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आयुर्वेद के सात प्रमुख सिद्धांतआयुर्वेद, भारत की प्राचीन चिकित्सा प्रणाली, जीवन के विज्ञान के रूप में जाना जाता है। इसके...
29/04/2025

आयुर्वेद के सात प्रमुख सिद्धांत

आयुर्वेद, भारत की प्राचीन चिकित्सा प्रणाली, जीवन के विज्ञान के रूप में जाना जाता है। इसके मूल सिद्धांतों का उद्देश्य शारीरिक, मानसिक और आत्मिक संतुलन के माध्यम से समग्र स्वास्थ्य को प्राप्त करना है। आयुर्वेद के प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं:

1. त्रिदोष सिद्धांत (वात, पित्त, कफ): आयुर्वेद के अनुसार, शरीर में तीन दोष होते हैं—वात, पित्त, और कफ। इनका संतुलन स्वास्थ्य का प्रतीक है, जबकि असंतुलन रोगों का कारण बनता है।
2. पंचमहाभूत सिद्धांत: यह सिद्धांत कहता है कि संपूर्ण सृष्टि, जिसमें मानव शरीर भी शामिल है, पांच महाभूतों—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, और आकाश—से मिलकर बनी है।
3. सप्तधातु सिद्धांत: शरीर में सात धातुएँ होती हैं—रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, और शुक्र—जो शरीर की संरचना और कार्यप्रणाली को नियंत्रित करती हैं।
4. त्रिमल सिद्धांत: शरीर में तीन प्रमुख मल होते हैं—मल (विष्टा), मूत्र, और स्वेद (पसीना)—जिनका उचित निष्कासन स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।
5. अग्नि सिद्धांत: 'अग्नि' शरीर की पाचन और चयापचय प्रक्रियाओं का प्रतिनिधित्व करता है। स्वस्थ अग्नि पोषण और ऊर्जा के लिए महत्वपूर्ण है।
6. प्रकृति सिद्धांत: प्रत्येक व्यक्ति की एक विशिष्ट 'प्रकृति' होती है, जो उनके दोषों के अनुपात पर आधारित होती है। यह प्रकृति उनके शारीरिक और मानसिक गुणों को निर्धारित करती है।
7. स्रोतस् सिद्धांत: शरीर में विभिन्न 'स्रोतस्' या नलिकाएँ होती हैं, जो पोषक तत्वों, गैसों, और अपशिष्ट पदार्थों के परिवहन में सहायता करती हैं।

इन सिद्धांतों के माध्यम से, आयुर्वेद व्यक्तिगत स्वास्थ्य और उपचार के लिए एक समग्र दृष्टिकोण प्रदान करता है, जो न केवल रोगों के उपचार पर बल्कि उनकी रोकथाम और जीवनशैली सुधार पर भी केंद्रित है।

"स्वास्थ्यवृत्त (Community Health): आयुर्वेद में समुदायिक स्वास्थ्य और निवारक चिकित्सा का समग्र दृष्टिकोण"आयुर्वेद में स...
29/04/2025

"स्वास्थ्यवृत्त (Community Health): आयुर्वेद में समुदायिक स्वास्थ्य और निवारक चिकित्सा का समग्र दृष्टिकोण"

आयुर्वेद में स्वास्थ्यवृत्त (Community Health) का महत्वपूर्ण स्थान है, जो व्यक्तिगत और सामुदायिक स्वास्थ्य की रक्षा और संवर्धन पर केंद्रित है। यह शाखा न केवल रोगों की रोकथाम पर बल देती है, बल्कि स्वस्थ जीवनशैली, आहार-विहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या, और सदाचार के माध्यम से समग्र स्वास्थ्य को बनाए रखने पर भी जोर देती है।

स्वास्थ्यवृत्त के प्रमुख घटक:

