। इसे छानकर शहद या मिश्री के साथ दिन में 1-2 बार पिएँ। यह बुखार, पाचन समस्याओं, और गठिया में उपयोगी है।

सर्दी-जुकाम के लिए पत्तों में अदरक का रस और मुलेठी का चूर्ण मिलाकर काढ़ा बनाएँ और मिश्री डालकर पिएँ।

पत्तों का रस.....
ताजे पत्तों को पीसकर रस निकालें। 10-20 मिली रस को शहद या पानी के साथ मिलाकर दिन में 1-2 बार लें। यह खांसी, पीलिया, और त्वचा रोगों के लिए उपयोगी है।

सिरदर्द के लिए रस को सिर पर लेप करें या 1-2 बूंद नाक में डालें।

चूर्ण....
सूखे पत्तों या जड़ को पीसकर चूर्ण बनाएँ। 1-3 ग्राम चूर्ण को शहद, अदरक के रस, या गर्म पानी के साथ दिन में 1-2 बार लें। यह पीलिया, लिवर रोग, और पाचन समस्याओं के लिए उपयोगी है।

गठिया के लिए 1-2 ग्राम चूर्ण में पिप्पली चूर्ण मिलाकर सेवन करें।

लेप.....
पत्तों को पीसकर पेस्ट बनाएँ और प्रभावित स्थान (जैसे घाव, सूजन, या दाद) पर लगाएँ।रोम छिद्र की सूजन के लिए पत्तों का भस्म घोड़े के पेशाब के साथ मिलाकर लेप करें।

सब्जी या चटनी:
द्रोणपुष्पी के कोमल पत्तों को सब्जी के रूप में पकाकर या चटनी बनाकर खाया जा सकता है। यह पाचन तंत्र को मजबूत करता है और भूख बढ़ाता है।

गोलियाँ.....
300 मिली पत्तों के रस में 10 ग्राम पित्तपापड़ा, 10 ग्राम नागरमोथा, और 20 ग्राम चिरायता चूर्ण मिलाकर गोलियाँ बनाएँ। 1-3 गोली गर्म पानी के साथ दिन में 1-2 बार लें। यह बुखार और ज्वर में लाभकारी है।

सावधानियाँ और संभावित नुकसान,,,,

चिकित्सक की सलाह: द्रोणपुष्पी का सेवन आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह के बिना नहीं करना चाहिए, क्योंकि अधिक मात्रा में सेवन ठंडी प्रकृति वाले लोगों के लिए हानिकारक हो सकता है।

एलर्जी: कुछ लोगों को इसके रस या लेप से त्वचा पर एलर्जी हो सकती है। पहले छोटी मात्रा में उपयोग करें।

गर्भावस्था और स्तनपान: गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं को इसके उपयोग से बचना चाहिए, जब तक कि चिकित्सक की सलाह न हो।

अधिक मात्रा: अत्यधिक मात्रा में सेवन से पेट में जलन या अन्य समस्याएँ हो सकती हैं।

निष्कर्ष,,,,
द्रोणपुष्पी एक शक्तिशाली आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी है, जो बुखार, पाचन समस्याओं, गठिया, त्वचा रोग, श्वसन समस्याओं, और पीलिया जैसे कई रोगों में लाभकारी है।
इसका उपयोग काढ़ा, चूर्ण, रस, लेप, या सब्जी के रूप में किया जा सकता है, लेकिन उचित मात्रा और विधि के लिए आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह आवश्यक है।

छोटी हरड़ के अद्भुत स्वास्थ्य लाभ:✅ पाचन तंत्र का मजबूत सहारा – छोटी हरड़ को प्राकृतिक डिटॉक्सिफायर माना जाता है। यह पाच...
10/02/2026

छोटी हरड़ के अद्भुत स्वास्थ्य लाभ:

✅ पाचन तंत्र का मजबूत सहारा – छोटी हरड़ को प्राकृतिक डिटॉक्सिफायर माना जाता है। यह पाचन को दुरुस्त करने, कब्ज दूर करने, गैस और एसिडिटी को कम करने में बेहद कारगर होती है। नियमित रूप से हरड़ के सेवन से आपकी आंतें मजबूत होती हैं और अपच जैसी समस्याएं दूर हो जाती हैं।
✅ इम्यूनिटी बूस्टर – इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स और एंटीबैक्टीरियल गुण शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद करते हैं। सर्दी-खांसी, बुखार और अन्य संक्रमणों से बचाने के लिए छोटी हरड़ का उपयोग बेहद लाभकारी होता है।
✅ डायबिटीज कंट्रोल – छोटी हरड़ शरीर में ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित करने में सहायक होती है। यह इंसुलिन संवेदनशीलता को बढ़ाती है और डायबिटीज रोगियों के लिए फायदेमंद मानी जाती है।
✅ वजन घटाने में मददगार – अगर आप मोटापे से परेशान हैं, तो छोटी हरड़ आपके लिए रामबाण हो सकती है। यह शरीर के मेटाबॉलिज्म को तेज करती है, जिससे अतिरिक्त चर्बी जल्दी कम होती है।
✅ बालों और त्वचा के लिए वरदान – हरड़ के सेवन से बाल झड़ने की समस्या कम होती है और स्कैल्प हेल्दी रहता है। साथ ही, यह त्वचा को ग्लोइंग बनाने में मदद करती है और फाइन लाइंस व झुर्रियों को कम करने का काम करती है।
✅ आंखों की रोशनी बढ़ाए – नियमित रूप से हरड़ के सेवन से नेत्र ज्योति में सुधार होता है और मोतियाबिंद जैसी समस्याओं का खतरा कम हो जाता है।
✅ दिल की सेहत का रखे ख्याल – हरड़ ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करती है और कोलेस्ट्रॉल के स्तर को संतुलित रखती है, जिससे हृदय रोगों का खतरा कम होता है।

