Amit Bawala

Amit Bawala महान आत्मा आत्म कल्याण की चिंता करते हैं तथा नीच आत्मा अभिमान की

14/01/2026
*’’जो गुरू वचन पर डटगे‘‘* परमेश्वर कबीर जी की प्रिय आत्माओं (सर्व संगत) को दास का शुभाशिर्वाद! सत्यषुरूष कबीर बंदी छोड़ ज...
14/01/2026

*’’जो गुरू वचन पर डटगे‘‘*

परमेश्वर कबीर जी की प्रिय आत्माओं (सर्व संगत) को दास का शुभाशिर्वाद! सत्यषुरूष कबीर बंदी छोड़ जी आपकी भक्ति की रक्षा करे। आपकी श्रद्धा परमेश्वर की भक्ति, दान, सेवा में आजीवन दृढ़ बनी रहे ताकि आप इस दुःखालय (दुःखों के घर) काल लोक से निकल सको।
असँख्यों जन्म आपको कष्ट पर कष्ट भोगते हो गए हैं। अनेकों जन्मों से परमेश्वर कबीर जी आपको भक्ति पथ पर लगाकर शुभ कर्म करवाते रहे हैं। अब आपका अंतिम जन्म है इस काल लोक में। यदि आप मर्यादा में रहकर भक्ति, दान, सेवा करते रहे। यदि भक्ति, दान, सेवा कम भी बने तो इतनी हानि नहीं होती जितनी मर्यादा खंड करने से होती है। यदि आप मन लगाकर प्रथम मंत्र की एक माला प्रतिदिन कर लोगे और पाँच माला सतनाम व सारनाम की कर लोगे यानि जब तक सारनाम नहीं मिलता, तब तक सतनाम की पाँच माला और सारनाम मिलने के बाद सारनाम की पाँच माला मन लगाकर एकाग्र चित्त से कर लोगे। दान, सेवा मन लगाकर सामथ्र्य से अधिक करो और मर्यादा में रहो तो आप सतलोक में बैठे समझना। यह दास (रामपाल दास पुत्र स्वामी रामदेवानंद जी महाराज) का वचन है। ब्रह्मांड पलट सकता है। सूर्य पश्चिम से उदय हो सकता है, परंतु दास का यह वचन नहीं पलट सकता। (यदि अधिक नाम जाप करोगे तो बहुत अच्छा है। ऊपर बताए तो पास मार्क हैं, वजीफा के लिए घना स्मरण करना पड़ता है। यह भी ध्यान रखना है।) विश्व की 7 ) अरब जनसंख्या में से एक‌ दास को यह सत्य ज्ञान व यथार्थ मोक्ष मंत्र मिले हैं। नामदान का आदेश हुआ है, यह कितनी अद्धभुत बात है। आप बच्चे हो। कभी ऐसे विचार नहीं करते। आप तो अपने को ही नहीं पहचानते। दास का पहचानना तो आपके वश की बात ही नहीं। यह भी दास को ही बताना पड़ता है, तब आप समझ सकते हो। आप वो नेक आत्मा हो जिनके विषय में संत गरीबदास जी ने कहा है:-
गरीब, लख बर शूरा झूझही, लख बर सावंत देह।
लख बर यति जहांन में, तब सतगुरू शरणा लेह।।
इस वाणी के अर्थ को आप बहुत बार सुन चुके हैं। समझ लेना कि आप कौन हैं। अब आपको सतगुरू जी ने शरण में ले लिया है। इस अवसर को चूकना मत, नहीं तो...
गरीबदास यह वक्त जात है, रोवोगे इस पहरे नूँ।
दास कौन है? यह भी संकेत दास ने ही देना पड़ेगा। जिसके विषय में परमेश्वर के लाल संत गरीबदास जी ने निम्न वाणी कही है:-
गरीब, तत्व भेद कोई ना कह रै झूमकरा। पैसे ऊपर नाच सुनो रै झूमकरा।।
कोट्यों मध्य कोई नहीं रे झूमकरा। अरबों में कोई गरक सुनो रै झूमकरा।।
विश्व की साढ़े सात अरब से ऊपर जनसंख्या में दास के अतिरिक्त किसी के पास यह ज्ञान व भक्ति विधि नहीं है। आप दास को हल्के में मत लो। अन्यथा 600 वर्ष पुरानी गलती फिर कर बैठोगे। जब परमेश्वर कबीर जी काशी नगर में जुलाहे (धाणक) रूप में प्रकट थे। संगत को विश्वास नहीं हुआ कि ये निर्धन अशिक्षित जुलाहा परमेश्वर है। तब परमेश्वर ने लीला की थी। एक बेटी को (जो कर्म की मार से वैश्या बनी थी।) हाथी पर बैठाया। बोतल में गंगा जल भरा था। आपने उसे शराब समझा था। वैश्या के गले बांह डाले हुए शराब पीते हुए परमेश्वर को आपने भडूवा (बेशर्म) व्याभिचारी समझा था। अपना अनमोल अवसर गँवाकर अब तक धक्के खा रहे हो। पूर्व वाली भूल से शिक्षा लेकर सतर्क होना चाहिए।
परमेश्वर कबीर जी ने वर्तमान में आपके लिए ऐसे उपकरण चैनल व मोबाईल में बनवा दिए हैं जिनसे आप सत्संग सुन सको। घर बैठे, सफर में कभी भी ज्ञान सुन सकते हो। ज्ञान एक नंबर का दास ने आपको बता दिया है, फिर भी आपकी बुद्धि विकसित नहीं होती है तो दुर्भाग्य की व दुःख की बात है। दास के पास कई बार शिकायत आती हैं कि कुछ भक्तजन व भक्तमति कहते हैं कि जो संदेश मैनेजमेंट भेजता है, यह गुरूदेव का नहीं होता। कमेटी वाले अपनी ओर से डालते हैं। जो मैसेज हमें मिलता है, वह भक्ति मार्ग में नहीं चलता। यह नहीं, वह नहीं, ऐसा क्यों है? वैसा क्यों है?

