04/09/2025
चन्द्र ग्रहण 2025 और पितृ पक्ष तिथियां एवं विशेष व्याख्या :
ज्योतिष के अनुसार, ग्रहण जिस राशि और नक्षत्र में लगता है, उसका असर उसी राशि और नक्षत्र के जातकों पर सबसे अधिक पड़ता है। इस बार का चंद्र ग्रहण कुंभ राशि और पूर्व भाद्रपद नक्षत्र में लग रहा है, जो इसे खास बनाता है।
साल 2025 का अंतिम चंद्र ग्रहण एक विशेष ज्योतिषीय घटना के रूप में सामने आने वाला है, जो न केवल खगोलीय दृष्टि से अहम है, बल्कि धार्मिक और ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि से भी इसका प्रभाव गहरा माना जा रहा है। यह ग्रहण 7 सितंबर की रात को लगेगा और भारत में स्पष्ट रूप से दिखाई देगा, इसलिए इसका सूतक काल भी मान्य होगा।
साथ ही ग्रहों की स्थिति भी इस समय कई बदलावों के संकेत दे रही है। आइए जानते हैं कि कुंभ राशि और पूर्व भाद्रपद नक्षत्र के लोगों के लिए यह ग्रहण कैसा रहेगा और किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
पितृ पक्ष के पहले दिन चंद्र ग्रहण
2025 का अंतिम चंद्रग्रहण 7 सितंबर, रविवार की रात को भाद्रपद मास की पूर्णिमा के दिन लगेगा।
ग्रहण का आरंभ (स्पर्श):
रात्रि 9: 57 मिनट पर
ग्रहण का मध्य (चरम अवस्था):
रात्रि 11:01 मिनट पर
ग्रहण का समापन: रात्रि 01:26 मिनट पर
इस तरह यह ग्रहण कुल 3 घंटे 29 मिनट तक रहेगा, जो इसे एक लंबे समय तक चलने वाला चंद्रग्रहण बनाता है।
ग्रहण का साया भारत पर बना हुआ है, इसलिए इसका सूतक काल भी मान्य होगा। ऐसे में 7 सितंबर 2025 को सूतक काल दोपहर 12 बजकर 59 मिनट से शुरू होगा। इसके प्रारंभ होने पर किसी भी तरह की शुभ काम, खरीदारी, पूजा-पाठ, मंदिरों में जाना आदि कार्य नहीं करने चाहिए। इसलिए आप इस दिन दोपहर 12 बजकर 59 मिनट से पहले पहले श्राद्ध, पिंडदान, पवित्र नदियों में स्नान व तर्पण आदि पुण्य काम कर सकते हैं। शास्त्रों के अनुसार ग्रहण के बाद पितरों का तर्पण और श्राद्ध करना उत्तम माना गया है। ऐसे में आश्विन कृष्ण प्रतिपदा तिथि में ग्रहण मोक्ष के बाद पितरों का तर्पण करना उत्तम रहेगा। इससे पितर संतुष्ट और प्रसन्न होंगे।
कहां-कहां दिखाई देगा यह चंद्रग्रहण?
यह चंद्रग्रहण विश्व के कई हिस्सों में देखा जा सकेगा।
एशिया (भारत, पाकिस्तान सहित पूरे दक्षिण एशिया)
यूरोप
ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड
अफ्रीका
उत्तर और दक्षिण अमेरिका के पूर्वी भाग
भारत में दिखेगा सूतक काल -
भारत में यह ग्रहण स्पष्ट रूप से दिखाई देगा, इसलिए यहाँ इसका सूतक काल मान्य होगा। विशेष रूप से भारत और पाकिस्तान के लिए यह ग्रहण ज्योतिषीय दृष्टि से संवेदनशील प्रभाव वाला माना जा रहा है, क्योंकि यह ग्रहण कुंभ राशि और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में लग रहा है।
कुंभ राशि पर चंद्र ग्रहण का प्रभाव -
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से यह चंद्र ग्रहण कुंभ राशि के जातकों के लिए फायदेमंद रहेगा। इस दौरान आपको विशेष रूप से आर्थिक क्षेत्र में सफलता मिल सकती है। नौकरी करने वालों के लिए पदोन्नति के अच्छे योग बनते दिखाई दे रहे हैं। आपके काम की सराहना होगी और कार्यस्थल पर आपकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी। जो लोग व्यापार करते हैं, उनके लिए भी यह समय सकारात्मक परिणाम देने वाला रहेगा। लाभ के कई अवसर बन सकते हैं। इसके अलावा, धन प्राप्ति के कई स्रोत खुल सकते हैं, जिससे आर्थिक स्थिति और भी मजबूत हो सकती है।
पूर्व भाद्रपद नक्षत्र वालों पर चंद्र ग्रहण का प्रभाव
जो लोग पूर्व भाद्रपद नक्षत्र में जन्मे हैं, उनके लिए यह साल का अंतिम चंद्र ग्रहण सौभाग्य लेकर आने वाला है। करियर के क्षेत्र में तरक्की के संकेत हैं, खासकर जो लोग नौकरी में उन्नति चाहते हैं या विदेश में काम करने का सपना देख रहे हैं, उनके लिए समय अनुकूल है। हालांकि, इस शुभ समय के बीच आपको अपने स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए। छोटी-मोटी स्वास्थ्य समस्याएं परेशान कर सकती हैं। साथ ही, अनावश्यक बहस या विवाद से बचना आपके लिए फायदेमंद रहेगा, वरना मानसिक तनाव हो सकता है।
श्राद्ध तिथियां 2025
पूर्णिमा श्राद्ध 07 सितम्बर 2025, रविवार
प्रतिपदा श्राद्ध 08 सितम्बर 2025, सोमवार
द्वितीया श्राद्ध 09 सितम्बर 2025, मंगलवार
तृतीया श्राद्ध 10 सितम्बर 2025, बुधवार
चतुर्थी श्राद्ध 10 सितम्बर 2025, बुधवार
पञ्चमी श्राद्ध 11 सितम्बर 2025, बृहस्पतिवार