छोटी हरड़ का सही सेवन कैसे करें?

छोटी हरड़ को आप कई तरीकों से अपने आहार में शामिल कर सकते हैं:
🔹 रात को सोने से पहले – हल्के गुनगुने पानी या शहद के साथ हरड़ का पाउडर लें, इससे कब्ज नहीं होगा और शरीर डिटॉक्स होगा।
🔹 सुबह खाली पेट – नींबू पानी के साथ हरड़ लेने से मेटाबॉलिज्म तेज होता है और पेट की समस्याएं दूर होती हैं।
🔹 आंवला और शहद के साथ – यह मिश्रण इम्यूनिटी को बूस्ट करने के लिए फायदेमंद होता है।
🔹 तेल में मिलाकर – हरड़ के चूर्ण को नारियल तेल में मिलाकर बालों में लगाने से बालों का झड़ना कम होता है।

क्या हरड़ हर किसी को खानी चाहिए?

हालांकि हरड़ के कई फायदे हैं, लेकिन कुछ लोगों को इसे सावधानी से इस्तेमाल करना चाहिए:
❌ गर्भवती महिलाएं और बच्चे बिना डॉक्टर की सलाह के हरड़ का सेवन न करें।
❌ लो ब्लड प्रेशर वाले लोगों को हरड़ कम मात्रा में लेनी चाहिए क्योंकि यह बीपी को और कम कर सकती है।
❌ बहुत अधिक मात्रा में लेने से डिहाइड्रेशन और दस्त की समस्या हो सकती है।

निष्कर्ष:

अगर आपको अब तक नहीं मालूम था कि छोटी हरड़ आपकी सेहत के लिए कितनी फायदेमंद है, तो अब जान गए होंगे कि यह एक संपूर्ण औषधि है जो पाचन, इम्यूनिटी, वजन, डायबिटीज, बाल, त्वचा और हृदय स्वास्थ्य के लिए वरदान है। लेकिन हमेशा सही मात्रा और सही तरीके से इसका उपयोग करना चाहिए ताकि इसके सभी लाभ प्राप्त किए जा सकें।

हींग एक जंगली वनस्पति की जड़ों से प्राप्त लिसलिसा दूध या गोंद है जिसकी गंध बहुत तीव्र होती है। कल्पद्रुम के अनुसार हींग ...
10/02/2026

हींग एक जंगली वनस्पति की जड़ों से प्राप्त लिसलिसा दूध या गोंद है जिसकी गंध बहुत तीव्र होती है। कल्पद्रुम के अनुसार हींग खुरासान, मुल्तान में पैदा होने वाले एक वृक्ष का रस (गोंद) है। बल्हीक के देश का होने के कारण इसे बाल्हीक भी कहा गया है। रामठ देश में पैदा होने के कारण इसे शब्दकल्पद्रुम और कुछ आयुर्वेदिक ग्रंथों में रामठम् भी कहा गया है। रामठ की भौगोलिक स्थिति वर्तमान इज़रायल के दक्षिणी भाग में है जिसे अब रामह कहा जाता है जो कभी रामेसिस द्वितीय के राज्य के अंतर्गत पड़ता था।
मध्य ईरानी वर्ग की खोतानी भाषा में हींग को अङ्गूष्ड कहा जाता था जो तिब्बती के शिङ्-कुंङ् से बना। चूँकि यह क्षेत्र बौद्ध धर्म का केंद्र रहा और बौद्ध प्रधान होने के कारण इसका भारत से गहरा संबंध था, इसलिए लगता है बौद्धों के साथ भारत आकर यह शिङ्-कुंङ् (शिङ्-गुङ्) पालि में हिङ्गु बन गया। पालि, प्राकृत और संस्कृत में इसे हिङ्गु ही कहा गया है। अब भारत की प्रायः सभी भाषाओं में इसे हींग नाम से जाना जाता है।

इसका अंग्रेजी पर्याय asafoetida भी लैटिन के दो शब्दों से बना है: asa जो फ़ारसी aza (गोंद) से बना, और fetida अर्थात् तीखी गंध। इस प्रकार आसफ्फोटिडा काअर्थ होगा तीखी गंध वाली गोंद। असहनीय तीखी गंध के कारण इसे यूरोप में शैतान का गोबर (डेविल्स डंग) भी कहा जाता है।