गुरूदेव को मैनेजमेंट गुमराह कर रहा है, आदि-आदि। इस शंका का समाधान इस प्रकार है:- यदि किसी को लगे कि जो मैसेज आया है यह गुरू जी की आज्ञा से है या नहीं। इसकी जाँच करनी आसान हैं। दास प्रतिदिन पुराने घर पर फोन करता है। आप दास के पुराने परिवार से जाँच कर लिया करो कि यह मैसेज गुरूदेव जी की आज्ञा से है या नहीं। यदि उत्तर हाँ में है तो उसका पालन करो। रही बात यह कैसे, वह कैसे, कभी वोट डालने का मैसेज, कभी किसी आरक्षण में समर्थन का मैसेज आदि-आदि यह भक्ति मार्ग में नहीं चलता। यह उसकी (जो ऐसा मानता है) अज्ञानता है। वह तत्त्वज्ञान से पूर्ण परिचित नहीं है। उसे ज्ञान अच्छी तरह समझना चाहिए या पुराने भक्तों की नकल कर लेनी चाहिए।

ध्यान रखना चाहिए कि:-
‘‘भाई जो गुरू वचन पर डटगे, कटगे फंद चैरासी के, रै कटगे फंद चैरासी के’’।।
एक उदाहरण पर्याप्त है, दास के संकेत को समझने के लिए:-
गोपीचंद तथा भरथरी दोनों मामा-भानजा थे। (भरथरी जी गोपीचन्द जी के मामा थे।) दोनों राजा थे। प्रेरणा पाकर दोनों ने परमात्मा प्राप्ति के लिए राज त्याग दिया। परिवार में हाहाकार मच गई। परंतु पीछे फिरकर नहीं देखा। दोनों ने श्री गोरख नाथ जी को गुरू बनाया। गुरूजी से निवेदन किया, गुरू कल्याण करो। मुक्ति का मार्ग बताओ। गोरख नाथ जी ने उनको दीक्षा दी। नाम जाप करने के दिए तथा कहा कि राजस्थान प्रांत के अलवर शहर में राजा का किला (दुर्ग) निर्माणाधीन है। यदि तुम मुक्ति चाहते हो तो जाओ, उस किले के निर्माण में निःशुल्क मजदूरी करो। अपने खाने के लिए अन्य मजदूरी करना। जाईए। दोनों ने उसी वक्त गुरू जी के चरण छूए और लेकर कंबल चल पड़े।
बारह वर्ष अलवर के किले में पत्थर ढ़ोने की मजदूरी निःशुल्क की। खाने के लिए एक कुम्हार के बर्तन बनाने व गाॅर तैयार करने में कुम्हार की मदद करने लगे। केवल रोटी-रोटी के लिए। कुम्हार की पत्नी निर्भाग थी। वह रोटी भी खिलाना अच्छा नहीं समझती, उसने अपने पति के खाने के लिए ही रोटी भेजी। गोपीचंद तथा भरथरी के लिए नहीं भेजी। कुम्हार देव पुरूष था, दयावान था। उसने अपने हिस्से के भोजन के तीन भाग करता। तीनों समान भोजन खाते थे। जैसे नौ रोटी कुम्हार को मिलती तो तीन-तीन खा लेते थे। जैसे-तैसे बारह वर्ष पूरे किए, सफलता पाई। आज गोपीचंद तथा भरथरी का महापुरूषों में नाम है। यदि वे यह विचार करते कि यह भक्ति मार्ग में नहीं चलता तो फेल हो जाते। गुरू जी का दिया नाम जाप किया। गुरू जी के वचन पर डटे रहे तो जो उस साधना से फल मिलना था, वह प्राप्त कर लिया।
परमेश्वर कबीर जी की प्रिय आत्माओ विचार करो! इतना कुछ करके भी उन समर्पित कुर्बान आत्माओं का जन्म-मरण नहीं मिटा। पहाड़ जैसा कष्ट (जन्म-मरण) ज्यों का त्यों पड़ा है। पता नहीं कब मानव जन्म मिलेगा। फिर सतगुरू वैसा ही काल की भक्ति बताने वाला मिल गया तो फिर वही दुर्गति तैयार है।
विशेष:- वे दोनों राजा थे। उनके परिवार को यह समस्या नहीं थी कि उनके घर त्याग देने से बच्चे भूखे मर जाएँगे। बच्चों को किसी वस्तु का अभाव नहीं था। गोपीचंद-भरथरी के घर त्याग देने से अन्य जनता को कोई लाभ नहीं मिला। केवल अपना ही कल्याण करवाया, जितना गुरू गोरख नाथ कर सकता था। स्वर्ग गए हैं। स्वर्ग समय समाप्त होते ही चैरासी लाख प्राणियों के जीवन प्राप्त करने वाले चक्र में पड़कर करोड़ों जन्म भोगने के पश्चात् मानव जन्म मिलेगा।