महा भरणी 11 सितम्बर 2025, बृहस्पतिवार
षष्ठी श्राद्ध 12 सितम्बर 2025, शुक्रवार
सप्तमी श्राद्ध 13 सितम्बर 2025, शनिवार
अष्टमी श्राद्ध 14 सितम्बर 2025, रविवार
नवमी श्राद्ध 15 सितम्बर 2025, सोमवार
दशमी श्राद्ध 16 सितम्बर 2025, मंगलवार
एकादशी श्राद्ध 17 सितम्बर 2025, बुधवार
द्वादशी श्राद्ध 18 सितम्बर 2025, बृहस्पतिवार
त्रयोदशी श्राद्ध 19 सितम्बर 2025, शुक्रवार
मघा श्राद्ध 19 सितम्बर 2025, शुक्रवार
चतुर्दशी श्राद्ध 20 सितम्बर 2025, शनिवार
सर्वपितृ अमावस्या 21 सितम्बर 2025, रविवार
पितृदोष से मुक्ति के उपाय
#पितृ_गायत्री_मंत्र प्रतिदिन १ माला या उससे अधिक (यथाशक्ति) जाप करे...
ॐ आद्य-भूताय विद्महे सर्व-सेव्याय धीमहि । शिव-शक्ति-स्वरूपेण पितृ-देव प्रचोदयात्
॥ पितृ प्रणाम मंत्र ॥
देवताभ्यः पित्रभ्यश्च महा योगिभ्य एव च नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः॥
मार्कंडेय पुराण (९४/३ -१३ )में वर्णित पितृ स्तोत्र पितरों की तस्वीर पर गंध, अक्षत, काले तिल चढ़ाकर या पीपल के वृक्ष में जल अर्पित कर नीचे लिखे पितृस्तोत्र का पाठ करें ।
॥ पुराणोक्त पितृ -स्तोत्र ॥
अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम्।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।
इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा।
तान् नमस्याम्यहं सर्वान् पितृनप्सूदधावपि।।
नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिव्योश्च तथा नमस्यामि कृतांजलिः।।
देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान्।
अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येऽहं कृतांजलिः।।
प्रजापतं कश्यपाय सोमाय वरूणाय च।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृतांजलिः।।
नमो गणेभ्यः सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु।
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे।।
सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्।।
अग्निरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम्।
अग्निषोममयं विश्वं यत एतदशेषतः।।
ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तयः।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिणः।।
तेभ्योऽखिलेभ्यो योगिभ्यः पितृभ्यो यतमानसः।
नमो नमो नमस्ते मे प्रसीदन्तु स्वधाभुजः।।
॥ अर्थ: ॥
रूचि बोले - जो सबके द्वारा पूजित, अमूर्त, अत्यन्त तेजस्वी, ध्यानी तथा दिव्यदृष्टि सम्पन्न हैं, उन पितरों को मैं सदा नमस्कार करता हूँ।
जो इन्द्र आदि देवताओं, दक्ष, मारीच, सप्तर्षियों तथा दूसरों के भी नेता हैं, कामना की पूर्ति करने वाले उन पितरो को मैं प्रणाम करता हूँ।
जो मनु आदि राजर्षियों, मुनिश्वरों तथा सूर्य और चन्द्रमा के भी नायक हैं, उन समस्त पितरों को मैं जल और समुद्र में भी नमस्कार करता हूँ।
नक्षत्रों,ग्रहों,वायु,अग्नि,आकाश और द्युलोक तथा पृथ्वी के भी जो नेता हैं, उन पितरों को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।
जो देवर्षियों के जन्मदाता, समस्त लोकों द्वारा वन्दित तथा सदा अक्षय फल के दाता हैं, उन पितरों को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।
प्रजापति, कश्यप, सोम, वरूण तथा योगेश्वरों के रूप में स्थित पितरों को सदा हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।
सातों लोकों में स्थित सात पितृगणों को नमस्कार है। मैं योगदृष्टिसम्पन्न स्वयम्भू ब्रह्माजी को प्रणाम करता हूँ।
चन्द्रमा के आधार पर प्रतिष्ठित तथा योगमूर्तिधारी पितृगणों को मैं प्रणाम करता हूँ। साथ ही सम्पूर्ण जगत् के पिता सोम को नमस्कार करता हूँ।
अग्निस्वरूप अन्य पितरों को मैं प्रणाम करता हूँ, क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् अग्नि और सोम मय है।
जो पितर तेज में स्थित हैं, जो ये चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं तथा जो जगत्स्वरूप एवं ब्रह्मस्वरूप हैं, उन सम्पूर्ण योगी पितरो को मैं एकाग्रचित्त होकर प्रणाम करता हूँ। उन्हें बारम्बार नमस्कार है। वे स्वधा भोजी पितर मुझ पर प्रसन्न हों
मार्कण्डेयपुराण में महात्मा रूचि द्वारा की गयी पितरों की यह स्तुति पितृस्तोत्र’ कहलाता है। पितरों की प्रसन्नता की प्राप्ति के लिये इस स्तोत्र का पाठ किया जाता है। इस स्तोत्र की बड़ी महिमा है।
#क्यों जरूरी है श्राद्ध, क्या है पितृ पक्ष का महत्व और क्या है सही विधि...