हींग अब भारत की प्रत्येक रसोई में स्थान का चुकी है और इसे विशेष मसालों में गिना जाता है। जिस हींग का हम उपयोग करते हैं उसे "बंधानी" हींग कहते हैं। यह "बंधानी" हींग क्या है?
बंधनी हींग
तीखी गंध के कारण हींग को संस्कृत में उग्रगंध भी कहा गया है। हींग की तीव्र गंध को कुछ हल्का करने के लिए कुछ और वस्तुएँ हींग में मिलाकर उसे 'बाँधा' जाता है। बाँधने से बन गया बंधनी/बंधानी (कंपाउंडेड) हींग। बंधानी हींग बनाने के लिए हींग की मात्रा केवल 30% या उससे भी कम होती है। इसे कुछ यों समझ सकते हैं कि जिसे आप शुद्ध हींग मान रहे हैं उसमें वस्तुतः दो तिहाई से अधिक मैदा, आटा, गोंद और अन्य पदार्थों को मिलाया जाता है। शुद्ध हींग की गंध को आप सहन नहीं कर सकते, उसे रसोई में बरतना तो दूर की बात है। मिलावटी होना हींग के भाग्य में लिखा हुआ है, इसलिए बाज़ार में जो हींग मिलती है उसमें गंध कम या अधिक इस आधार पर होती है कि उसमें मिलावट कम है या अधिक।

विश्व में हींग की सर्वाधिक खपत भारत में है और भारत में हींग का उत्पादन नहीं होता था,,, बंधनी हींग या उपयोग करने योग्य मिलावटी हींग का उत्पादन होता है। अफगानिस्तान, ईरान, खुरासान आदि मध्य एशिया के देशों से कच्ची हींग का आयात होता है।

हींग से जुड़ी एक विचित्र बात और पता चलती है कि हींग से चमड़े का उद्योग भी जुड़ा हुआ था। कहते हैं मुगल काल में आगरा हींग का बहुत बड़ा बाज़ार हुआ करता था। अफगानिस्तान से हींग भेड़ों की खाल के थैलों में बंद होकर आती थी ‌। आगरा पहुँचकर हींग तो हींग के व्यापारियों के पास पहुँचती और कच्चे चमड़े का थैला अलग से बेच दिया जाता। यही कारण था कि आगरा में जूते का उद्योग भी फलने फूलने लगा। आज हाथरस भारत में हींग शोधन का सबसे बड़ा केंद्र है।

अब तो भारत में हींग की खेती शुरू हो चुकी है और इसका शोध कार्य 2016 में पूर्ण हुआ, 2017 में प्रथम बार हींग के बीज ईरान से मंगवाए गए, विभिन्न संस्थानों को वितरित किए गए
आज हम उत्पादन के करीब आ चुके हैं,,,

आगर आप को गेस हो गई है तो अपनी. नाभि पे हिंग पावडर का पानी से गाढ़ा लेप बना के अपनी नाभि पे लगा कर सो जाये आधे घंटे मे गेस छुट जायेगी. अगर छोटे बच्चे को भी ये उपाय करने से. बच्चे को तुरंत राहत मिलेगी,,,

गुजरात में मूंगफली नहीं, “सिंग दाणा”मिट्टी, स्वाद और संस्कार से जुड़ी एक छोटी-सी लेकिन गहरी कहानीगुजरात में अगर आप किसी ...
10/02/2026

गुजरात में मूंगफली नहीं, “सिंग दाणा”

मिट्टी, स्वाद और संस्कार से जुड़ी एक छोटी-सी लेकिन गहरी कहानी

गुजरात में अगर आप किसी दुकान, घर या सड़क किनारे ठेले पर “मूंगफली” मांगें, तो जवाब मिलेगा—
“सिंग दाणा लीजिए।”

यह सिर्फ शब्दों का फर्क नहीं है।
यह फर्क है मिट्टी का, स्वाद का और आदतों का।

नाम के पीछे की सोच

गुजराती भाषा चीज़ों को घुमा-फिराकर नहीं कहती, वह उन्हें सीधे उनके स्वभाव से पहचान देती है।
मूंगफली ज़मीन के अंदर फली में पैदा होती है।
इसीलिए गुजराती ने उसे नाम दिया—
सिंग (फली) + दाणा (दाना) = सिंग दाणा।

नाम सुनते ही उसकी बनावट, उसका जन्मस्थान और उसकी सादगी सामने आ जाती है।
यह नाम भाषा से ज़्यादा लोकबुद्धि का उदाहरण है।

गुजरात की मूंगफली अलग क्यों है?

