Jay Gurudev

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भक्ति दान मोहिं दीजिये, गुर देवन के देव और नाहीं कुछ चाहिये, निस दिन तुम्हरी सेव। 🙏 Jay Gurudev  🙏         ゚            ...
08/12/2025

भक्ति दान मोहिं दीजिये,
गुर देवन के देव और
नाहीं कुछ चाहिये,
निस दिन तुम्हरी सेव।
🙏 Jay Gurudev 🙏









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यह ऐसा संसार है, जैसा सेमल फूल।दिन दस के ब्यौहार को, झूठे रंग न भूल।।कबीर साहब का यह पद गहन दार्शनिक अंतर्दृष्टि प्रस्तु...
07/12/2025

यह ऐसा संसार है, जैसा सेमल फूल।
दिन दस के ब्यौहार को, झूठे रंग न भूल।।

कबीर साहब का यह पद गहन दार्शनिक अंतर्दृष्टि प्रस्तुत करता है। यह केवल एक उपदेश नहीं है, अपितु यह जीवन की उस मूलभूत भ्रांति पर सीधा और सशक्त प्रहार है जिसे मनुष्य 'सत्य' मानकर अपना अस्तित्व गढ़ता है।
साहब कबीर कहते हैं :- "यह ऐसा संसार है, जैसा सेमल फूल।"
सेमल का फूल! हाँ, सेमल का फूल—क्या तुमने सचमुच उसे देखा है? दूर से देखो, तो लगता है जैसे आग लगी है! इतना लाल, इतना भव्य, इतना उत्तेजक! तुम सोचते हो, "बस, जीवन का सार यहीं छिपा है!" यह इतना आकर्षक है कि तुम्हारी आँखें चिपक जाती हैं।
यह तुम्हें बुलाता है- "सत्य यहाँ है! आनंद यहाँ है!"
और तुम क्या करते हो?
तुम दौड़ पड़ते हो!
तुम्हारा पूरा जीवन इस एक फूल को हाथ में लेने की दौड़ है!
तुम सोचते हो: करोड़ों मिलेंगे तो शांति मिलेगी।
तुम सोचते हो: शक्ति मिलेगी तो सम्मान मिलेगा।
तुम सोचते हो: सुंदर देह मिलेगी तो प्रेम मिलेगा।
तुमने जिसे सत्य समझा, वह तो केवल सेमल का फूल है,
एक भव्य, मोहक धोखा! दूर से दिखता है, सब मिल गया! लेकिन… जैसे ही तुम पास आते हो, जैसे ही तुम उसे हाथ में लेते हो—क्या पाते हो?
कोई सुगंध नहीं: भीतर कोई आत्मा नहीं! कोई स्थायी इत्र नहीं। सिर्फ़ बाहरी चमकीली पॉलिश! तुम्हारी चेतना को तृप्त करने वाला वहाँ कुछ भी नहीं है!
कोई मिठास नहीं: कोई गहन आनंद नहीं! केवल सतही, क्षणभंगुर उत्तेजना! एक पल का ज्वर, और फिर राख!
यह सिर्फ़ बनावटी सुंदरता है! बाहर का आवरण, भीतर खोखला! यह तुम्हें बुलाता है, तुम आते हो, और फिर पाते हो कि तुम ठगे गए! यह संसार ठीक वही है—एक भव्य मचान, जहाँ सब कुछ कृत्रिम है। तुम झूठ के ग्राहक बन गए हो!
तुम्हारी गलत दिशा तुम्हारी सारी पीड़ा है! तुम्हारी सारी जंजीर है!
तुम किस चीज़ को सत्य मानकर जी रहे हो?
क्या तुम सिर्फ़ रंगों के पीछे भाग रहे हो?
क्या तुम सिर्फ़ उस शोर में जी रहे हो जिसकी कोई धुन नहीं?
साहब कबीर दूसरा चोट करते हैं: "दिन दस के ब्यौहार को..."
तुम अपने जीवन को क्या समझ बैठे हो?
एक अनंत यात्रा?
नहीं! यह तो दस दिन का ब्यौहार है!
एक छोटी-सी दुकान, जो खोली गई है और दस दिन में बंद हो जाएगी!
तुम्हारा जीवन क्या है?
एक क्षणभंगुर प्रवास! एक सराय—जिसमें यात्री आया और अगली सुबह चला गया!
तुम इस अल्पकालिकता को क्यों भूल जाते हो?
तुम इस 'छोटा-से पड़ाव' को ही अपनी अंतिम गंतव्य क्यों समझ बैठे? तुम एक किराए के मकान को अपना स्थायी घर मानकर उसे सजाने में जीवन व्यतीत कर रहे हो!
झूठे रंग न भूल! : -
अहंकार और मोह का नाटक
तुम उन रंगों को ही सत्य मान रहे हो जो झूठे हैं।
अहंकार: यह सबसे बड़ा झूठा रंग है! तुम सोचते हो 'मैं' ही सब कुछ हूँ। यह सिर्फ़ एक परछाईं है जो धूप में बनती है और शाम को मिट जाती है। यह अस्तित्व का सत्य नहीं, यह तुम्हारी मनगढ़ंत कहानी है!
मोह यह दूसरा झूठा रंग है! तुम सोचते हो कि तुम किसी को 'पकड़' सकते हो। संबंध सिर्फ़ दो यात्रियों के बीच की अल्पकालिक मैत्री है; और तुम उसे 'जंजीर' बना लेते हो!
तुम अपना बहुमूल्य समय उस चीज़ को पाने में क्यों लगा रहे हो जिसकी कोई सुगंध नहीं? तुम उस सेमल के फूल पर अपनी चेतना को बर्बाद कर रहे हो!
संसार में दो तरह के फूल हैं!
बाहर का फूल: यह सेमल का फूल है। आकर्षक, लाल, मगर सारहीन! यह मुरझाएगा, यह धोखा है! इसे पकड़ने का अर्थ है—निराशा को गले लगाना!
भीतर का फूल: यह कमल का फूल है। शांत, पवित्र, और जिसकी सुगंध शाश्वत है। यह तुम्हारी आत्मा है, तुम्हारा 'स्वभाव'! यही तुम्हारा केंद्र है!
जागो!
जागना यह नहीं है कि तुम दुनिया छोड़कर भाग जाओ! भागना तो फिर एक और सेमल फूल है!
जागना यह है—
बाहर की सुंदरता को पहचानो, पर उससे मत छलो!
अंदर की सुगंध को खोजो, और उसी में जियो!
सेमल के फूल को देखो, किन्तु जान लो कि यह भ्रम है! और जब तुम जान लोगे कि यह सिर्फ़ दस दिन का खेल है, तो तुम अचानक मुक्त हो जाओगे!
जब जीवन इतना छोटा है, तो फिर इसे केवल प्रेम, सत्य और परमात्मा के सुमिरन पर क्यों न लगाएँ? जिनकी सुगंध कभी नहीं जाती!
यही ध्यान है!
यही मुक्ति है!

