05/06/2021
#सावधानी_बरतें_फायदे_मे_रहेंगे !
प्रिय किसान भाईयों #थनैला_mustitis रोग दुग्ध व्यवसाय के लिये सबसे बड़ा संकट है। भारतवर्ष में 60 प्रतिशत गाये, भैंसे एवं अन्य पशु इस रोग से पीडि़त है इसके कारण दुग्ध उत्पादकों को कई हजार करोड़ रुपये का नुकसान इस बीमारी के कारण होता है। थनैला रोग कई प्रकार के जीवाणु संक्रमण के कारण फैलता है। दुधारू पशुओं के लिये थनैला काफी खतरनाक बीमारी है। यह छूआछूत से तेजी से फैलता है। नर या बांझ पशु इसके शिकार नहीं होते। रोग की चपेट में आने पर पशुओं को असहनीय पीड़ा का सामना करना है। साथ ही उनका दूध भी कम हो जाता है। कभी-कभी पशु दूध छोड़ देते हैं। सावधानी बरत कर पशुपालक अपने दुधारू पशुओं को काफी हद तक इस रोग से बचा सकते हैं।
पशुधन वैज्ञानिक लालचन्द वर्मा के मुताबिक यह रोग कई प्रकार के जीवाणुओं से उत्पन्न होता है। इसीलिए इसको मस्टाइटिस कामप्लैक्स भी कहा जाता है। उन्होंने बताया कि पीड़ित पशु के सूजे हुए अयन पर आयोडिन मरहम अथवा आयोडेक्स लगाना चाहिये। गर्म पानी में मैगसल्फ, बोरिक एसिड तथा नीम की पत्ती डालकर सेंका जा सकता है। थन में सड़न होने पर 100 ग्राम नेनुआ की पत्ती को 250 मिली पानी के साथ पीसें इसे प्रभावित भाग पर लगाकर सूती कपड़े से बांध दें।
चलिए इस #थनैला_mustitis नामक समस्या को थोड़ा विस्तार से जानते हैं:-
#थनैला रोग का कारण :
1.संक्रामक रोगाणु: –इस रोग का प्रमुख कारण जीवाणु है। इन जीवाणुओं को कई ग्रुप में विभाजित किया जा सकता है।
*स्टेप्टोकोकस की जातियां एवं माइकोप्लाजमा की जातियां प्रमुख संक्रामक जीवाणु थनैला रोग के कारण होते हैं।
*पर्यावरण रोगाणु-स्टेप्टोकोकस डिशप्लैस्टीज, स्टैप्टोकोकस यूबेरिश, कोलीफार्म जीवाणु आदि।मुख्य रूप से स्ट्रैप्टोकोकस, स्टेफाइलोकस, कोर्नीबैक्टिरियम, ईकोलाई आदि जीवाणु इस रोग को उत्पन्न करते हैं।
2.अन्य कारक :-
* रोग फैलने के प्रमुख कारण साफ सफाई का अच्छी तरह से न होना होता है। रोग का संचरण दूषित त्वचा पर यह जीवाणु थन की नलिका से प्रवेश कर रोग उत्पन्न करते हैं।
* रोग का संचरण एक पशु से दूसरे पशु मेंं संक्रमित ग्वाले के हाथों के कारण फैलता है। इसलिये सबसे महत्वपूर्ण यह है कि एक पशु का दूध निकालने के बाद हाथों को अच्छी तरह साफ करके दूसरे पशु का दूध निकालना चाहिये। इससे रोग फैलने का प्रतिशत सबसे कम होता है।
* रोग के कुछ अन्य कारण भी हैं जैसे :-
अयन या थन में चोट
पशुशाला में कुप्रबन्धन
गीला तथा गंदा फर्श,मक्खियों की अधिकता आहार में प्रोटीन की अतिरिक्त मात्रा एवं दूध निकालने का गलत तरीका
जीवाणु, थन में चोट, रगड़ एवं पशु के गंदे या भीगे फर्श पर बैठने के कारण अयन में प्रवेश कर जाते हैं।
पशु दुहने की मशीन, पशु दुहने वाले के गंदे हाथ! खून चूसने वाली मक्खियां रोग के प्रसार में सहायक बनती हैं।
थन की स्थिति जो कि क्षति एवं ट्रामा से उत्पन्न कारण!
थन पर गोबर एवं यूरिन कीचड़ का संक्रमण होने पर!