भारतीय महीनों की गणना के अनुसार भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को सृष्टि पालक भगवान विष्णु के प्रतिरूप श्रीकृष्ण का जन्म धूमधान से मनाया गया है। तदुपरांत शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को प्रथम देव गणेशजी का जन्मदिन यानी गणेश महोत्सव के बाद भाद्र पक्ष माह की पूर्णिमा से अपने पितरों की मोक्ष प्राप्ति के लिए अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का महापर्व शुरू हो जाता है।
इसको महापर्व इसलिए बोला जाता है क्योंकि नौदुर्गा महोत्सव नौ दिन का होता है, दशहरा पर्व दस दिन का होता है, पर यह पितृ पक्ष सोलह दिनों तक चलता है।
हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार अश्विन माह के कृष्ण पक्ष से अमावस्या तक अपने पितरों के श्राद्ध की परंपरा है। यानी कि १२ महीनों के मध्य में छठे माह भाद्र पक्ष की पूर्णिमा से (यानी आखिरी दिन से) ७ वें माह अश्विन के दिनों में यह पितृ पक्ष का महापर्व मनाया जाता है।
सूर्य भी अपनी प्रथम राशि मेष से भ्रमण करता हुआ जब छठी राशि कन्या में एक माह के लिए भ्रमण करता है तब ही यह सोलह दिन का पितृ पक्ष मनाया जाता है।
उपरोक्त ज्योतिषीय पारंपरिक गणना का महत्व इसलिए और भी बढ़ जाता है क्योंकि शास्त्रों में भी कहा गया है कि आपको सीधे खड़े होने के लिए रीढ़ की हड्डी यानी बैकबोन का मजूबत होना बहुत आवश्यक है, जो शरीर के लगभग मध्य भाग में स्थित है और जिसके चलते ही हमारे शरीर को एक पहचान मिलती है।
उसी तरह हम सभी जन उन पूर्वजों के अंश हैं अर्थात हमारी जो पहचान है यानी हमारी रीढ़ की हड्डी मजबूत बनी रहे उसके लिए हर वर्ष के मध्य में अपने पूर्वजों को अवश्य याद करें और हमें सामाजिक और पारिवारिक पहचान देने के लिए श्राद्ध कर्म के रूप में अपना धन्यवाद अर्थात अपनी श्रद्धाजंलि दें।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में हमारे पूर्वज मोक्ष प्राप्ति की कामना लिए अपने परिजनों के निकट अनेक रूपों में आते हैं। इस पर्व में अपने पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व उनकी आत्मा की शांति देने के लिए श्राद्ध किया जाता है और उनसे जीवन में खुशहाली के लिए आशीर्वाद की कामना की जाती है।
ज्योतिषीय गणना के अनुसार जिस तिथि में माता-पिता, दादा-दादी आदि परिजनों का निधन होता है। इन 16 दिनों में उसी तिथि पर उनका श्राद्ध करना उत्तम रहता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार उसी तिथि में जब उनके पुत्र या पौत्र द्वारा श्राद्ध किया जाता है तो पितृ लोक में भ्रमण करने से मुक्ति मिलकर पूर्वजों को मोक्ष प्राप्त हो जाता है। हमारे पितरों की आत्मा की शांति के लिए ‘श्रीमद भागवत् गीता’ या ‘भागवत पुराण’ का पाठ अति उत्तम माना जाता है।
ज्योतिष में नवग्रहों में सूर्य को पिता व चंद्रमा को मां का कारक माना गया है। जिस तरह सूर्य ग्रहण व चंद्र ग्रहण लगने पर कोई भी शुभ कार्य का शुभारंभ मना होता है, वैसे ही पितृ पक्ष में भी माता-पिता, दादा-दादी के श्राद्ध के पक्ष के कारण शुभ कार्य शुरू करने की मनाही रहती है, जैसे-विवाह, मकान या वाहन की खरीदारी इत्यादि।
कैसे करें श्राद्ध पितृ पक्ष में तर्पण और श्राद्ध सामान्यत: दोपहर १२ बजे के लगभग करना ठीक माना जाता है। इसे किसी सरोवर, नदी या फिर अपने घर पर भी किया जा सकता है।
परंपरा अनुसार, अपने पितरों के आवाहन के लिए भात, काले तिल व घिक का मिश्रण करके पिंड दान व तर्पण किया जाता है। इसके पश्चात विष्णु भगवान व यमराज की पूजा-अर्चना के साथ-साथ अपने पितरों की पूजा भी की जाती है।