गुजरात की मूंगफली देशभर में मशहूर है, लेकिन वजह यह नहीं कि उसका दाना बहुत बड़ा होता है।
असल वजह है उसका स्वाद और खुशबू।

सौराष्ट्र के इलाके—
जूनागढ़, अमरेली, राजकोट, गिर-सोमनाथ—
यहाँ की हल्की रेतीली मिट्टी, तेज धूप और कम नमी
मूंगफली के दाने में
तेल, मिठास और खुशबू भर देती है।

इसीलिए यहाँ की मूंगफली

भूनने पर ज़्यादा महकती है

कच्ची खाने पर भी हल्की मीठी लगती है

आकार में छोटी होते हुए भी स्वाद में गहरी होती है

यही कारण है कि बाहर की मूंगफली गुजरात में आकर अक्सर
“पानी वाली” कह दी जाती है।

सिर्फ फसल नहीं, जुनून है सिंग दाणा

गुजरात में सिंग दाणा केवल खेत की उपज नहीं,
यह रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है।

यह आपको हर जगह मिल जाएगा—

उपवास के खाने में

स्ट्रीट फूड में

दाबेली, फाफड़ा, चाट में

स्कूल के टिफ़िन से लेकर बस-स्टैंड तक

और मज़ेदार बात यह कि
यहाँ चखने में भी सिंग दाणा मौजूद रहता है—
बिलकुल वैसे जैसे उत्तर भारत में चना।

रसोई से संस्कार तक

आज भी गुजरात के बहुत से घरों में
मूंगफली का तेल ही रोज़मर्रा का तेल है—
हल्का, खुशबूदार और भरोसेमंद।

कहा जाता है कि शायद इसी वजह से
गुजराती खाना बहुत ज़्यादा मसालेदार नहीं होता।
तेल खुद ही स्वाद दे देता है,
मसाले चिल्लाने नहीं पड़ते।

उत्पादन और पहचान

गुजरात देश के उन राज्यों में शामिल है
जहाँ सबसे ज़्यादा मूंगफली पैदा होती है।

लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि
गुजराती समाज ने सिंग दाणा को
अपनी संस्कृति और संस्कार का हिस्सा बना लिया है।

यह खेत से निकलकर
रसोई, गली, त्योहार, उपवास
और पेट तक पहुँचता है—
बिना अपनी पहचान खोए।

मिट्टी से पेट तक की कहानी

सिंग दाणा की कहानी
किसी बड़े व्यंजन की नहीं,
किसी महंगे स्वाद की नहीं—

यह कहानी है
मिट्टी से जुड़े स्वाद की,
सादगी की
और गुजराती जीवनशैली की।

शायद इसलिए गुजरात में मूंगफली नहीं कहलाती—
सिंग दाणा कहलाती है।

मिट्टी से गुजराती लोगों के पेट तक
एक छोटी-सी,
लेकिन बेहद गहरी कहानी…
सिंग दाणा की।

दलिया छोड़ दिए हो, इसलिए  #रोग पकड़े हुए हो,,,,,स्कूल में मिलने वाला मिड डे मील हमेशा दलिया ही होता था।💯 अक्सर मैं सोचा कर...
09/02/2026

दलिया छोड़ दिए हो, इसलिए #रोग पकड़े हुए हो,,,,,
स्कूल में मिलने वाला मिड डे मील हमेशा दलिया ही होता था।💯 अक्सर मैं सोचा करता था कि हमें दलिया ही क्यों देते हैं? ढेर भर के आइटम्स छोड़ छाड़ के सिर्फ दलिया ही क्यों परोस देते हैं,,,?

खैर, वक्त बीतता गया और दलिया हमारे रोज के खानपान से दूर होता गया थोड़ी पढ़ाई लिखाई किये और फिर जंगलों की तरफ रुख किया। आदिवासियों के साथ रहने लगा और देखते ही देखते मेरे खानपान में दलिया एक बार फिर लौट आया और जब दलिया से जुड़ी जानकारियां गाँव देहात के जानकारों से मिलने लगी तो समझ आया कि दलिया तो जन्नत है। शुक्रिया है उन पॉलिसी मेकर्स का जिन्होंने मिड डे मील में दलिया इनकॉरपोरेट करवाया होगा

दलिया बेहद #पौष्टिक आहार है। 100 ग्राम दलिया खा लेंगे तो दिन भर के लिए आवश्यक फाइबर्स का 75% हिस्सा आपको मिल जाएगा। मैग्नेशियम भी खूब होता है इसमें जो हार्ट के लिए जरूरी है। इसमें आयरन और विटामिन B6 भी अच्छा खासा मिल जाता है। हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए भी दलिया हमारे शरीर में ताबड़तोड़ मेहनत करता है। इतने सारे गुण है इस दलिये में तो फिर हमारी रसोई से क्यों नदारद है ये? मुझे याद आ रही है एक घटना, उस वक्त मेरी उम्र करीबन 16 साल रही होगी। क्रिकेट खेलने का चस्का लग चुका था। मेरे दोस्त के पिताजी बड़े सरकारी ओहदे पर थे, सरकारी बंगला मिला हुआ था उन्हेँ, घर में एकाध दो नौकर चाकर भी थे। अक्सर उनके घर पर मैं और मेरे कुछ दोस्त क्रिकेट खेला करते थे। एक दिन उनके कुक ने दलिया परोसकर हमें खाने के लिए बुलाया। मैं दलिया पाते ही खुश हो गया, स्कूल वाला मिड डे मील याद आ रहा था। दोस्त के पिताजी ने हमें दलिया खाते हुए देख नौकर को अच्छी खासी फटकार लगा दी, 'ये भी कोई चीज है जो बच्चों को दे रहे हो? कोई ढंग की चीज बना लेते'...मैं बड़ा एन्जॉय कर रहा था दलिया को लेकिन प्लेट हाथों से ले ली गयी और हमें नूडल्स खाने के लिए दिया गया। बस ऐसे ही सत्यानाश हुआ होगा हमारे पारंपरिक #भोज दलिया का। नूडल्स ने निगल लिया दलिया..

