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होली मुहूर्त निर्णय 2026 :तथ्य स्पस्टीकरण  ======================• पूर्णिमा तिथि प्रारंभ - 2 मार्च 2026 को शाम 5:55 बजेप...
26/02/2026

होली मुहूर्त निर्णय 2026 :
तथ्य स्पस्टीकरण ======================
• पूर्णिमा तिथि प्रारंभ - 2 मार्च 2026 को शाम 5:55 बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्त - 3 मार्च 2026 को शाम 5:07 बजे
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•भद्रकाल 2 मार्च को शाम 5:58 बजे से शुरू होकर 3 मार्च, 2026 को सुबह 5:30 बजे तक चलेगा।
होलिका दहन और भद्र काल

भद्रा की पूंछ 3 मार्च को 01:25 ए एम से 02:35 ए एम तक है

और भद्रा मुख 02:35 ए एम से 04:30 ए एम तक है.
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• 3 मार्च को सूतक काल सुबह 6:23 बजे से शुरू होगा
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2 मार्च 2026 (शास्त्रों के अनुसार श्रेष्ठ शुभ मुहूर्त)
चूंकि पूर्णिमा 2 मार्च को प्रदोष काल में विद्यमान है, इसलिए कई विद्वान इसे ही श्रेष्ठ मान रहे हैं:

मुख्य मुहूर्त: शाम 06:24 से शाम 06:36 तक (अवधि 12 मिनट).

भद्रा पुच्छ मुहूर्त: मध्यरात्रि 01:23 से 02:34 (2 मार्च की रात).

3 मार्च 2026 (पंचांग विशेष के अनुसार)
कुछ स्थानीय पंचांगों के अनुसार उदय व्यापिनी पूर्णिमा न होने के बावजूद प्रदोष काल को प्राथमिकता दी गई है:

होलिका दहन मुहूर्त: शाम 06:22 से रात 08:50 तक (अवधि 02 घंटे 28 मिनट).
रंगवाली होली (धुलेंडी): बुधवार, 4 मार्च 2026.

विशेष सावधानी: 2 मार्च को भद्रा 'भूमिलोक' की है जो सर्वथा त्याज्य है. 3 मार्च को भद्रा मुख का समय सुबह 02:35 am से 04:30 am तक रहेगा, जिसमें दहन वर्जित है.

जब, हम 2 मार्च, 2026 को होलिका दहन मनाएंगे, इसलिए लोगों को यह ध्यान रखना चाहिए कि भद्रकाल 2 मार्च को शाम 5:58 बजे से शुरू होकर 3 मार्च, 2026 को सुबह 5:30 बजे तक चलेगा।

* होलिका दहन भद्रकाल से या तो पहले करने की सलाह दी जाती है।
या बाद में, पहले तो होगा नहीं अब बाद में करे तो 3 मार्च को सूतक काल सुब23 बजे से शुरू होगा

* ग्रहण सूतक काल शुरू हो जायेगा तो उससे पहले ही दहन होगा, क्युकी ग्रहण काल समाप्ति, 3 मार्च शाम 6:47 pm से पहले ही पूर्णिमा समाप्त होजायेगी

ऐसी स्थिति में इस वर्ष प्रतिपदा वृद्धिगामिनी है। सामान्यतः नियम के अनुसार 3 मार्च की प्रदोष बेला में होलिका दहन अपेक्षित था, परंतु चन्द्रग्रहण होने के कारण ग्रहण नियम लागू होगा।

शास्त्र में स्पष्ट निर्देश है —
अत्र चेच्चंद्र ग्रहणं तदा ततोऽ र्वार्ड्.निशि भद्रावर्जपूर्णिमायां होलिकादीपनम्।

तथा —
अथ परेऽह्णि ग्रस्तोदयस्तदा पूर्वदिने भद्रावर्ज रात्रिचतुर्थ्य यामे विष्टिपुच्छे वा होलिका कार्य।

अर्थात् यदि चन्द्रग्रहण हो तो भद्रा रहित पूर्णिमा में रात्रि में होलिका दहन किया जाए।

यदि अगले दिन ग्रस्तोदय ग्रहण हो तो पूर्व दिवस में भद्रा त्यागकर रात्रि के चतुर्थ याम अथवा विष्टिपुच्छ काल में होलिका दहन करना चाहिए।
शास्त्रागत मान्यताओं पर ध्यान दें तो होलिका दहन मध्य रात्रि से पूर्व कर लेना ज्यादा श्रेयस्कर होता है।

ऐसी स्थिति में भद्रा का मुख त्याग कर भद्रा के पुच्छ में रात बजे से पूर्व होलिका दहन का मुहूर्त उत्तम होगा।

भद्रा की पूंछ 2 मार्च की रात या 3 मार्च को 01:25 ए एम से 02:35 ए एम तक है

शास्त्रों के अनुसार भद्रा पुच्छ काल में होलिका दहन श्रेष्ठ माना गया है। ऐसे में 2 मार्च को रात 1.26 से 2.38 बजे के बीच होलिका दहन करना शुभ रहेगा, क्योंकि इस समय भद्रा लग रही है। इस दिन नवपंचम योग, लक्ष्मीनारायण योग और पंचग्रही योग बन रहे हैं, जो सुख-समृद्धि के संकेत हैं।

2 मार्च को पूर्णिमा तिथि सायं 5:18 बजे से प्रारंभ हो जाएगी तथा इसी समय भद्रा भी आरंभ हो जाएगी , जो रात में 4:46 बजे तक व्याप्त रहेगी।भद्रा तज्य है

कुछ ज्योतिषियों का मानना है कि भद्रा समाप्त होने पर होलिका दहन कर सकते हैं।

इसके लिए 3 मार्च को सुबह सूतक लगने से पहले होलिक दहन कर सकते हैं। होलिका दहन मुहूर्त: 3 मार्च, मंगलवार, ब्रह्म मुहूर्त 05:05 ए एम से 05:55 ए एम के बीच.

लेकिन विशिष्ट स्थिति में ही भोर में होलिका दहन करना चाहिए। भोर वेला 5 बजे होलिका दहन उचित नहीं है, भद्रा की पुंछ में ही होलिका दहन होना चाहिए।

निष्कर्ष:निर्णय
होलिका दहन कब करना चाहिए?
तीन मुहूर्त प्राप्त होते है
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# पहला मुहूर्त भद्रा युक्त
मुख्य मुहूर्त: शाम 06:24 से शाम 06:36 तक (अवधि 12 मिनट).
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# दूसरा मुहूर्त
2 मार्च रात्रि 29:29 (अर्थात 3 मार्च प्रातः 5:29 बजे) से लेकर सूर्योदय पूर्व लगभग 6:30 बजे तक।
होलिका दहन मुहूर्त: 3 मार्च, मंगलवार, ब्रह्म मुहूर्त 05:05 ए एम से 05:55 ए एम के बीच.यह काल ग्रहण नियम से शास्त्रसम्मत शुभ मुहूर्त है।3 मार्च 2026 को सूतक काल शुरू होने से ठीक पहले मिलेगा, 3 मार्च को सूतक काल सुबह 6:23 बजे से शुरू होगा, इसलिए होलिका दहन सुबह 5:30 से 6:23 बजे के बीच भी किया जा सकता है। इस दिन होलिका दहन करने पर आपको पूर्णिमा तिथि मिलेगी और भद्र काल नहीं होगा।किन्तु भोर वेला में दहन नहीं होता
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# तीसरा सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त
शास्त्रों के अनुसार भद्रा पुच्छ काल में होलिका दहन श्रेष्ठ माना गया है।विशिष्ट स्थिति में ही भोर में होलिका दहन करना चाहिए ऐसे में 2 मार्च को रात 1.26 से 2.38 बजे के बीच होलिका दहन करना शुभ रहेगा
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इसलिए यह आप पर निर्भर करता है कि आप होलिका दहन पूजा करने के लिए कौन सा मुहूर्त चुनेंगे।
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चीरबंधन एवं रंग धारण — 27 फरवरी प्रातः भद्रा से पहले (11:30 से पूर्व)
रंग वाली होली / दुलहण्डी — 4 मार्च 2026

चंद्र ग्रहण और सूतक काल

चंद्र ग्रहण 2026 के दौरान सूतक काल
हिंदू परंपरा के अनुसार, चंद्र ग्रहण का सूतक काल ग्रहण शुरू होने से नौ घंटे पहले प्रारंभ होता है। इस ग्रहण के लिए, सूतक काल 3 मार्च को सुबह 6:20 बजे (भारतीय समयानुसार) से शुरू होकर ग्रहण समाप्त होने तक (शाम 6:47 बजे) तक जारी रहेगा। इन घंटों के दौरान, कई धार्मिक गतिविधियाँ पारंपरिक रूप से स्थगित कर दी जाती हैं। भक्तों को मंदिर जाने और विशिष्ट पूजा-पाठ करने से बचने की सलाह दी जाती है। इस दौरान की जाने वाली सामान्य प्रथाओं में मंत्रों का जाप करना, आध्यात्मिक शुद्धि के लिए ध्यान करना और पके हुए भोजन को तुलसी के पत्तों से ढककर उसकी शुद्धता बनाए रखना शामिल है

पूर्ण चंद्रग्रहण पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इराक, ईरान, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, अंटार्कटिका, उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका, रूस और पूरे एशिया में दिखाई देगा।
चंद्र ग्रहण का सामान्य प्रभाव:
पूर्ण चंद्रग्रहण 3 मार्च, 2026 को फाल्गुन पूर्णिमा के दिन होगा। द्रिक पंचांग के अनुसार, यह खगोलीय घटना भारतीय समयानुसार दोपहर 3:20 बजे शुरू होगी और शाम 6:33 से 6:40 बजे के बीच अपने चरम पर पहुंचेगी। ग्रहण इसके तुरंत बाद शाम 6:47 बजे समाप्त हो जाएगा। भारत में, चंद्रमा शाम 6:20 से 6:30 बजे के बीच उदय होगा, जिसका अर्थ है कि नागरिक पूर्णग्रहण के अंतिम 20 से 25 मिनट ही देख पाएंगे। उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में चंद्रमा के जल्दी उदय होने के कारण दृश्यता सबसे स्पष्ट रहने की उम्मीद है, हालांकि दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे प्रमुख शहरों में भी आसमान साफ ​​रहने पर यह घटना देखी जा सकेगी।

यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि यह चंद्र ग्रहण सिंह राशि में पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में होगा, जो शुक्र ग्रह से संबंधित है और प्रेम, जुनून, आनंद, सौंदर्य और विलासिता का प्रतीक है। यह पिछले जन्म के संबंधों को भी उजागर करेगा और सभी कर्मिक बंधनों को दूर करेगा। सिंह राशि सूर्य द्वारा शासित है, इसलिए सिंह राशि के जातक अपने परिचितों के सामने अपनी शक्ति और अहंकार का प्रदर्शन करेंगे और निश्चित रूप से इस कदर अधिकार का प्रदर्शन करेंगे कि कोई भी उन्हें पराजित नहीं कर सकेगा।