गुरुदेव मेरी नैया उस पार लगा देनाअब तक तो निभाया है आगे भी लगा देना। Jay Gurudev      ゚
07/12/2025

गुरुदेव मेरी नैया उस पार लगा देना
अब तक तो निभाया है आगे भी लगा देना।
Jay Gurudev

आपको भी सादर Jay Gurudev 🙏     ゚               सोबरन लाल मौर्य
06/12/2025

आपको भी सादर Jay Gurudev 🙏

सोबरन लाल मौर्य

गुरुदेव मेरे दाता मुझको इतना वर दोसेवा श्रद्धा सुमिरन झोली में मेरे भर दो     ゚
06/12/2025

गुरुदेव मेरे दाता मुझको इतना वर दो
सेवा श्रद्धा सुमिरन झोली में मेरे भर दो









04/12/2025

क्या खा करके हुए खराब
अंडा मछली और शराब
🙏बाबा जय गुरुदेव🙏

04/12/2025

क्या खाने से होगी भलाई
दूध दही और मलाई।।
🙏बाबा जय गुरुदेव 🙏

04/12/2025

बाबा जी का कहना है
शाकाहारी रहना है
🙏बाबा जय गुरुदेव🙏

करता था सो क्यों किया, अब करि क्यों पछताय।बोया पेड़ बबूल का, अम्ब कहाँ से खाय॥कबीर साहब का यह दोहा केवल एक नैतिक उपदेश न...
03/12/2025

करता था सो क्यों किया, अब करि क्यों पछताय।
बोया पेड़ बबूल का, अम्ब कहाँ से खाय॥

कबीर साहब का यह दोहा केवल एक नैतिक उपदेश नहीं है—यह अस्तित्व का आधारभूत शाश्वत सूत्र है, धर्म के मौलिक विज्ञान का सीधा उदघोष है:- "कारण और प्रभाव"

