Dr.P.kumar MD Ayurved & Naturopath

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27/04/2018

मनुष्य का उत्सर्जन तंत्र किस तरह से कार्य करता है ।

किसी जीव के शरीर से विषाक्त अपशिष्ट (Toxic Wastes) को बाहर निकालने की प्रक्रिया उत्सर्जन (Excretion) कहलाती है। कार्बन डाईऑक्साइड और यूरिया मानव शरीर द्वारा उत्सर्जित किए जाने वाले प्रमुख अपशिष्ट है। कार्बन डाईऑक्साइड श्वसन की प्रक्रिया से पैदा होता है और यूरिया यकृत (लीवर) में अप्रयुक्त प्रोटीनों के अपघटन से बनता है। मानव शरीर से इन्हें बाहर निकालना अनिवार्य है, क्योंकि इनका मानव शरीर में संचित होना जहरीला होता है और ये उन्हें नुकसान पहुंचा सकते हैं। शरीर से अपशिष्ट बाहर निकालने के लिए अलग–अलग अंग होते हैं। ये अंग हैं–फेफड़े (lungs) और वृक्क (kidney)। हमारे फेफड़े (lungs) कार्बन डाईऑक्साइड का और वृक्क (kidney) यूरिया का उत्सर्जन करते हैं। इसलिए वृक्क (kidney) मानव शरीर का मुख्य उत्सर्जक अंग है|

सबसे पहले हम देखेंगे कि फेफड़ों से किस प्रकार कार्बन डाईऑक्साइड बाहर निकाला जाता है| श्वसन की प्रक्रिया के दौरान भोजन के ऑक्सीकरण द्वारा शरीर में अपशिष्ट पदार्थ के रूप में कार्बन डाईऑक्साइ बनता है। प्रसरण (Diffusion) के द्वारा यह कार्बन डाईऑक्साइड शरीर के ऊतकों में से रक्त प्रवाह में प्रवेश करता है। रक्त इस कार्बन डाईऑक्साइड को फेफड़ों में ले जाता है। जब हम सांस बाहर की तरफ छोड़ते हैं, तब फेफड़े कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन करते हैं जो नाक के माध्यम से वायु में मिल जाता है।

मनुष्यों का उत्सर्जन तंत्र शरीर के तरल अपशिष्टों को एकत्र करता है और उन्हें बाहर निकालने में मदद करता है। इसमें निम्नलिखित मुख्य अंग होते हैं– दो वृक्क (kidney), दो मूत्रवाहिनियां (Ureters), मूत्राशय (Bladder) और मूत्रमार्ग (Urethra)। वृक्क सेम के बीज के आकार वाले अंग हैं, जो मानव शरीर के पिछले भाग में कमर से थोड़ा ऊपर स्थित होते हैं। हर किसी मनुष्य में दो वृक्क होते हैं। हमारे वृक्कों में रक्त लगातार प्रवाहित होता रहता है। वृक्क की धमनी (Renal Artery Or Kidney Artery) वृक्क में अपशिष्ट पदार्थों से युक्त गंदा रक्त लाती है। इसलिए, वृक्क का काम विषैले पदार्थ, जैसे-यूरिया व कुछ अन्य अपशिष्ट लवणों और रक्त में मौजूद अतिरिक्त जल का पीले तरल, जिसे मूत्र कहा जाता है, के रूप में उनका उत्सर्जन करना है। वृक्क द्वारा साफ किए गए रक्त को वृक्क शिरा (Renal Vein Or Kidney Vein) ले कर जाती हैं।

प्रत्येक वृक्क से एक मूत्रवाहिनी मूत्राशय में खुलती है। मूत्रवाहिनियां वे नलियां होती हैं, जो मूत्र को वृक्क से मूत्राशय में लेकर जाती हैं। यहां मूत्र जमा होता है। मूत्राशय बड़ा होता है और हमारे शौचालय जाने तक मूत्र को जमा कर के रखता है। मूत्रमार्ग (Urethra) कहलाने वाली नली, जो मूत्राशय से जुड़ी होती है, से मूत्र मानव शरीर से बाहर निकलता है।

वृक्क और उसके कार्यों के बारे में :-

वृक्क की संरचना में दिखाया गया है कि प्रत्येक वृक्क अत्यधिक संख्या में उत्सर्जन इकाईयों, जिसे नेफ्रॉन कहते हैं, से बना होता है। नेफ्रॉन के ऊपरी हिस्से पर कप के आकार का थैला होता है, जिसे ‘बोमैन्स कैप्सूल’ (Bowman’s capsule) कहते हैं। बोमैन्स कैप्सूल के निचले हिस्से पर नली के आकार की छोटी नली (Tubule) होती है। ये दोनों मिलकर नेफ्रॉन बनाते हैं। नली का एक सिरा बोमैन्स कैप्सूल (Bowman’s capsule) से जुड़ा होता है और दूसरा वृक्क की मूत्र–एकत्र करने वाली संग्रहण नलिका से जुड़ा होता है। बोमैन्स कैप्सूल (Bowman’s capsule) में रक्त केशिका (Capillaries) का पुलिंदा होता है, इसे ‘ग्लोमेरुलस’ (Glomerulus) कहते हैं। ग्लोमेरुलस (Glomerulus) का एक सिरा वृक्क धमनी से जुड़ा होता है जो इसमें यूरिया अपशिष्ट युक्त गंदा रक्त लाता है और दूसरा सिरा यूरिया मुक्त रक्त के लिए वृक्क शिरा (Renal Vein) के साथ जुड़ा होता है।