अपनी तीन पीढ़ी पूर्व तक के पूर्वजों की पूजा करने की मान्यता है। ब्राह्मण को घर पर आमंत्रित कर सम्मानपूर्वक उनके द्वारा पूजा करवाने के उपरांत अपने पूर्वजों के लिए बनाया गया विशेष भोजन समर्पित किया जाता है।
फिर आमंत्रित ब्राह्मण को भोजन करवाया जाता है। ब्राह्मण को दक्षिणा, फल, मिठाई और वस्त्र देकर प्रसन्न किया जाता है व चरण स्पर्श कर सभी परिवारजन उनसे आशीष लेते हैं।
पित पृक्ष में पिंड दान अवश्य करना चाहिए ताकि देवों व पितरों का आशीर्वाद मिल सके।
अपने पितरों के पसंदीदा भोजन बनाना अच्छा माना जाता है। सामान्यत: पितृ पक्ष में अपने पूर्वजों के लिए कद्दू की सब्जी, दाल-भात, पूरी व खीर बनाना शुभ माना जाता है। पूजा के बाद पूरी व खीर सहित अन्य सब्जियां एक थाली में सजाकर गाय, कुत्ता, कौवा और चींटियों को देना अति आवश्यक माना जाता है।
कहा जाता है कि कौवे व अन्य पक्षियों द्वारा भोजन ग्रहण करने पर ही पितरों को सही मायने में भोजन प्राप्त होता है, क्योंकि पक्षियों को पितरों का दूत व विशेष रूप से कौवे को उनका प्रतिनिधि माना जाता है। पितृ पक्ष में अपशब्द बोलना, ईर्ष्या करना, क्रोध करना बुरा माना जाता है व इनका त्याग करना ही चाहिए।
इस दौरान घर पर लहसुन, प्याज, नॉन-वेज और किसी भी तरह के नशे का सेवन वर्जित माना जाता है। पीपल के पेड़ के नीचे शु्द्ध घी का दिया जलाकर गंगा जल, दूध, घी, अक्षत व पुष्प चढ़ाने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है।
घर में गीता का पाठ करना भी इस अवधि में काफी अच्छा माना गया है। यह सब करके आप अपने पितरों का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यदि इस अवसर पर अपने पूर्वजों के सम्मान में उनके नाम से प्याऊ, स्कूल, धर्मशाला आदि के निर्माण में सहयोग करें तो माना जाता है कि आपके पूर्वज आप पर अति कृपा बनाए रखते हैं।
यह महत्वपूर्ण है कि पितरों को धन से नहीं, बल्कि भावना से प्रसन्न करना चाहिए। विष्णु पुराण में भी कहा गया है कि निर्धन व्यक्ति जो नाना प्रकार के पकवान बनाकर अपने पितरों को विशेष भोजन अर्पित करने में सक्षम नहीं हैं, वे यदि मोटा अनाज या चावल या आटा और यदि संभव हो तो कोई सब्जी-साग व फल भी यदि पितरों को प्रति पूर्ण आस्था से किसी ब्राह्मण को दान करता है तो भी उसे अपने पूर्वजों का पूरा आशीर्वाद मिल जाता है।
यदि मोटा अनाज व फल देना भी मुश्किल हो तो वो सिर्फ अपने पितरों को तिल मिश्रित जल को तीन उंगुलियों में लेकर तर्पण कर सकता है, ऐसा करने से भी उसकी पूरी प्रक्रिया होना माना जाता है।
श्राद्ध व तर्पण के दौरान ब्राह्मण को तीन बार जल में तिल मिलाकर दान देने व बाद में गाय को घास खिलाकर सूर्य देवता से प्रार्थना करते हुए कहना चाहिए कि मैंने अपनी सामर्थ्य के अनुसार जो किया उससे प्रसन्न होकर मेरे पितरों को मोक्ष दें, तो इससे आपके पितरों को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है व व्यक्ति का पूर्ण श्राद्ध का फल प्राप्त हो जाता है।
यदि माता-पिता, दादा-दादी इत्यादि किसी के निधन की सही तिथि का ज्ञान नहीं हो तो इस पर्व के अंतिम दिन यानी अमावस्या पर उनका श्राद्ध करने से पूर्ण फल मिल जाता है।
यह शब्द 'श्राद्ध श्रद्धा' से बना है। ब्रह्म पुराण (उपर्युक्त उद्धृत), मरीचि एवं बृहस्पति की परिभाषाओं से यह स्पष्ट है कि श्राद्ध एवं श्रद्धा में घनिष्ठ संबंध है। श्राद्ध में श्राद्धकर्ता का यह अटल विश्वास रहता है कि मृत या पितरों के कल्याण के लिए ब्राह्मणों को जो कुछ भी दिया जाता है, वह उसे या उन्हें किसी प्रकार अवश्य ही मिलता है।