1. दिनचर्या (दैनिक नियम): आयुर्वेद में दैनिक जीवन के लिए नियम निर्धारित हैं, जैसे सुबह जल्दी उठना, दंतधावन (दांत साफ करना), स्नान, योगाभ्यास, और संतुलित आहार का सेवन। ये नियम शरीर और मन को स्वस्थ रखने में सहायता करते हैं।
2. ऋतुचर्या (मौसमी नियम): विभिन्न ऋतुओं के अनुसार आहार और व्यवहार में परिवर्तन करने की सलाह दी गई है, जिससे शरीर मौसम के प्रभाव से सुरक्षित रह सके। उदाहरण के लिए, ग्रीष्म ऋतु में ठंडे और तरल पदार्थों का सेवन, जबकि शीत ऋतु में गर्म और पौष्टिक आहार का सेवन।
3. आहार-विहार (आहार और जीवनशैली): स्वास्थ्यवृत्त में संतुलित आहार और स्वस्थ जीवनशैली पर विशेष ध्यान दिया जाता है। यह माना जाता है कि उचित आहार और नियमित व्यायाम से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और रोगों से बचाव होता है।
4. सदाचार (नैतिक आचरण): आयुर्वेद में मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य के लिए नैतिक आचरण, जैसे सत्य बोलना, अहिंसा, और संयम का पालन महत्वपूर्ण माना गया है। यह मानसिक शांति और सामुदायिक सद्भाव को बढ़ावा देता है।
5. रोग प्रतिषेध (रोगों की रोकथाम): स्वास्थ्यवृत्त में रोगों की रोकथाम के लिए स्वच्छता, उचित आहार, नियमित व्यायाम, और मानसिक संतुलन पर जोर दिया जाता है। यह समग्र स्वास्थ्य को बनाए रखने में सहायता करता है।

आयुर्वेद के अनुसार, स्वास्थ्य की परिभाषा केवल रोगमुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शारीरिक, मानसिक, और आत्मिक संतुलन को भी शामिल करती है। स्वास्थ्यवृत्त का उद्देश्य इस समग्र स्वास्थ्य को प्राप्त करना और समाज में स्वस्थ जीवनशैली को प्रोत्साहित करना है।

"आयुर्वेद में फिजियोलॉजी: स्वास्थ्य और रोगों की आयुर्वेदिक समझ"आयुर्वेद में शरीर क्रिया विज्ञान (Physiology) को 'शरीर क्...
19/04/2025

"आयुर्वेद में फिजियोलॉजी: स्वास्थ्य और रोगों की आयुर्वेदिक समझ"

आयुर्वेद में शरीर क्रिया विज्ञान (Physiology) को 'शरीर क्रिया' कहा जाता है, जो मानव शरीर में होने वाली विभिन्न जैविक क्रियाओं और प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है। यह विज्ञान शरीर के अंगों, ऊतकों और कोशिकाओं के कार्यों को समझने में सहायता करता है, जिससे स्वास्थ्य और रोग की अवस्थाओं का ज्ञान प्राप्त होता है।

आयुर्वेदिक शरीर क्रिया के मुख्य घटक:

1. दोष (Humors): आयुर्वेद के अनुसार, शरीर में तीन प्रमुख दोष होते हैं: वात, पित्त और कफ। ये दोष शरीर की सभी शारीरिक और मानसिक क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं।

o वात दोष: यह गति और संचार से संबंधित है, जैसे श्वसन, रक्त परिसंचरण और तंत्रिका संचार।
o पित्त दोष: यह पाचन, चयापचय और शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है।
o कफ दोष: यह संरचना, स्नेहन और प्रतिरोधक क्षमता से संबंधित है।

2. धातु (Tissues): शरीर में सात प्रमुख धातुएँ होती हैं, जो विभिन्न ऊतकों का प्रतिनिधित्व करती हैं: रस (प्लाज्मा), रक्त (रक्त), मांस (मांसपेशियाँ), मेद (वसा), अस्थि (हड्डियाँ), मज्जा (अस्थि मज्जा) और शुक्र (प्रजनन तत्व)।

3. मल (Waste Products): शरीर में तीन प्रमुख मल होते हैं: मल (मल), मूत्र (मूत्र) और स्वेद (पसीना)। ये अपशिष्ट पदार्थ शरीर से निष्कासित होते हैं।

