25/11/2025
सनातन में 16 संस्कार होते है , किंतु इसमें केवल कर्ण भेदन संस्कार की बात, ये विज्ञान इतना गहन है जिसको भारत के ऋषियों ने सहस्त्र वर्ष पहले जान लिया था।
कुंडली और हथेली का विश्लेषण करवाने के लिए संपर्क 9120101561 नेहा मिश्रा
गोरखनाथ जी के नाथ संप्रदाय में कनफटा योगी बहुत प्रसिद्ध हैं। आपने भी “कनफटा” शब्द सुना होगा , कान में छेद करने के पीछे बहुत गहरा विज्ञान है और इसमें कई ऐसे रहस्य छिपे हुए हैं, जिन्हें शायद आपने आज से पहले कभी नहीं सुना होगा।
जिसको साइटिका का तेज दर्द होता है कई बार डॉक्टर उनको उनके कान में हेलिक्स के पास एक छोटा-सा छेद करने को कहते है और आश्चर्यजनक रूप से वह दर्द अगले ही दिन पूरी तरह खत्म हो जाता है क्या डॉक्टर को नसों का एक अलग तरह का ज्ञान था, जो उन्होंने किसी मेडिकल किताब में नहीं पढ़ा था।
लेकिन उससे पहले आपको 1950 में फ्रांस के डॉक्टर पॉल नोजियर (Paul Nogier) की कही एक अनोखी बात।
उन्होंने पाया कि मानव कान का आकार उल्टे भ्रूण (गर्भस्थ शिशु) जैसा होता है – जैसे गर्भ में बच्चा सिर नीचे करके मुड़ा हुआ बैठा हो। इसी आधार पर उन्होंने एक पूरा सिस्टम विकसित किया, जिसे आज “ऑरिकुलर एक्यूपंक्चर” या “इयर रिफ्लेक्सोलॉजी” कहा जाता है।
इस प्रक्रिया की नींव इस विचार पर टिकी है कि कान पूरे शरीर का एक छोटा-सा माइक्रोकोस्म (लघु जगत) है। कान के अलग-अलग हिस्सों के बिंदु सीधे शरीर के विभिन्न अंगों, नाड़ियों और ऊर्जा मार्गों से जुड़े हुए हैं। इसका मतलब यह है कि कान में हल्की-सी उत्तेजना या दबाव डालने से असर सिर्फ कान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरे शरीर की नर्वस सिस्टम और ऊर्जा प्रवाह को प्रभावित कर सकता है।
डॉक्टर नोजियर से भी बहुत पहले आयुर्वेद और नाथ संप्रदाय ने इस ज्ञान को जाना और इस्तेमाल किया था।
आयुर्वेद कहता है कि कान का विशेष संबंध वायु और आकाश – इन दो पंचमहाभूतों से है। आकाश यानी स्पेस (खाली स्थान), जहाँ से ध्वनि गुजरती है, और वायु यानी वह गति जो ध्वनि को ग्रहण करती है। इसलिए कान केवल सुनने का यंत्र नहीं है, बल्कि हमारी सात्विकता, संतुलन और मानसिक जागरूकता का प्रमुख केंद्र है।
जब वात दोष असंतुलित हो जाता है, तो कान में बजना, टिनिटस या हल्की हलचल महसूस होती है। पित्त दोष बढ़ जाए तो कान में दर्द, जलन या गर्मी महसूस होती है। कफ दोष ज्यादा हो जाए तो कान में भारीपन, बंद होने का अहसास या सुनने की शक्ति कम हो सकती है।