10/12/2025

अनजाने में भी हो जाते हैं उपाय

ज्योतिष की लाल किताब पद्धति में हर वस्तु का कारक किसी-न-किसीग्रह को माना जाता है। इस तरह हर ग्रह की कारक वस्तुओं की ओरध्यान देकर कोई जातक उपाय के गुप्त भेद को जान सकता है। वैसे भीलाल किताब से सम्बन्धित उपाय किसी-न-किसी रूप में हमारे देश मेंसदियों से विध्यमान हैं। यह अलग बात है कि अधिकांश लोग ये उपायकिसी और उद्देश्य से करते थे लेकिन अनजाने में उपाय हो जाता थाक्योंकि अज्ञानता में किया गया कार्य भी अपना असर तो दिखासा ही है।
भारत के बहुत से प्रान्तों में स्त्रियाँ और कुछ पुरुष भी अपने पाँवोंकी अंगुलियों में चाँदी के छल्ले पहनते हैं। बहुत से लोग इन्हें फैशनसमझकर पहनते हैं, लेकिन जब से लाल किताब प्रकाश में आई है तब सेफैशन के रूप में पहने जाने वाले चाँदी के छल्लों का भेद एक उपाय केरूप में प्रकट हुआ है। दरअसल लाल किताब में केतु को पाँव का कारकमाना जाता है, इसलिए पाँव के दर्द को दूर करने के लिए लाल किताबमें पाँव में छल्ले डालने का उपाय बताया गया है। ऐसे जातक जिन्हेंहमेशा पाँव में दर्द रहता हो वे यदि पाँव में रेशम का धागा बाँधें तो काफीलाभ मिल सकता है। ऐसा जिस्म के किसी हिस्से के दर्द में भी किया जासकता है। इसी प्रकार केतु को कानों का कारक भी माना जाता है। ऐसादेखा जाता है कि बहुत से लोग अपने कानों में सोने या चाँदी कीबालियाँ, झरुमके आदि पहनते हैं। आजकल तो बहुत से नकयुवक भी यहाँतक कि बॉलीवुड के अभिनेता और पश्चिमी संस्कृति में पले-बढ़े लोगतथा पॉप संगीत में रुचि रखने वाले इस तरह की बालियाँ आदि अपनेएक या दोनों कानों में डालते हैं। यहाँ भी केतु का कारक अंग यानी कान.

को छेदन द्वारा कमजोर कर कान या जिस्म के किसी अन्य भाग में दर्दसे मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया जा रहा है। इस तरह कान में पहनी गईएक बाली या बालियाँ फैशन की चाह न होकर लाल किताब का एकमहत्वपूर्ण उपाय हो जाती है। केतु को औलाद का कारक भी माना जाताहै जबकि बुध ग्रह बेटी का कारक होता है। इस कारण उत्तरी भारत केअनेक भागों में जब किसी जातक के बेटे की बचपन में या कम उम्र मेंअकाल मौत हो जाया करती थी तो उपाय के तौर पर लोग उसके बादवाली सन्तान के कानों में सोने या ताँबे की बालियाँ डाल दिया करते थे।ऐसा बच्चे के जन्म के कुछ समय बाद ही कर दिया जाता था।वास्तविकता यह है कि लोग इस धारणा के पीछे छिपे उपाय को बिल्कुलनहीं जानते थे। फिर भी यह सदियों से चला आ रहा था।
श्ृंगार के रूप में वर्षों से किए जाने वाले कार्यों का एक उदाहरणयह भी है कि भारत के लगभग सभी प्रान्तों में स्त्रियाँ अपने पाँवों परलाल रंग लगाती आ रही हैं जिसे महावर रचाना कहा जाता है। लालकिताब के अनुसार अनजाने में किया गया यह कार्य दरअसल स्त्री केशरीर में दर्द का उपाय तो करता ही है साथ ही उसके बेटे के लिए भीशुभफल कारक होता है। यहाँ यह स्पष्ट करना जरूरी है कि कानों मेंबालियाँ और पैरों में बिछुए पहनने से तो केतु कमजोर हुआ था जबकिपैरों में लाल रंग लगाने से केतु का बुरा प्रभाव भी नियन्त्रित हो गया।इसका कारण यह है कि मंगल को लाल रंग का कारक माना जाता है।जब कोई जातक केतु के कारक पैरों पर लाल रंग लगा देता है तो केतुबेहद कमजोर हो जाता है और अपना कोई दुष्र्भाव नहीं छोड़ पाता।
लाल किताब के अनुसार केतु बेटे के अलावा कुत्ते का भी कारक होताहै। हममें से बहुत से लोग शौकिया तौर पर घरों में कुते पालते हैं और यहपरम्परा सदियों पुरानी है। लाल किताब में यह वर्णन आता है कि कुनेपरिवार में किसी के खासकर लड़कों के ऊपर आने वाली विपत्तियों को पहलेसे ही जान लेते हैं और सारी मुसीबतें पहले खुद झेलते हैं फिर किसी परआँच आने देते हैं। इस क्रम में वे अपनी जान भी दे देते हैं।
किसी जातक की कुंडली में केतु यदि बारहवें भाव में हो जिसेआमतौर पर शुभ फलों का कारक माना जाता है तो ऐसे जातक को कुत्ताअवश्य पालना चाहिए। ऐसा करना बेहद शुभ फलदायक होता है। यहाँतक कि यदि परिवार पर कोई मुसीबत आने वाली हो तो वह कुत्ता अपनीपूरी आयु भोगे बगैर खुद मौत को गले लगा लेता है। ऐसा होने परजातक को अपने मन में कोई वहम पालने के बजाय कुत्ता पाल लेनाचाहिए।
इसी प्रकार अनजाने में या फैशन या श्रृंगार के रूप में किए गए कईकाम जातक के जीवन को कष्टों से मुक्ति दिलाने में अहम भूमिकानिभाते हैं।

दान से भी अशुभ फल सम्भव जिस जातक की जन्म कुंडली में चन्द्रमा छठे भाव में हो वह यदि आप लोगों के लाभ के लिए तालाब, कुआँ आद...
29/11/2025

दान से भी अशुभ फल सम्भव

जिस जातक की जन्म कुंडली में चन्द्रमा छठे भाव में हो वह यदि आप लोगों के लाभ के लिए तालाब, कुआँ आदि बनवाएं या किमी को वेतन देकर लोगों को मुफ्त पानी पिलाने का प्रबन्ध करे या आम लोगों के लिए कुआँ आदि की मरम्मत भी कराए तो उसके घर सन्तान खासकर लड़का पैदा होने की सम्भावना न के बराबर रह जाती है। इतना ही नहीं उसके परिवार में बेवक्त मौतों की सम्भावना बढ़ जाती है और उस परिवार की सदस्य संख्या खासतौर पर पुरुषों की संख्या घटती चली जाती है। यह सब सुनने में कुछ अजीब-सा लग सकता है।

लाल किताब के अनुसार कुंडली का छठा स्थान बुध तथा केतु का पक्का घर है। चन्द्र, बुध से शत्रुता करता है तथा केतु, चन्द्र को ग्रहण लगा देता है। इसके कारण पानी जिसे चन्द्रमा की कारक वस्तु कहा जाता है वह अमृत की बजाय जहर के समान हो जाती है। अब यदि छठे भाव में चन्द्र की उपस्थिति वाला जातक एक अच्छा कर्म समझकर दूसरों को दान के तौर पर पानी पिलाता है या उसकी व्यवस्था करता है तो वास्तव में वह पानी के स्थान पर दूसरों को जहर पिला रहा है, इसलिए देखने में अच्छा लगने वाला यह कर्म भी उस जातक के लिए अशुभ फलदायक हो जाता है और उसे कई प्रकार के संकटों से गुजरना पड़ता है। उसका मन अशान्त रहने लगता है और उसके माता का स्वास्थ्य भी खराब रहने लगता है। ऐसे में चन्द्रमा का प्रकोप कम करने के लिए 41 दिनों तक किसी धर्म स्थल में दूध चढ़ाने से लाभ मिलना सम्भव है। इसी प्रकार बहुत से जातक अपने घर में मन्दिर स्थापित कर लेते हैं और उसके सामने बैठकर पूजा करते हैं। ऐसे जातक जिनकी कुंडली में सातवें भाव में बृहस्पति हो, उन्हें घर में मन्दिर स्थापित करने से बचना चाहिए क्योंकि यह उनके लिए घातक हो सकता है। लाल किताब में कहा गया है कि “रखा घर में मन्दिर गुम्बद न परिवार देगा, बचेगा लड़का अगर तो यो मिट्टी करेगा ।” यानी घर में मन्दिर रखना जातक के परियार पर बहुत बुरा असर देगा। ऐसे जातक के घर लड़का पैदा होने की सम्मायना बहुत कम हो जाएगी। यदि किसी और ग्रह के प्रभाव के कारण लड़का पैदा हो भी जाए तो वह परिवार के लिए बदनामी और बर्बादी का कारण बनेगा। कालपुरुष कुंडली के अनुसार सातवें घर में तुला राशि पड़ती है जिसमें बृहस्पति के दो कट्टर शत्रु माने जाने वाले ग्रह बुध और शुक्र का प्रभाव रहता है। किसी भी मन्दिर या धर्म स्थान का बृहस्पति से विशेष सम्बन्ध होता है, इसलिए सातवें भाव में अशुभ हुए बृहस्पति की कारक वस्तु अर्थात धर्म स्थान को स्थापित करना एक प्रकार से घर में अशुभता को ही स्थापित करना है, इसलिए ऐसे जातकों को जिनके सातवें भाव में बृहस्पति हो घर में मन्दिर के निर्माण से बचना चाहिए। लाल किताब में कहा गया है कि ऐसे जातकों को किसी साधु या ब्राह्मण को कपड़ों का दान देने से भी बचना चाहिए। ऐसा इसलिए क्‍योंकि कुंडली के सातवें घर में शुक्र की तुला राशि पड़ती है और शुक्र को सिले हुए कपड़े का कारक माना जाता है। ऐसे में किसी ब्राह्मण को कपड़ा देना ठीक वैसा ही होगा जैसे किसी को मीठा जहर दिया जाए।

यदि कोई जातक ऐसा कर चुका हो या ऐसा करता रहा हो तो इसके दुष्प्रभाव से बचने के लिए सात साल मिर्च पीले रंग के कपड़े में बाँधकर घर में रखने से लाभ मिलना सम्भव है। ऐसा करने से मंगल और बृहस्पति शक्तिशाली हो जाते हैं क्योंकि लाल मिर्च मंगल की कारक है और पीला कपड़ा बृहस्पति का। दोनों को एक साथ रखने से बृहस्पति को मंगल की सहायता प्राप्त हो जाती है। इसी प्रकार शनि ग्रह का मकान से विशेष सम्बन्ध माना जाता है। लाल किताब में कहा गया है कि ऐसे जातक जिनके आठवें भाव में शनि हो, यदि कोई ऐसी सराय या धर्मशाला आदि बनाएँ जिनमें आम यात्री मुफ्त में आराम करें तो ऐसा करने वाला जातक खुद बेघर हो सकता है और उसकी आर्थिक हालत खराब हो सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि कुंडली में आठवाँ भाव मृत्यु का स्थान होता है। ऐसे में यदि आम लोगों के लिए मकान बनाया जाए तो मकान का कारक शनि खुद मृत्यु स्थान में आ जाता है।