अब दास की पहचान करो, कर सको तो:- दास का जन्म एक किसान परिवार जाति-जाट में हुआ। पिता जी के पास दो एकड़ जमीन थी।
हम छः भाई-बहन हुए (दो भाई, चार बहन)। दास पढ़कर जूनियर इन्जीनियर लगा। सन् 1988 में गुरूदेव से दीक्षा की भीख मिली। सन् 1994 में दास को नामदान करने का आदेश मिला। सन् 1995 में दास के सामने दो रास्ते थे। सत्संग, पाठ करवाने वालों की संख्या बढ़ने लगी। नौकरी छोड़े बिना गुरूजी के वचन का पालन नहीं हो सकता था। दास के पुराने परिवार में दो पुत्र (विरेन्द्र तथा मनोज) तथा दो पुत्री{मंजू तथा अंजू (बेबी)}, कुल चार बच्चे हैं। अनारो देवी दास की धर्मपत्नी है। एक एकड़ जमीन। दो बच्चों (विरेन्द्र बेटा व अंजू बेटी) का विवाह 1994 में किया। दो बच्चे (बेटी मंजू व बेटा मनोज) छोटे थे, पढ़ रहे थे। नौकरी ही एकमात्र रोजगार का साधन था। अनारो देवी एक भैंस रखती थी। उससे घर का घी-दूध ही चलता था। कुछ दूध बेचती थी जो भैंस के चारे की पूर्ति ही करता था। दो कमरे किराए पर चढ़ते थे। कभी किरायेदार आते, कभी खाली रहते थे। मई 1995 में दास दो राहे पर खड़ा हो गया। एक तरफ गुरू जी का वचन, दूसरी और चार बच्चे और पत्नी की मौत। कई दिन ज्ञान मंथन करके गुरू वचन चुना। दास को गुरूदेव की कृपा से ज्ञान ठीक से समझ आ गया था। फिर तनख्वाह से 50% दान-धर्म गुरूजी की आज्ञानुसार करने लगा था। अन्य सत्संगी कहते थे कि भक्त जी! ऐसे कैसे काम चलेगा। बच्चों की ओर भी देख। दास धुन का पक्का है। जिस कार्य को करने की ठान ली, किसी की नहीं सुनी। सोचा करता ये भक्तजन ज्ञान की बातें तो एक नंबर की करते हैं, परंतु अमल एक आने का नहीं करते।