आदिवासी तबकों में अलग-अलग प्रकार के दलिया बनते हैं। कहीं दरदरे गेंहू का दलिया, कहीं चावल या किनकी का दलिया और कहीं कुटकी का दलिया। दक्षिण गुजरात में आदिवासी नागली (रागी) का दलिया भी बनाते हैं। औषधीय गुणों की खान होता है दलिया लेकिन भागती दौड़ती ज़िंदगी में हम शहरी लोग इस कदर भागे कि देहाती खानपान को तुच्छ समझने लगे। हम गबदू और आलसखोर हो गए और जल्दबाज़ी के चक्कर में फास्टफूड की तरफ रीझने लगे। हमारा फ़ूड तो बेशक फास्ट हुआ लेकिन बॉडी का सिस्टम स्लो हो गया। हम बीमार होने लगे, शारीरिक और मानसिक रूप से। यहाँ मानसिक बीमार इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि कुछ खानपान को हमने निम्नस्तर का या गरीबों का खानपान मान लिया, बस वहीं गलती हो गई।

सन 1990 के बाद से हिंदुस्तान में लाइफ स्टाइल डिसऑर्डर्स की भरमार होने लगी। डायबिटीज, आर्थराइटिस, कैंसर, हार्ट डिसीसेस, मोटापा और तरह तरह के टीमटाम वाले रोग हर परिवार में पैर पसारने लगे, क्यों? बताइये क्यों? आज भी ग्रामीण तबकों में ये सब समस्याएं काफी कम हैं या ना के बराबर हैं, क्यों? बताइये क्यों? क्योंकि ये लोग आज भी पारंपरिक खानपान को अपनाए हुए हैं।
इनका गरीब होना या भीड़भाड़ और भागते दौड़ते वाले समाज से दूरी होना, इनके लिए 'ब्लेसिंग इन डिस्गाइज़' है। अगर हमारे गांव देहात लाइफ स्टाइल डिसऑर्डर्स से काफी हद तक दूर हैं, उनके जीवन में तनाव कम है और उनके नसीब में पिज़्ज़ा, बर्गर, चाउमीन और अट्टरम सट्टरम चीजें नहीं हैं, तो ये उनके विकसित होने का प्रमाण है, फिर हम लोग लाख कहते रहें कि वो देहाती हैं, आदिवासी हैं या गरीब हैं लेकिन सच्चाई ये है कि वे हमसे लाख गुना बेहतर हैं.. गाँव देहातों में आज भी दलिया और दलिया जैसे कई पौष्टिक व्यंजन अक्सर बनते हैं, इन्हें बड़े शौक से खाया जाता है। बाज़ारवाद ने दलिया को ओट मील बना दिया और आपकी पॉकेट ढीली करवा दी। आप घर में ही दलिया तैयार करें या पता कीजिये आसपास में आटा चक्की कहाँ है, और दलिया बनवा लाइये। अब ये ना पूछना कि आटा चक्की क्या होती है?दलिया बनता कैसे है?

इतना भी तेज ना भागो कि लौटने की गुंजाइश खत्म हो जाए...अपने घर परिवार के बुजुर्गों से पूछिये, सब समझा देंगे, गूगल के दादा परदादी सब आपके घर में ही हैं, उनसे बात कीजिये, सीखिये, इसी बहाने उनका मान भी बढ़ेगा और उन्हें अच्छा लगेगा। भागती दौड़ती लाइफ में हम दलिया तो भूल ही चुके हैं, बुजुर्गों से संवाद भी तो नदारद है पता नहीं किधर भागे जा रही है दुनिया, वापसी करो उस पगडंडी की तरफ जो आपको फार्मेसी और अस्पताल नहीं, अच्छी सेहत की ओर पहुंचाए। भटको, सारे चक्कर एक तरफ फेंक मारो... #दलिया खाना शुरू करें, कम से कम दस दिन में एक बार ही सही
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पेट से गुड-गुड की आवाज़ क्यों आती है? कारण, संकेत और आसान आयुर्वेदिक उपाय - इस पोस्ट में हम एक ऐसी समस्या पर बात करने वा...
09/02/2026

पेट से गुड-गुड की आवाज़ क्यों आती है? कारण, संकेत और आसान आयुर्वेदिक उपाय - इस पोस्ट में हम एक ऐसी समस्या पर बात करने वाले हैं, जो सुनने में भले छोटी लगे, लेकिन जिसे झेलने वाला इंसान अंदर-ही-अंदर काफी परेशान रहता है।

हम बात कर रहे हैं पेट से गुड-गुड करके आवाज़ आने की।

बहुत से लोग कहते हैं -
“पेट में कुछ भी खाया नहीं, फिर भी अंदर से आवाज़ें क्यों आ रही हैं?”
“कहीं पेट में कोई गड़बड़ तो नहीं?”