ग्लोमेरुलस (Glomerulus) का काम उसमें से प्रवाहित वाले रक्त को साफ करना है। रक्त में उपस्थित ग्लूकोज, एमीनो एसिड, लवण, यूरिया और जल जैसे तत्वों के सिर्फ छोटे अणु ही इससे गुजर पाते हैं और बोमैंस कैप्सूल में साफ हो कर जमा हो जाते हैं। ग्लोमेरुलस (Glomerulus) केशिकाओं (Capillaries) से प्रोटीन और रक्त कोशिकाओं जैसे बड़े अणु नहीं गुजर पाते हैं और रक्त में ही रह जाते हैं। नेफ्रॉन की छोटी नली (Tubule) ग्लूकोज, एमिनो एसिड, लवण और जल जैसे चुनिंदा उपयोगी पदार्थों के रक्त कोशिकाओं में पुनः अवशोषण की अनुमति देता है। लेकिन, यूरिया छोटी नली (Tubule) में ही रह जाता है और रक्त केशिकाओं में पुनः अवशोषित नहीं हो पाता है।

उत्सर्जन तंत्र की कार्यप्रणाली

जैसा कि ऊपर चर्चा की गई है, यूरिया जैसे अपशिष्ट से युक्त गंदा रक्त ग्लोमेरुलस (Glomerulus) में प्रवेश करता है और यहां रक्त साफ होता है। निस्पंदन (Filtration) के दौरान रक्त में मौजूद ग्लूकोज, एमीनो एसिड, लवण, यूरिया और पानी आदि बोमैन्स कैप्सूल से गुजरता है और फिर नेफ्रॉन की छोटी नली (Tubule) में प्रवेश करता है। यहां उपयोगी पदार्थ छोटी नली (Tubule) के आस–पास वाली रक्त केशिकाओं के माध्यम से रक्त में पुनःअवशोषित हो जाते हैं। नेफ्रॉन की छोटी नली (Tubule) में रह गया तरल मूत्र है। नेफ्रॉन इस मूत्र को वृक्क की संग्रहण नलिका (Collecting Duct Of The Kidney) में ले जाता है, जहां से यह मूत्रनली में ले जाई जाती है और यहां से ही मूत्र मूत्राशय में जाता है। कुछ समय के बाद मूत्र मूत्रमार्ग से शरीर के बाहर निकाल दिया जाता है।

वृक्क का खराब होना (Kidney failure or Renal failure) क्याहै?

वृक्क में किसी प्रकार के संक्रमण, किसी प्रकार की चोट या वृक्क में रक्त का सीमित प्रवाह वृक्क को काम करने से रोक सकता है और उसे पूरी तरह से खराब कर सकता है तथा यूरिया एवं अन्य अपशिष्ट उत्पादों को रक्त में जाने से नहीं रोक पाता है। यहां तक की शरीर में जल की मात्रा भी नियंत्रित नहीं हो पाती। ऐसी स्थिति में अगर रोगी का उचित उपचार नहीं किया गया तो उसकी मौत भी हो सकती है। इसका सबसे अच्छा समाधान है-वृक्क का प्रत्यारोपण (Kidney Transplant)। इसमें क्षतिग्रस्त वृक्क को हटा दिया जाता है और किसी स्वस्थ व्यक्ति के वृक्क को शल्य चिकित्सा के माध्यम से प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। अगर ऐसा संभव न हो तो रोगी को नियमित अंतराल पर वृक्क मशीन पर रखा जाता है, जिसे डायलिसिस की प्रक्रिया कहते हैं। वृक्क मशीन को कृत्रिम वृक्क भी कहा जाता है, जो डायलिसिस के माध्यम से रक्त से अपशिष्ट उत्पादों को हटा देती है।

