14/01/2026
*’’जो गुरू वचन पर डटगे‘‘*
परमेश्वर कबीर जी की प्रिय आत्माओं (सर्व संगत) को दास का शुभाशिर्वाद! सत्यषुरूष कबीर बंदी छोड़ जी आपकी भक्ति की रक्षा करे। आपकी श्रद्धा परमेश्वर की भक्ति, दान, सेवा में आजीवन दृढ़ बनी रहे ताकि आप इस दुःखालय (दुःखों के घर) काल लोक से निकल सको।
असँख्यों जन्म आपको कष्ट पर कष्ट भोगते हो गए हैं। अनेकों जन्मों से परमेश्वर कबीर जी आपको भक्ति पथ पर लगाकर शुभ कर्म करवाते रहे हैं। अब आपका अंतिम जन्म है इस काल लोक में। यदि आप मर्यादा में रहकर भक्ति, दान, सेवा करते रहे। यदि भक्ति, दान, सेवा कम भी बने तो इतनी हानि नहीं होती जितनी मर्यादा खंड करने से होती है। यदि आप मन लगाकर प्रथम मंत्र की एक माला प्रतिदिन कर लोगे और पाँच माला सतनाम व सारनाम की कर लोगे यानि जब तक सारनाम नहीं मिलता, तब तक सतनाम की पाँच माला और सारनाम मिलने के बाद सारनाम की पाँच माला मन लगाकर एकाग्र चित्त से कर लोगे। दान, सेवा मन लगाकर सामथ्र्य से अधिक करो और मर्यादा में रहो तो आप सतलोक में बैठे समझना। यह दास (रामपाल दास पुत्र स्वामी रामदेवानंद जी महाराज) का वचन है। ब्रह्मांड पलट सकता है। सूर्य पश्चिम से उदय हो सकता है, परंतु दास का यह वचन नहीं पलट सकता। (यदि अधिक नाम जाप करोगे तो बहुत अच्छा है। ऊपर बताए तो पास मार्क हैं, वजीफा के लिए घना स्मरण करना पड़ता है। यह भी ध्यान रखना है।) विश्व की 7 ) अरब जनसंख्या में से एक दास को यह सत्य ज्ञान व यथार्थ मोक्ष मंत्र मिले हैं। नामदान का आदेश हुआ है, यह कितनी अद्धभुत बात है। आप बच्चे हो। कभी ऐसे विचार नहीं करते। आप तो अपने को ही नहीं पहचानते। दास का पहचानना तो आपके वश की बात ही नहीं। यह भी दास को ही बताना पड़ता है, तब आप समझ सकते हो। आप वो नेक आत्मा हो जिनके विषय में संत गरीबदास जी ने कहा है:-
गरीब, लख बर शूरा झूझही, लख बर सावंत देह।
लख बर यति जहांन में, तब सतगुरू शरणा लेह।।
इस वाणी के अर्थ को आप बहुत बार सुन चुके हैं। समझ लेना कि आप कौन हैं। अब आपको सतगुरू जी ने शरण में ले लिया है। इस अवसर को चूकना मत, नहीं तो...