स्कंद पुराण का कथन है कि 'श्राद्ध' नाम इसलिए पड़ा है कि उस कृत्य में श्रद्धा मूल (मूल स्रोत) है। इसका तात्पर्य यह है कि इसमें न केवल विश्वास है, प्रत्युत एक अटल धारणा है कि व्यक्ति को यह करना ही है।
ॠग्वेद में श्रद्धा को 'देवत्व' नाम दिया गया है। मनु व याज्ञवल्क्य ऋषियों ने धर्मशास्त्र में नित्य व नैमित्तिक श्राद्धों की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए कहा कि श्राद्ध करने से कर्ता पितृ ऋण से मुक्त हो जाता है तथा पितर संतुष्ट रहते हैं जिससे श्राद्धकर्ता व उसके परिवार का कल्याण होता है।
श्राद्ध महिमा में कहा गया है- 'आयु: पूजां धनं विद्यां स्वर्ग मोक्ष सुखानि च। प्रयच्छति तथा राज्यं पितर: श्राद्ध तर्पिता।।' - अर्थात जो लोग अपने पितरों का श्राद्ध श्रद्धापूर्वक करते हैं, उनके पितर संतुष्ट होकर उन्हें आयु, संतान, धन, स्वर्ग, राज्य मोक्ष व अन्य सौभाग्य प्रदान करते हैं।
हमारी संस्कृति में माता-पिता व गुरु को विशेष श्रद्धा व आदर दिया जाता है, उन्हें देवतुल्य माना जाता है। 'पितरं प्रीतिमापन्ने प्रियन्ते सर्वदेवता:' - अर्थात पितरों के प्रसन्न होने पर सारे ही देवता प्रसन्न हो जाते हैं।
आत्मिक प्रगति के लिए सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है- 'श्रद्धा।' श्रद्धा में शक्ति भी है। वह पत्थर को देवता बना देती है और मनुष्य को नर से नारायण स्तर तक उठा ले जाती है। किंतु श्रद्धा मात्र चिंतन या कल्पना का नाम नहीं है। उसके प्रत्यक्ष प्रमाण भी होना चाहिए। यह उदारता, सेवा, सहायता, करुणा आदि के रूप में ही हो सकती है। इन्हें चिंतन तक सीमित न रखकर कार्यरूप में, परमार्थपरक कार्यों में ही परिणत करना होता है। यही सच्चे अर्थों में श्राद्ध है।
संसार के सभी देशों, सभी धर्मों व सभी जातियों में किसी न किसी रूप में मृतकों का श्राद्ध होता है। मृतकों के स्मारक, कवच, मकबरे संसारभर में देखे जाते हैं। पूर्वजों के नाम पर नगर, मुहल्ले, संस्थाएं, मकान, कुएं, तालाब, मंदिर, मीनार आदि बनाकर उनके नाम तथा यश को चिरस्थायी रखने का प्रयत्न किया जाता है। उनकी स्मृति में पर्वों एवं जयंतियों का आयोजन किया जाता है। यह अपने-अपने ढंग के श्राद्ध ही हैं।
'क्या फायदा?' वाला तर्क केवल हिन्दू श्राद्ध पर ही नहीं, समस्त संसार की मानव प्रवृत्ति पर लागू होता है। असल बात यह है कि प्रेम, उपकार, आत्मीयता एवं महानता के लिए मनुष्य स्वभावत: कृतज्ञ होता है और जब तक उस कृतज्ञता के प्रकट करने का प्रत्युपकारस्वरूप कुछ प्रदर्शन न कर ले, तब तक उसे आंतरिक बेचैनी रहती है, इस बेचैनी को वह श्राद्ध द्वारा ही पूरी करता है।
उपकारी के प्रति कृतज्ञता का प्रत्युपकार का भाव रखना भावना क्षेत्र की पवित्रता एवं उत्कृष्टता का प्राणवान चिन्ह है। इसके लिए धनदान आवश्यक नहीं, समय, धन, श्रमदान, भाव दान भी असमर्थता की स्थिति में इसी प्रयोजन की पूर्ति करते हैं। उन्हीं सब बातों पर विचार करते हुए भारतीय धर्म-परंपरा में श्राद्ध-कर्म की महत्ता बताई गई है। सत्पात्र न मिलने या अपनी आर्थिक स्थिति अच्छी न होने की स्थिति में इसे जलांजलि देकर तर्पण के रूप में भी संपन्न किया जा सकता है।
यह सोचना उचित नहीं कि जो मर गए, उन तक हमारी दी हुई वस्तु कैसे पहुंचेगी? पहुंचती तो केवल श्रद्धा है। मरे हुए व्यक्तियों को श्राद्ध-कर्म से कुछ लाभ होता है कि नहीं? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि- 'होता है, अवश्य होता है।'