इसलिए डायलिसिस एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका प्रयोग किसी व्यक्ति के रक्त में से अपशिष्ट पदार्थ यूरिया को अलग कर रक्त को साफ करने में किया जाता है। रोगी की बाहों में धमनी से रक्त को डायलिसिस मशीन, जो चुनींदा पारगम्य झिल्ली की लंबी नलियों से बनी होती है और डायलिसिस घोल वाले टैंक में कुंडली रूप में रखे होते हैं, के डायलाइजर में प्रवाहित किया जाता है। डायलिसिस घोल में पानी, ग्लूकोज और लवण आम शरीर में मौजून इन तत्वों की सांद्रता के जैसा ही होता है। मरीज का रक्त जैसे ही डायलिसिस घोल से प्रवाहित होता है, वैसे ही उसमें मौजूद यूरिया जैसे अधिकांश अपशिष्ट चुनींदा पारगम्य झिल्ली सेल्युलोज नलियों से डायलाइजिंग घोल में प्रवाहित होते हैं। साफ किया हुआ रक्त रोगी की बाहों की शिराओं में वापस भेजा जाता है।

भगवती हर्बल इण्डिया
कुल्हड़ीया,परबत्ता,खगड़िया,बिहार

डॉ० पी० कुमार (एम०डी०)

31/03/2018
पेन्क्रियाटाइटिस: लक्षण और कारणलक्षणतीव्र पेन्क्रियाटाइटिस।पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द जो पीठ की तरफ फ़ैल जाता है।सूजन और...
19/03/2018

पेन्क्रियाटाइटिस: लक्षण और कारण

लक्षण

तीव्र पेन्क्रियाटाइटिस।

पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द जो पीठ की तरफ फ़ैल जाता है।

सूजन और पीड़ायुक्त पेट।

मतली और उल्टी।

बुखार

बढ़ी हुई ह्रदयगति।

पेट फूलना।

क्रोनिक (दीर्घ) पेन्क्रियाटाइटिस।

वजन में गिरावट।

अतिसार और तैलीय मल और इसके साथ ही तीव्र पेन्क्रियाटाइटिस के लक्षण

भूख ना लगना।

गुदा से हवा निकलना।

कारण

पेन्क्रियाटाइटिस उत्पन्न होने के प्रमुख कारणों में हैं पित्ताशय की पथरी और अत्यधिक मदिरापान।
अन्य अत्यल्प कारणों में हैं:

पैंक्रियास को लगा आघात या शल्यक्रिया।

अनुवांशिक असामान्यताएं और विकार।

वायरस द्वारा उत्पन्न संक्रमण।

(मूत्रवर्धक) औषधियाँ ।।

सभी प्रकार के असाध्य बिमारियों से बचाव के लिए सम्पर्क ।।

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मिलन लाईफ लाईन आयुर्वेदिक चिकित्सा केंद्र कुल्हड़ीया,परवत्ता,खगड़िया,बिहार

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🌹🌹मिलन लाईफ लाईन आयुर्वेदिक चिकित्सा केंद्र 🌹🌹कब्ज़ के आयुर्वेदिक उपचार (Ayurveda For Constipation)आयुर्वेद के अनुसार:कब्...
15/03/2018

🌹🌹मिलन लाईफ लाईन आयुर्वेदिक चिकित्सा केंद्र 🌹🌹

कब्ज़ के आयुर्वेदिक उपचार (Ayurveda For Constipation)

आयुर्वेद के अनुसार:

कब्ज़ शरीर में वात के बढ़ने से होती है। आयुर्वेद के अनुसार वात प्रकृति वाले व्यक्तियों को कब्ज़ होने की संभावना ज्यादा रहती है। आयुर्वेद के अनुसार कब्ज़ का मूलभूत कारण हमारा भोजन है। अगर भोजन में फाइबर और तरल पर्दार्थों की कमी होगी तो हमारे मल को शरीर से बाहर निकलने में परेशानी होगी ।

आयुर्वेदिक उपचार (Ayurvedic Treatment)

कड़ा कब्ज़ (Hard Stool):

हल्के गर्म तिल के तेल से अनिमा (E***a) लेने पर कड़े कब्ज़ में तुरन्त राहत मिलती है।तिल के तेल से पेट पर मालिश करने से भी कब्ज़ में आराम मिलता है।ग्लिसरीन से पेट पर मालिश करने से भी कब्ज़ में आराम मिलता है।

पुरानी कब्ज़ (Chronic Constipation)

त्रिफला (Triphala) के सेवन से पुरानी कब्ज़ में बहुत आराम मिलता है।रात को सोते वक्त 5 ग्राम (एक चम्मच भर) त्रिफला चुर्ण हल्के गर्म दूध अथवा गर्म पानी के साथ लेने से कब्ज़ दूर होती है।त्रिफला व ईसबगोल की भूसी दो चम्मच मिलाकर शाम को गुनगुने पानी से लें इससे कब्ज़ दूर होती है।

वात युक्त शरीर(Vata Type Body)

वात युक्त शरीर वालों के लिए हल्के गर्म तिल के तेल से अनिमा लेने पर कब्ज़ में तुरन्त राहत मिलती है।रात को सोते समय दूध के साथ अलसी के बीज़ Flaxseeed लेना लाभकर होता है।

पित्त युक्त शरीर (Pitta Type Body)