गरीबदास यह वक्त जात है, रोवोगे इस पहरे नूँ।
दास कौन है? यह भी संकेत दास ने ही देना पड़ेगा। जिसके विषय में परमेश्वर के लाल संत गरीबदास जी ने निम्न वाणी कही है:-
गरीब, तत्व भेद कोई ना कह रै झूमकरा। पैसे ऊपर नाच सुनो रै झूमकरा।।
कोट्यों मध्य कोई नहीं रे झूमकरा। अरबों में कोई गरक सुनो रै झूमकरा।।
विश्व की साढ़े सात अरब से ऊपर जनसंख्या में दास के अतिरिक्त किसी के पास यह ज्ञान व भक्ति विधि नहीं है। आप दास को हल्के में मत लो। अन्यथा 600 वर्ष पुरानी गलती फिर कर बैठोगे। जब परमेश्वर कबीर जी काशी नगर में जुलाहे (धाणक) रूप में प्रकट थे। संगत को विश्वास नहीं हुआ कि ये निर्धन अशिक्षित जुलाहा परमेश्वर है। तब परमेश्वर ने लीला की थी। एक बेटी को (जो कर्म की मार से वैश्या बनी थी।) हाथी पर बैठाया। बोतल में गंगा जल भरा था। आपने उसे शराब समझा था। वैश्या के गले बांह डाले हुए शराब पीते हुए परमेश्वर को आपने भडूवा (बेशर्म) व्याभिचारी समझा था। अपना अनमोल अवसर गँवाकर अब तक धक्के खा रहे हो। पूर्व वाली भूल से शिक्षा लेकर सतर्क होना चाहिए।
परमेश्वर कबीर जी ने वर्तमान में आपके लिए ऐसे उपकरण चैनल व मोबाईल में बनवा दिए हैं जिनसे आप सत्संग सुन सको। घर बैठे, सफर में कभी भी ज्ञान सुन सकते हो। ज्ञान एक नंबर का दास ने आपको बता दिया है, फिर भी आपकी बुद्धि विकसित नहीं होती है तो दुर्भाग्य की व दुःख की बात है। दास के पास कई बार शिकायत आती हैं कि कुछ भक्तजन व भक्तमति कहते हैं कि जो संदेश मैनेजमेंट भेजता है, यह गुरूदेव का नहीं होता। कमेटी वाले अपनी ओर से डालते हैं। जो मैसेज हमें मिलता है, वह भक्ति मार्ग में नहीं चलता। यह नहीं, वह नहीं, ऐसा क्यों है? वैसा क्यों है?
गुरूदेव को मैनेजमेंट गुमराह कर रहा है, आदि-आदि। इस शंका का समाधान इस प्रकार है:- यदि किसी को लगे कि जो मैसेज आया है यह गुरू जी की आज्ञा से है या नहीं। इसकी जाँच करनी आसान हैं। दास प्रतिदिन पुराने घर पर फोन करता है। आप दास के पुराने परिवार से जाँच कर लिया करो कि यह मैसेज गुरूदेव जी की आज्ञा से है या नहीं। यदि उत्तर हाँ में है तो उसका पालन करो। रही बात यह कैसे, वह कैसे, कभी वोट डालने का मैसेज, कभी किसी आरक्षण में समर्थन का मैसेज आदि-आदि यह भक्ति मार्ग में नहीं चलता। यह उसकी (जो ऐसा मानता है) अज्ञानता है। वह तत्त्वज्ञान से पूर्ण परिचित नहीं है। उसे ज्ञान अच्छी तरह समझना चाहिए या पुराने भक्तों की नकल कर लेनी चाहिए।
ध्यान रखना चाहिए कि:-
‘‘भाई जो गुरू वचन पर डटगे, कटगे फंद चैरासी के, रै कटगे फंद चैरासी के’’।।
एक उदाहरण पर्याप्त है, दास के संकेत को समझने के लिए:-