वाणी तो यह कहती है कि:-
गरीब, सिर साटे की भक्ति, और कुछ नहीं बात।
सिर के साटे पाईए, अविगत अलख अनाथ।।
ये दान करने वाले को दान से मना करते हैं। परमात्मा सिर दान करने से मिल जाए तो भी प्राप्त करना चाहिए। ये नकली भक्त हैं। दास दान दोनों हाथों से करता था। जिस कारण से धन संग्रह नहीं हुआ था। जब दास ने घर त्यागा, उस समय शायद दो हजार रूपये अनारो देवी के पास होंगे। वे भी दास से छुपाकर रखे होंगे। मई 1995 में दास ने घर त्याग दिया और परमेश्वर की मजदूरी में लग गया। उसके बाद मुड़कर नहीं देखा। (नहीं देखा पीछा फिर कै) जिस कारण से आज ये सतगुरू का बाग लग गया। लाखों पुण्यात्माओं को अपने परम पिता परमेश्वर कबीर जी की पहचान हो गई है। आगे तो गिनती नहीं कितने जीवों का पहाड़ जैसा कष्ट जन्म-मरण का कहर समाप्त होगा।
जिसका श्रेय पुराने परिवार को भी जाता है। गोपीचन्द-भरथरी के परिवार के सामने रोजगार की समस्या कतई नहीं थी। फिर भी बच्चों तथा पत्नियों ने रो-रोकर कहर मचा दिया था। गोरख नाथ के डेरे में भी वापिस लाने पहुँच गए थे। पुराने परिवार की दशा यह थी दास के घर त्यागने के एक या दो महीने के बाद उस परिवार को भीख मांगकर खाना था। यह मुझे पता था। परिवार को नहीं था। फिर भी इन पुण्यात्माओं ने आह तक नहीं की। अन्यथा हाहाकार मच जाती। परिजनों को बुलाते, रिश्तेदारी इकट्ठी कर लेते। हम किसके सहारे रहेंगे? क्या खाएँगे? दास को विचलित कर सकते थे। जिस कारण मेरा जीवन तो नष्ट होना था, इस परिवार का भी मानव जीवन व्यर्थ जाता। आप (संगत) का आज यह जो बाग लगा है, यह नहीं लगता। आपका मानव जीवन नष्ट हो जाता। पुराने परिवार का आपके ऊपर जो बहुत बड़ा उपकार है। दास तो इस पुराने परिवार का सदा ऋणी रहेगा। यदि ये हाहाकार मचा देते तो न आप सुखी होते, न दास मुक्त होता।
यह सब बताने का दास का केवल इतना ही उद्देश्य है कि आप इस परिवार को स्नेह की दृष्टि से देखना। याद कर लेना इसके उपकार को। जब भी दिखाई दे तो यह कल्पना अवश्य करना कि ये उस परिवार के सदस्य हैं। दास के कहने का भाव यह नहीं है कि इनकी पूजा किया करना या माला डालकर सम्मान करना। नहीं, केवल इनके उपकार को ना भूलना, इसी से पुण्य के भागी बन जाओगे। गोपीचन्द तथा भरथरी ने घर त्यागा, न अपना कल्याण करवा पाए, न अन्य जनता को लाभ दे पाए। दास ने घर परमात्मा प्राप्ति के लिए नहीं त्यागा। आप पुण्यात्माओं के कल्याण के लिए। एक परिवार दो बेटे, दो बेटी छोड़ी थी। लाखों परिवार, लाखों बेटे-बेटी मिल गई। वह परिवार भी परमेश्वर कबीर जी ने जिंदा रखा, वह भी फिर मिल गया यानि वह भी भक्त बन गया तो अपना असली परिवार बन गया। सतलोक में बना रहेगा। नहीं तो यहीं पर बारा बाट हो जाना था।
सर्व संगत से निवेदन है इस पत्र को अमर कथा मानकर सुरक्षित रखना। जब मन (काल का एजेंट) परेशान करे, इसे पढ़ लेना।
यहाँ पर यह बताना भी अनिवार्य है कि इस महान परोपकार में अपने-अपने स्तर की सहायता प्रत्येक भक्त/भक्तमति ने सिर धड़ की बाजी लगाकर की है। प्रत्येक का नाम लिखा जाए तो मोटा ग्रंथ बन जाएगा। आज भी सर्व संगत पूर्ण समर्पित है। कुछ भक्त जन विचलित होते हैं, उनके लिए संजीवनी का काम यह पत्र करेगा। मैनेजमेंट कौन है? आप में से भक्त हैं। दास की आज्ञा का पालन करते हैं।
दास रात कहता है तो वे रात कहते हैं। दिन कहता है तो दिन। अपनी ओर से कुछ नहीं कहते। वे तत्त्वज्ञान से पूर्ण परिचित हैं। वे समझते हैं कि गुरू जी की आज्ञा को अनदेखा करना नरक में गिरने के समान है।