वैसे भी शनि एक ऐसा ग्रह है जो सुपात्रों की ही मदद करता है। यही कारण है कि शनि यदि किसी जातक के दसवें भाव में बैठा हो और वह जातक अनजाने में भी किसी पर तरस खाकर उसकी मदद कर दे या उसका कोई काम कर दे तो शनि नाराज हो जाते हैं। इसका सीधा असर उस जातक की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है। यहाँ तक कि वह दिवालिया हो सकता है। लाल किताब के अनुसार राहु यदि किसी जातक के चतुर्थ भाव में हो तो उस जातक को अपने मकान की छत या शौचालय में बदलाव नहीं करना चाहिए। इन चीजों में किसी प्रकार की मरम्मत या बदलाव भी अशुभ फल दे सकती है।

 #स्वप्नशास्त्र   अगर स्वप्न ब्रह्म मुहूर्त सुबह (3 बजे से 5:30 मिनट)तक आते हैं तो वह स्वप्न आने वाले १ महीने में सत्य ह...
22/11/2025

#स्वप्नशास्त्र
अगर स्वप्न ब्रह्म मुहूर्त सुबह (3 बजे से 5:30 मिनट)तक आते हैं तो वह स्वप्न आने वाले १ महीने में सत्य होते हैं। बाक़ी के सपने सच होने में विलंब होता है ।आज हम जानकारी लेंगे स्वप्न तथा उनसे प्राप्त होने वाले संभावित फल के बारे मैं:-
1- सांप दिखाई देना- धन लाभ
2- नदी देखना- सौभाग्य में वृद्धि
3- नाच-गाना देखना- अशुभ समाचार मिलने के योग
4- नीलगाय देखना- भौतिक सुखों की प्राप्ति
5- नेवला देखना- शत्रुभय से मुक्ति
6- पगड़ी देखना- मान-सम्मान में वृद्धि
7- पूजा होते हुए देखना- किसी योजना का लाभ मिलना
8- फकीर को देखना- अत्यधिक शुभ फल
9- गाय का बछड़ा देखना- कोई अच्छी घटना होना
10- वसंत ऋतु देखना- सौभाग्य में वृद्धि
11- स्वयं की बहन को देखना- परिजनों में प्रेम बढऩा
12- बिल्वपत्र देखना- धन-धान्य में वृद्धि
13- भाई को देखना- नए मित्र बनना
14- भीख मांगना- धन हानि होना
15- शहद देखना- जीवन में अनुकूलता
16- स्वयं की मृत्यु देखना- भयंकर रोग से मुक्ति
17- रुद्राक्ष देखना- शुभ समाचार मिलना
18- पैसा दिखाई- देना धन लाभ
19- स्वर्ग देखना- भौतिक सुखों में वृद्धि
20- पत्नी को देखना- दांपत्य में प्रेम बढ़ना
21- स्वस्तिक दिखाई देना- धन लाभ होना
22- हथकड़ी दिखाई देना- भविष्य में भारी संकट
23- मां सरस्वती के दर्शन- बुद्धि में वृद्धि
24- कबूतर दिखाई देना- रोग से छुटकारा
25- कोयल देखना- उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति
26- अजगर दिखाई देना- व्यापार में हानि
27- कौआ दिखाई देना- बुरी सूचना मिलना
28- छिपकली दिखाई देना- घर में चोरी होना
29- चिडिय़ा दिखाई देना- नौकरी में पदोन्नति
30- तोता दिखाई देना- सौभाग्य में वृद्धि
31- भोजन की थाली देखना- धनहानि के योग
32- इलाइची देखना- मान-सम्मान की प्राप्ति
33- खाली थाली देखना- धन प्राप्ति के योग
34- गुड़ खाते हुए देखना- अच्छा समय आने के संकेत
35- शेर दिखाई देना- शत्रुओं पर विजय
36- हाथी दिखाई देना- ऐेश्वर्य की प्राप्ति
37- कन्या को घर में आते देखना- मां लक्ष्मी की कृपा मिलना
38- सफेद बिल्ली देखना- धन की हानि
39- दूध देती भैंस देखना- उत्तम अन्न लाभ के योग
40- चोंच वाला पक्षी देखना- व्यवसाय में लाभ
41- स्वयं को दिवालिया घोषित करना- व्यवसाय चौपट होना
42- चिडिय़ा को रोते देखता- धन-संपत्ति नष्ट होना
43- चावल देखना- किसी से शत्रुता समाप्त होना
44- चांदी देखना- धन लाभ होना
45- दलदल देखना- चिंताएं बढऩा
46- कैंची देखना- घर में कलह होना
47- सुपारी देखना- रोग से मुक्ति
48- लाठी देखना- यश बढऩा
49- खाली बैलगाड़ी देखना- नुकसान होना
50- खेत में पके गेहूं देखना- धन लाभ होना
51- किसी रिश्तेदार को देखना- उत्तम समय की शुरुआत
52- तारामंडल देखना- सौभाग्य की वृद्धि
53- ताश देखना- समस्या में वृद्धि
54- तीर दिखाई- देना लक्ष्य की ओर बढऩा
55- सूखी घास देखना- जीवन में समस्या
56- भगवान शिव को देखना- विपत्तियों का नाश
57- त्रिशूल देखना- शत्रुओं से मुक्ति
58- दंपत्ति को देखना- दांपत्य जीवन में अनुकूलता
59- शत्रु देखना- उत्तम धनलाभ
60- दूध देखना- आर्थिक उन्नति
61- धनवान व्यक्ति देखना- धन प्राप्ति के योग
62- दियासलाई जलाना- धन की प्राप्ति
63- सूखा जंगल देखना- परेशानी होना
64- मुर्दा देखना- बीमारी दूर होना
65- आभूषण देखना- कोई कार्य पूर्ण होना
66- जामुन खाना- कोई समस्या दूर होना
67- जुआ खेलना- व्यापार में लाभ
68- धन उधार देना- अत्यधिक धन की प्राप्ति
69- चंद्रमा देखना- सम्मान मिलना
70- चील देखना- शत्रुओं से हानि
71- फल-फूल खाना- धन लाभ होना
72- सोना मिलना- धन हानि होना
73- शरीर का कोई अंग कटा हुआ देखना- किसी परिजन की मृत्यु के योग
74- कौआ देखना- किसी की मृत्यु का समाचार मिलना
75- धुआं देखना- व्यापार में हानि
76- चश्मा लगाना- ज्ञान में बढ़ोत्तरी
77- भूकंप देखना- संतान को कष्ट
78- रोटी खाना- धन लाभ और राजयोग
79- पेड़ से गिरता हुआ देखना किसी रोग से मृत्यु होना
80- श्मशान में शराब पीना- शीघ्र मृत्यु होना
81- रुई देखना- निरोग होने के योग
82- कुत्ता देखना- पुराने मित्र से मिलन
83- सफेद फूल देखना- किसी समस्या से छुटकारा
84- उल्लू देखना- धन हानि होना
85- सफेद सांप काटना- धन प्राप्ति
86- लाल फूल देखना- भाग्य चमकना
87- नदी का पानी पीना- सरकार से लाभ
88- धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाना- यश में वृद्धि व पदोन्नति
89- कोयला देखना- व्यर्थ विवाद में फंसना
90- जमीन पर बिस्तर लगाना- दीर्घायु और सुख में वृद्धि
91- घर बनाना- प्रसिद्धि मिलना
92- घोड़ा देखना- संकट दूर होना
93- घास का मैदान देखना- धन लाभ के योग
94- दीवार में कील ठोकना- किसी बुजुर्ग व्यक्ति से लाभ
95- दीवार देखना- सम्मान बढऩा
96- बाजार देखना- दरिद्रता दूर होना
97- मृत व्यक्ति को पुकारना- विपत्ति एवं दुख मिलना
98- मृत व्यक्ति से बात करना- मनचाही इच्छा पूरी होना
99- मोती देखना- पुत्री प्राप्ति
100- लोमड़ी देखना- किसी घनिष्ट व्यक्ति से धोखा मिलना
101- गुरु दिखाई देना- सफलता मिलना
102- गोबर देखना- पशुओं के व्यापार में लाभ
103- देवी के दर्शन करना- रोग से मुक्ति
104- चाबुक दिखाई देना- झगड़ा होना
105- चुनरी दिखाई देना- सौभाग्य की प्राप्ति
106- छुरी दिखना- संकट से मुक्ति
107- बालक दिखाई देना- संतान की वृद्धि
108- बाढ़ देखना- व्यापार में हानि
109- जाल देखना- मुकद्में में हानि
110- जेब काटना- व्यापार में घाटा
111- चेक लिखकर देना- विरासत में धन मिलना
112- कुएं में पानी देखना- धन लाभ
113- आकाश देखना- पुत्र प्राप्ति
114- अस्त्र-शस्त्र देखना- मुकद्में में हार
115- इंद्रधनुष देखना- उत्तम स्वास्थ्य
116- कब्रिस्तान देखना- समाज में प्रतिष्ठा
117- कमल का फूल देखना- रोग से छुटकारा
118- सुंदर स्त्री देखना- प्रेम में सफलता
119- चूड़ी देखना- सौभाग्य में वृद्धि
120- कुआं देखना- सम्मान बढऩा
121- अनार देखना- धन प्राप्ति के योग
122- गड़ा धन दिखाना- अचानक धन लाभ
123- सूखा अन्न खाना- परेशानी बढऩा
124- अर्थी देखना- बीमारी से छुटकारा
125- झरना देखना- दु:खों का अंत होना
126- बिजली गिरना- संकट में फंसना
127- चादर देखना- बदनामी के योग
128- जलता हुआ दीया देखना- आयु में वृद्धि
129- धूप देखना- पदोन्नति और धनलाभ
130- रत्न देखना- व्यय एवं दु:ख 131- चंदन देखना- शुभ समाचार मिलना
132- जटाधारी साधु देखना- अच्छे समय की शुरुआत
133- स्वयं की मां को देखना- सम्मान की प्राप्ति
134- फूलमाला दिखाई देना- निंदा होना
135- जुगनू देखना- बुरे समय की शुरुआत
136- टिड्डी दल देखना- व्यापार में हानि
137- डाकघर देखना- व्यापार में उन्नति
138- डॉक्टर को देखना- स्वास्थ्य संबंधी समस्या
139- ढोल दिखाई देना- किसी दुर्घटना की आशंका
140- मंदिर देखना- धार्मिक कार्य में सहयोग करना
141- तपस्वी दिखाई- देना दान करना
142- तर्पण करते हुए देखना- परिवार में किसी बुर्जुग की मृत्यु
143- डाकिया देखना- दूर के रिश्तेदार से मिलना
144- तमाचा मारना- शत्रु पर विजय
145- उत्सव मनाते हुए देखना- शोक होना
146- दवात दिखाई देना- धन आगमन
147- नक्शा देखना- किसी योजना में सफलता
148- नमक देखना- स्वास्थ्य में लाभ
149- कोर्ट-कचहरी देखना- विवाद में पडऩा
150- पगडंडी देखना- समस्याओं का निराकरण
151- सीना या आंख खुजाना- धन लाभ