गोपीचंद तथा भरथरी दोनों मामा-भानजा थे। (भरथरी जी गोपीचन्द जी के मामा थे।) दोनों राजा थे। प्रेरणा पाकर दोनों ने परमात्मा प्राप्ति के लिए राज त्याग दिया। परिवार में हाहाकार मच गई। परंतु पीछे फिरकर नहीं देखा। दोनों ने श्री गोरख नाथ जी को गुरू बनाया। गुरूजी से निवेदन किया, गुरू कल्याण करो। मुक्ति का मार्ग बताओ। गोरख नाथ जी ने उनको दीक्षा दी। नाम जाप करने के दिए तथा कहा कि राजस्थान प्रांत के अलवर शहर में राजा का किला (दुर्ग) निर्माणाधीन है। यदि तुम मुक्ति चाहते हो तो जाओ, उस किले के निर्माण में निःशुल्क मजदूरी करो। अपने खाने के लिए अन्य मजदूरी करना। जाईए। दोनों ने उसी वक्त गुरू जी के चरण छूए और लेकर कंबल चल पड़े।
बारह वर्ष अलवर के किले में पत्थर ढ़ोने की मजदूरी निःशुल्क की। खाने के लिए एक कुम्हार के बर्तन बनाने व गाॅर तैयार करने में कुम्हार की मदद करने लगे। केवल रोटी-रोटी के लिए। कुम्हार की पत्नी निर्भाग थी। वह रोटी भी खिलाना अच्छा नहीं समझती, उसने अपने पति के खाने के लिए ही रोटी भेजी। गोपीचंद तथा भरथरी के लिए नहीं भेजी। कुम्हार देव पुरूष था, दयावान था। उसने अपने हिस्से के भोजन के तीन भाग करता। तीनों समान भोजन खाते थे। जैसे नौ रोटी कुम्हार को मिलती तो तीन-तीन खा लेते थे। जैसे-तैसे बारह वर्ष पूरे किए, सफलता पाई। आज गोपीचंद तथा भरथरी का महापुरूषों में नाम है। यदि वे यह विचार करते कि यह भक्ति मार्ग में नहीं चलता तो फेल हो जाते। गुरू जी का दिया नाम जाप किया। गुरू जी के वचन पर डटे रहे तो जो उस साधना से फल मिलना था, वह प्राप्त कर लिया।
परमेश्वर कबीर जी की प्रिय आत्माओ विचार करो! इतना कुछ करके भी उन समर्पित कुर्बान आत्माओं का जन्म-मरण नहीं मिटा। पहाड़ जैसा कष्ट (जन्म-मरण) ज्यों का त्यों पड़ा है। पता नहीं कब मानव जन्म मिलेगा। फिर सतगुरू वैसा ही काल की भक्ति बताने वाला मिल गया तो फिर वही दुर्गति तैयार है।
विशेष:- वे दोनों राजा थे। उनके परिवार को यह समस्या नहीं थी कि उनके घर त्याग देने से बच्चे भूखे मर जाएँगे। बच्चों को किसी वस्तु का अभाव नहीं था। गोपीचंद-भरथरी के घर त्याग देने से अन्य जनता को कोई लाभ नहीं मिला। केवल अपना ही कल्याण करवाया, जितना गुरू गोरख नाथ कर सकता था। स्वर्ग गए हैं। स्वर्ग समय समाप्त होते ही चैरासी लाख प्राणियों के जीवन प्राप्त करने वाले चक्र में पड़कर करोड़ों जन्म भोगने के पश्चात् मानव जन्म मिलेगा।
अब दास की पहचान करो, कर सको तो:- दास का जन्म एक किसान परिवार जाति-जाट में हुआ। पिता जी के पास दो एकड़ जमीन थी।
हम छः भाई-बहन हुए (दो भाई, चार बहन)। दास पढ़कर जूनियर इन्जीनियर लगा। सन् 1988 में गुरूदेव से दीक्षा की भीख मिली। सन् 1994 में दास को नामदान करने का आदेश मिला। सन् 1995 में दास के सामने दो रास्ते थे। सत्संग, पाठ करवाने वालों की संख्या बढ़ने लगी। नौकरी छोड़े बिना गुरूजी के वचन का पालन नहीं हो सकता था। दास के पुराने परिवार में दो पुत्र (विरेन्द्र तथा मनोज) तथा दो पुत्री{मंजू तथा अंजू (बेबी)}, कुल चार बच्चे हैं। अनारो