जैसे किरका जहर का रंग होरी हो, कहो कौन तिस खाय राम रांग होरी हो।
एक नया पैसा दुरूपयोग करना ये जहर के (किरके) कण के समान खाना समझते हैं यानि परमात्मा के पैसे में गड़बड़ करना जहर खाने के समान मानते हैं। जहर का एक कण ही बुरा हाल कर देता है। अधिक खाना क्या करता है, सबको पता है। समय आने पर आप सबको पता चल जाएगा कि दास कौन है? आप केवल कबीर जी का वफादार कुत्ता दास को मानकर चलो जो भौंक-भौंककर आप धनी लोगों को जगा रहा है। चोरी होने से बचा रहा है। जागते रहना। नाम का जाप करते रहना। जगत की बातों में न आना। भक्त का मार्ग जगत से भिन्न है। जगत की रीति-रिवाज, सूखी शान भक्ति का नाश करने वाली हैं। इसलिए:-
भाई जो गुरू वचन पर डटगे कट गे फंद चैरासी के, रै कट गे फंद चैरासी के।।
वस्तु मिली ठौर की ठौर, मिट गई मन पापी की दौड़।
भ्रम मिटे मथुरा काशी के, भ्रम मिटे मथुरा काशी के।।
कुत्ता हूँ गुरूदेव का, रामपाल दास का नाम।
गले प्रेम की जेवड़ी, जहां खैंचो तहां जाऊँ मैं।।
तो-तो करो तो बाहडूं, दूर-दूर करो तो जाऊँ।
ज्यों राखो त्यों ही रहूँ, जो देओ सो खाऊँ।।
बंदी छोड़ दयाल जी, तुम लग हमरी दौड़।
जैसे काग जहाज का, सूझत और न ठौर।

11/01/2026
10/01/2026

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#ज्ञानगंगा
#जीनेकीराह




09/01/2026

#किसान_जीवन_रक्षक_सम्मान

09/01/2026

सत्यनाम प्राप्ति के लिए तथा प्राप्त करने के बाद आवश्यक नियम जिन में से एक भी नियम खण्ड नहीं करना है। यदि निम्न नियमों का पालन नहीं कर सकते तो सत्यनाम न लें।
उपदेश प्राप्त पुण्यात्माऐं परमात्मा के मार्ग पर चलती हैं। वह परमात्मा प्राप्ति के लिए यात्रा प्रारम्भ करती हैं। यात्री बहुत ही कम सामान लेकर यात्रा करता है। अधिक भार उठा कर यात्रा करना सम्भव नहीं होता। जो सांसारिक परम्पराऐं हैं, वे व्यर्थ का भार है जो भक्तिमार्ग में यात्रा करने में बाधक हैं। इसलिए इस भार से मुक्त होने के लिए निम्न नियमों का पालन करना अनिवार्य है:-

1 किसी के पैर नहीं छूने और न ही दूसरे को छूने देना है यदि अचानक या मना करने पर भी पैर छू लेता हैं तो उस स्थिति में नाम खण्ड नहीं होता। आप ने किसी को बद्दुआ या आशीर्वाद नहीं देना है, न ही इच्छा करके किसी से आशीर्वाद लेना है कोई आप के सिर पर आशीर्वाद के लिए हाथ रखे तो आपने मना करना है, फिर भी कोई हाथ रख देता है तो आप का उपदेश सुरक्षित है परन्तु आप ने आशीर्वाद व बद्दुआ बिल्कुल नहीं देनी है। क्योंकि आशीर्वाद देने से आप की भक्ति कमाई क्षीण हो जाती है। जैसे एक पहिए की ट्यूब से दूसरे पहिए की ट्यूब में हवा डालने से आप की गाड़ी खड़ी हो जाएगी। आप को हानि हो जाएगी। एक उपदेशी बहन ने अपने अनुपदेशी भाई को स्वस्थ होने का आशीर्वाद दे दिया भाई तो स्वस्थ हो गया परन्तु बहन इतनी अस्वस्थ हुई की एक महिना अस्पताल में रही। पुनः उपदेश लिया अपनी गलती की क्षमा याचना करने पर ही वह स्वस्थ हो पाई। इसलिए सर्व से प्रार्थना है कि यह गलति न करें। इसी प्रकार अन्य नियमों के खण्ड करने से आप की राम नाम की गाड़ी में पंचर हो जाएगा वह भी रूक जाएगी अर्थात् आप जी को हानि होगी। पूर्व समय में सति प्रथा (परम्परा) थी। जिस किसी का पति मर जाता था तो उसकी स्त्राी को भी उसी मृत पति के साथ जिन्दा जलाया जाता था। जो एक महा जालिम कर्म था। उस समय के मानव समाज ने उस कुरीती को मजबूरन मानना पड़ता था। किसी महापुरूष ने संघर्ष करके उस सति प्रथा को बन्द कराया। समाज के रूढ़ीवादी व्यक्तियों ने बहुत विरोध भी किया, परन्तु प्रयत्न सफल हुआ तो आज सर्व बहनें सुखी हैं। इसी प्रकार ये सर्व परम्पराऐं जानों जो मानव समाज पर भार हैं। इनको समाप्त करने से ही भार मुक्त हो सकेंगे तथा भक्ति मार्ग पर आसानी से चल सकेंगे।