सुश्रुत संहिता में कर्ण (कान) को केवल श्रवणेंद्रिय नहीं, बल्कि पूरे शरीर और मन के संतुलन का एक मुख्य केंद्र माना गया है। कान में सैकड़ों नाड़ियाँ और रक्तवाहिनियाँ जुड़ी होती हैं, जिनका सीधा संबंध हमारे मस्तिष्क, मानसिक स्वास्थ्य और संतुलन प्रणाली (vestibular system) से है। सुश्रुत संहिता में तो कर्ण की शल्य चिकित्सा (ear surgery) तक का विस्तृत उल्लेख है।
प्राचीन वैद्य जानते थे कि कान में चोट, सूजन या कोई रोग होने पर सिर्फ स्थानीय उपचार काफी नहीं है; वे कान के विभिन्न हिस्सों का निरीक्षण करके पूरे शरीर का निदान करते थे, क्योंकि वे भली भाँति जानते थे कि कान के अंदर की कोई गड़बड़ी मस्तिष्क तक असर डाल सकती है और पूरा तंत्रिका तंत्र प्रभावित हो सकता है।
यही बात पारंपरिक चीनी चिकित्सा (TCM) और आधुनिक ऑरिकुलर एक्यूपंक्चर में भी मिलती है। चीनी चिकित्सा में भी कान को “शरीर का माइक्रो-सिस्टम” माना गया है और वहाँ किडनी मेरिडियन का सीधा संबंध कान से जोड़ा जाता है (किडनी हमारे अनुसार वायु-आकाश तत्व को ही नियंत्रित करती है)।
समझ गए होंगे कि नाथ संप्रदाय के कनफटा योगी क्यों अपने कान में बड़े-बड़े मुद्गर (कुंडल) डालकर इतने लंबे समय तक साधना करते थे। वह सिर्फ पहचान या दिखावा नहीं था। – वह एक गहरा वैज्ञानिक और आध्यात्मिक अभ्यास था, जिससे वे अपनी वायु और आकाश तत्व की ऊर्जा को जागृत कर सहस्रार तक ले जाते थे।
ताओइस्ट ध्यान पद्धतियों में कानों को ऊर्जा के प्रमुख केंद्र के रूप में देखा जाता है। इनका उपयोग आंतरिक जागरूकता बढ़ाने और ची ऊर्जा (जिसे हम प्राण ऊर्जा भी कहते हैं) के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है।
उदाहरण के लिए, जुआंग-त्ज़ू और बायचेन की ताओइस्ट योग पद्धति में कानों तथा बाकी इन्द्रियों को पूरी तरह खाली-शांत मन की अवस्था में लाकर ध्यान को एकाग्र करने की प्रक्रिया शामिल है। ताओइस्ट (Taoist Alchemists) इसे सूक्ष्म ऊर्जा का द्वार या जीवन ऊर्जा का चैनल मानते हैं और कान के माध्यम से ऊर्जा को संतुलित करने, तनाव कम करने और आयु बढ़ाने का अभ्यास करते हैं।
अब चलते हैं प्राचीन मिस्र की पवित्र भूमि पर, जहाँ हर प्रतीक में गहरा रहस्य छिपा था। भारत की तरह वहाँ के लोग भी मानते थे कि शरीर का हर हिस्सा नेटेरू (दैवीय शक्तियों) से जुड़ा हुआ है। बहुत से पुजारी और अपने कानों में बड़े-बड़े सोने के आभूषण पहनते थे। साधारण नजर में यह सिर्फ सजावट लगती थी, लेकिन जानकारों के लिए यह स्पिरिचुअल रिसेप्टिविटी (आध्यात्मिक ग्रहणशीलता) का प्रतीक था – यानी दैवीय तरंगों और प्रकाश को ग्रहण करने की क्षमता।
उनके अनुसार कान के लोब “रा की लाइट” सुनने वाले द्वार थे – वह जगह जहाँ से चेतना सूर्य की दैवीय ऊर्जा को आत्मसात करती थी। मिस्र की ममी में भी कान छिदवाने के स्पष्ट निशान मिले हैं।