देवी दास की धर्मपत्नी है। एक एकड़ जमीन। दो बच्चों (विरेन्द्र बेटा व अंजू बेटी) का विवाह 1994 में किया। दो बच्चे (बेटी मंजू व बेटा मनोज) छोटे थे, पढ़ रहे थे। नौकरी ही एकमात्र रोजगार का साधन था। अनारो देवी एक भैंस रखती थी। उससे घर का घी-दूध ही चलता था। कुछ दूध बेचती थी जो भैंस के चारे की पूर्ति ही करता था। दो कमरे किराए पर चढ़ते थे। कभी किरायेदार आते, कभी खाली रहते थे। मई 1995 में दास दो राहे पर खड़ा हो गया। एक तरफ गुरू जी का वचन, दूसरी और चार बच्चे और पत्नी की मौत। कई दिन ज्ञान मंथन करके गुरू वचन चुना। दास को गुरूदेव की कृपा से ज्ञान ठीक से समझ आ गया था। फिर तनख्वाह से 50% दान-धर्म गुरूजी की आज्ञानुसार करने लगा था। अन्य सत्संगी कहते थे कि भक्त जी! ऐसे कैसे काम चलेगा। बच्चों की ओर भी देख। दास धुन का पक्का है। जिस कार्य को करने की ठान ली, किसी की नहीं सुनी। सोचा करता ये भक्तजन ज्ञान की बातें तो एक नंबर की करते हैं, परंतु अमल एक आने का नहीं करते।
वाणी तो यह कहती है कि:-
गरीब, सिर साटे की भक्ति, और कुछ नहीं बात।
सिर के साटे पाईए, अविगत अलख अनाथ।।
ये दान करने वाले को दान से मना करते हैं। परमात्मा सिर दान करने से मिल जाए तो भी प्राप्त करना चाहिए। ये नकली भक्त हैं। दास दान दोनों हाथों से करता था। जिस कारण से धन संग्रह नहीं हुआ था। जब दास ने घर त्यागा, उस समय शायद दो हजार रूपये अनारो देवी के पास होंगे। वे भी दास से छुपाकर रखे होंगे। मई 1995 में दास ने घर त्याग दिया और परमेश्वर की मजदूरी में लग गया। उसके बाद मुड़कर नहीं देखा। (नहीं देखा पीछा फिर कै) जिस कारण से आज ये सतगुरू का बाग लग गया। लाखों पुण्यात्माओं को अपने परम पिता परमेश्वर कबीर जी की पहचान हो गई है। आगे तो गिनती नहीं कितने जीवों का पहाड़ जैसा कष्ट जन्म-मरण का कहर समाप्त होगा।
जिसका श्रेय पुराने परिवार को भी जाता है। गोपीचन्द-भरथरी के परिवार के सामने रोजगार की समस्या कतई नहीं थी। फिर भी बच्चों तथा पत्नियों ने रो-रोकर कहर मचा दिया था। गोरख नाथ के डेरे में भी वापिस लाने पहुँच गए थे। पुराने परिवार की दशा यह थी दास के घर त्यागने के एक या दो महीने के बाद उस परिवार को भीख मांगकर खाना था। यह मुझे पता था। परिवार को नहीं था। फिर भी इन पुण्यात्माओं ने आह तक नहीं की। अन्यथा हाहाकार मच जाती। परिजनों को बुलाते, रिश्तेदारी इकट्ठी कर लेते। हम किसके सहारे रहेंगे? क्या खाएँगे? दास को विचलित कर सकते थे। जिस कारण मेरा जीवन तो नष्ट होना था, इस परिवार का भी मानव जीवन व्यर्थ जाता। आप (संगत) का आज यह जो बाग लगा है, यह नहीं लगता। आपका मानव जीवन नष्ट हो जाता। पुराने परिवार का आपके ऊपर जो बहुत बड़ा उपकार है। दास तो इस पुराने परिवार का सदा ऋणी रहेगा। यदि ये हाहाकार मचा देते तो न आप सुखी होते, न दास मुक्त होता।