2 टी.वी., कम्प्यूटर तथा मोबाइल में फिल्म, सीरियल, मैच, कार्टून देखना तथा मोबाइल में विडियो गेम आदि नहीं खेलना है।

3 किसी को दान (बिना सिला कपड़ा, सीधा आदि) नहीं देना हैं, न ही किसी धार्मिक स्थल (मन्दिर, मैंण्ड़ी) के लिए पैसे देने हैं और न ही उनके किसी भण्डारे में जाना है। जैसे - धर्मशाला, गली पक्की करने, कुआं तथा तालाब (जोहड़) की खुदाई, खेतों के साझले नाले की खुदाई तथा अन्य इसी प्रकार के सामूहिक सामाजिक कार्यों के लिए पैसे दे सकते हैं।

4 माथे पर तिलक न लगाना है और न हीं लगवाना है, भात में पटड़े पर नहीं चढ़ना है, गले में माला नहीं डलवानी है और न ही डालनी हैं और नही किसी की झोली में पैसे डालने या लेने हैं। यदि दोनों पक्ष उपदेशी हैं तो विवाह केवल असुर निकन्दन रमैणी करके साधारण विधि से करना है तथा भात परम्परा को समाप्त करना है

5 कोई त्यौहार, जागरण, मुण्डन, धार्मिक अनुष्ठान, जन्मदिन, छटी आदि नही मनाना है, न ही उसमें जाना व सहयोग करना है।

6 किसी को दुआ या बद्दुआ नहीं देनी है।

7 किसी को Good morning, Good afternoon, Good evening, Good night आदि शब्द नहीं
बोलने हैं। यदि कोई बोलता हैं तो उसे समय अनुसार केवल Morning-Morning, Evening-Evening
Afaternoon व Night-Night दो-दो बार बोल दे।

8 Happy Birthday, Happy New Year तथा Good bye आदि शब्द नही बोलने हैं। यदि कोई आपसे बोलता हैं, तो उसे धन्यवाद बोल दें।

9 सिक्खों को छोड़ कर सन्त-बाबा रूप में दाढ़ी न हो।

10 बहनों ने नेल पाॅलिस ओर लिपिस्टिक नहीं लगानी हैं।

11 परफ्यूम तथा सैंट आदि नहीं लगाना है।

12 विवाहित बहनें केवल सिन्दूर या बिन्दी में से एक चीज लगा सकती हैं।

13 किसी अनउपदेशी का झूठा नहीं खाना है यदि अनजान में खाया है तो क्षमा होता हैं, भविष्य में ध्यान रखें।

14 हाथों पर मेंहदी नहीं लगानी है। किसी बिमारी के कारण लगा सकते हैं। हाथों में मेहंदी लगाने से नाम खण्ड होता है। सिर (बालों) में रंग, काली मेंहदी या डाॅई नहीं लगानी है।

15 शादी में जाते है तो पैसे (शगुन, वारफेरी, मुंह दिखाई पर पैसे) नहीं देने है। विदाई के समय घर में नारियल नहीं फोड़ना है, कन्या विदाई के समय गाड़ी पर पानी डालना या सगुन के लिए धक्का लगाना अर्थात् सगुन करना मना है।

16 किसी को किसी भी अवसर पर gift देना मना है। अगर कोई gift दे तो कोशिश करनी है ना लो। अगर कोई पीछे से रख जाऐ या डाक या कोरियर द्वारा भेजे तो उसको रख लें उनके उपलक्ष में कुछ रूपये दान आश्रम में कर दें।

17 परिवार में किसी की भी शादी हो तो परिवार के अन्य सदस्यों के लिए कपड़े आदि नहीं देने व नहीं लेने हैं।

18 कन्या दान रूप में कपड़े, गहने आदि नहीं देने हैं। रूपये भी इस उपलक्ष में देने हैं कि आप ने वहां खाना खाया है। और बहन के घर जाते है तो इसी उद्देश्य से पैसे दे सकते हैं कि आपने वहां खाना खाया है या चाय आदि पी है, यह ध्यान रहे यदि अधिक धन दे दिया तो आप की बहन पर आप का ऋण न हो जाए तथा संस्कार न जुड़ जाऐं। क्योंकि हम संस्कार वश ही यहां काल जाल में रह जाते हैं। यदि आप पैसा देना चाहें और बहन न लेवे तो दोनों ही भार मुक्त हो जाते हैं। यदि बहन-बुआ जी आदि उपदेशी हैं तो उन को चाहिए कि वह पैसा रूपया- कपड़ा आभूषण कदापि न लें। प्यार से कहें कि आपने कह दिया, हमने मान लिया, एैसे शिष्टाचार से मना कर दें।

