03/12/2025
करता था सो क्यों किया, अब करि क्यों पछताय।
बोया पेड़ बबूल का, अम्ब कहाँ से खाय॥
कबीर साहब का यह दोहा केवल एक नैतिक उपदेश नहीं है—यह अस्तित्व का आधारभूत शाश्वत सूत्र है, धर्म के मौलिक विज्ञान का सीधा उदघोष है:- "कारण और प्रभाव"
साहब कबीर कहते हैं -करता था सो क्यों किया, अब करि क्यों पछताय...
प्रश्न यह नहीं है कि तुमने क्या किया। प्रश्न है: जब तुम कर रहे थे, तब तुम कहाँ थे?
तुम पूरी तरह स्वतंत्र हो, कि क्या बोना है—फूल या काँटे?
यह चुनाव तुम्हारा है, और इस पर कोई रोक नहीं है। जीवन तुम्हें हर क्षण विकल्प देता है।
जब तुमने क्रोध का ज़हर उगला, जब तुमने लोभ की खाई खोदी, जब तुम कामवासना के अंधेरे में भटक रहे थे—तुम्हारा 'होश' कहाँ था? तुम मौजूद थे, शरीर यहाँ था, लेकिन तुम्हारी चेतना गहरी नींद में थी। तुम बेहोशी में कर्म कर रहे थे—और सोए हुए व्यक्ति के कर्म हमेशा 'पाप' होते हैं, क्योंकि वे अज्ञान से पैदा होते हैं।
और अब? अब जब परिणाम की आग तुम्हें छू रही है, जब बबूल के काँटे चुभने लगे हैं, तो तुमने एक नया नाटक शुरू कर दिया है—पछतावे का नाटक।
पछतावा सिर्फ इतना सिद्ध करता है कि तुम अभी भी अज्ञानी हो। तुम परिणाम को स्वीकारने से भाग रहे हो। यह एक बचकानी माँग है कि "मैंने ज़हर बोया, पर मुझे अमृत चाहिए!"
मन की चालाकी देखो! वह विष बोता है और अमृत का स्वप्न देखता है। वह ईंट फेंकता है और उम्मीद करता है कि आकाश से गुलाब बरसेंगे। यह मूर्खता नहीं तो और क्या है?
यह तुम्हारी अपनी ही माँग है, और यह माँग ही दुःख है।
जीवन एक न्यायालय नहीं, एक प्रतिध्वनि है
जीवन कोई न्याय का मंदिर नहीं है जहाँ कोई न्यायाधीश तुम्हें सज़ा देगा। जीवन एक विशाल उद्यान है, एक दर्पण है, एक प्रतिध्वनि है।
तुम जो भी बोते हो, वही अनंत गुना होकर तुम्हारे पास लौट आता है। यह कोई शाप नहीं है, यह कोई दंड नहीं है—यह तुम्हारी ही रचना है, तुम्हारा ही विस्तार है।
तुम दीवार से सिर पटक रहे हो, पर दीवार तो केवल तुम्हारी फेंकी हुई ईंट वापस कर रही है। परिणाम कोई सज़ा नहीं है; यह तुम्हारी करनी का सटीक दर्पण है।
तुमने अपने भीतर बबूल का बीज बोया—वह है तुम्हारा अज्ञान, तुम्हारा लालच, तुम्हारा अहंकार, दूसरों को चोट पहुँचाने की तुम्हारी सुषुप्त वृत्ति। बबूल से आम की उम्मीद करना प्रकृति के नियम का अपमान है, और स्वयं का उपहास!
पछताओ मत—जागो!
अब क्या करें? रोएँ? माफ़ी माँगें? नहीं।
पछतावा एक समय की बर्बादी है। यह पुरानी गलती को नई ऊर्जा देना है।
सबसे पहला और सबसे मौलिक कदम है: परिणाम को पूरे सम्मान से स्वीकार करो।
स्वीकारो कि "हाँ, यह मेरी ही कृति है। मैंने यह किया, और मुझे यह फल मिल रहा है।" जब तुम इस दर्पण को होश से देख लेते हो, तो तुम्हारी सारी ऊर्जा वर्तमान में लौट आती है।
पछतावे की सारी ऊर्जा को 'जागने' में लगा दो!
परिणाम को देखो, उससे सीखो, और उस सीख को भीतर गहरे उतर जाने दो।
यह क्षण निर्णायक है। क्योंकि यह क्षण ही नया बीज बनने वाला है।
अब 'बेहोशी' में मत जियो।
अब बिना जाने मत बोलो।
अब बिना समझे कार्य मत करो।
अब क्या बो रहा हूँ?
तुम ही रचयिता हो! अतीत जा चुका। उस पर रोना व्यर्थ है।
सारा ध्यान इस क्षण पर लगाओ:
यदि तुम प्रेम बोओगे, तो प्रेम लौटेगा।
यदि तुम मौन बोओगे, तो शांति लौटेगी।
यदि तुम करुणा बोओगे, तो सारा अस्तित्व तुम्हें करुणा से भर देगा।
प्रश्न अब यह नहीं है— “मैंने क्या किया?”
प्रश्न अब केवल यह है— “मैं अब क्या बो रहा हूँ? क्या मैं होश का बीज बो रहा हूँ?”
पछताओ मत—जागो! और इसी क्षण से, अपनी ऊर्जा को 'आम' के बीज बोने में लगा दो। तुम्हारी चेतना ही तुम्हारा खेत है।
बोलने से पहले एक क्षण ठहरो।
कर्म करने से पहले भीतर जागो।
जीने से पहले इस नियम को समझो।
अभी, इसी क्षण, होशपूर्वक आम का बीज बोना शुरू करो! क्योंकि यह क्षण, तुम्हारी नई नियति का निर्माण कर रहा है!
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