4. अग्नि (Digestive Fire): यह पाचन और चयापचय प्रक्रियाओं का प्रतिनिधित्व करता है। 'जठराग्नि' मुख्य अग्नि है, जो भोजन के पाचन में सहायता करती है।

5. स्रोतस् (Channels): शरीर में विभिन्न स्रोतस् या नलिकाएँ होती हैं, जो पोषक तत्वों, गैसों और अपशिष्ट पदार्थों के परिवहन में सहायता करती हैं।

शरीर क्रिया की अवधारणाएँ:

• पंचमहाभूत सिद्धांत: आयुर्वेद के अनुसार, शरीर पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से बना है, जो शरीर की संरचना और क्रियाओं को प्रभावित करते हैं।
• त्रिदोष सिद्धांत: वात, पित्त और कफ दोषों का संतुलन स्वास्थ्य का प्रतीक है, जबकि इनका असंतुलन रोगों का कारण बनता है।
• धातु पोषण क्रम: आहार से प्राप्त पोषक तत्व क्रमशः विभिन्न धातुओं को पोषित करते हैं, जिससे शरीर की संरचना और क्रियाएँ सुचारू रूप से चलती हैं।

आयुर्वेदिक शरीर क्रिया विज्ञान का उद्देश्य शरीर की क्रियाओं को समझकर स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगों की रोकथाम करना है। यह समग्र दृष्टिकोण अपनाते हुए शारीरिक, मानसिक और आत्मिक स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित करता है।

"आयुर्वेदिक शारीरिकी: मानव शरीर की संरचना, प्रणालियाँ और महत्व"आयुर्वेद में शरीर रचना विज्ञान (एनाटॉमी) को 'शारीरिकी' या...
18/04/2025

"आयुर्वेदिक शारीरिकी: मानव शरीर की संरचना, प्रणालियाँ और महत्व"

आयुर्वेद में शरीर रचना विज्ञान (एनाटॉमी) को 'शारीरिकी' या 'शरीर रचना विज्ञान' कहा जाता है, जो मानव शरीर की संरचना, अंगों की बनावट और उनके पारस्परिक संबंधों का अध्ययन करता है। यह चिकित्सा विज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा है, जो शरीर के विभिन्न अंगों और प्रणालियों की संरचना को समझने में सहायता करती है।

शरीर रचना विज्ञान के प्रमुख घटक:

1. कोशिका (Cell): शरीर की सबसे छोटी इकाई, जो जीवन की मूलभूत इकाई है।
2. ऊतक (Tissue): समान कार्य और संरचना वाली कोशिकाओं का समूह, जैसे मांसपेशी ऊतक, तंत्रिका ऊतक।
3. अंग (Organ): विभिन्न ऊतकों का समूह, जो विशेष कार्य करते हैं, जैसे हृदय, यकृत।
4. प्रणाली (System): संबंधित अंगों का समूह, जो मिलकर एक विशेष कार्य करते हैं, जैसे पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र।

मानव शरीर के प्रमुख भाग:

1. सिर (Head): इसमें मस्तिष्क, आँखें, कान, नाक और मुँह शामिल हैं।
2. गला (Neck): सिर और धड़ को जोड़ने वाला भाग, जिसमें श्वासनली, अन्ननली और महत्त्वपूर्ण रक्त वाहिकाएँ होती हैं।
3. धड़ (Torso): इसमें छाती और पेट शामिल हैं, जहाँ हृदय, फेफड़े, यकृत, आमाशय और आंतें स्थित हैं।
4. ऊपरी अंग (Upper Limbs): भुजाएँ, कोहनी, कलाई और हाथ।
5. निचले अंग (Lower Limbs): जांघें, घुटने, पिंडली, टखने और पैर।

शरीर की प्रमुख प्रणालियाँ:

1. अस्थि प्रणाली (Skeletal System): हड्डियों का ढाँचा, जो शरीर को संरचना और समर्थन प्रदान करता है।
2. मांसपेशी प्रणाली (Muscular System): मांसपेशियाँ, जो शरीर की गति और स्थिरता में सहायता करती हैं।
3. तंत्रिका प्रणाली (Nervous System): मस्तिष्क, रीढ़ की हड्डी और नसें, जो शरीर के विभिन्न हिस्सों के बीच संचार स्थापित करती हैं।
4. रक्त परिसंचरण प्रणाली (Circulatory System): हृदय और रक्त वाहिकाएँ, जो शरीर में रक्त का प्रवाह सुनिश्चित करती हैं।
5. श्वसन प्रणाली (Respiratory System): फेफड़े और श्वासनली, जो शरीर में ऑक्सीजन का आदान-प्रदान करती हैं।
6. पाचन प्रणाली (Digestive System): मुख, आमाशय, आंतें आदि, जो भोजन के पाचन और पोषक तत्वों के अवशोषण में सहायता करती हैं।
7. मूत्र प्रणाली (Urinary System): गुर्दे और मूत्राशय, जो शरीर से अपशिष्ट पदार्थों को निकालते हैं।
8. प्रजनन प्रणाली (Reproductive System): वे अंग जो प्रजनन में सहायता करते हैं।
आयुर्वेद में, शरीर रचना विज्ञान का अध्ययन न केवल शारीरिक अंगों की संरचना तक सीमित है, बल्कि यह शरीर, मन और आत्मा के बीच संबंधों को भी समझता है। यह दृष्टिकोण समग्र स्वास्थ्य और कल्याण को बढ़ावा देने में सहायता करता है।

"आयुर्वेद में रस शास्त्र और भैषज्य कल्पना: औषध निर्माण की दो प्रमुख शाखाएँ"आयुर्वेद में रस शास्त्र और भैषज्य कल्पना (आयु...
17/04/2025

"आयुर्वेद में रस शास्त्र और भैषज्य कल्पना: औषध निर्माण की दो प्रमुख शाखाएँ"

आयुर्वेद में रस शास्त्र और भैषज्य कल्पना (आयुर्वेदिक फार्मेसी) दो महत्वपूर्ण शाखाएँ हैं, जो औषधियों के निर्माण, गुणधर्म और उनके चिकित्सीय उपयोग का अध्ययन करती हैं।

रस शास्त्र:

'रस शास्त्र' आयुर्वेद की वह शाखा है जो मुख्यतः खनिज पदार्थों, विशेषकर धातुओं और खनिजों, के औषधीय उपयोग का अध्ययन करती है। इसमें पारा (रस) और अन्य धातुओं को विशेष प्रक्रियाओं द्वारा शुद्ध करके औषधियों का निर्माण किया जाता है। इन औषधियों का उपयोग विभिन्न रोगों के उपचार में किया जाता है।

भैषज्य कल्पना:
'भैषज्य कल्पना' आयुर्वेद में औषधियों के निर्माण, उनके रूप, मात्रा, गुणधर्म और उपयोग विधियों का विज्ञान है। यह शाखा विभिन्न प्रकार की औषधीय तैयारियों, जैसे क्वाथ (काढ़ा), चूर्ण (पाउडर), अवलेह (लेह्य), तैल (तेल), घृत (घी) आदि के निर्माण की विधियों का विस्तृत वर्णन करती है।

मुख्य औषधीय रूप:
1. स्वरस (ताजा रस): ताजे पौधों या उनके अंगों से निकाला गया रस।
2. कल्क (पेस्ट): पौधों को पीसकर बनाया गया पेस्ट।
3. क्वाथ (काढ़ा): पौधों को पानी में उबालकर तैयार किया गया अर्क।
4. हिम (कोल्ड इन्फ्यूजन): पौधों को ठंडे पानी में भिगोकर तैयार किया गया अर्क।
5. फांट (हॉट इन्फ्यूजन): पौधों को गर्म पानी में भिगोकर तैयार किया गया अर्क।
6. चूर्ण (पाउडर): सूखे पौधों को पीसकर बनाया गया पाउडर।
7. अवलेह (लेह्य): गाढ़ी औषधीय तैयारी, जिसे चाटकर लिया जाता है।
8. तैल (तेल): औषधीय तेल, जिसे बाहरी या आंतरिक उपयोग के लिए तैयार किया जाता है।
9. घृत (घी): औषधीय घी, जिसका उपयोग आंतरिक और बाहरी दोनों रूपों में होता है।
10. वटी (टैबलेट): औषधीय गोलियाँ, जिन्हें निगला जाता है।