संसार एक समुद्र के समान है जिसमें जल कणों की भांति हर एक जीव है। विश्व एक शिला है तो व्यक्ति उसका एक परमाणु। हर एक आत्मा, जो जीवित या मृत रूप से इस विश्व में मौजूद है, अन्य समस्त आत्माओं से संबद्ध है। संसार में कहीं भी अनीति, युद्ध, कष्ट, अनाचार, अत्याचार हो रहे हैं तो सुदूर देशों के निवासियों के मन में भी उद्वेग उत्पन्न होता है।
जब जाड़े का प्रवाह आता है, तो हर चीज ठंडी होने लगती है और गर्मी की ऋतु में हर चीज की ऊष्णता बढ़ जाती है। छोटा-सा यज्ञ करने से उसकी दिव्य गंध तथा दिव्य भावना समस्त संसार के प्राणियों को लाभ पहुंचाती है। इसी प्रकार कृतज्ञता की भावना प्रकट करने के लिए किया हुआ श्राद्ध समस्त प्राणियों में शांतिमयी सद्भावना की लहरें पहुंचाता है। ये सूक्ष्म भाव तरंगें सुगंधित पुष्पों की सुगंध की तरह तृप्तिकारक आनंद और उल्लासवर्धक होती हैं।
सद्भावना की सुगंध जीवित और मृतक सभी को तृप्त करती है। इन सभी में अपने स्वर्गीय पितर भी आ जाते हैं। उन्हें भी श्राद्ध यज्ञ की दिव्य तरंगें आत्मशांति प्रदान करती हैं।
जिन्होंने अपने साथ में किसी भी प्रकार की कोई भलाई की है उसे बार-बार प्रकट करना चाहिए, क्योंकि इससे उपकार करने वालों को संतोष तथा प्रोत्साहन प्राप्त होता है। वे अपने ऊपर अधिक प्रेम करते हैं और अधिक घनिष्ठ बनते हैं, साथ-साथ अहसान स्वीकार करने से अपनी नम्रता एवं मधुरता बढ़ती है। उपकारों का बदला चुकाने के लिए किसी न किसी रूप में सदा ही प्रयत्न करते रहना चाहिए।
'पितरों का उद्देश्य करके (उनके कल्याण के लिए) श्रद्धापूर्वक किसी वस्तु का या उससे संबंधित किसी द्रव्य का त्याग श्राद्ध है।'
उचित समय पर शास्त्रसम्मत विधि द्वारा पितरों के लिए श्रद्धाभाव से मंत्रों के साथ जो दान-दक्षिणा आदि दिया जाए, वही श्राद्ध कहलाता है। २० अंश रेतस (सोम) को 'पितृॠण' कहते हैं। २८ अंश रेतस के रूप में 'श्रद्धा' नामक मार्ग से भेजे जाने वाले 'पिंड' तथा 'जल' आदि के दान को 'श्राद्ध' कहते हैं।
मनुष्य के ३ पूर्वजों यथा- पिता, पितामह एवं प्रपितामह क्रम से पितृदेवों अर्थात वसुओं, रुद्रों एवं आदित्य के समान हैं और श्राद्ध करते समय उनको पूर्वजों का प्रतिनिधि मानना चाहिए।
कुछ लोगों के मत से श्राद्ध से इन बातों का निर्देश होता है- होम, पिंडदान एवं ब्राह्मण तर्पण (ब्राह्मण संतुष्टि भोजन आदि से), किंतु 'श्राद्ध' शब्द का प्रयोग इन तीनों के साथ गौण अर्थ में उपयुक्त समझा जा सकता है।
पितरों के लिए कृष्ण पक्ष उत्तम होता है। कृष्ण पक्ष की अष्टमी को उनके दिनों का उदय होता है। अमावस्या उनका मध्याह्न है तथा शुक्ल पक्ष की अष्टमी अंतिम दिन होता है। धार्मिक मान्यता है कि अमावस्या को किया गया श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान उन्हें संतुष्टि व ऊर्जा प्रदान करते हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पृथ्वीलोक में देवता उत्तर गोल में विचरण करते हैं और दक्षिण गोल भाद्रपद मास की पूर्णिमा को चन्द्रलोक के साथ-साथ पृथ्वी के नजदीक से गुजरता है। इस मास की प्रतीक्षा हमारे पूर्वज पूरे वर्षभर करते हैं। वे चन्द्रलोक के माध्यम से दक्षिण दिशा में अपनी मृत्यु तिथि पर अपने घर के दरवाजे पर पहुंच जाते है और वहां अपना सम्मान पाकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी नई पीढ़ी को आशीर्वाद देकर चले जाते हैं।
#तर्पण_क्यों..........?