पित्त युक्त शरीर वालों में कब्ज़ का मूल कारण शरीर में पित्त की अधिकता के कारण इन्फ्लेमेशन का होना है।पित्त युक्त शरीर में पेट और छोटी आँत, दो ऐसी जगह है जहाँ पित्त दोष का असर सबसे ज्यादा होता है। नीम पित्त दोष के लिए एक बहुत उपयुक्त जड़ी बूटी है। इसके उपयोग से पित्त दोष में आराम मिलता है और छोटी आँत की इन्फ्लेमेशन कम होती है जिस कारण वहाँ से मल को आगे बढ़ने में आसानी होती है।

कफ युक्त शरीर (Kapha Type Body)

कफ युक्त शरीर वालों के लिए शरीर में कफ को नियंत्रित करने वाले आहार पर जोर दिया जाता है।बासमती चावल, कच्ची सब्जियाँ और फ़ल जैसे की सेब, केला, अंगूर का सेवन लाभदायक होता है।कफ युक्त शरीर वालों को कभी भी जुलाब प्रेरक प्रदार्थ नही लेना चाहिये।अपने भोजन में उन पर्दार्थो का समावेश करें जिनमे फाइबर अधिक होता है।

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सेरिब्रल पैल्सि / Cerebral Palsyसेरिब्रल पैल्सि का उल्लेख उन अवस्थाओं के एक समूह के लिए किया जाता है जो कि गतिविधि और हा...
14/03/2018

सेरिब्रल पैल्सि / Cerebral Palsy

सेरिब्रल पैल्सि का उल्लेख उन अवस्थाओं के एक समूह के लिए किया जाता है जो कि गतिविधि और हावभाव के नियंत्रण को प्रभावित करते हैं। गतिविधि को नियंत्रित करने वाले मस्तिष्क के एक या अधिक हिस्से की क्षति के कारण प्रभावित व्यक्ति अपनी मांसपेशियों को सामान्य ढंग से नहीं हिला सकता। इसके लक्षणों का दायरा पक्षाघात के रूपों समेत हल्का से लेकर गंभीर तक हो सकता है।

उपचार शुरू होने पर अधिकतर बच्चे अपनी क्षमताओं में बहुत हद तक सुधार ला सकते हैं। हालांकि समय के साथ लक्षण बदल सकते हैं लेकिन सेरिब्रल पैल्सि परिभाषा के हिसाब से तेजी से फैलने वाला नहीं है, अत: अगर बढ़ी हुई क्षति देखने में आती है तो समस्या हो सकता है कि सेरिब्रल पैल्सि की बजाय कोई और हो।

सेरिब्रल पैल्सि वाले बहुत से बच्चे दूसरी ऐसी समस्याओं से ग्रस्त होते हैं जिनके उपचार की आवश्यकता होती है। इनमें मानसिक सामान्य विकास में कमी; सीखने की अक्षमता; दौरा; और देखने, सुनने और बोलने की समस्या शामिल है।

प्राय: सेरिब्रल पैल्सि का निदान तब तक नहीं हो पाता जब तक कि बच्चा दो से तीन वर्ष की उम्र का नहीं हो जाता। तीन साल से अधिक उम्र के 1,000 में से लगभग 2 से 3 बच्चों को सेरिब्रल पैल्सि होती है। इस देश में हर उम्र के लगभग 500,000 बच्चे एवं वयस्क सेरिब्रल पैल्सि से ग्रस्त हैं।

सेरिब्रल पैल्सि की तीन मुख्य किस्में :

स्पास्टिक सेरिब्रल पैल्सि। प्रभावित लोगों में से लगभग 70 से 80 प्रतिशत लोग स्पास्टिक सेरिब्रल पैल्सि से ग्रस्त होते हैं, जिसमें कि मांसपेशियां सख्त होती हैं जो कि गतिविधि को मुश्किल बना देती हैं। जब दोनों टांगें प्रभावित होती हैं (स्पास्टिक डिप्लेजिआ), तो बच्चे को चलने में मुश्किल हो सकती है क्योंकि कूल्हे एवं टांगों की सख्त मांसपेशियां टांगों को अंदर की ओर मोड़ सकती हैं और घुटने पर क्रास कर सकती हैं (इसे सिजरिंग कहा जाता है)। अन्य मामलों में शरीर का केवल एक पक्ष प्रभावित होता है (स्पास्टिक हेमिप्लेजिआ), अक्सर बाहें टांगों के मुकाबले ज्यादा गहराई से प्रभावित होती हैं। सर्वाधिक गंभीर स्पास्टिक क्वाडरिपलेजिआ होती है, जिसमें कि अक्सर मुंह और जीभ को नियंत्रित करने वाली मांसपेशियों के साथ-साथ सभी चारों अंग और धड़ा प्रभावित होता है। स्पास्टिक क्वाडरिपलेजिआ वाले बच्चों में मंदबुद्धि और अन्य समस्याएं पायी जाती हैं।