इन दोनों शाखाओं का मुख्य उद्देश्य रोगों के प्रभावी उपचार के लिए सुरक्षित और प्रभावी औषधियों का निर्माण करना है। आयुर्वेदिक चिकित्सक इन सिद्धांतों का पालन करके रोगियों के लिए उचित औषधियों का चयन और निर्माण करते हैं।

"आयुर्वेद में रोग विकृति विज्ञान: दोष असंतुलन, कारण, निदान एवं उपचार"आयुर्वेद में रोग एवं विकृति विज्ञान (Pathology) को ...
16/04/2025

"आयुर्वेद में रोग विकृति विज्ञान: दोष असंतुलन, कारण, निदान एवं उपचार"

आयुर्वेद में रोग एवं विकृति विज्ञान (Pathology) को 'रोग विज्ञान' या 'विकृति विज्ञान' कहा जाता है, जो शरीर में होने वाले विकारों, उनके कारणों, लक्षणों और विकास प्रक्रिया का अध्ययन करता है। आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से, रोग शरीर में दोषों (वात, पित्त, कफ) के असंतुलन के परिणामस्वरूप उत्पन्न होते हैं। इन दोषों का संतुलन बिगड़ने पर शरीर में विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं।

रोग के कारण:

आयुर्वेद में रोगों के प्रमुख कारणों को 'त्रिविध हेतुओं' के रूप में वर्गीकृत किया गया है:

1. असात्म्येंद्रियार्थ संयोग: इंद्रियों का उनके विषयों के साथ अनुचित संपर्क, जैसे अत्यधिक तेज़ या मंद प्रकाश देखना, अत्यधिक तेज़ या मंद ध्वनि सुनना आदि।
2. प्रज्ञापराध: बुद्धि का अनुचित उपयोग, जैसे ज्ञात हानिकारक कार्यों को करना या लाभकारी कार्यों से बचना।
3. परिणाम: काल या समय का अनुचित प्रभाव, जैसे ऋतु परिवर्तन के साथ अनुकूलन में असफलता।

रोग की उत्पत्ति की प्रक्रिया (सम्प्राप्ति):

रोग की उत्पत्ति को आयुर्वेद में 'सम्प्राप्ति' कहा जाता है, जो छह चरणों में होती है:
1. संचय: दोषों का एकत्रित होना।
2. प्रकोप: दोषों का उग्र होना।
3. प्रसार: दोषों का शरीर में फैलना।
4. स्थानसंश्रय: दोषों का कमजोर अंगों में जमाव।
5. व्यक्ति: रोग के लक्षणों का प्रकट होना।
6. भेद: रोग की जटिलताओं का विकास।

रोग निदान:

आयुर्वेद में रोग निदान के लिए 'त्रिविध परीक्षाएँ' अपनाई जाती हैं:
1. दर्शन: रोगी का निरीक्षण।
2. स्पर्शन: रोगी का स्पर्श करके परीक्षण।
3. प्रश्न: रोगी से प्रश्न करके जानकारी एकत्रित करना।

उपचार:

उपचार के लिए आयुर्वेद में दो मुख्य विधियाँ हैं:
1. शोधन चिकित्सा: शरीर से दोषों को निकालना, जैसे पंचकर्म।
2. शमन चिकित्सा: दोषों को संतुलित करना, जैसे औषधि सेवन, आहार-विहार में परिवर्तन।

इस प्रकार, आयुर्वेद में रोग एवं विकृति विज्ञान शरीर के दोषों के संतुलन और असंतुलन पर आधारित है, जो समग्र स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।

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K. K. Mall, Raghunath Puri, Kalwar Road, Jhotwara
Jaipur
302012

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