अगर आपके साथ भी ऐसा होता है कि पेट से बार-बार आवाज़ आती है और आप कंफ्यूज़ हो जाते हैं कि आखिर ये हो क्या रहा है, तो आज का ये टॉपिक आपके लिए ही है।

आयुर्वेद में इस स्थिति को “आटोप (Atop)” कहा जाता है।
हम जानेंगे:

पेट से आवाज़ क्यों आती है
इसके पीछे कौन-सा दोष बिगड़ता है
और इसे कंट्रोल करने के आसान आयुर्वेदिक उपाय क्या हैं

पेट से गुड-गुड की आवाज़ क्यों आती है?
सबसे पहले ये समझना जरूरी है कि शरीर के अंदर जब वात और कफ दोष गड़बड़ाते हैं, तब पेट से आवाज़ आने की शुरुआत होती है।

अब ये दो सिचुएशन हो सकती हैं:

या तो कफ ने वात को रोक दिया
या फिर वात इतना ज्यादा बढ़ गया कि वह अपने रास्ते में हर चीज़ को डिस्टर्ब करने लगा

इन दोनों ही हालात में आंतों की जो नेचुरल मूवमेंट होती है (जिसे peristalsis कहते हैं), वो बिगड़ जाती है।
नतीजा?
पेट के अंदर से गुड-गुड, गड़-गड़, आवाज़ें आने लगती हैं।

सिर्फ आवाज़ या साथ में और भी तकलीफें?
कुछ लोगों को केवल आवाज़ आती है, लेकिन कई लोगों में इसके साथ-साथ और भी परेशानियाँ जुड़ जाती हैं, जैसे:

बार-बार गैस बनना
ढीला मोशन या चिपचिपा मल
पेट में दर्द या मरोड़
मल त्याग के समय ज्यादा आवाज़
पेट ठीक से साफ न होना
अगर ये समस्या लंबे समय तक चलती रहे, तो धीरे-धीरे और लक्षण भी दिखने लगते हैं:
चक्कर आना
कमर के निचले हिस्से में दर्द
घुटनों में दर्द
कमजोरी या भारीपन

यानी शुरुआत भले सिर्फ आवाज़ से हो, लेकिन अगर इसे इग्नोर किया गया, तो ये समस्या बढ़ती चली जाती है।

वात और कफ एक साथ क्यों बिगड़ते हैं?
अब असली सवाल - ऐसा होता क्यों है?

ज्यादातर मामलों में इसका कारण होता है एक्सट्रीम खान-पान।
मतलब:

बहुत ज्यादा मीठा खाना
और उसी के साथ बहुत ज्यादा तीखा, मिर्च-मसालेदार खाना

जैसे:
एक तरफ खूब मिठाई, हलवा, मीठी चीज़ें
और ऊपर से एकदम तेज मिर्च, तीखा मसाला - ऐसा कि मुंह से लेकर पेट तक सब जल जाए

जब ये दोनों चीज़ें साथ-साथ लगातार खाई जाती हैं, तो:

मीठा - कफ बढ़ाता है
तीखा - वात को भड़काता है

और जब वात और कफ एक साथ टकराते हैं, तो सबसे पहले पाचन अग्नि खराब होती है।
अग्नि खराब होते ही पेट में आवाज़, गैस और गड़बड़ी शुरू हो जाती है।

ध्यान रखें: अति हर जगह नुकसान करती है
आयुर्वेद साफ कहता है -
किसी भी रस की अति मत करो।

बहुत ज्यादा तीखा भी नहीं
बहुत ज्यादा मीठा भी नहीं
छहों रस (मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय) को बैलेंस में खाना जरूरी है।

मौसम के हिसाब से थोड़ा एडजस्टमेंट ठीक है,
लेकिन किसी एक रस पर टिक जाना शरीर को बिगाड़ देता है।

अब करें क्या? आसान आयुर्वेदिक उपाय
अगर पेट से आवाज़ आ रही है और साथ में दर्द, गैस, या अन्य तकलीफें भी जुड़ गई हैं, तो नीचे दिए गए उपाय बहुत काम के हैं।

उपाय 1: धनिया-सोंठ का पानी
धनिया और सोंठ - दोनों पाचक हैं और वात-कफ को शांत करते हैं।