माया और एज़टेक सभ्यताओं में भी कान छिदवाना एक गहरी आध्यात्मिक और धार्मिक मान्यता का हिस्सा था। यह प्रथा व्यक्ति को देवताओं से जोड़ती थी, आत्मा के पुनर्जन्म और दैवीय ऊर्जा के प्रवाह का प्रतीक मानी जाती थी।
माया संस्कृति में इत्ज़ामना सबसे प्रमुख देवता हैं, जिन्हें सृष्टि, ज्ञान और आकाश का स्वामी माना जाता है। उनकी मूर्तियों और चित्रों में अक्सर कानों में बड़े आभूषण या सर्प के प्रतीक दिखाई देते हैं। ये साँप ऊर्जा और चेतना के प्रतीक थे। माया धर्मशास्त्रियों तथा पांडुलिपियों के अनुसार यह “सर्पेण्ट ऑफ़ एनर्जी” या दैवीय कुंडलिनी ऊर्जा को दर्शाता है, जो शरीर के अंदर उठती है और नाद, कंपन या ऊर्जा प्रवाह के रूप में प्रकट होती है।
तो देखा आपने – मिस्र, भारत, चीन, माया, एज़टेक… दुनिया की हर प्राचीन महान सभ्यता में कान छिदवाने और उसमें भारी आभूषण पहनने की परंपरा एक ही गहरे रहस्य की ओर इशारा करती है: कान सिर्फ सुनने का अंग नहीं, बल्कि दैवीय ऊर्जा और चेतना का प्रवेश द्वार है।
यही कारण है कि गोरखनाथ जी के नाथ योगी आज भी कनफटे कहलाते हैं और बड़े-बड़े मुद्गर (दारुण कुंडल) पहनकर साधना करते हैं। यह कोई फैशन नहीं, बल्कि हजारों साल पुराना जीवंत विज्ञान और आध्यात्म है।
आध्यात्मिक दृष्टि से कान को “श्रवण” और “चेतना का द्वार” माना गया है। कान वह माध्यम है जिसके जरिए मनुष्य केवल शब्द ही नहीं, बल्कि ज्ञान, अनुभव और दैवीय तरंगें भी ग्रहण करता है। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में कर्णवेध संस्कार को 16 संस्कारों में से एक पवित्र संस्कार का दर्जा दिया गया है।
यह केवल सौंदर्य या गहने पहनने के लिए नहीं होता, बल्कि ज्ञान-प्राप्ति, मानसिक विकास और सूक्ष्म ऊर्जा के प्रवाह को सही दिशा देने का प्रतीक है। बच्चे के कान में छेद इसलिए किया जाता है ताकि उसकी प्राण-ऊर्जा सुचारु रूप से बहने लगे, रोग कम हों और मस्तिष्क नई उच्च तरंगों को ग्रहण करने के लिए हमेशा तैयार रहे।
दुर्भाग्य से आज ये गहरे अर्थ खो गए हैं, क्योंकि पूरा विधि-विधान और मंत्रों सहित प्रक्रिया अब बहुत कम लोग करते हैं।
सबसे रहस्यमयी और रोचक बात – पीनियल ग्लैंड।
डॉक्टर पॉल नोजियर ने जिस तरह कान के आकार को उल्टे भ्रूण जैसा बताया था, उसके अनुसार कान का लोब (ear lobe) ठीक मस्तिष्क के स्थान पर आता है। और कर्णवेध संस्कार भी सबसे पहले लोब में ही किया जाता है।
कई प्राचीन सभ्यताओं और योगियों ने कान छिदवाने को सीधे-सीधे पीनियल ग्लैंड (तीसरी आँख) और आज्ञा चक्र पर प्रभाव डालने से जोड़ा है।
शारीरिक स्तर पर कान के लोब से पीनियल ग्लैंड तक कोई सीधी नस या तंत्रिका नहीं जाती, लेकिन सूक्ष्म शरीर (subtle body) के स्तर पर इसका गहरा संबंध अनुभव किया गया है।
