26/05/2020
#विचारणीय!!!
सिक्के का दूसरा पहलू!!!!
आखिर हर 100 साल बाद क्यों आती है विश्व में #महामारी...
1720 #प्लेग: 1 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु
1820 #हैजा: 1 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु
1920 #स्पेनिशफ्लू : 5 करोड़ो से अधिक लोगों की मृत्यु
2020 #कोरोना : अभी तक 3.25 लाख से अधिक लोगो की मृत्यु
कही ये #प्रकृति का अपने आप को #स्वस्थ करने की प्रक्रिया तो नहीं है???
इस तरह की अकस्मात् घटने वाली #आपदाओं या महामारियों का कारण ईश्वर नहीं, बल्कि मनुष्य के विचार और कार्य-व्यवहार होते हैं। मनुष्य की दूषित सोच और कर्म से वायुमंडल में अच्छी और बुरी तरंगों का संतुलन बिगड़ जाता है, तभी प्रकृति विनाशकारी तांडव कर उठती है।
इसे जल-चक्र के उदाहरण से समझ सकते हैं। जितना जल सागर से वाष्पीकरण के बाद ऊपर उठकर बादलों में जाता है, ठीक उतना ही वर्षा रुप में धरती पर बरस जाता है। यह सिलसिला Zero-waste repeated cycle (शून्य अपशिष्ट पुनरावृत्तीय क्रम) के रुप में चलता जाता है। इसे #संतुलन का #सिद्धांत भी कह सकते हैं। #ईश्वर की यह संपूर्ण #सृष्टि भी ठीक इसी तरह से स्वयं को हर हाल में संतुलित रखती है। यदि कभी यह सूक्ष्म संतुलन बिगड़ जाता है, तो सृष्टि के पास फिर कई तरीके हैं इसे पुनर्स्थापित करने के।
यही तो हमारे शरीर में भी होता है। कभी सोचा, क्यों अचानक से कभी छींक, तो कभी हिचकी आने लगती है? क्या इन्हें भी 'एक्ट ऑफ गॉड' कहेंगे? यह शोचनीय है। जानते हैं, छींक कब आती है? जब नाक के द्वारा शरीर में कोई बाहरी कण घुस जाता है। उसे शरीर से बाहर निकालने के लिए नाक के अंदर के सूक्ष्म स्नायु मस्तिष्क तक सिंगल भेजते हैं। तब मस्तिष्क शरीर के कई हिस्सों में संदेश भेजता है, जो मिलकर छींक को सिद्ध करते हैं ताकि वह कण बाहर आ जाए। यदि अब हिचकी की बात करें, तो वह कैसे आती है? जब पेट ज़रुरत से ज्यादा भर जाता है या शरीर का तापमान बिगड़ जाता है या फिर शराब, सिगरेट (जिनकी शरीर को आदत नहीं है) आदि के सेवन के समय या बेहद खुशी या स्ट्रेस के समय! इन सभी स्थितियों में मध्यपट (diaphragm) बेचैनी अनुभव करता है। मध्यपट अपने आपको संतुलित करने के लिए तुरन्त संकुचित होता है, जिससे हम जल्दी से हवा को गले में खींचते हैं और हिचकी आती है।
माने जब तक #मनुष्य अपने #दुष्कर्मों पर रोक नहीं लगता, तब तक विश्व भर में #प्राकृतिक #आपदाओं के रूप में #विनाश होता ही रहेगा.. जब-जब मनुष्य की #आध्यात्मिक चेतना पर #भौतिकवाद का रंग चढ़ जाता है, तब-तब सृष्टि में नकारात्मक तरंगों का प्रभाव बढ़ता है। इस कारण प्रकृति का सूक्ष्म विद्युत संतुलन बिगड़ता है और महामारियों, प्राकृतिक आपदाओं का बाढ़, भूकंप, सूखा और तूफान के रूप में प्रकोप होता है। इन सबके लिए ईश्वर ज़िम्मेदार नहीं है। प्रकृति को नियंत्रित करने से पहले, मनुष्य को स्वयं अपनी #मानसिकता को नियंत्रित करने की जरूरत है।
वर्तमान में, कोरोना वायरस #महामारी के चलते विश्व में उभरी #लॉकडाउन की परिस्थिति अपने आपमें उपरिलिखित तथ्यों का सजीव प्रतिबिम्ब है। आज मनुष्य घरों में कैद है, तो प्रकृति इतनी हर्षित है। एस्सेल ग्रुप के अंतरराष्ट्रीय चैनल WION ने बड़ी खूबसूरती से इस विषय पर प्रकाश डाला और एक वीडियो के माध्यम से समाज को जागरुक भी किया। चैनल की पत्रकार पालकी शर्मा ने कमेंट में कहा...
कोरोना वायरस के भय से प्राकृतिक स्थानों पर मनुष्य की आवाजाही कम हुई, वैसे ही नदियों, समुद्रों और बगीचों इत्यादि में पशु-पक्षियों का आना शुरु हो गया। इटली देश के समुद्रों में पर्यटन-जहाज़ चलना बंद हुए, तो अब वहाँ डॉल्फिन मछली के भी दर्शन होने लगे। जिन शहरों में गोंडोला और पर्यटक भरे रहते थे, अब वहाँ बत्तखें मुस्कुराकर घूमती-फिरती दिखने लगी हैं। सिंगापुर में तो ऊदबिलाव (otters) सड़क पर घूमने लगे हैं।
वाह !! प्रकृति #माँ, तेरा क्या तरीका है!! अपने #अस्तित्व का #बोध करवाने का! लेकिन क्या हम मनुष्य कुछ #सबक सीख पाएँगे? यदि नहीं, तो फिर या तो हमें अपने ही घरों में कैद होकर रहना होगा या मरना होगा! अगर हम स्वतंत्र जीना चाहते हैं, तो हमें खुद को #बदलना होगा!
#सम्मान करना सीखना होगा प्रकृति का और पालन करने होंगे ईश्वर के #नियम! क्या तैयार हैं हम इसके लिए?
🙏