बनाने का तरीका:
धनिया: 20 ग्राम
सोंठ: 3–5 ग्राम
पानी: 2 लीटर
इसे उबालकर 1 लीटर कर लें।

अब इस पानी का इस्तेमाल:

चावल पकाने में
दाल, सब्ज़ी या कोई भी उबली चीज़ बनाने में करें

इससे क्या होगा?
खाने में औषधि के गुण आ जाएंगे
पाचन सुधरेगा
पेट की आवाज़ धीरे-धीरे कम होगी

उपाय 2: तड़के वाला तरीका (कम मेहनत वालों के लिए )
अगर इतना सब करने का मन नहीं है, तो:

धनिया (3–5 ग्राम)
सोंठ (थोड़ी कम मात्रा)

इसे घी या तेल में हल्का सा तड़का लगाकर
दाल या सब्ज़ी में डाल दें।

उपाय 3: छाछ + धनिया + सोंठ
अगर आप और भी आसान तरीका चाहते हैं, तो:

छाछ लें (पूरा मक्खन निकालकर)

उसमें धनिया डालें
सोंठ उसकी मात्रा का लगभग 1/4 रखें
इसे खाने के साथ, पानी की जगह थोड़ा-थोड़ा पीएं।

छाछ, धनिया और सोंठ — तीनों वात-कफ नाशक हैं
गैस, आवाज़ और पेट दर्द में बहुत राहत देते हैं

बहुत ज्यादा आवाज़ हो तो ये करें
अगर पेट की आवाज़ इतनी ज्यादा है कि आसपास वाले भी सुन लें, तो:

घी का उपाय:
1 चम्मच देसी घी
1–2 चुटकी सेंधा नमक
1–2 चुटकी सोंठ
इसे खाने के बीच में लें।
जैसे एक रोटी खाई, फिर ये मिश्रण लिया, फिर अगली रोटी।

यह समान वायु को बैलेंस करता है
पेट की आवाज़, गैस और कमर-घुटनों के दर्द में मदद करता है

पेट से ज्यादा आवाज़ (आटोप) में काम आने वाली आयुर्वेदिक दवाइयाँ
अगर केवल डाइट और घरेलू उपायों से पेट की आवाज़ कंट्रोल नहीं हो रही, या आवाज़ के साथ दर्द, गैस, ढीलापन, कमर-घुटनों का दर्द भी जुड़ गया है, तो कुछ आयुर्वेदिक दवाइयाँ बहुत अच्छा सपोर्ट देती हैं।

1. हिंग्वाष्टक चूर्ण
यह दवा खासतौर पर वात-कफ जनित गैस, आवाज़ और मरोड़ में दी जाती है।

डोज़:
1/2 टीस्पून
दिन में 2 बार
गुनगुने पानी के साथ
भोजन से पहले

पेट की गुड-गुड आवाज़, गैस और भारीपन में सबसे पहली पसंद।

2. पंचकोल चूर्ण
जब आवाज़ के साथ अग्नि बहुत मंद हो और खाना देर से पचता हो।

डोज़:

1/4 टीस्पून
दिन में 1–2 बार
छाछ या गुनगुने पानी के साथ
भोजन से पहले

वात-कफ को शांत करता है और पाचन को एक्टिव करता है।

3. चित्रकादि वटी
अगर पेट की आवाज़ के साथ

पेट दर्द
गैस
बार-बार मरोड़
हो रही हो।

डोज़:
1–2 टैबलेट
दिन में 2 बार
गुनगुने पानी के साथ
भोजन से पहले
कमजोर पाचन अग्नि को मजबूती देती है।

4. लवण भास्कर चूर्ण
जब पेट में आवाज़ के साथ भारीपन और भूख कम लगना हो।

डोज़:
1/2 टीस्पून
दिन में 2 बार
गुनगुने पानी के साथ
भोजन से पहले

गैस, ऑटोप और डाइजेशन स्लोनेस में उपयोगी।

5. हिंगु वटी (अगर दर्द ज्यादा हो)
अगर आवाज़ के साथ तेज़ दर्द या ऐंठन हो।

डोज़:
1 टैबलेट
दिन में 2 बार
गुनगुने पानी के साथ
भोजन के बाद
तुरंत वात शमन करती है।

कौन-सी दवा कब चुनें? (Quick Guide)

सिर्फ आवाज़ + गैस - हिंग्वाष्टक चूर्ण
आवाज़ + मंद अग्नि - पंचकोल चूर्ण
आवाज़ + पेट दर्द - चित्रकादि वटी / हिंगु वटी
आवाज़ + भारीपन - लवण भास्कर चूर्ण

एक साथ सब दवाइयाँ लेने की ज़रूरत नहीं होती।

जरूरी सावधानियाँ
ये जनरल डोज़ हैं, व्यक्ति की प्रकृति के अनुसार बदल सकती हैं
बहुत ज्यादा तीखा, मीठा, ठंडा और बासी खाना इस दौरान अवॉइड करें
गर्भवती महिलाएँ, बुज़ुर्ग, या जो पहले से एलोपैथिक दवाइयाँ ले रहे हों,
आयुर्वेद चिकित्सक से सलाह ज़रूर लें