राहु को मत छेड़़ो    लाल किताब में राहु को कुंडली के तृतीय व षण्ठम भाव में ही शुभदेने वाला कहा जाता है। तृतीय भाव में राह...
14/11/2025

राहु को मत छेड़़ो
लाल किताब में राहु को कुंडली के तृतीय व षण्ठम भाव में ही शुभदेने वाला कहा जाता है। तृतीय भाव में राहु को आयु व दौलत कामालिक कहा गया है। कहते हैं कि जिस जातक की कुंडली में राहु तृतीयभाव में हो, उसके लिए वह हाथ में बन्दूक लिए खड़ा पहरेदार या रक्षकहै। ऐसा राहु जातक को अच्छा स्वास्थ्य तो प्रदान करता ही है, धन हानिभी नहीं होने देता और जातक को दिलेर बनाता है। अन्य ज्योतिषीयमान्यताओं में भी तृतीय यानी पराक्रम भाव में क्रूर व पुरुष ग्रह जैसे-राहु,मंगल, सूर्य व केतु का होना शुभ बताया गया है, जबकि तृतीय भाव मेंही शुभ व स्त्री ग्रह जैसे-चन्द्रमा, शुक्र व बुध जातक को उतना दिलेरनहीं बनाते। इसी प्रकार कुंडली के षष्ठम भाव में बैठा राहु जातक केजीवन में आने वाली बड़ी से बड़ी मुसीबत को टाल देता है।
लाल किताब में कहा गया है कि षष्ठम भाव का राहु जातक के गलेमें पड़े हुए फाँसी के फन्दे को भी हाथों का रूप लेकर निकाल देता है। अतःषष्ठम भाव में इसे मुसीबत की हर रस्सी काटने वाला ‘मददगार हाथी’ कहागया है। ऐसी मान्यता है कि शीशे की एक छोटी-सी गोली सदैव पास मेंरखने से इस भाव में राहु की शुभता और बढ़ जाती है। लाल किताब में राहुको कच्चा कोयला, कैक्टस का पौधा, हाथी आदि का कारक माना गया है।अतः बेहतर होगा कि यह वस्तुएँ घर में न रखें। कालपुरुष की कुंडली मेंतृतीय व षष्ठम भाव में राहु के सबसे घनिष्ठ मित्र बुध की मिथुन व कन्याराशियाँ आती हैं। अतः इन दो भागों में राहु शुभ फलदायक है। कुंडली केचतुर्थ भाव में बैठा राहु किसी जातक को तब तक कोई नुकसान नहींपहुँचाता, जब तक वह उससे छेड़छाड़ न करे ।
कालपुरुष की कुंडली के अनुसार चतुर्थ भाव में कर्क राशि आती है, जिसका स्वामी चन्द्रमा है और चन्द्रमा को सभी ग्रहों की माता मानागया है। अतः चतुर्थ भाव में राहु चुपचाप बैठा रहता है और कोईशुभ-अशुभ फल नहीं देता, किन्तु चतुर्थ भाव में राहु की उपस्थिति केसमय यदि राहु की कारक चीजें जैसे-मकान की छत को बदलना याशौचालय को तुड़वाकर दुबारा बनवाना या शौचालय की मरम्मत करवानाराहु को नाराज कर देता है। अतः उस परिवार के किसी-न-किसी व्यक्तिको दिमागी बीमारियाँ होने की आशंका जताई जाती है। यहाँ राहु यदिपहले से ही अशुभ हो तो कई बार जातक को जेल या पागलखाने तकजाने की नौबत आ जाती है। चतुर्थ भाव का हमारे मकान से गहरासम्बन्ध है। ऐसा माना जाता है कि राहु के कारक व्यक्ति से जमीनखरीदकर उस पर मकान बनवाने या उसके द्वारा बनवाए हुए मकान कोखरीदकर उसमें रहने से साहु क्रोधित हो जाता है और उस परिवार मेंकोई-न-कोई मुसीबत खड़ी रहती है। अतः राहु से छेड़खानी करने केबजाय उससे दूरी बनाकर रहना चाहिए, क्योंकि तृतीय व षष्ठम भाव केअलावा राहु चाहे जहाँ भी हो, अपनी शरारत से बाज नहीं आता। कोईजातक अपने घर में यदि कच्चे कोयले की बोरियाँ भरकर रखता है तोराहु नाराज हो सकता है। यदि ऐसा हो तो राहु के क्रोध से बचने के लिएबार-बार गंगा स्नान करना या पीतल के बर्तन में गंगाजल भरकर, उसेढँककर घर में रखना श्रेयस्कर बताया गया है। लाल किताब के अनुसारगंगा या किसी भी पवित्र नदी का बहता पानी बृहस्पति है। इसी प्रकारपीले रंग का होने के कारण पीतल बृहस्पति की धातु है। बृहस्पति कोराहु के कहर से बचाने वाला माना जाता है। अष्टम भाव में स्थित राहुअशुभ होता है। वह जातक को राह चलते मुश्किलें दे सकता है तथा कुछऐसी अन्दरूनी बीमारियाँ पैदा कर सकता है, जिसे चिकित्सक भी आसानीसे न समझ सकें।ज्योतिष में राहु को ‘छाया ग्रह' कहा गया है, लेकिन लाल किताबके अनुसार यह छाया साधारण परछाई भर नहीं, आँधी जैसे धुएँ काकारक है। अतः अष्टम भाव के राहु को ‘कड़वा धुआँ कहा जाता है। यह अचानक चोट, कोर्ट केस-मुकदमे, पुलिस ज्यादती, मुसीबतों, संकटआदि की ओर इशारा करता है। इस स्थिति में जातक को यह समझ मेंनहीं आता कि मुसीबतें कब और कैसे आती हैं। अष्टम भाव का राहु जबवर्षफल व गोचर फल में भी इसी भाव में होता है, तो जातक के ऊपरकोई बड़ी, मुसीबत आ सकती है। इसके अलावा राहु शुक्र जैसे कोमल वसुन्दर ग्रह को बेहद परेशान रखता है। सप्तम भाव में शुक्र व राहु का एकसाथ होना मांगलिक दोष से ज्यादा खतरनाक माना जाता है। ज्योतिष मेंशुक्र को पत्नी का कारक कहा गया है। अतः इसका शादी से गहरासम्बन्ध होता है। शुक्र हमारी त्वचा का भी कारक है। इसलिए सप्तमभाव में शुक्र के साथ बैठा राहु शुक्र के शुभ फल को भी दूषित कर देताहै। यदि ऐसा हो तो शाम के समय नीले रंग का फूल घर के बाहर जमीनमें दबाते रहना चाहिए।

2025 में दिवाली का मुख्य दिन 20 अक्टूबर दीपावली 2025: पांच दिवसीय पर्व का कार्यक्रमधनतेरस: 18 अक्टूबर 2025 (शनिवार) धनते...
17/10/2025

2025 में दिवाली का मुख्य दिन 20 अक्टूबर
दीपावली 2025: पांच दिवसीय पर्व का कार्यक्रम

धनतेरस: 18 अक्टूबर 2025 (शनिवार)
धनतेरस : 18 अक्टूबर 2025

धनतेरस की पूजा का शुभ मुहूर्त: सायंकाल : 07:16 से लेकर 08:20 बजे तक

प्रदोषकाल : सायंकाल 05:48 से 08:20 बजे तक

वृषभ काल : शाम को 07:16 से 09:11 बजे तक

यम के दीप जलाने का मुहूर्त: सायंकाल 05:48 से लेकर 07:04 बजे तक

हिंदू मान्यता के अनुसार धनतेरस के दिन 13 दीयों में से एक दीया मृत्यु के देवता कहलाने वाले यमदेव के लिए विशेष रूप से जलाया जाता है. यम का दीया शुभ मुहूर्त में घर के बाहर दक्षिण दिशा में जलाया जाता है. यम के लिए चार बाती वाला चौमुखा दीया जलाना चाहिए. यम के दीये को जलाने के लिए सरसों के तेल का प्रयोग करें. पूजा की इस प्रक्रिया को यम दीपम या फिर यम के लिए दीपदान कहते हैं. हिंदू मान्यता के अनुसार पूजा के इस उपाय को करने से अकाल मृत्यु का भय दूर हो जाता है.

हिंदू मान्यता के अनुसार धनतेरस की शाम को 13 दीये जलाने से सुख-सौभाग्य और आरोग्य की प्राप्ति होती है. इन 13 दीये में से पहला दीया घर के बाहर दक्षिण दिशा में यम देवता के लिए जलाया जाता है, जबकि दूसरा दीया धन की देवी माता लक्ष्मी के लिए जलाना चाहिए. इसी प्रकार दो दीये अपने मेन गेट पर अगल-बगल रख दें. इसके बाद एक दीया तुलसी माता के पास रखे. गौरतलब है कि कार्तिक मास में तुलसी के पास दीपदान का बहुत ज्यादा महत्व होता है. इसके बाद एक दीया ब्रह्म स्थान यानि घर के बीचों बीच और बाकी दिये को घर के विभिन्न कोने में रखना चाहिए.

नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली): 19 अक्टूबर 2025 (रविवार)

दीपावली (महालक्ष्मी पूजन): 20 अक्टूबर 2025 (सोमवार)
लक्ष्मी पूजन मुहूर्त: शाम 07:08 से रात 08:18 बजे तक
निशीथ काल मुहूर्त: रात 11:41 से रात 12:31 बजे तक

गोवर्धन पूजा: 22 अक्टूबर 2025 (बुधवार)

भाई दूज: 23 अक्टूबर 2025 (गुरुवार)

ज्यादातर पंडितों के मुताबिक, वर्ष 2025 की दिवाली 20 अक्टूबर को ही दिवाली मनाना ज्यादा शुभ रहेगा. है, जो अमावस्या तिथि के अनुसार निर्धारित हुआ है. इस बार दीपावली छह दिनों तक चलेगी क्योंकि तिथियों के कारण त्योहार का विस्तार हुआ है. 21 अक्टूबर को कोई मुख्य त्योहार नहीं है, जबकि गोवर्धन पूजा 22 अक्टूबर को होगी.
[17/10, 8:53 am] Ast. Er. Pankaj Bissa: दिवाली का त्योहार नजदीक है. 18 अक्टूबर 2025 को धनतेरस से इसकी शुरआत हो रही है. वैसे तो दीपोत्सव या दीपावली पांच दिनों का त्योहार है, लेकिन तिथि के बढ़ने के कारण इस बार दीपावली छह दिनों का त्योहार हो गया है. अभी तक बड़ा सवाल था कि 20 या 21 अक्टूबर में से दीपावली कब है? इसके समाधान में सामने आया है कि दीपावली इस बार 20 अक्टूबर को ही है.
20 अक्टूबर को प्रदोष व्यापिनी अमावस्या का आरंभ होगा, जो कि शाम 3 बजकर 44 मिनट से शुरू होगी. यदि सायं काल में प्रतिपदा तिथि आरंभ होती है तो उस बीच पंच दिवसीय दीपावली का पर्व नहीं मनाना चाहिए. यानी प्रतिपदा में दीपावली का कोई महत्व नहीं होता है. इसलिए, अगर आप 21 अक्टूबर को शाम 5 बजकर 55 मिनट पर दिवाली का पूजन करेंगे, तो उसमें दोष उत्पन्न हो सकते हैं. इसी कारण 20 अक्टूबर को ही दिवाली मनाना शुभ रहेगा
जिन शहरों में सूर्यास्त शाम 5 बजकर 30 मिनट से पहले होगा, उन शहरों में 21 अक्टूबर को दिवाली मनाई जा सकती है. लेकिन, जिन शहरों में सूर्यास्त शाम 5 बजकर 30 मिनट के बाद होगा उनमें 20 अक्टूबर को ही दिवाली मनाना उचित होगा. साथ ही, प्रदोष काल व्यापिनी तिथि हमें 20 अक्टूबर को ही प्राप्त हो रही है. इसलिए, 20 अक्टूबर को ही पूरे देश में दिवाली मनाना उचित माना जा रहा है. इस दिन प्रदोष काल शाम 5 बजकर 46 मिनट से लेकर रात 8 बजकर 18 मिनट तक मिनट तक रहेगा.

20 अक्टूबर को ही दिवाली मनाना उचित रहेगा. क्योंकि, 20 तारीख की रात को मां लक्ष्मी की पूजा का बहुत ही अच्छा योग बन रहा है. लेकिन, 21 तारीख को वह योग नहीं बन रहा है जिसमें मां लक्ष्मी की पूजा-उपासना की जाए. 20 अक्टूबर को महालक्ष्मी का पूजन और दिवाली से जुड़े सभी कार्य किए जाएंगे.
द्रिक पंचांग के अनुसार, इस वर्ष अमावस्या तिथि की शुरुआत 20 अक्टूबर को दोपहर 3 बजकर 44 मिनट पर होगी और तिथि का समापन 21 अक्टूबर की रात 9 बजकर 03 मिनट पर होगा.

दिवाली के दिन लक्ष्मी-गणेश पूजन का सबसे शुभ समय शाम 7 बजकर 08 मिनट से लेकर रात 8 बजकर 18 मिनट तक रहेगा. इस अवधि को प्रदोष काल और स्थिर लग्न का संयोग कहा गया है, जो मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करने के लिए उत्तम माना जा रहा है. यानी लोगों को पूजा के लिए करीब 1 घंटा 11 मिनट का समय मिलेगा.

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20/09/2025

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दिव्य पाठ ये 7 शक्तिशाली रक्षक पाठ लिंक पाएं Facebook X Pinterest ईमेल दूसरे ऐप सितंबर 25, 2022  7 शक्तिशाली रक्षक पाठ ये 5 पाठ सम्पूर्....

चन्द्र ग्रहण 2025 और पितृ पक्ष तिथियां एवं विशेष व्याख्या : ज्योतिष के अनुसार, ग्रहण जिस राशि और नक्षत्र में लगता है, उस...
04/09/2025

चन्द्र ग्रहण 2025 और पितृ पक्ष तिथियां एवं विशेष व्याख्या :

ज्योतिष के अनुसार, ग्रहण जिस राशि और नक्षत्र में लगता है, उसका असर उसी राशि और नक्षत्र के जातकों पर सबसे अधिक पड़ता है। इस बार का चंद्र ग्रहण कुंभ राशि और पूर्व भाद्रपद नक्षत्र में लग रहा है, जो इसे खास बनाता है।

साल 2025 का अंतिम चंद्र ग्रहण एक विशेष ज्योतिषीय घटना के रूप में सामने आने वाला है, जो न केवल खगोलीय दृष्टि से अहम है, बल्कि धार्मिक और ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि से भी इसका प्रभाव गहरा माना जा रहा है। यह ग्रहण 7 सितंबर की रात को लगेगा और भारत में स्पष्ट रूप से दिखाई देगा, इसलिए इसका सूतक काल भी मान्य होगा।

साथ ही ग्रहों की स्थिति भी इस समय कई बदलावों के संकेत दे रही है। आइए जानते हैं कि कुंभ राशि और पूर्व भाद्रपद नक्षत्र के लोगों के लिए यह ग्रहण कैसा रहेगा और किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

पितृ पक्ष के पहले दिन चंद्र ग्रहण
2025 का अंतिम चंद्रग्रहण 7 सितंबर, रविवार की रात को भाद्रपद मास की पूर्णिमा के दिन लगेगा।

ग्रहण का आरंभ (स्पर्श):
रात्रि 9: 57 मिनट पर
ग्रहण का मध्य (चरम अवस्था):
रात्रि 11:01 मिनट पर
ग्रहण का समापन: रात्रि 01:26 मिनट पर
इस तरह यह ग्रहण कुल 3 घंटे 29 मिनट तक रहेगा, जो इसे एक लंबे समय तक चलने वाला चंद्रग्रहण बनाता है।
ग्रहण का साया भारत पर बना हुआ है, इसलिए इसका सूतक काल भी मान्य होगा। ऐसे में 7 सितंबर 2025 को सूतक काल दोपहर 12 बजकर 59 मिनट से शुरू होगा। इसके प्रारंभ होने पर किसी भी तरह की शुभ काम, खरीदारी, पूजा-पाठ, मंदिरों में जाना आदि कार्य नहीं करने चाहिए। इसलिए आप इस दिन दोपहर 12 बजकर 59 मिनट से पहले पहले श्राद्ध, पिंडदान, पवित्र नदियों में स्नान व तर्पण आदि पुण्य काम कर सकते हैं। शास्त्रों के अनुसार ग्रहण के बाद पितरों का तर्पण और श्राद्ध करना उत्तम माना गया है। ऐसे में आश्विन कृष्ण प्रतिपदा तिथि में ग्रहण मोक्ष के बाद पितरों का तर्पण करना उत्तम रहेगा। इससे पितर संतुष्ट और प्रसन्न होंगे।

कहां-कहां दिखाई देगा यह चंद्रग्रहण?
यह चंद्रग्रहण विश्व के कई हिस्सों में देखा जा सकेगा।
एशिया (भारत, पाकिस्तान सहित पूरे दक्षिण एशिया)
यूरोप
ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड
अफ्रीका
उत्तर और दक्षिण अमेरिका के पूर्वी भाग

भारत में दिखेगा सूतक काल -

भारत में यह ग्रहण स्पष्ट रूप से दिखाई देगा, इसलिए यहाँ इसका सूतक काल मान्य होगा। विशेष रूप से भारत और पाकिस्तान के लिए यह ग्रहण ज्योतिषीय दृष्टि से संवेदनशील प्रभाव वाला माना जा रहा है, क्योंकि यह ग्रहण कुंभ राशि और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में लग रहा है।

कुंभ राशि पर चंद्र ग्रहण का प्रभाव -

ज्योतिषीय दृष्टिकोण से यह चंद्र ग्रहण कुंभ राशि के जातकों के लिए फायदेमंद रहेगा। इस दौरान आपको विशेष रूप से आर्थिक क्षेत्र में सफलता मिल सकती है। नौकरी करने वालों के लिए पदोन्नति के अच्छे योग बनते दिखाई दे रहे हैं। आपके काम की सराहना होगी और कार्यस्थल पर आपकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी। जो लोग व्यापार करते हैं, उनके लिए भी यह समय सकारात्मक परिणाम देने वाला रहेगा। लाभ के कई अवसर बन सकते हैं। इसके अलावा, धन प्राप्ति के कई स्रोत खुल सकते हैं, जिससे आर्थिक स्थिति और भी मजबूत हो सकती है।

पूर्व भाद्रपद नक्षत्र वालों पर चंद्र ग्रहण का प्रभाव

जो लोग पूर्व भाद्रपद नक्षत्र में जन्मे हैं, उनके लिए यह साल का अंतिम चंद्र ग्रहण सौभाग्य लेकर आने वाला है। करियर के क्षेत्र में तरक्की के संकेत हैं, खासकर जो लोग नौकरी में उन्नति चाहते हैं या विदेश में काम करने का सपना देख रहे हैं, उनके लिए समय अनुकूल है। हालांकि, इस शुभ समय के बीच आपको अपने स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए। छोटी-मोटी स्वास्थ्य समस्याएं परेशान कर सकती हैं। साथ ही, अनावश्यक बहस या विवाद से बचना आपके लिए फायदेमंद रहेगा, वरना मानसिक तनाव हो सकता है।

श्राद्ध तिथियां 2025
पूर्णिमा श्राद्ध 07 सितम्बर 2025, रविवार
प्रतिपदा श्राद्ध 08 सितम्बर 2025, सोमवार
द्वितीया श्राद्ध 09 सितम्बर 2025, मंगलवार
तृतीया श्राद्ध 10 सितम्बर 2025, बुधवार
चतुर्थी श्राद्ध 10 सितम्बर 2025, बुधवार
पञ्चमी श्राद्ध 11 सितम्बर 2025, बृहस्पतिवार
महा भरणी 11 सितम्बर 2025, बृहस्पतिवार
षष्ठी श्राद्ध 12 सितम्बर 2025, शुक्रवार
सप्तमी श्राद्ध 13 सितम्बर 2025, शनिवार
अष्टमी श्राद्ध 14 सितम्बर 2025, रविवार
नवमी श्राद्ध 15 सितम्बर 2025, सोमवार
दशमी श्राद्ध 16 सितम्बर 2025, मंगलवार
एकादशी श्राद्ध 17 सितम्बर 2025, बुधवार
द्वादशी श्राद्ध 18 सितम्बर 2025, बृहस्पतिवार
त्रयोदशी श्राद्ध 19 सितम्बर 2025, शुक्रवार
मघा श्राद्ध 19 सितम्बर 2025, शुक्रवार
चतुर्दशी श्राद्ध 20 सितम्बर 2025, शनिवार
सर्वपितृ अमावस्या 21 सितम्बर 2025, रविवार
पितृदोष से मुक्ति के उपाय

#पितृ_गायत्री_मंत्र प्रतिदिन १ माला या उससे अधिक (यथाशक्ति) जाप करे...