साहब कबीर कहते हैं -करता था सो क्यों किया, अब करि क्यों पछताय...
प्रश्न यह नहीं है कि तुमने क्या किया। प्रश्न है: जब तुम कर रहे थे, तब तुम कहाँ थे?
तुम पूरी तरह स्वतंत्र हो, कि क्या बोना है—फूल या काँटे?
यह चुनाव तुम्हारा है, और इस पर कोई रोक नहीं है। जीवन तुम्हें हर क्षण विकल्प देता है।
जब तुमने क्रोध का ज़हर उगला, जब तुमने लोभ की खाई खोदी, जब तुम कामवासना के अंधेरे में भटक रहे थे—तुम्हारा 'होश' कहाँ था? तुम मौजूद थे, शरीर यहाँ था, लेकिन तुम्हारी चेतना गहरी नींद में थी। तुम बेहोशी में कर्म कर रहे थे—और सोए हुए व्यक्ति के कर्म हमेशा 'पाप' होते हैं, क्योंकि वे अज्ञान से पैदा होते हैं।
और अब? अब जब परिणाम की आग तुम्हें छू रही है, जब बबूल के काँटे चुभने लगे हैं, तो तुमने एक नया नाटक शुरू कर दिया है—पछतावे का नाटक।
पछतावा सिर्फ इतना सिद्ध करता है कि तुम अभी भी अज्ञानी हो। तुम परिणाम को स्वीकारने से भाग रहे हो। यह एक बचकानी माँग है कि "मैंने ज़हर बोया, पर मुझे अमृत चाहिए!"
मन की चालाकी देखो! वह विष बोता है और अमृत का स्वप्न देखता है। वह ईंट फेंकता है और उम्मीद करता है कि आकाश से गुलाब बरसेंगे। यह मूर्खता नहीं तो और क्या है?
यह तुम्हारी अपनी ही माँग है, और यह माँग ही दुःख है।
जीवन एक न्यायालय नहीं, एक प्रतिध्वनि है
जीवन कोई न्याय का मंदिर नहीं है जहाँ कोई न्यायाधीश तुम्हें सज़ा देगा। जीवन एक विशाल उद्यान है, एक दर्पण है, एक प्रतिध्वनि है।
तुम जो भी बोते हो, वही अनंत गुना होकर तुम्हारे पास लौट आता है। यह कोई शाप नहीं है, यह कोई दंड नहीं है—यह तुम्हारी ही रचना है, तुम्हारा ही विस्तार है।
तुम दीवार से सिर पटक रहे हो, पर दीवार तो केवल तुम्हारी फेंकी हुई ईंट वापस कर रही है। परिणाम कोई सज़ा नहीं है; यह तुम्हारी करनी का सटीक दर्पण है।
तुमने अपने भीतर बबूल का बीज बोया—वह है तुम्हारा अज्ञान, तुम्हारा लालच, तुम्हारा अहंकार, दूसरों को चोट पहुँचाने की तुम्हारी सुषुप्त वृत्ति। बबूल से आम की उम्मीद करना प्रकृति के नियम का अपमान है, और स्वयं का उपहास!
पछताओ मत—जागो!
अब क्या करें? रोएँ? माफ़ी माँगें? नहीं।
पछतावा एक समय की बर्बादी है। यह पुरानी गलती को नई ऊर्जा देना है।
सबसे पहला और सबसे मौलिक कदम है: परिणाम को पूरे सम्मान से स्वीकार करो।
स्वीकारो कि "हाँ, यह मेरी ही कृति है। मैंने यह किया, और मुझे यह फल मिल रहा है।" जब तुम इस दर्पण को होश से देख लेते हो, तो तुम्हारी सारी ऊर्जा वर्तमान में लौट आती है।
पछतावे की सारी ऊर्जा को 'जागने' में लगा दो!
परिणाम को देखो, उससे सीखो, और उस सीख को भीतर गहरे उतर जाने दो।
यह क्षण निर्णायक है। क्योंकि यह क्षण ही नया बीज बनने वाला है।
अब 'बेहोशी' में मत जियो।
अब बिना जाने मत बोलो।
अब बिना समझे कार्य मत करो।
अब क्या बो रहा हूँ?
तुम ही रचयिता हो! अतीत जा चुका। उस पर रोना व्यर्थ है।
सारा ध्यान इस क्षण पर लगाओ:
यदि तुम प्रेम बोओगे, तो प्रेम लौटेगा।
यदि तुम मौन बोओगे, तो शांति लौटेगी।
यदि तुम करुणा बोओगे, तो सारा अस्तित्व तुम्हें करुणा से भर देगा।
प्रश्न अब यह नहीं है— “मैंने क्या किया?”
प्रश्न अब केवल यह है— “मैं अब क्या बो रहा हूँ? क्या मैं होश का बीज बो रहा हूँ?”
पछताओ मत—जागो! और इसी क्षण से, अपनी ऊर्जा को 'आम' के बीज बोने में लगा दो। तुम्हारी चेतना ही तुम्हारा खेत है।
बोलने से पहले एक क्षण ठहरो।
कर्म करने से पहले भीतर जागो।
जीने से पहले इस नियम को समझो।
अभी, इसी क्षण, होशपूर्वक आम का बीज बोना शुरू करो! क्योंकि यह क्षण, तुम्हारी नई नियति का निर्माण कर रहा है!
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