यह सब बताने का दास का केवल इतना ही उद्देश्य है कि आप इस परिवार को स्नेह की दृष्टि से देखना। याद कर लेना इसके उपकार को। जब भी दिखाई दे तो यह कल्पना अवश्य करना कि ये उस परिवार के सदस्य हैं। दास के कहने का भाव यह नहीं है कि इनकी पूजा किया करना या माला डालकर सम्मान करना। नहीं, केवल इनके उपकार को ना भूलना, इसी से पुण्य के भागी बन जाओगे। गोपीचन्द तथा भरथरी ने घर त्यागा, न अपना कल्याण करवा पाए, न अन्य जनता को लाभ दे पाए। दास ने घर परमात्मा प्राप्ति के लिए नहीं त्यागा। आप पुण्यात्माओं के कल्याण के लिए। एक परिवार दो बेटे, दो बेटी छोड़ी थी। लाखों परिवार, लाखों बेटे-बेटी मिल गई। वह परिवार भी परमेश्वर कबीर जी ने जिंदा रखा, वह भी फिर मिल गया यानि वह भी भक्त बन गया तो अपना असली परिवार बन गया। सतलोक में बना रहेगा। नहीं तो यहीं पर बारा बाट हो जाना था।
सर्व संगत से निवेदन है इस पत्र को अमर कथा मानकर सुरक्षित रखना। जब मन (काल का एजेंट) परेशान करे, इसे पढ़ लेना।
यहाँ पर यह बताना भी अनिवार्य है कि इस महान परोपकार में अपने-अपने स्तर की सहायता प्रत्येक भक्त/भक्तमति ने सिर धड़ की बाजी लगाकर की है। प्रत्येक का नाम लिखा जाए तो मोटा ग्रंथ बन जाएगा। आज भी सर्व संगत पूर्ण समर्पित है। कुछ भक्त जन विचलित होते हैं, उनके लिए संजीवनी का काम यह पत्र करेगा। मैनेजमेंट कौन है? आप में से भक्त हैं। दास की आज्ञा का पालन करते हैं।
दास रात कहता है तो वे रात कहते हैं। दिन कहता है तो दिन। अपनी ओर से कुछ नहीं कहते। वे तत्त्वज्ञान से पूर्ण परिचित हैं। वे समझते हैं कि गुरू जी की आज्ञा को अनदेखा करना नरक में गिरने के समान है।
जैसे किरका जहर का रंग होरी हो, कहो कौन तिस खाय राम रांग होरी हो।
एक नया पैसा दुरूपयोग करना ये जहर के (किरके) कण के समान खाना समझते हैं यानि परमात्मा के पैसे में गड़बड़ करना जहर खाने के समान मानते हैं। जहर का एक कण ही बुरा हाल कर देता है। अधिक खाना क्या करता है, सबको पता है। समय आने पर आप सबको पता चल जाएगा कि दास कौन है? आप केवल कबीर जी का वफादार कुत्ता दास को मानकर चलो जो भौंक-भौंककर आप धनी लोगों को जगा रहा है। चोरी होने से बचा रहा है। जागते रहना। नाम का जाप करते रहना। जगत की बातों में न आना। भक्त का मार्ग जगत से भिन्न है। जगत की रीति-रिवाज, सूखी शान भक्ति का नाश करने वाली हैं। इसलिए:-
भाई जो गुरू वचन पर डटगे कट गे फंद चैरासी के, रै कट गे फंद चैरासी के।।
वस्तु मिली ठौर की ठौर, मिट गई मन पापी की दौड़।
भ्रम मिटे मथुरा काशी के, भ्रम मिटे मथुरा काशी के।।
कुत्ता हूँ गुरूदेव का, रामपाल दास का नाम।
गले प्रेम की जेवड़ी, जहां खैंचो तहां जाऊँ मैं।।
तो-तो करो तो बाहडूं, दूर-दूर करो तो जाऊँ।
ज्यों राखो त्यों ही रहूँ, जो देओ सो खाऊँ।।
बंदी छोड़ दयाल जी, तुम लग हमरी दौड़।
जैसे काग जहाज का, सूझत और न ठौर।