ॐ आद्य-भूताय विद्महे सर्व-सेव्याय धीमहि । शिव-शक्ति-स्वरूपेण पितृ-देव प्रचोदयात्
॥ पितृ प्रणाम मंत्र ॥
देवताभ्यः पित्रभ्यश्च महा योगिभ्य एव च नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः॥
मार्कंडेय पुराण (९४/३ -१३ )में वर्णित पितृ स्तोत्र पितरों की तस्वीर पर गंध, अक्षत, काले तिल चढ़ाकर या पीपल के वृक्ष में जल अर्पित कर नीचे लिखे पितृस्तोत्र का पाठ करें ।
॥ पुराणोक्त पितृ -स्तोत्र ॥
अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम्।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।
इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा।
तान् नमस्याम्यहं सर्वान् पितृनप्सूदधावपि।।
नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिव्योश्च तथा नमस्यामि कृतांजलिः।।
देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान्।
अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येऽहं कृतांजलिः।।
प्रजापतं कश्यपाय सोमाय वरूणाय च।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृतांजलिः।।
नमो गणेभ्यः सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु।
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे।।
सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्।।
अग्निरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम्।
अग्निषोममयं विश्वं यत एतदशेषतः।।
ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तयः।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिणः।।
तेभ्योऽखिलेभ्यो योगिभ्यः पितृभ्यो यतमानसः।
नमो नमो नमस्ते मे प्रसीदन्तु स्वधाभुजः।।
॥ अर्थ: ॥
रूचि बोले - जो सबके द्वारा पूजित, अमूर्त, अत्यन्त तेजस्वी, ध्यानी तथा दिव्यदृष्टि सम्पन्न हैं, उन पितरों को मैं सदा नमस्कार करता हूँ।
जो इन्द्र आदि देवताओं, दक्ष, मारीच, सप्तर्षियों तथा दूसरों के भी नेता हैं, कामना की पूर्ति करने वाले उन पितरो को मैं प्रणाम करता हूँ।
जो मनु आदि राजर्षियों, मुनिश्वरों तथा सूर्य और चन्द्रमा के भी नायक हैं, उन समस्त पितरों को मैं जल और समुद्र में भी नमस्कार करता हूँ।
नक्षत्रों,ग्रहों,वायु,अग्नि,आकाश और द्युलोक तथा पृथ्वी के भी जो नेता हैं, उन पितरों को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।
जो देवर्षियों के जन्मदाता, समस्त लोकों द्वारा वन्दित तथा सदा अक्षय फल के दाता हैं, उन पितरों को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।
प्रजापति, कश्यप, सोम, वरूण तथा योगेश्वरों के रूप में स्थित पितरों को सदा हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।
सातों लोकों में स्थित सात पितृगणों को नमस्कार है। मैं योगदृष्टिसम्पन्न स्वयम्भू ब्रह्माजी को प्रणाम करता हूँ।
चन्द्रमा के आधार पर प्रतिष्ठित तथा योगमूर्तिधारी पितृगणों को मैं प्रणाम करता हूँ। साथ ही सम्पूर्ण जगत् के पिता सोम को नमस्कार करता हूँ।
अग्निस्वरूप अन्य पितरों को मैं प्रणाम करता हूँ, क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् अग्नि और सोम मय है।
जो पितर तेज में स्थित हैं, जो ये चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं तथा जो जगत्स्वरूप एवं ब्रह्मस्वरूप हैं, उन सम्पूर्ण योगी पितरो को मैं एकाग्रचित्त होकर प्रणाम करता हूँ। उन्हें बारम्बार नमस्कार है। वे स्वधा भोजी पितर मुझ पर प्रसन्न हों
मार्कण्डेयपुराण में महात्मा रूचि द्वारा की गयी पितरों की यह स्तुति पितृस्तोत्र’ कहलाता है। पितरों की प्रसन्नता की प्राप्ति के लिये इस स्तोत्र का पाठ किया जाता है। इस स्तोत्र की बड़ी महिमा है।

#क्यों जरूरी है श्राद्ध, क्या है पितृ पक्ष का महत्व और क्या है सही विधि...