पूरी तरह थन ग्रंथियों से दूध का न निकलना।
गाय की उम्र या आनुवांशिक कारक।
थन नलिका में असमान्यताएं।
#थनैला फैलने की अवस्था :-
* थनैला रोग फैलने के तीन अवस्था प्रमुख होती है, सबसे पहले रोगाणु थन में प्रवेश करते हैं। इसके बाद संक्रमण उत्पन्न करते हैं तथा बाद में सूजन पैदा करते है!
सबसे पहले जीवाणु बाहरी थन नलिका से अन्दर वाली थन नलिकाओं में प्रवेश करते हैं वहां अपनी संख्या बढ़ाते हैं तथा स्तन ऊतक कोशिकाओं को क्षति पहुंचाते हैं। थन ग्रंथियों में सूजन आ जाती है।
* प्राकृतिक सुरक्षात्मक प्रक्रिया
वैसे तो प्रकृति ने पशु के थन ऊतकों को सुरक्षात्मक प्रक्रिया दी है जो सामान्य स्थिति में रोग पैदा करने वाले जीवाणुओं को नष्ट कर देती है। प्रकृति ने थनों को प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक सुरक्षात्मक प्रक्रिया दी है।
प्राथमिक सुरक्षात्मक प्रक्रिया थन नलिकाओं द्वारा दी जाती है। थन नलिका प्राकृतिक सुरक्षात्मक प्रक्रिया के तहत हानिकारक जीवाणुओं को प्रवेश नहीं करने देती है।
द्वितीयक सुरक्षात्मक प्रक्रिया बी-लिम्फोसाइट एवं टी-लिम्फोसाइट के द्वारा दी जाती है। तृतीयक सुरक्षातमक प्रक्रिया सभी भक्षी कोशिकाओं एवं न्यूट्रोफिल के द्वारा दी जाती है।
#थनैला रोग के लक्षण :
इसके चपेट में आने पर पशु को बुखार रहता है। वह बेचैन रहता है, भूख नहीं लगती, अयन गर्म एवं लाल हो जाता है। थन में दूध कम आता है। दूध हल्का पीला हो जाता है। बाद में चलकर अयन शक्त हो जाता है दबाने पर दूध नहीं निकलता है।
#थनैला रोग के कारण आर्थिक हानियां
* थनैला से ग्रसित पशु के दूध में दैहिक सेल की संख्या बढ़ जाती है, नमक बढ़ जाता है। यह दूध मानव उपयोग के लिये अनुपयुक्त होता है।
*थनैला रोग होने के कारण पशु का दूध उत्पादन कम हो जाता है। ऐसा देखा गया हे कि थनैला से पीडि़त पशु का दूध उत्पादन 5 से 25 प्रतिशत तक कम हो जाता है।
*थनैला रोग से पीडि़त पशु के दूध का उपयोग नहीं करना चाहिये क्योंकि इसमें स्वतंत्र एन्टीबॉयोटिक एवं जीवाणुओं की संख्या सबसे अधिक होती है।
*उत्पादन जीवनकाल कम होना एवं प्रारंभिक कलिंग के कारण धन की हानि होती है। थनैला के कारण कई बार पशु के थन नलिका हमेशा के लिये पूर्ण रूप से बंद हो जाते है।
* इलाज की लागत बढऩा : थनैला रोग के कारण पशु के इलाज की लागत बढ़ती है जिसके कारण व्यवसायिक हानि होती है।
थनैला रोग की रोकथाम :
1. थनैला रोग की रोकथाम जरूरी है क्योंकि यह एक संक्रामक रोग है तथा एक पशु से दूसरे पशु में संचारित होता है।
2. आसपास के वातावरण की साफ-सफाई जरूरी है तथा जानवरों का आवास हवादार होना चाहिये।
3. फर्श सूखा एवं साफ होना चाहिये।
4. थनों की सफाई नियमित रूप से करना चाहिये।
5. एक पशु का दूध निकालने के बाद ग्वाले को अपने हाथ अच्छी तरह से धोना चाहिये।
6. थनों का समय-समय पर परीक्षण करते रहना चाहिये। उनमें कोई गठान एवं दूध में थक्के हो तो थनैला रोग के लक्षण होते है, तुरंत पशु चिकित्सक की सलाह लेना चाहिये।
निदान : वैसे तो थनैला रोग का निदान करना मुश्किल होता है। यदि सावधानीपूर्वक थन एवं दूध का क्लीनिकल परीक्षण किया जाये तो थनैला रोग की संभावित पहचान की जा सकती है।
साथ ही Halton minerals के मैमरी केयर का प्रारंभिक अवस्था मे प्रयोग करके भी थनैला से बचा जा सकता है।
9729348003