डिसकाइनेटिक सेरिब्रल पैल्सि। लगभग 10 से 20 प्रतिशत में डिसकाइनेटिक रूप होता है जो कि समूचे शरीर को प्रभावित करता है। इसका पता मांसपेशी के टोन में उतार-चढ़ावों (बहुत सख्त से लेकर बहुत अधिक ढीले तक बदलता रहता है) से चलता है और कई बार यह अनियंत्रित गतिविधि से जुड़ा होता है (जो कि धीमी एवं मुड़ी हुई या त्वरित एवं झटकेदार हो सकती है)।

कायदे से बैठने एवं चलने के लिए अपने शरीर को नियंत्रित करने के लिए बच्चों को अक्सर सीखने में परेशानी होती है। क्योंकि चेहरे एवं जीभ की मांसपेशियां प्रभावित हो सकती हैं, इसके अलावा चूसने, निगलने और बोलने में भी मुश्किल आ सकती है।

एटाक्सिक सेरिब्रल पैल्सि। लगभग 5 से 10 प्रतिशत इसके एटाक्सिक रूप से ग्रस्त होते हैं, जो कि संतुलन एवं समन्वयन को प्रभावित करती है। वे अस्थिर चाल के साथ चल सकते हैं और उन्हें उन गतियों में मुश्किल आती है जिनके लिए सटीक समन्वयन की आवश्यकता होती है, जैसे कि लेखन।

गर्भावस्था के दौरान और जन्म के समय के आसपास ऐसी बहुत सी चीजें घटित होती हैं जो कि मस्तिष्क के सामान्य विकास को बाधित कर सकती हैं और जिनके परिणामस्वरूप सेरिब्रल पैल्सि हो सकती है। लगभग 70 प्रतिशत मामलों में मस्तिष्क को क्षति जन्म से पहले पहुंचती है, हालांकि यह प्रसव के समय के आसपास, या जीवन के पहले महीने या वर्ष में भी घटित होती है।

कुछ ज्ञात कारणों में शामिल हैं :

गर्भावस्था के दौरान संक्रमण। रुबेला (जर्मन मीजल्स), साइटोमेगलोवाइरस (एक हल्का वाइरल संक्रमण) और टोक्सोप्लास्मोसिस (एक हल्का परजीवीय संक्रमण) मस्तिष्क की क्षति का कारण बन सकते हैं और इनके फलस्वरूप सेरिब्रल पैल्सि हो सकती है।

भ्रूण तक पहुंचने वाली अपर्याप्त आक्सीजन। उदाहरण के लिए, जब गर्भनाल ठीक ढंग से काम नहीं कर रही होती है या वह प्रसव से पहले गर्भाशय की दीवार से अलग हो जाती है तो इस बात की आशंका रहती है कि भ्रूण को पर्याप्त आक्सीजन प्राप्त न हो।

समय पूर्व जन्म। 3 1/3 पाउंड से कम वाले समय से पहले जन्मे बच्चों में उन बच्चों के मुकाबले सेरिब्रल पैल्सि होने की आशंका 30 गुना अधिक होती है जो कि पूरे समय में पैदा होते हैं।

प्रसव पीड़ा एवं प्रसव की जटिलताएं। अभी हाल फिलहाल तक डाक्टर मान कर चल रहे थे कि मुश्किल प्रसाव के दौरान एसफिक्सिआ (ऑक्सीजन की कमी) सेरिब्रल पैल्सि के अधिकतर मामलों का कारण थी। पर हालिया अध्ययन बताते हैं कि केवल लगभग 10 प्रतिशत मामलों में ही इसकी वजह से सैरिब्रल पैल्सि हुई।

आरएच बीमारी। मां के रक्त और उसके भ्रूण के बीच की यह असंगति मस्तिष्क को क्षति पहुंचा सकती है, जिसके फलस्वरूप सेरिब्रल पैल्सि हो सकती है। सौभाग्यवश, आरएच बीमारी को आरएच-निगेटिव स्त्री को गर्भावस्था के 28वें हफ्ते के आसपास और पुन: आरएच-पॉजिटिव बच्चे के जन्म के बाद आरएच इम्यून नामक रक्त उत्पाद का इंजेक्शन देकर प्राय: रोका जा सकता है।

अन्य जन्मजात कुरूपताएं। मस्तिष्क की विकृतियों, असंख्य आनुवांशिक बीमारियों, क्रोमोसोमल असामान्यताओं और दूसरी शारीरिक जन्मजात कमियों वाले बच्चों में सेरिब्रल पैल्सि का खतरा अधिक रहता है।