19 स्कूल में गायत्री मन्त्र बोलते समय ओ3म् शब्द नहीं बोलना है। क्योंकि जिसे गायत्राी मंत्र कहते है यह यजुर्वेद के अध्याय 36 का मंत्र 3 है। मूल पाठ में ओ3म् मन्त्र नहीं है। वेद परमात्मा की अनूठी देन हैं। इसमें वृद्धि या कटौती करना, परमात्मा का अपमान है, लाभ के स्थान पर हानि ही होती है, इस लिए इस मन्त्र के साथ ओ3म् नहीं बोलना है। यजुर्वेद के अ. 36 मंत्र 3 अर्थात् कथित ‘‘गायत्री मंत्र’’ मात्र परमात्मा की महिमा का एक मंत्र है। इसे पढ़ने से परमात्मा के गुणों का ज्ञान होता है। जैसे बिजली की महिमा कहीं लिखी हो उसको कविता बनाकर गाते रहने से बिजली के गुणों का ज्ञान तो होता है परन्तु बिजली का लाभ नहीं मिल सकता। लाभ तो बिजली का कनैक्शन लेने से ही मिलेगा। इसी प्रकार यजुर्वेद अध्याय 36 मंत्रा 3 जिसको गायत्री मंत्र बताकर जाप करने को कहते हैं। वह व्यर्थ है।
क्योंकि यह मंत्र तो परमात्मा की महिमा का ज्ञान कराता है। परमेश्वर के गुणों अर्थात् लाभ को बताता है। वह लाभ अधिकारी संत से सत्यनाम व सारनाम की दीक्षा प्राप्त करके अर्थात् कनैक्शन लेकर ही प्राप्त हो सकते हैं। यजुर्वेद अध्याय 36 मंत्र 3 अर्थात् गायत्री मंत्र की आवृर्ति करने से नहीं। फिर भी कोई अज्ञानी व्यक्ति विद्यार्थियों को विवश करे तो ओ3म शब्द का उच्चारण न करें केवल गायत्री मंत्र का भूर्भवः स्वः से ही उच्चारण प्रारम्भ करें। ‘‘ओ3म्‘‘ एक अक्षर को न लगाऐं अध्यापकों को चाहिए कि यजुर्वेद अध्याय 36 मंत्र 3 की अपेक्षा सन्त गरीबदास जी महाराज की वाणी से मंगलाचरण विद्यार्थीयों से बुलाऐं। गायत्राी मंत्र से कई गुणा लाभ होता है। परन्तु सत्यनाम तथा सारनाम बिना सब व्यर्थ है।

20 मुर्दे के अंतिम संस्कार में लकड़ी डाल सकते हैं। कंधे पर या अन्य साधन द्वारा शव को ले जा सकते हैं।

21 मुर्दे पर एक से अधिक कफन नहीं डालना है यदि आप से पहले किसी ने कफन डाल रखा हैं तो आप ने कफन नहीं डालना हैं क्योंकि कफन केवल एक ही होता है अगर पहले कफन डाल रखा है फिर किसी ने एक से ज्यादा कफन डाला है तो नाम खण्ड होता है।

22 शादी में खाना खा सकते है, यह मान कर पैसे दे सकते हैं कि आपने यहां भोजन खाया हैं।

23 यदि दोनों पक्ष उपदेशी हैं तो पीलिया देना, छुछक देना बन्द करना है। एक पक्ष अनुपदेशी है तो केवल दो-2 जोड़ी कपड़े केवल जच्चा व बच्चे के देने हैं।

24 नौकरी पर आफिस में जब कोई रिटायर होता है तो आफिस में सभी आपस में पैसे इकक्टे करके उसे ळपजि तथा पार्टी देते हैं ऐसा कर सकते हैं। (इसमें थोड़ा बहुत दे सकते हैं) लेकिन उपदेशी ने कतई नहीं लेना है।

25 घर में जब बहन आती हैं तो उसे कपड़े व पैसे नहीं देने हैं। अगर बहन या बेटी अनुपदेशी है तो बहुत कम एक या दो जोड़ी कपड़े दे सकते है। बच्चों के लिए खाने-पीने का सामान दे सकते हैं और अगर जब बहन के घर जाते हैं तो साथ में बच्चों के लिए फल, मिठाई आदि ले जा सकते हैं।

26 स्कूल में विदाई पार्टी के समय बच्चे पैसे दे सकते हैं।

27 यदि गऊशाला की कमेटी रजिस्टर्ड है तो रूपये दे सकते हैं, यदि रजिस्टर्ड नहीं है तो चारा आदि दे सकते हैं।