भारतीय महीनों की गणना के अनुसार भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को सृष्टि पालक भगवान विष्णु के प्रतिरूप श्रीकृष्ण का जन्म धूमधान से मनाया गया है। तदुपरांत शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को प्रथम देव गणेशजी का जन्मदिन यानी गणेश महोत्सव के बाद भाद्र पक्ष माह की पूर्णिमा से अपने पितरों की मोक्ष प्राप्ति के लिए अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का महापर्व शुरू हो जाता है।
इसको महापर्व इसलिए बोला जाता है क्योंकि नौदुर्गा महोत्सव नौ दिन का होता है, दशहरा पर्व दस दिन का होता है, पर यह पितृ पक्ष सोलह दिनों तक चलता है।
हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार अश्विन माह के कृष्ण पक्ष से अमावस्या तक अपने पितरों के श्राद्ध की परंपरा है। यानी कि १२ महीनों के मध्य में छठे माह भाद्र पक्ष की पूर्णिमा से (यानी आखिरी दिन से) ७ वें माह अश्विन के दिनों में यह पितृ पक्ष का महापर्व मनाया जाता है।
सूर्य भी अपनी प्रथम राशि मेष से भ्रमण करता हुआ जब छठी राशि कन्या में एक माह के लिए भ्रमण करता है तब ही यह सोलह दिन का पितृ पक्ष मनाया जाता है।
उपरोक्त ज्योतिषीय पारंपरिक गणना का महत्व इसलिए और भी बढ़ जाता है क्योंकि शास्त्रों में भी कहा गया है कि आपको सीधे खड़े होने के लिए रीढ़ की हड्डी यानी बैकबोन का मजूबत होना बहुत आवश्यक है, जो शरीर के लगभग मध्य भाग में स्थित है और जिसके चलते ही हमारे शरीर को एक पहचान मिलती है।
उसी तरह हम सभी जन उन पूर्वजों के अंश हैं अर्थात हमारी जो पहचान है यानी हमारी रीढ़ की हड्डी मजबूत बनी रहे उसके लिए हर वर्ष के मध्य में अपने पूर्वजों को अवश्य याद करें और हमें सामाजिक और पारिवारिक पहचान देने के लिए श्राद्ध कर्म के रूप में अपना धन्यवाद अर्थात अपनी श्रद्धाजंलि दें।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में हमारे पूर्वज मोक्ष प्राप्ति की कामना लिए अपने परिजनों के निकट अनेक रूपों में आते हैं। इस पर्व में अपने पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व उनकी आत्मा की शांति देने के लिए श्राद्ध किया जाता है और उनसे जीवन में खुशहाली के लिए आशीर्वाद की कामना की जाती है।
ज्योतिषीय गणना के अनुसार जिस तिथि में माता-पिता, दादा-दादी आदि परिजनों का निधन होता है। इन 16 दिनों में उसी तिथि पर उनका श्राद्ध करना उत्तम रहता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार उसी तिथि में जब उनके पुत्र या पौत्र द्वारा श्राद्ध किया जाता है तो पितृ लोक में भ्रमण करने से मुक्ति मिलकर पूर्वजों को मोक्ष प्राप्त हो जाता है। हमारे पितरों की आत्मा की शांति के लिए ‘श्रीमद भागवत् गीता’ या ‘भागवत पुराण’ का पाठ अति उत्तम माना जाता है।
ज्योतिष में नवग्रहों में सूर्य को पिता व चंद्रमा को मां का कारक माना गया है। जिस तरह सूर्य ग्रहण व चंद्र ग्रहण लगने पर कोई भी शुभ कार्य का शुभारंभ मना होता है, वैसे ही पितृ पक्ष में भी माता-पिता, दादा-दादी के श्राद्ध के पक्ष के कारण शुभ कार्य शुरू करने की मनाही रहती है, जैसे-विवाह, मकान या वाहन की खरीदारी इत्यादि।
कैसे करें श्राद्ध पितृ पक्ष में तर्पण और श्राद्ध सामान्यत: दोपहर १२ बजे के लगभग करना ठीक माना जाता है। इसे किसी सरोवर, नदी या फिर अपने घर पर भी किया जा सकता है।
परंपरा अनुसार, अपने पितरों के आवाहन के लिए भात, काले तिल व घिक का मिश्रण करके पिंड दान व तर्पण किया जाता है। इसके पश्चात विष्णु भगवान व यमराज की पूजा-अर्चना के साथ-साथ अपने पितरों की पूजा भी की जाती है।
अपनी तीन पीढ़ी पूर्व तक के पूर्वजों की पूजा करने की मान्यता है। ब्राह्मण को घर पर आमंत्रित कर सम्मानपूर्वक उनके द्वारा पूजा करवाने के उपरांत अपने पूर्वजों के लिए बनाया गया विशेष भोजन समर्पित किया जाता है।
फिर आमंत्रित ब्राह्मण को भोजन करवाया जाता है। ब्राह्मण को दक्षिणा, फल, मिठाई और वस्त्र देकर प्रसन्न किया जाता है व चरण स्पर्श कर सभी परिवारजन उनसे आशीष लेते हैं।
पित पृक्ष में पिंड दान अवश्य करना चाहिए ताकि देवों व पितरों का आशीर्वाद मिल सके।
अपने पितरों के पसंदीदा भोजन बनाना अच्छा माना जाता है। सामान्यत: पितृ पक्ष में अपने पूर्वजों के लिए कद्दू की सब्जी, दाल-भात, पूरी व खीर बनाना शुभ माना जाता है। पूजा के बाद पूरी व खीर सहित अन्य सब्जियां एक थाली में सजाकर गाय, कुत्ता, कौवा और चींटियों को देना अति आवश्यक माना जाता है।
कहा जाता है कि कौवे व अन्य पक्षियों द्वारा भोजन ग्रहण करने पर ही पितरों को सही मायने में भोजन प्राप्त होता है, क्योंकि पक्षियों को पितरों का दूत व विशेष रूप से कौवे को उनका प्रतिनिधि माना जाता है। पितृ पक्ष में अपशब्द बोलना, ईर्ष्या करना, क्रोध करना बुरा माना जाता है व इनका त्याग करना ही चाहिए।
इस दौरान घर पर लहसुन, प्याज, नॉन-वेज और किसी भी तरह के नशे का सेवन वर्जित माना जाता है। पीपल के पेड़ के नीचे शु्द्ध घी का दिया जलाकर गंगा जल, दूध, घी, अक्षत व पुष्प चढ़ाने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है।
घर में गीता का पाठ करना भी इस अवधि में काफी अच्छा माना गया है। यह सब करके आप अपने पितरों का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यदि इस अवसर पर अपने पूर्वजों के सम्मान में उनके नाम से प्याऊ, स्कूल, धर्मशाला आदि के निर्माण में सहयोग करें तो माना जाता है कि आपके पूर्वज आप पर अति कृपा बनाए रखते हैं।
यह महत्वपूर्ण है कि पितरों को धन से नहीं, बल्कि भावना से प्रसन्न करना चाहिए। विष्णु पुराण में भी कहा गया है कि निर्धन व्यक्ति जो नाना प्रकार के पकवान बनाकर अपने पितरों को विशेष भोजन अर्पित करने में सक्षम नहीं हैं, वे यदि मोटा अनाज या चावल या आटा और यदि संभव हो तो कोई सब्जी-साग व फल भी यदि पितरों को प्रति पूर्ण आस्था से किसी ब्राह्मण को दान करता है तो भी उसे अपने पूर्वजों का पूरा आशीर्वाद मिल जाता है।
यदि मोटा अनाज व फल देना भी मुश्किल हो तो वो सिर्फ अपने पितरों को तिल मिश्रित जल को तीन उंगुलियों में लेकर तर्पण कर सकता है, ऐसा करने से भी उसकी पूरी प्रक्रिया होना माना जाता है।
श्राद्ध व तर्पण के दौरान ब्राह्मण को तीन बार जल में तिल मिलाकर दान देने व बाद में गाय को घास खिलाकर सूर्य देवता से प्रार्थना करते हुए कहना चाहिए कि मैंने अपनी सामर्थ्य के अनुसार जो किया उससे प्रसन्न होकर मेरे पितरों को मोक्ष दें, तो इससे आपके पितरों को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है व व्यक्ति का पूर्ण श्राद्ध का फल प्राप्त हो जाता है।
यदि माता-पिता, दादा-दादी इत्यादि किसी के निधन की सही तिथि का ज्ञान नहीं हो तो इस पर्व के अंतिम दिन यानी अमावस्या पर उनका श्राद्ध करने से पूर्ण फल मिल जाता है।
यह शब्द 'श्राद्ध श्रद्धा' से बना है। ब्रह्म पुराण (उपर्युक्त उद्धृत), मरीचि एवं बृहस्पति की परिभाषाओं से यह स्पष्ट है कि श्राद्ध एवं श्रद्धा में घनिष्ठ संबंध है। श्राद्ध में श्राद्धकर्ता का यह अटल विश्वास रहता है कि मृत या पितरों के कल्याण के लिए ब्राह्मणों को जो कुछ भी दिया जाता है, वह उसे या उन्हें किसी प्रकार अवश्य ही मिलता है।
स्कंद पुराण का कथन है कि 'श्राद्ध' नाम इसलिए पड़ा है कि उस कृत्य में श्रद्धा मूल (मूल स्रोत) है। इसका तात्पर्य यह है कि इसमें न केवल विश्वास है, प्रत्युत एक अटल धारणा है कि व्यक्ति को यह करना ही है।
ॠग्वेद में श्रद्धा को 'देवत्व' नाम दिया गया है। मनु व याज्ञवल्क्य ऋषियों ने धर्मशास्त्र में नित्य व नैमित्तिक श्राद्धों की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए कहा कि श्राद्ध करने से कर्ता पितृ ऋण से मुक्त हो जाता है तथा पितर संतुष्ट रहते हैं जिससे श्राद्धकर्ता व उसके परिवार का कल्याण होता है।
श्राद्ध महिमा में कहा गया है- 'आयु: पूजां धनं विद्यां स्वर्ग मोक्ष सुखानि च। प्रयच्छति तथा राज्यं पितर: श्राद्ध तर्पिता।।' - अर्थात जो लोग अपने पितरों का श्राद्ध श्रद्धापूर्वक करते हैं, उनके पितर संतुष्ट होकर उन्हें आयु, संतान, धन, स्वर्ग, राज्य मोक्ष व अन्य सौभाग्य प्रदान करते हैं।
हमारी संस्कृति में माता-पिता व गुरु को विशेष श्रद्धा व आदर दिया जाता है, उन्हें देवतुल्य माना जाता है। 'पितरं प्रीतिमापन्ने प्रियन्ते सर्वदेवता:' - अर्थात पितरों के प्रसन्न होने पर सारे ही देवता प्रसन्न हो जाते हैं।
आत्मिक प्रगति के लिए सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है- 'श्रद्धा।' श्रद्धा में शक्ति भी है। वह पत्थर को देवता बना देती है और मनुष्य को नर से नारायण स्तर तक उठा ले जाती है। किंतु श्रद्धा मात्र चिंतन या कल्पना का नाम नहीं है। उसके प्रत्यक्ष प्रमाण भी होना चाहिए। यह उदारता, सेवा, सहायता, करुणा आदि के रूप में ही हो सकती है। इन्हें चिंतन तक सीमित न रखकर कार्यरूप में, परमार्थपरक कार्यों में ही परिणत करना होता है। यही सच्चे अर्थों में श्राद्ध है।
संसार के सभी देशों, सभी धर्मों व सभी जातियों में किसी न किसी रूप में मृतकों का श्राद्ध होता है। मृतकों के स्मारक, कवच, मकबरे संसारभर में देखे जाते हैं। पूर्वजों के नाम पर नगर, मुहल्ले, संस्थाएं, मकान, कुएं, तालाब, मंदिर, मीनार आदि बनाकर उनके नाम तथा यश को चिरस्थायी रखने का प्रयत्न किया जाता है। उनकी स्मृति में पर्वों एवं जयंतियों का आयोजन किया जाता है। यह अपने-अपने ढंग के श्राद्ध ही हैं।
'क्या फायदा?' वाला तर्क केवल हिन्दू श्राद्ध पर ही नहीं, समस्त संसार की मानव प्रवृत्ति पर लागू होता है। असल बात यह है कि प्रेम, उपकार, आत्मीयता एवं महानता के लिए मनुष्य स्वभावत: कृतज्ञ होता है और जब तक उस कृतज्ञता के प्रकट करने का प्रत्युपकारस्वरूप कुछ प्रदर्शन न कर ले, तब तक उसे आंतरिक बेचैनी रहती है, इस बेचैनी को वह श्राद्ध द्वारा ही पूरी करता है।
उपकारी के प्रति कृतज्ञता का प्रत्युपकार का भाव रखना भावना क्षेत्र की पवित्रता एवं उत्कृष्टता का प्राणवान चिन्ह है। इसके लिए धनदान आवश्यक नहीं, समय, धन, श्रमदान, भाव दान भी असमर्थता की स्थिति में इसी प्रयोजन की पूर्ति करते हैं। उन्हीं सब बातों पर विचार करते हुए भारतीय धर्म-परंपरा में श्राद्ध-कर्म की महत्ता बताई गई है। सत्पात्र न मिलने या अपनी आर्थिक स्थिति अच्छी न होने की स्थिति में इसे जलांजलि देकर तर्पण के रूप में भी संपन्न किया जा सकता है।
यह सोचना उचित नहीं कि जो मर गए, उन तक हमारी दी हुई वस्तु कैसे पहुंचेगी? पहुंचती तो केवल श्रद्धा है। मरे हुए व्यक्तियों को श्राद्ध-कर्म से कुछ लाभ होता है कि नहीं? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि- 'होता है, अवश्य होता है।'
संसार एक समुद्र के समान है जिसमें जल कणों की भांति हर एक जीव है। विश्व एक शिला है तो व्यक्ति उसका एक परमाणु। हर एक आत्मा, जो जीवित या मृत रूप से इस विश्व में मौजूद है, अन्य समस्त आत्माओं से संबद्ध है। संसार में कहीं भी अनीति, युद्ध, कष्ट, अनाचार, अत्याचार हो रहे हैं तो सुदूर देशों के निवासियों के मन में भी उद्वेग उत्पन्न होता है।
जब जाड़े का प्रवाह आता है, तो हर चीज ठंडी होने लगती है और गर्मी की ऋतु में हर चीज की ऊष्णता बढ़ जाती है। छोटा-सा यज्ञ करने से उसकी दिव्य गंध तथा दिव्य भावना समस्त संसार के प्राणियों को लाभ पहुंचाती है। इसी प्रकार कृतज्ञता की भावना प्रकट करने के लिए किया हुआ श्राद्ध समस्त प्राणियों में शांतिमयी सद्भावना की लहरें पहुंचाता है। ये सूक्ष्म भाव तरंगें सुगंधित पुष्पों की सुगंध की तरह तृप्तिकारक आनंद और उल्लासवर्धक होती हैं।
सद्भावना की सुगंध जीवित और मृतक सभी को तृप्त करती है। इन सभी में अपने स्वर्गीय पितर भी आ जाते हैं। उन्हें भी श्राद्ध यज्ञ की दिव्य तरंगें आत्मशांति प्रदान करती हैं।
जिन्होंने अपने साथ में किसी भी प्रकार की कोई भलाई की है उसे बार-बार प्रकट करना चाहिए, क्योंकि इससे उपकार करने वालों को संतोष तथा प्रोत्साहन प्राप्त होता है। वे अपने ऊपर अधिक प्रेम करते हैं और अधिक घनिष्ठ बनते हैं, साथ-साथ अहसान स्वीकार करने से अपनी नम्रता एवं मधुरता बढ़ती है। उपकारों का बदला चुकाने के लिए किसी न किसी रूप में सदा ही प्रयत्न करते रहना चाहिए।
'पितरों का उद्देश्य करके (उनके कल्याण के लिए) श्रद्धापूर्वक किसी वस्तु का या उससे संबंधित किसी द्रव्य का त्याग श्राद्ध है।'
उचित समय पर शास्त्रसम्मत विधि द्वारा पितरों के लिए श्रद्धाभाव से मंत्रों के साथ जो दान-दक्षिणा आदि दिया जाए, वही श्राद्ध कहलाता है। २० अंश रेतस (सोम) को 'पितृॠण' कहते हैं। २८ अंश रेतस के रूप में 'श्रद्धा' नामक मार्ग से भेजे जाने वाले 'पिंड' तथा 'जल' आदि के दान को 'श्राद्ध' कहते हैं।
मनुष्य के ३ पूर्वजों यथा- पिता, पितामह एवं प्रपितामह क्रम से पितृदेवों अर्थात वसुओं, रुद्रों एवं आदित्य के समान हैं और श्राद्ध करते समय उनको पूर्वजों का प्रतिनिधि मानना चाहिए।
कुछ लोगों के मत से श्राद्ध से इन बातों का निर्देश होता है- होम, पिंडदान एवं ब्राह्मण तर्पण (ब्राह्मण संतुष्टि भोजन आदि से), किंतु 'श्राद्ध' शब्द का प्रयोग इन तीनों के साथ गौण अर्थ में उपयुक्त समझा जा सकता है।
पितरों के लिए कृष्ण पक्ष उत्तम होता है। कृष्ण पक्ष की अष्टमी को उनके दिनों का उदय होता है। अमावस्या उनका मध्याह्न है तथा शुक्ल पक्ष की अष्टमी अंतिम दिन होता है। धार्मिक मान्यता है कि अमावस्या को किया गया श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान उन्हें संतुष्टि व ऊर्जा प्रदान करते हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पृथ्वीलोक में देवता उत्तर गोल में विचरण करते हैं और दक्षिण गोल भाद्रपद मास की पूर्णिमा को चन्द्रलोक के साथ-साथ पृथ्वी के नजदीक से गुजरता है। इस मास की प्रतीक्षा हमारे पूर्वज पूरे वर्षभर करते हैं। वे चन्द्रलोक के माध्यम से दक्षिण दिशा में अपनी मृत्यु तिथि पर अपने घर के दरवाजे पर पहुंच जाते है और वहां अपना सम्मान पाकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी नई पीढ़ी को आशीर्वाद देकर चले जाते हैं।