हासिल की हुई सेरिब्रल पैल्सि। सेरिब्रल पैल्सि वाले लगभग 10 प्रतिशत बच्चे इसे जन्म के बाद मस्तिष्क की उन चोटों के चलते प्राप्त करते हैं जो कि जीवन के पहले दो वर्षों में लगती हैं। इस प्रकार की चोटों का सर्वाधिक आम कारण मस्तिष्क के संक्रमण (जैसे कि मेनिनजाइटिस) और सिर की चोटें होती हैं।

सेरिब्रल पैल्सि का निदान मुख्य रूप से इस बात के मूल्यांकन के जरिये किया जाता है कि कोई शिशु या बच्चा कैसे गति करता है। सीपी वाले कुछ बच्चे ढीली मांसपेशी वाले होते हैं, जिससे कि वे लटके हुए नजर आ सकते हैं। अन्य बच्चों के पास ज्यादा सख्त मांसपेशी होती है जो कि उन्हें सख्त नजर आने वाला या मांसपेशी के परिवर्तनीय स्वास्थ्य वाला (एक समय में बढ़ा हुआ और अन्य समय में कम) बना देती है। इसके अलावा हो सकता है कि डॉक्टर मैग्नेटिक रिसोनैंस इमेजिंग (एमआरआई), कंप्यूटेड टोमोग्रैफि (सीटी स्कैन) या अल्ट्रासाउंड जैसे ब्रेन-इमेजिंग परीक्षणों का सुझाव दे। ये परीक्षण कर्इ बार सेरिब्रल पैल्सि के कारण की पहचान करने में सहायता कर सकते हैं।

सेरिब्रल पैल्सि का उपचार किस प्रकार किया जाता है?

स्वास्थ्यचर्या पेशेवरों की एक टीम बच्चे एवं परिवार के साथ बच्चे की जरूरतों को पहचान करने के लिए काम करती है। इस टीम में बालरोग विशेषज्ञ, भौतिक मेडिसिन और पुनर्वास चिकित्सक, आर्थोपीडिक सर्जन्स, फिजिकल एवं अक्यूपेशनल थेरेपिस्ट, नेत्ररोग विशेषज्ञ, वक्तृत्व/भाषा पैथोलॉजिस्ट और सामाजिक कार्यकर्ता एवं मनोवैज्ञानिक शामिल हो सकते हैं।

बच्चे की निदान के शीघ्र बाद भौतिक चिकित्सा शुरू होती है। इससे प्रेरक पेशी कौशलों (जैसे कि बैठना एवं चलना) में वृद्धि होती है, मांसपेशी की ताकत बेहतर होती है और कांट्रैक्चर्स (जोड़ की गतिविधि को सीमित करने वाली मांसपेशियों का छोटा होना) को रोकने में सहायता मिलती है। कई बार कांट्रैक्चर्स को रोकने में सहायता करने और हाथों एवं टांगों के प्रकार्य को बेहतर बनाने के लिए उपचार के साथ-साथ ब्रेसेस, स्पिंलंट्स या कास्ट्स को प्रयोग में लाया जाता है। अगर कांट्रैक्चर्स बहुत अधिक गंभीर हैं तो प्रभावित मांसपेशियों को बड़ा करने के लिए सर्जरी की सिफारिश की जा सकती है।

दवाओं का प्रयोग स्पास्टिसिटी को शांत करने या असमान्य गतिविधि को कम करने के लिए किया जा सकता है। बदकिस्मती से, मौखिक औषधि उपचार अक्सर बहुत सहायक नहीं होता। कई बार सीधे स्पास्टिक मांसपेशियों में दवाओं का इंजेक्शन अधिक मददगार होता है, और इसका असर कई महीनों तक बना रह सकता है। सभी चारों अंगों को प्रभावित करने वाली मध्यम से लेकर तीव्र स्पास्टिसिटी वाले बच्चों में एक नये प्रकार का औषधि उपचार संभावनासंपन्न जान पड़ रहा है। शल्यक प्रक्रिया के दौरान त्वचा के नीचे एक पंप बैठा दिया जाता है जो कि एंटी-स्पाज्मोडिक औषधि बैक्लोफेन की निरंतर आपूर्ति करती है।

दोनों टांगों को प्रभावित करने वाली स्पास्टिसिटी वाले कुछ बच्चों के लिए चुनिंदा पृष्ठीय रिजोटोमी बहुत संभव है कि स्पास्टिसिटी को स्थायी रूप से कम कर दे और बैठने, खड़े होने और चलने की क्षमता को बेहतर बना दे। इस प्रक्रिया में डाक्टर कुछ नर्व फाइबर्स को काट देते हैं जो कि स्पास्टिसिटी की सबसे बड़ी वजह होते हैं। यह प्रक्रिया प्राय: उस समय अपनायी जाती है जब बच्चा दो से छह वर्ष के बीच की उम्र का होता है।