जो पितृगण दिवंगत हो चुके हैं उनके लिए तर्पण श्राद्ध का विधान है। श्रद्धांजलि पूजा-उपचार का सरलतम प्रयोग है। अन्य उपचारों में वस्तुओं की जरूरत पड़ती है तथा वे कभी उपलब्ध होती हैं, कभी नहीं। किंतु जल ऐसी वस्तु है जिसे हम दैनिक जीवन में अनिवार्यत: प्रयोग करते हैं।
वह सर्वत्र सुविधापूर्वक मिल भी जाता है इसलिए पुष्पांजलि आदि श्रमसाध्य श्रद्धांजलियों में जलांजलि को सर्वसुलभ माना गया है। उसके प्रयोग में आलस्य और अश्रद्धा के अतिरिक्त और कोई व्यवधान नहीं हो सकता इसलिए सूर्य नारायण को अर्घ्य, तुलसी वृक्ष में जलदान, अतिथियों को अर्घ्य तथा पितरगणों को तर्पण का विधान है।
प्रश्न यह नहीं कि इस पानी की उन्हें आवश्यकता है या नहीं? प्रश्न केवल अपनी अभिव्यक्ति-भर का है। उसे निर्धारित मंत्र बोलते हुए, गायत्री महामंत्र में अथवा बिना मंत्र के भी जलांजलि दी जा सकती है। यही है उनके प्रति पूजा-अर्चा का सुगमतम विधान। शास्त्रीय भाषा में इसे 'तर्पण' कहा जाता है। इसमें यह तर्क करने की गुंजाइश नहीं है कि यह पानी उन पूर्वजों या सूर्य तक पहुंचा या नहीं?
१. इसके पीछे अपनी कृतज्ञताभरी भावनाओं को सींचते रहने की अभिव्यक्ति की ही प्रमुखता है।
२. पितृऋण को चुकाने के लिए दूसरा कृत्य आता है- 'श्राद्ध'। श्राद्ध का प्रचलित रूप तो 'ब्राह्मण भोजन' मात्र रह गया है, पर बात ऐसी है नहीं। अपने साधनों का एक अंश पितृ प्रयोजनों के निमित्त ऐसे कार्यों में लगाया जाना चाहिए जिससे लोक-कल्याण का प्रयोजन भी सधता हो।
ऐसे श्राद्ध कृत्यों में समय की आवश्यकता को देखते हुए वृक्षारोपण ऐसा कार्य हो सकता है जिसे ब्रह्मभोज से भी कहीं अधिक महत्व का माना जा सके। किसी व्यक्ति को भोजन करा देने से उसकी एक समय की भूख बुझती है।
दूसरा समय आते ही फिर वह आवश्यकता जाग पड़ती है। उसे कोई दूसरा व्यक्ति कहां तक कब तक पूरा करता रहे। फिर यदि कोई व्यक्ति अपंग, मुसीबतग्रस्त या लोकसेवी नहीं है तो उसे मुफ्त में भोजन कराते रहने के पीछे किसी उच्च उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती।
३. वृक्ष वायुशोधन करते हैं। छाया देते हैं। फल-फूल भी मिलते हैं। हरे पत्ते पशुओं का भोजन बन सकते हैं। सूखे पत्तों से जमीन को खाद मिलती है। लकड़ी के अनेक उपयोग हैं। वृक्षों से बादल बरसते हैं। भूमि का कटाव रुकता है। पक्षी घोंसले बनाते हैं। उनकी छाया में मनुष्यों व पशुओं को विश्राम मिलता है। इस प्रकार वृक्षारोपण भी एक उपयोगी प्राणी के पोषण के समान है।
श्राद्ध रूप में ऐसे वृक्ष लगाए जाएं, जो किसी न किसी रूप में प्राणियों की आवश्यकता पूरी करते हों। अपने पास कृषियोग्य भूमि से थोड़ी भी जमीन बचती हो, कम उपयोगी हो तो उसमें आम, पीपल, महुआ आदि के वृक्ष लगा देने चाहिए। केवल सींचने, रखवाली करने आदि की जिम्मेदारी अपने कंधे पर लेकर दूसरों की जमीन में वृक्ष लगा देने में भी पुण्य फल की प्राप्ति हो सकती है।
४. वृक्षों की भांति ही जलाशयों के निर्माण का भी उपयोग है। तालाबों में हर साल वर्षा के पानी के साथ मिट्टी भर जाती है और उनकी सतह ऊंची हो जाने से कम पानी समाता है, जो जल्दी ही सूख जाता है। इन्हें यदि हर साल श्रमदान से गहरे करते रहा जाए तो पशुओं को पानी, सिंघाड़ा, कमल जैसी बेलें तथा तल में जमने वाली चिकनी मिट्टी से मकानों की मरम्मत हो सकती है।
#श्राद्ध पक्षकीवर्तमान में प्रासंगिकता?
