20/12/2025
एण्टीबायोटिक का अंधाधुंध इस्तेमाल बनाता है शिशुओं को जीवनभर के लिए बीमार
नवजात शिशुओं का पर्यावरण के साथ सामजस्य बनाने में कठिनाई होती है इसलिए मौसम में परिवर्तन होने या पर्यावरणीय प्रदूषण के सम्पर्क के कारण से सर्दी, जुकाम, डायरिया, श्वसन सम्बन्धी समस्यायें, एलर्जी, रशेज हो जाना सामान्य बात है। लेकिन प्राय: देखा गया है कि माता-पिता घबराकर शिशुओं के समीप के अंग्रेजी चिकित्सक के पास ले जाते हैं जो उनको शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के नाम पर तरह-तरह की एण्टीबायोटिक दवायें देता है जिससे बच्चा फौरन ठीक हो जाता है। वास्तव में, ये एण्टीबायोटिक दवायें उनके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के बजाय, शरीर में सम्बन्धित रोग के बैक्टीरिया की प्रति रोधक क्षमता को बढ़ाते हैं। जिससे बच्चा उस एण्टीबायोटिक का भी अभ्यस्त हो जाता है। बच्चे पर रोग के फिर से आक्रमण होने पर उसे एण्टीबायोटिक की बढ़ी हुयी खुराक देनी होती है। इस प्रकार बार-बार अतर्किक रूप से एण्टीबायोटिक देने के कारण बच्चे का शरीर एण्टीबायोटिक दवाओं का अभ्यस्त हो जाता है और धीरे-धीरे शरीर की प्राकृतिक रोगप्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने लगती है जिससे वह तरह-तरह के हृदय रोग, वैंâसर, किडनी फेल्योर, मधुमेह जैसे गैर संचारी रोगों का शिकार बनने लगता है।
इसलिए, अब तो अंग्रेजी डॉक्टर भी कहने लगे हैं कि बच्चों को एण्टीबायोटिक का प्रयोग तो भूलकर भी न करायें। कई वैज्ञानिक शोधों से भी पता चला है कि भारत में बढ़ते हुए मधुमेह और अस्थमा के मामलों के पीछे भी एण्टीबायोटिक का अतार्किक इस्तेमाल ही है।
इस पर आयुष ग्राम ट्रस्ट चित्रकूट से पर्याप्त कार्य किया है और वनस्पतियों एवं रसौषधियों का प्रयोग कर एक योग का निर्माण कर हजारों बच्चों पर प्रयोग किया तथा कराया जिसके परिणाम आये हैं। इस योग को ‘बाल आयुष रसायन’ नाम दिया गया है। इसका प्रयोग नवजात शिशु से लेकर बच्चे की पाँच वर्ष की आयु तक भी किया जा सकता है।
१. बालार्क बाल जीवन रस (स्वानुभूत)- इसकी निर्माण विधि चिकित्सा पल्लव दिसम्बर २०१३ अंक के पृष्ठ ३२ में प्रकाशित है। सेवन विधि- १ से ३ माह तक के बच्चे को १-१ गोली हर ६ घण्टे में (२ बार) माँ के दूध और शहद में घोलकर। ९ माह से ढाई वर्ष तक २-२ गोली दिन में २ बार यानी हर ६ घण्टे में शहद से।
२. स्वर्ण प्राशन रसायन- सेवन विधि- १ से २ माह के बच्चे को ३-३ बूँद दिन में ३ बार। २ से ४ माह के बच्चे को ५-५ बूँद दिन में ३ बार, ४ से ६ माह के बच्चे को ६-६ बूँद दिन में २ बार। ६ माह से ढाई वर्ष तक ८-८ बूँद दिन में २ बार। ढाई वर्ष से ५ वर्ष तक १०-१० बूँद दिन में २ बार। गुण- बाल आयुष रसायन में आयु, वीर्य, स्मरणशक्ति, धारणशक्ति, बुद्धि, बल और कान्ति को बढ़ाने की अद्भुत शक्ति है, यह हृदय के लिए हितकर, ओज को बढ़ाने वाला है, इसको सेवन करने वाला बालक उत्तम स्वास्थ्य, बुद्धि और मेधा से युक्त रहता है। इसको सेवन करने से बच्चों को हकलाने, तुतलाने जैसा वाणी दोष नहीं रहता तथा शरीर प्राकृतिक की रोगप्रतिरोधक में वृद्धि होती है। मालिश- सर्दियों के दिन में महानारायण तैल की मालिश और गर्मियों के दिन में शंखपुष्पी तैल की मालिश कर स्नान कराना चाहिए।
आहार- देशी गाय का दूध, देशी गाय का घी, देशी गाय का मक्खन, फल, व फलों के रस, गेहूँ के आटे की रोटी, यवसत्व (जौ माल्ट), सब्जी और फलों का सूप दें। परहेज- ब्रेड, बिस्किट, एक बार का ठण्डा हुआ फिर गर्म करके बनाया आहार, समोसा, आलू के चिप्स, सॉस, आम-अमचूर की खटाई, डिब्बा बन्द आहार न दें।
नोट- भूख और इच्छा के अभाव में बच्चों को आहार नहीं देना चाहिए। कुछ मातायें बच्चों को कुछ न कुछ ठूँसते ही रहना चाहती हैं, जबकि बच्चा जब भूखा होता है तो रो-रोकर अपनी माँग पूरी कर लेता है।
विशेष- ‘बाल आयुष रसायन’ के प्रयोग से ३ माह के अन्दर बच्चों की लम्बाई बढ़ती हुयी पायी गयी है। बच्चे की मेधा, बुद्धि में बहुत ही विकास तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता में विशेष बढ़ोत्तरी पायी गयी है।
आप सभी से निवेदन है कि बाल आयुष रसायन थैरेपी का पर्याप्त प्रचार-प्रसार का आज के बच्चे और देश के भावी नागरिकों को मेधावान्, प्रज्ञावान्, बुद्धिवान् और आयुष्मान् बनायें।