अनुसंधान से पता चलता है कि सेरिब्रल पैल्सि की उत्पत्ति गर्भावस्था के शुरू में गलत कोशिका विकास से होती है। उदाहरण के लिए, अनुसंधानकर्ताओं के एक समूह ने हाल ही में पाया कि सेरिब्रल पैल्सि वाले एक तिहाई से अधिक बच्चों में कुछ दांतों पर दंतवल्क गायब (एनामेल) था। वैज्ञानिक इसके अलावा अन्य घटनाओं, जैसे कि मस्तिष्क में रक्त स्राव, दौरों और सांस तथा संचरण की समस्याओं, का भी परीक्षण कर रहे हैं जोकि नवजात बच्चे के मस्तिष्क को खतरे में डालती हैं। कुछ जांचकर्ता यह जानने के लिए अध्ययन आयोजित कर रहे हैं कि क्या कुछ दवाइयां नवजात शिशु के दौरे को रोकने में सहायता कर सकती हैं और अन्य अनुसंधानकर्ता जन्म के समय कम वजन के कारणों का परीक्षण कर रहे हैं। अन्य वैज्ञानिक इस बात का पता लगा रहे हैं कि किस प्रकार से मस्तिष्क की चोटें (जैसे कि आक्सीजन या रक्त प्रवाह की कमी से मस्तिष्क की क्षति, मस्तिष्क में रक्तस्राव और दौरे) मस्तिष्क के रसायनों के असामान्य स्राव का कारण बनकर मस्तिष्क की बीमारी उत्पन्न कर सकती हैं।

मिलन लाईफ लाईन आयुर्वेदिक चिकित्सा केंद्र कुल्हड़ीया

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डॉ० पी०कुमार (एम०डी०)

नमस्कार दोस्तो 🙏🙏🙏🙏🙏पित्ताशय की पथरी (Gallstones)पित्ताशय (Gall Bladder) पित्त (Bile) भंडारण के लिए एक छोटी सी थैली है (...
14/03/2018

नमस्कार दोस्तो 🙏🙏🙏🙏🙏

पित्ताशय की पथरी (Gallstones)

पित्ताशय (Gall Bladder) पित्त (Bile) भंडारण के लिए एक छोटी सी थैली है (पित्त जिगर द्वारा उत्पादित एक पाचक रस है जो खाने में मौजूद वसा के टूटने में प्रयोग किया जाता है)। पित्ताशय में वसायुक्त खाद्य पदार्थों की मात्र अधिक होने से पित्ताशय की पथरी (कोलेस्ट्रॉल, पित्त वर्णक और कैल्शियम लवण से बना छोटा सा पत्थर) का निर्माण होता है।

गॉलस्टोन्स या पथरी पाचन तंत्र की एक आम बीमारी है, और अधिकतर 50 साल से अधिक आयु वर्ग के लोग इससे प्रभावित होते थे, परन्तु वर्तमान जीवन शैली के कारण, खास तौर पर खान पान की आदतों के कारण, युवा वर्ग भी इस तकलीफ से पीड़ित होने लगा है। पित्ताशय की पथरी (pathari ) पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अधिक होती हैं।



पित्ताशय की पथरी के प्रकार (Types of Gallstones)

मिश्रित पत्थर - कोलेस्ट्रॉल और नमक से बने पत्थरकोलेस्ट्रॉल पत्थर - मुख्य रूप से कोलेस्ट्रॉल ,एक वसा की तरह के पदार्थ का बना हुआ होता है।वर्णक पत्थर - पित्त रंग में हरे भूरे रंग का है , विशेष पिगमेंट के कारण वसा की तरह के पदार्थ का बना हुआ होता हैपित्त में कोलेस्ट्रॉल संचय, पित्ताशय की पथरी का मुख्य कारण है

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डॉ०पी०कुमार (एम०डी०)

बवासीर को मेडिकल में piles या hemorrhoids कहा जाता है। यह बीमारी ज्यादातर 45 से 65 के बीच की उम्र के लोगों को होती हैं।ब...
14/03/2018

बवासीर को मेडिकल में piles या hemorrhoids कहा जाता है। यह बीमारी ज्यादातर 45 से 65 के बीच की उम्र के लोगों को होती हैं।

बवासीर के कारण

बवासीर तब होती है जब गुदा और मलाशय की नसों में किसी कारण बस सूजन और इन्फ्लामेशन होने लगता है। इसके सबसे मुख्य कारण हैं – लम्बे समय से कब्ज होना, मोटापा, फूड एलर्जी, आलस्य या शारीरिक गतिविधि कम करना, गर्भावस्था (प्रेगनेंसी), अधिक समय तक एक ही जगह पर बैठे रहना, भोजन में फाइबर की कमी, रात को अधिक देर तक जागना, धूम्रपान और शराब का सेवन, शरीर में पानी की कमी, डिप्रेशन, फैमिली हिस्ट्री और अत्यधिक तले-भुने खाने का सेवन।

बवासीर में मरीज के गुदा द्वार में मस्से हो जाते हैं जिनमे निरंतर खून बहने और अत्यधिक दर्द होने कारन मरीज काफी कमजोर और दुखी हो जाता है। बवासीर के 2 प्रकार होते हैं – पहला बाहर की बवासीर (external hemorrhoid) और अन्दर की बवासीर (internal hemorrhoid).