जैसे योग और एक्यूपंक्चर में मेरिडियन या नाड़ियाँ होती हैं, उसी तरह कान के कुछ विशेष बिंदुओं की उत्तेजना मस्तिष्क के मध्य भाग को प्रभावित करती है – ठीक वहीं जहाँ पीनियल ग्लैंड स्थित है।
सबसे दिलचस्प बात: वैगस नर्व स्टिमुलेशन (vagus nerve stimulation) के आधुनिक अध्ययनों में पाया गया है कि कान के लोब और कुछ खास बिंदुओं पर उत्तेजना देने से मेलाटोनिन और सेरोटोनिन जैसे हार्मोन पर सीधा असर पड़ता है – और ये दोनों हार्मोन पीनियल ग्लैंड से ही निकलते हैं।
इसलिए कान के लोब पर दी गई उत्तेजना (चाहे सुई से, दबाव से या भारी कुंडल के निरंतर दबाव से) अप्रत्यक्ष रूप से पीनियल ग्लैंड की सक्रियता, हार्मोनल संतुलन और सूक्ष्म ऊर्जा प्रवाह को जागृत करती है।
यही कारण है कि नाथ योगी और सिद्ध पुरुष भारी-भारी दारुण-कुंडल (मुद्गर) डालकर सालों-साल साधना करते थे – ताकि पीनियल ग्लैंड लगातार सक्रिय रहे, डीएमटी जैसी आंतरिक रसायन स्वाभाविक रूप से स्रावित हों और सहस्रार तक की यात्रा सरल हो जाए।
नाथ योग और आयुर्वेद दोनों में कान के लोब को एक अति महत्वपूर्ण मर्म बिंदु कहा गया है – ऐसा स्थान जहाँ शरीर की सारी ऊर्जा सबसे सघन रूप में मिलती है। इसे “शिरोमर्म” क्षेत्र से भी जोड़ा गया है, यानी मस्तिष्क और चेतना का क्षेत्र।
कई तांत्रिक परंपराओं में कान छिदवाना “द्वार खोलने” का प्रतीक है – ऊर्जा के प्रवाह का नियंत्रण और सूक्ष्म जगत के द्वार का उद्घाटन।
और यही कारण है कि नाथ योगियों को “कनफटा” कहा गया।
कनफटा = कर्ण + फट = जिसने श्रवण द्वार को फाड़ दिया।
यानी वह अब बाहरी ध्वनियों से परे, भीतर के अनाहत नाद – उस इनर साउंड को सुन सकता है, जो सृष्टि के मूल में अनवरत गूंज रहा है।
अगर हम इसे आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दोनों नजरिए से एक साथ देखें तो बात बहुत साफ हो जाती है।
हम सबके कान के लोब पर वह छोटा-सा हिस्सा, जिसे आज ज्यादातर लोग सिर्फ सजावट के लिए छिदवाते हैं, वास्तव में शरीर और चेतना के बीच का सबसे गहरा पुल है।
न्यूरोफिजियोलॉजी की भाषा में कहें तो कान का लोब और उसके आसपास के बिंदु सीधे इन चार प्रमुख नसों से जुड़े होते हैं
ऑरिकुलर ब्रांच ऑफ वैगस नर्व
ग्रेट ऑरिकुलर नर्व
ऑरिकुलोटेम्पोरल नर्व और
ट्राइजेमिनल नर्व की कुछ शाखाएँ
यानी ये बिंदु बाहर के नहीं, पूरे तंत्रिका तंत्र के सबसे संवेदनशील हिस्सों से जुड़े होते हैं।
और सबसे खास बात: जब इन बिंदुओं को हल्का-सा भी उत्तेजित किया जाता है (जैसे वैगस नर्व स्टिमुलेशन में होता है), तो मस्तिष्क में पैरासिम्पेथेटिक सिस्टम तुरंत एक्टिवेट हो जाता है।
नतीजा?