हम लोग हमेशा बदलाव चाहते हैं। हमारी सोच दशा व समय के साथ बदल जाती है, लेकिन कुछ वस्तुएं हमेशा प्रासंगिक होती हैं। पितृपक्ष हमारे परिवार से जुड़ी एक परंपरा है व अपनों को याद करने का एक अवसर है। जो हमसे जुड़े हैं या जुड़े थे, वो हम सबके लिए हमेशा प्रासंगिक होते हैं। श्राद्ध पक्ष के वर्तमान में प्रासंगिक होने के कई कारण हैं-
१. हमारा समाज अत्यंत भौतिकवादी होता जा रहा है। बगैर स्वार्थ के कोई किसी की सहायता नहीं करना चाहता है। पितृपक्ष में अपने पूर्वजों के लिए जो भी दान या भोजन हम दूसरों को देते हैं, उससे समाज के गरीब एवं जरूरतमंदों की सहायता होती है तथा समाज में सहयोग एवं समन्वय की भावना जाग्रत होती है।
२. जो कभी हमारे परिवार का हिस्सा रहे हैं जिनका खून हमारी रगों में दौड़ रहा है, कम से कम एक पखवाड़ा हम उन्हें याद करते हैं। इस बहाने हम अपने पूर्वजों को याद करके अपने परिवार, समाज एवं धर्म में अपनी आस्था व्यक्त करते हैं।
३. हमारे पूर्वज एवं बुजुर्ग हमारी धरोहर हैं। वर्तमान में बुजुर्ग समाज की मुख्य धारा से कटते जा रहे हैं। इस एक पखवाड़े में हम सभी उनके प्रति सम्मान एवं सद्भाव व्यक्त करते हैं।
४. परंपराओं से समाज एवं परिवार में एकनिष्ठा पनपती है। पितृपक्ष को मनाने से हमारी नई पीढ़ी में सांस्कृतिक सोच के साथ बुजुर्गों के सम्मान की भावना का जागरण होता है। श्राद्ध से श्रद्धा जीवित रहती है। श्रद्धा को प्रकट करने का जो प्रदर्शन होता है, वह 'श्राद्ध' कहा जाता है।
जीवित पितरों व गुरुजनों के लिए श्रद्धा प्रकट करने व श्रद्धा करने के लिए उनकी अनेक प्रकार से सेवा, पूजा तथा संतुष्टि की जा सकती है, परंतु स्वर्गीय पितरों के लिए श्रद्धा प्रकट करने व अपनी कृतज्ञता को प्रकट करने का कोई निमित्त निर्माण करना पड़ता है। यह निमित्त श्राद्ध है। स्वर्गीय गुरुजनों के कार्यों, उपकारों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने से ही छुटकारा नहीं मिल जाता।
हम अपने अवतारों, देवताओं, ऋषियों, महापुरुषों और पूजनीय पूर्वजों की जयंतियां धूमधाम से मनाते हैं, उनके गुणों का वर्णन करते हैं, उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनके चरित्रों एवं विचारों से प्रेरणा ग्रहण करते हैं।
यदि कहा जाए कि मृत व्यक्तियों ने तो दूसरी जगह जन्म ले लिया होगा तो उनकी जयंतियां मनाने से क्या लाभ? तो यह तर्क बहुत अविवेकपूर्ण होगा। श्राद्ध और तर्पण का मूल आधार अपनी कृतज्ञता और आत्मीयता व सात्विक वृत्तियों को जागृत रखना है। इन प्रवृत्तियों का जीवित, जागृत रहना संसार की सुख-शांति के लिए नितांत आवश्यक है।
इसलिए मैं आपसे आग्रह करता हूं कि आप उपरोक्त कारणों में से कम से कम एक के लिए पितृ पक्ष को जरूर मानें। इससे आप और आपके परिवार को और अधिक शांति और खुशी पाने में लिए मदद मिलेगी।
अब सवाल यह है कि आप इन दिनों के महत्व को जानते हैं तो यह सुनिश्चित करें कि आप इस वर्ष पितृपक्ष में पितरों की पूजा करेंगे और अपने पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त करेंगे। यह आशीर्वाद निश्चित रूप से आपके जीवन को प्रभावशाली एवं सुखमय बना देगा।
◆धर्म ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध के सोलह दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं। ऐसी मान्यता है कि पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा चुकाया जाता है।
वर्ष के किसी भी मास तथा तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों के लिए पितृपक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है।पूर्णिमा पर देहांत होने से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को श्राद्ध करने का विधान है।
इसी दिन से महालय (श्राद्ध) का प्रारंभ भी माना जाता है। श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए। पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितृगण वर्षभर तक प्रसन्न रहते हैं। धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि पितरों का पिण्ड दान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्य आदि की प्राप्ति करता है।
श्राद्ध में पितरों को आशा रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिण्ड दान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे। इसी आशा के साथ वे पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं। यही कारण है कि हिंदू धर्म शास्त्रों में प्रत्येक हिंदू गृहस्थ को पितृपक्ष में श्राद्ध अवश्य रूप से करने के लिए कहा गया है।
श्राद्ध से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं। मगर ये बातें श्राद्ध करने से पूर्व जान लेना बहुत जरूरी है क्योंकि कई बार विधिपूर्वक श्राद्ध न करने से पितृ श्राप भी दे देते हैं। आज हम आपको श्राद्ध से जुड़ी कुछ विशेष बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं-
१- श्राद्धकर्म में गाय का घी, दूध या दही काम में लेना चाहिए। यह ध्यान रखें कि गाय को बच्चा हुए दस दिन से अधिक हो चुके हैं। दस दिन के अंदर बछड़े को जन्म देने वाली गाय के दूध का उपयोग श्राद्ध कर्म में नहीं करना चाहिए।
२- श्राद्ध में चांदी के बर्तनों का उपयोग व दान पुण्यदायक तो है ही राक्षसों का नाश करने वाला भी माना गया है। पितरों के लिए चांदी के बर्तन में सिर्फ