बाहर की बवासीर में patient के गुदा द्वार के आसपास मस्से होते हैं जिनमे दर्द तो नहीं होता लेकिन खुजली होती है। उन मस्सों को अधिक खुजलाने की वजह से उनमें से खून भी आने लगता है ।

अन्दर की बवासीर में गुदा के अन्दर मस्से होते हैं और मल करते समय जोर लगाने पर रोगी को बेहद तेज दर्द होता है और खून भी बाहर आने लगता है।

बवासीर के लक्षण

बवासीर के कुछ सामान्य लक्षण निम्न हैं – गुदा के आसपास मस्से या गांठ होना, मल त्यागते समय ब्लड आना, गुदा के आसपास खुजली होना, मस्सों में से लगातार खून निकलना और बार-बार मल त्यागने की इच्छा होना लेकिन त्यागते समय मल न निकलना।

यदि लम्बे समय तक बवासीर को नजरंदाज किया जाये और इसका सही उपचार न किया जाये तो इसके कारण कुछ सीरियस समस्याएं , जैसे खून की कमी (एनीमिया) और टिश्यू डेथ (ऊतकों का मरना) हो सकती हैं। इसके कारण गुदा, मलाशय और पेट के कैंसर होने की सम्भावना भी बढ़ सकती है।

बवासीर होने पर बिना किसी संकोच के डॉक्टर को पूरी जानकारी दें और इसका उचित इलाज करायें।

मिलन लाईफ लाईन आयुर्वेदिक चिकित्सा केंद्र कुल्हड़ीया

डॉ०पी०कुमार (एम०डी०)

आयुर्वेद : आयुर्वेद तन, मन और आत्‍मा के बीच संतुलन बनाकर स्‍वास्‍थ्‍य में सुधार करता है। आयुर्वेद में न केवल उपचार होता ...
14/03/2018

आयुर्वेद : आयुर्वेद तन, मन और आत्‍मा के बीच संतुलन बनाकर स्‍वास्‍थ्‍य में सुधार करता है। आयुर्वेद में न केवल उपचार होता है बल्कि यह जीवन जीने का ऐसा तरीका सिखाता है, जिससे जीवन लंबा और खुशहाल होता है। आयुर्वेद के अनुसार शरीर में वात, पित्‍त और कफ जैसे तीनों मूल तत्‍वों के संतुलन से कोई भी बीमारी आप तक नहीं आ सकती। लेकिन जब इनका संतुलन बिगड़ता है, तो बीमारी शरीर पर हावी होने लगती है और आयुर्वेद में इन्‍हीं तीनों तत्‍वों का संतुलन बनाया जाता है। साथ ही आयुर्वेद में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने पर बल दिया जाता है ताकि किसी भी प्रकार का रोग न हो। आयुर्वेद में विभिन्‍न रोगों के इलाज के लिए हर्बल उपचार, घरेलू उपचार, आयुर्वेदिक दवाओं, आहार संशोधन, मालिश और ध्‍यान का उपयोग किया जाता है। आयुर्वेद क्‍या है, आयुर्वेद से विभिन्‍न रोगों को इलाज कैसे होता है, आयुर्वेद का इस्‍तेमाल कैसे किया जाता है, त्‍वचा के लिए आयुर्वेद कैसे काम करता है और आयुर्वेदिक औषधियां कौन-कौन सी हैं, इसके अलावा आयुर्वेद के बारे में संपूर्ण जानकारी के लिए मिलन लाईफ लाईन आयुर्वेदिक चिकित्सा केंद्र कुल्हड़ीया के सम्पर्क में लगातार बनें रहें ।
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मिलन लाईफ लाईन आयुर्वेदिक चिकित्सा केंद्र
प्रो० :- विनीता कुमारी

आयुर्वेद क्या है? – आयुर्वेदा शब्द दो शब्दों के मेल- आयुष्+वेद से मिलकर बना है जिसका अर्थ है- ”जीवन विज्ञान’ – “साइन्स ऑ...
14/03/2018

आयुर्वेद क्या है? –

आयुर्वेदा शब्द दो शब्दों के मेल- आयुष्+वेद से मिलकर बना है जिसका अर्थ है- ”जीवन विज्ञान’ – “साइन्स ऑफ लाइफ” आयुर्वेदा सिर्फ़ रोगों के इलाज़ तक ही सिमित नहीं है बल्कि यह रह्न- सहन , जीवन मूल्यों, स्वस्थ जीवन जीने व निरोगी रहने का सम्पूर्ण जानकारी प्रदान करता है|

मिलन लाईफ लाईन आयुर्वेदिक चिकित्सा केंद्र कुल्हड़ीया

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