#तर्पण_क्यों..........?
जो पितृगण दिवंगत हो चुके हैं उनके लिए तर्पण श्राद्ध का विधान है। श्रद्धांजलि पूजा-उपचार का सरलतम प्रयोग है। अन्य उपचारों में वस्तुओं की जरूरत पड़ती है तथा वे कभी उपलब्ध होती हैं, कभी नहीं। किंतु जल ऐसी वस्तु है जिसे हम दैनिक जीवन में अनिवार्यत: प्रयोग करते हैं।
वह सर्वत्र सुविधापूर्वक मिल भी जाता है इसलिए पुष्पांजलि आदि श्रमसाध्य श्रद्धांजलियों में जलांजलि को सर्वसुलभ माना गया है। उसके प्रयोग में आलस्य और अश्रद्धा के अतिरिक्त और कोई व्यवधान नहीं हो सकता इसलिए सूर्य नारायण को अर्घ्य, तुलसी वृक्ष में जलदान, अतिथियों को अर्घ्य तथा पितरगणों को तर्पण का विधान है।
प्रश्न यह नहीं कि इस पानी की उन्हें आवश्यकता है या नहीं? प्रश्न केवल अपनी अभिव्यक्ति-भर का है। उसे निर्धारित मंत्र बोलते हुए, गायत्री महामंत्र में अथवा बिना मंत्र के भी जलांजलि दी जा सकती है। यही है उनके प्रति पूजा-अर्चा का सुगमतम विधान। शास्त्रीय भाषा में इसे 'तर्पण' कहा जाता है। इसमें यह तर्क करने की गुंजाइश नहीं है कि यह पानी उन पूर्वजों या सूर्य तक पहुंचा या नहीं?
१. इसके पीछे अपनी कृतज्ञताभरी भावनाओं को सींचते रहने की अभिव्यक्ति की ही प्रमुखता है।
२. पितृऋण को चुकाने के लिए दूसरा कृत्य आता है- 'श्राद्ध'। श्राद्ध का प्रचलित रूप तो 'ब्राह्मण भोजन' मात्र रह गया है, पर बात ऐसी है नहीं। अपने साधनों का एक अंश पितृ प्रयोजनों के निमित्त ऐसे कार्यों में लगाया जाना चाहिए जिससे लोक-कल्याण का प्रयोजन भी सधता हो।
ऐसे श्राद्ध कृत्यों में समय की आवश्यकता को देखते हुए वृक्षारोपण ऐसा कार्य हो सकता है जिसे ब्रह्मभोज से भी कहीं अधिक महत्व का माना जा सके। किसी व्यक्ति को भोजन करा देने से उसकी एक समय की भूख बुझती है।
दूसरा समय आते ही फिर वह आवश्यकता जाग पड़ती है। उसे कोई दूसरा व्यक्ति कहां तक कब तक पूरा करता रहे। फिर यदि कोई व्यक्ति अपंग, मुसीबतग्रस्त या लोकसेवी नहीं है तो उसे मुफ्त में भोजन कराते रहने के पीछे किसी उच्च उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती।
३. वृक्ष वायुशोधन करते हैं। छाया देते हैं। फल-फूल भी मिलते हैं। हरे पत्ते पशुओं का भोजन बन सकते हैं। सूखे पत्तों से जमीन को खाद मिलती है। लकड़ी के अनेक उपयोग हैं। वृक्षों से बादल बरसते हैं। भूमि का कटाव रुकता है। पक्षी घोंसले बनाते हैं। उनकी छाया में मनुष्यों व पशुओं को विश्राम मिलता है। इस प्रकार वृक्षारोपण भी एक उपयोगी प्राणी के पोषण के समान है।
श्राद्ध रूप में ऐसे वृक्ष लगाए जाएं, जो किसी न किसी रूप में प्राणियों की आवश्यकता पूरी करते हों। अपने पास कृषियोग्य भूमि से थोड़ी भी जमीन बचती हो, कम उपयोगी हो तो उसमें आम, पीपल, महुआ आदि के वृक्ष लगा देने चाहिए। केवल सींचने, रखवाली करने आदि की जिम्मेदारी अपने कंधे पर लेकर दूसरों की जमीन में वृक्ष लगा देने में भी पुण्य फल की प्राप्ति हो सकती है।
४. वृक्षों की भांति ही जलाशयों के निर्माण का भी उपयोग है। तालाबों में हर साल वर्षा के पानी के साथ मिट्टी भर जाती है और उनकी सतह ऊंची हो जाने से कम पानी समाता है, जो जल्दी ही सूख जाता है। इन्हें यदि हर साल श्रमदान से गहरे करते रहा जाए तो पशुओं को पानी, सिंघाड़ा, कमल जैसी बेलें तथा तल में जमने वाली चिकनी मिट्टी से मकानों की मरम्मत हो सकती है।

#श्राद्ध पक्षकीवर्तमान में प्रासंगिकता?
हम लोग हमेशा बदलाव चाहते हैं। हमारी सोच दशा व समय के साथ बदल जाती है, लेकिन कुछ वस्तुएं हमेशा प्रासंगिक होती हैं। पितृपक्ष हमारे परिवार से जुड़ी एक परंपरा है व अपनों को याद करने का एक अवसर है। जो हमसे जुड़े हैं या जुड़े थे, वो हम सबके लिए हमेशा प्रासंगिक होते हैं। श्राद्ध पक्ष के वर्तमान में प्रासंगिक होने के कई कारण हैं-
१. हमारा समाज अत्यंत भौतिकवादी होता जा रहा है। बगैर स्वार्थ के कोई किसी की सहायता नहीं करना चाहता है। पितृपक्ष में अपने पूर्वजों के लिए जो भी दान या भोजन हम दूसरों को देते हैं, उससे समाज के गरीब एवं जरूरतमंदों की सहायता होती है तथा समाज में सहयोग एवं समन्वय की भावना जाग्रत होती है।
२. जो कभी हमारे परिवार का हिस्सा रहे हैं जिनका खून हमारी रगों में दौड़ रहा है, कम से कम एक पखवाड़ा हम उन्हें याद करते हैं। इस बहाने हम अपने पूर्वजों को याद करके अपने परिवार, समाज एवं धर्म में अपनी आस्था व्यक्त करते हैं।
३. हमारे पूर्वज एवं बुजुर्ग हमारी धरोहर हैं। वर्तमान में बुजुर्ग समाज की मुख्य धारा से कटते जा रहे हैं। इस एक पखवाड़े में हम सभी उनके प्रति सम्मान एवं सद्भाव व्यक्त करते हैं।
४. परंपराओं से समाज एवं परिवार में एकनिष्ठा पनपती है। पितृपक्ष को मनाने से हमारी नई पीढ़ी में सांस्कृतिक सोच के साथ बुजुर्गों के सम्मान की भावना का जागरण होता है। श्राद्ध से श्रद्धा जीवित रहती है। श्रद्धा को प्रकट करने का जो प्रदर्शन होता है, वह 'श्राद्ध' कहा जाता है।
जीवित पितरों व गुरुजनों के लिए श्रद्धा प्रकट करने व श्रद्धा करने के लिए उनकी अनेक प्रकार से सेवा, पूजा तथा संतुष्टि की जा सकती है, परंतु स्वर्गीय पितरों के लिए श्रद्धा प्रकट करने व अपनी कृतज्ञता को प्रकट करने का कोई निमित्त निर्माण करना पड़ता है। यह निमित्त श्राद्ध है। स्वर्गीय गुरुजनों के कार्यों, उपकारों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने से ही छुटकारा नहीं मिल जाता।
हम अपने अवतारों, देवताओं, ऋषियों, महापुरुषों और पूजनीय पूर्वजों की जयंतियां धूमधाम से मनाते हैं, उनके गुणों का वर्णन करते हैं, उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनके चरित्रों एवं विचारों से प्रेरणा ग्रहण करते हैं।
यदि कहा जाए कि मृत व्यक्तियों ने तो दूसरी जगह जन्म ले लिया होगा तो उनकी जयंतियां मनाने से क्या लाभ? तो यह तर्क बहुत अविवेकपूर्ण होगा। श्राद्ध और तर्पण का मूल आधार अपनी कृतज्ञता और आत्मीयता व सात्विक वृत्तियों को जागृत रखना है। इन प्रवृत्तियों का जीवित, जागृत रहना संसार की सुख-शांति के लिए नितांत आवश्यक है।
इसलिए मैं आपसे आग्रह करता हूं कि आप उपरोक्त कारणों में से कम से कम एक के लिए पितृ पक्ष को जरूर मानें। इससे आप और आपके परिवार को और अधिक शांति और खुशी पाने में लिए मदद मिलेगी।
अब सवाल यह है कि आप इन दिनों के महत्व को जानते हैं तो यह सुनिश्चित करें कि आप इस वर्ष पितृपक्ष में पितरों की पूजा करेंगे और अपने पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। यह आशीर्वाद निश्चित रूप से आपके जीवन को प्रभावशाली एवं सुखमय बना देगा।
◆धर्म ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध के सोलह दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं। ऐसी मान्यता है कि पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा चुकाया जाता है।
वर्ष के किसी भी मास तथा तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों के लिए पितृपक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है।पूर्णिमा पर देहांत होने से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को श्राद्ध करने का विधान है।
इसी दिन से महालय (श्राद्ध) का प्रारंभ भी माना जाता है। श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए। पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितृगण वर्षभर तक प्रसन्न रहते हैं। धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि पितरों का पिण्ड दान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्य आदि की प्राप्ति करता है।
श्राद्ध में पितरों को आशा रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिण्ड दान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे। इसी आशा के साथ वे पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं। यही कारण है कि हिंदू धर्म शास्त्रों में प्रत्येक हिंदू गृहस्थ को पितृपक्ष में श्राद्ध अवश्य रूप से करने के लिए कहा गया है।
श्राद्ध से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं। मगर ये बातें श्राद्ध करने से पूर्व जान लेना बहुत जरूरी है क्योंकि कई बार विधिपूर्वक श्राद्ध न करने से पितृ श्राप भी दे देते हैं। आज हम आपको श्राद्ध से जुड़ी कुछ विशेष बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं-
१- श्राद्धकर्म में गाय का घी, दूध या दही काम में लेना चाहिए। यह ध्यान रखें कि गाय को बच्चा हुए दस दिन से अधिक हो चुके हैं। दस दिन के अंदर बछड़े को जन्म देने वाली गाय के दूध का उपयोग श्राद्ध कर्म में नहीं करना चाहिए।
२- श्राद्ध में चांदी के बर्तनों का उपयोग व दान पुण्यदायक तो है ही राक्षसों का नाश करने वाला भी माना गया है। पितरों के लिए चांदी के बर्तन में सिर्फ

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