Bottom Line
पेट से बार-बार आवाज़ आना शरीर का सिग्नल है कि
वात और कफ बिगड़ रहे हैं और पाचन कमजोर हो रहा है।

शुरुआत में इसे सही कर लिया जाए,
तो आगे चलकर बड़ी समस्याओं से बचा जा सकता है।

डाइट सुधार + घरेलू उपाय + सही आयुर्वेदिक दवाइयाँ
इस समस्या को कंट्रोल ही नहीं, जड़ से ठीक करने में मदद करती हैं।

✨ नाभि : कुदरत की एक अद्भुत देन ✨मानव शरीर केवल मांस और हड्डियों का ढांचा नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और परमात्मा की एक अत...
09/02/2026

✨ नाभि : कुदरत की एक अद्भुत देन ✨
मानव शरीर केवल मांस और हड्डियों का ढांचा नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और परमात्मा की एक अत्यंत सूक्ष्म एवं बुद्धिमान रचना है। हमारे शरीर का प्रत्येक अंग किसी न किसी उद्देश्य से जुड़ा है। इन्हीं अंगों में नाभि का विशेष महत्व बताया गया है।

🔹 गर्भ से जीवन की शुरुआत और नाभि
जब शिशु गर्भ में होता है, तब उसका सम्पूर्ण पोषण माँ से जुड़ी नाड़ी (नाल) के माध्यम से होता है, जो नाभि से जुड़ी रहती है। नौ महीनों तक वही नाभि शिशु के लिए भोजन, जल और जीवन का माध्यम बनती है। यही कारण है कि भारतीय मान्यताओं में नाभि को जीवन-केंद्र कहा गया है।
परंपरागत मान्यता यह भी कहती है कि मृत्यु के कुछ समय बाद तक नाभि क्षेत्र में गर्माहट बनी रहती है, क्योंकि यह शरीर का गहन केंद्र होता है।

🔹 नाभि और शरीर का संबंध
आयुर्वेद और योग परंपरा के अनुसार नाभि के आसपास कई नसों, धमनियों और ऊर्जात्मक केंद्रों का संगम होता है। इसे मणिपुर चक्र से जोड़ा जाता है, जो पाचन, ऊर्जा और शरीर की आंतरिक शक्ति से संबंधित माना जाता है।
इसी कारण से हमारे बुज़ुर्ग नाभि क्षेत्र की देखभाल को अत्यंत आवश्यक मानते थे।

🔹 नाभि में तेल लगाने की परंपरा
भारत में पीढ़ियों से यह परंपरा रही है कि नाभि में तेल या घी लगाया जाए। यह कोई तात्कालिक चमत्कार नहीं, बल्कि धीमी, नियमित और सहायक देखभाल का तरीका माना गया है।
लोक-अनुभव के अनुसार नाभि में तेल लगाने से:
शरीर की शुष्कता कम होती है
त्वचा और बालों की प्राकृतिक नमी बनी रहती है
ठंड से होने वाली जकड़न में आराम महसूस हो सकता है
पाचन तंत्र को हल्का बल मिलता है
शरीर में ऊर्जा का संतुलन बना रहता है

🔹 परंपरागत अनुभवों में बताए गए कुछ उपाय
⚪ सामान्य दुर्बलता व रूखी त्वचा
रात को सोने से पहले 3–5 बूंद शुद्ध घी या नारियल तेल नाभि में डालकर हल्के हाथों से चारों ओर फैला दें।
⚪ जोड़ों में जकड़न या घुटनों का दर्द
अरंडी के तेल से नाभि क्षेत्र में नियमित मालिश।
⚪ ठंड, कंपकंपी या नसों की जकड़न
सरसों के तेल से नाभि व आसपास हल्की मालिश।
⚪ त्वचा की देखभाल में सहायक
नीम तेल की कुछ बूंदें, केवल बाहरी प्रयोग के लिए।
👉 ये सभी उपाय लोक-परंपराओं और घरेलू अनुभवों पर आधारित हैं, न कि किसी चिकित्सकीय उपचार का विकल्प।

🔹 समझदारी जरूरी है
आज के समय में कई बीमारियाँ जीवनशैली, खान-पान और उम्र से जुड़ी होती हैं। आँखों की गंभीर समस्या, नसों की बीमारी या कोई भी दीर्घकालिक रोग होने पर डॉक्टर की सलाह अनिवार्य है। नाभि में तेल लगाना एक सहायक परंपरा हो सकती है, लेकिन इलाज का स्थान नहीं ले सकती।

🌼 निष्कर्ष,,,,,,

नाभि हमें यह याद दिलाती है कि जीवन की शुरुआत कितनी कोमल और जुड़ी हुई होती है।
जब हम अपनी परंपराओं को समझदारी और सही जानकारी के साथ अपनाते हैं, तभी वे हमारे जीवन में सच में उपयोगी बनती हैं।

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