• हार्ट रेट कम होता है।
• तनाव और कॉर्टिसॉल लेवल गिरता है।
• गहरी मानसिक शांति आती है।
• नींद बेहतर होती है।
• इम्यून सिस्टम मजबूत होता है।
यानी सिर्फ कान के लोब पर एक हल्का-सा दबाव या छेद पूरे शरीर के तंत्रिका तंत्र को रीसेट कर सकता है।
पर यह कान की रहस्यमयी शक्ति यहीं खत्म नहीं होती। अब उस सबसे शक्तिशाली बिंदु;
कान के ऊपरी हिस्से में, ठीक इस गड्ढे में (जिसे एंटी-हेलिक्स के अंदर ट्राएंगुलर फोसा कहते हैं), एक अति महत्वपूर्ण बिंदु होता है, जिसे चीनी एक्यूपंक्चर में “शेन मेन” (Shen Men) कहते हैं। इसका शाब्दिक अर्थ है – “आत्मा का द्वार” या “Spirit Gate”।
पारंपरिक चीनी चिकित्सा में शेन मेन को सबसे शक्तिशाली मास्टर पॉइंट माना जाता है। इसका सीधा संबंध मानसिक शांति, ऊर्जा संतुलन, तनाव मुक्ति और पूरे तंत्रिका तंत्र की स्थिरता से है।
“शेन” = आत्मा / चेतना
“मेन” = द्वार
यानी वह जगह जहाँ से सचमुच आत्मा का दरवाजा खुलता है।
जब इस बिंदु को हल्की सुई, दबाव, मालिश या यहाँ तक कि सिर्फ गहरे कुंडल के निरंतर दबाव से उत्तेजित किया जाता है, तो यह तुरंत पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम को सक्रिय कर देता है।
परिणाम?
शरीर तुरंत “रेस्ट एंड डाइजेस्ट” मोड में चला जाता है।
हार्ट रेट धीमा हो जाता है।
तनाव, चिंता, एंग्जायटी और यहाँ तक कि एडिक्शन में भी अद्भुत कमी आती है।
नींद गहरी और शांत होती है।
ध्यान में बैठते ही दिमाग की तरंगें तुरंत अल्फा और थीटा स्टेट में चली जाती हैं।
इसीलिए शेन मेन पॉइंट को WHO की ऑफिशियल ऑरिकुलर एक्यूपंक्चर स्टैंडर्ड लिस्ट में भी शामिल किया गया है।
लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से यह कहीं ज्यादा गहरा जाता है।
कई सिद्ध साधक और नाथ योगी इस बिंदु को “अनाहत नाद” सुनने की कुंजी मानते हैं। उनका अनुभव है कि शेन मेन को लगातार सक्रिय रखने से चेतना और आत्मा के बीच की सूक्ष्म दीवार पतली पड़ने लगती है, और व्यक्ति भीतर की उस दिव्य ध्वनि से सीधा जुड़ने लगता है, जिसे वेदों में “अनहद नाद” कान के अंदर लगभग 200 से ज्यादा एक्टिव नर्व एंडिंग्स होती हैं, जो सीधे मस्तिष्क के सबसे प्राचीन और गहरे हिस्सों से जुड़ी होती हैं। यही कारण है कि जब कोई सूक्ष्म ध्वनि या कंपन कान से गुजरता है, तो वह सिर्फ सुनाई नहीं देता, बल्कि पूरे शरीर और चेतना में एक गहरी तरंग पैदा कर देता है।
नाथ योगी जानते थे कि अगर शेन मेन और उसके आसपास के बिंदुओं पर भारी मुद्गर (दारुण कुंडल) का स्थायी दबाव रहे, तो यह आत्मा का द्वार हमेशा खुला रहता है। यही कारण है कि वे सालों-साल भारी-भारी कुंडल डालकर रहते थे, ताकि यह द्वार कभी बंद न हो।
जब आप अपने कान को छुएँ, तो सिर्फ मांस का टुकड़ा नहीं है बल्कि वहाँ सचमुच एक जीवंत द्वार है, भीतर सोई हुई दिव्यता का दरवाजा।
Spiritual researcher नेहा मिश्रा
Mo 091201 01561