28 शादी की मिठाई कोई घर में लेकर आए तो और कुछ शादी के नाम के कार्ड के साथ मिठाई लाते हैं तो हृदय से मना करंे। फिर भी कोई रख जाए तो खा सकते हैं उस के बदले में कुछ रूपये आश्रम में दान कर दें। आप पर भार नहीं रहेगा। उपदेशी भक्त ने समाज में किसी के विवाह में भी भोजन खा रखा है, उसके लिए विवाह के दिन से कुछ दिन बाद मिठाई व भोजन करवा सकते हैं। यह छूट केवल एक बार है, आगे से विवाह में मिठाई बनाने की परम्परा बंद है, सामान्य भोजन बनाऐ।

29 भगत-भाई आपस में उधार सामान एक दूसरे से ले सकते हैं और अगर आपस में एक दूसरे के घर आते जाते है तो बच्चों के लिए खाने पीने का सामान ले जा सकते हैं।

30 भाई या बहन की आर्थिक स्थिती कमजोर हो तो आर्थिक या अन्य मदद उधार रूप में कर सकते हैं। बहन को चाहिए कि उस पैसे को लौटाए जिस से उस पर भार नहीं बनेगा। यदि बहन या भाई धन लौटाने में असमर्थ है तो भाई कभी बहन पर तथा बहन भाई पर पैसे लौटाने का दबाव न बनाए।

31 लड़की की शादी में माता-पिता अपनी लड़की को चार जोड़ी कपड़े दे सकते हैं पैसे नहीं, अगर लड़के की शादी में लड़की वाले बगैर नाम वाले हैं और वो अगर जबरदस्ती अपनी लड़की को कुछ देना चाहे तो इसी प्रकार लड़की की शादी में लड़के वाले अनउपदेशी कुछ मांग करें तो स्पष्ट मना कर दें बिल्कुल नहीं लेना देना हैं।

32 जिन लड़कियों का विवाह होता है वे जिन कपड़ों को पहन कर विवाह मण्डप अर्थात रमैणी में बैठे उन्हीं कपड़ों में अपनी ससुराल जाऐं। अन्य पोशाक न बदलें किन्ही परिस्थितियों में बदलनी पड़ें (जैसे मिट्टी लग जाए, गील्ली हो जाए या अन्य कारण से खराब हो जाए) तो बदल सकते हैं। अन्यथा नहीं। सुनने में आया है कि कुछ बहनें रमैणी में विवाह के समय सामान्य पोषाक पहनती हैं, बाद में तड़क भड़क वाली पोषाक पहन कर ससुराल जाती हैं, वह मर्यादा के विरूद्ध है। विवाह के समय जैसी भी नई या पुरानी पोषाक पहन रखी है, उसी को पहन कर ससुराल जाऐं, अन्य या उपरोक्त परिस्थितियों में पोषाक बदली जा सकती है।

33 आप के द्वार पर कोई भिक्षुक आता या कहीं बाजार में आप से कोई भिक्षा मांगता है तो उसे पैसे न दें, खाना खिला दें। यदि उस को वस्त्र की आवश्यकता है तो वस्त्र बिना सिला न दें, पुराना या नया सिला हुआ कपड़ा दें। कम्बल चद्दर भी पुराना दें नहीं तो अधिकतर भिक्षुक शराबी कबाबी हैं, नए कपड़ों को बेचकर शराब आदि नशीली वस्तुओं का प्रयोग करते हैं वह दोष दान करने वाले को भी लगेगा। एक श्रद्धालु ने कहा कि यह अच्छा सा नहीं लगता कि भिक्षुक को रूपये न दें, आत्मा नहीं मानती? उस के लिए उत्तर तथा एक उदाहरण यह है कि एक भद्रपुरूष ने एक भिखारी को 100 रूप्ये की भिक्षा दे दी। पहले वह भिक्षुक पाव शराब पीता था, अपनी पत्नी व परिवार को परेशान करता था।
उस दिन 100 रूपये प्राप्त होने के कारण उस भिखारी ने आधा बोतल शराब पी ली। शराब के नशे में अपनी पत्नी को पीट डाला। उस भिखारी की पत्नी ने बच्चों समेत आत्महत्या कर ली। उस जैनटलमैन के सौ रूपये के दान ने एक परिवार को उजाड़ दिया। इसका दोष दानकर्ता को है। गीता में लिखा है कि कुपात्र को किया दान लाभ के स्थान पर हानि करता है।
कबीर परमेश्वर जी कहते हैं:-
गुरु बिन माला फेरते गुरु बिन देते दान। गुरु बिन दोनों निश्फल हैं, पूछो वेद पुरान।।

34 किसी भी नियम के खण्डित हो जाने पर आप को परमेश्वर से मिलने वाला लाभ बन्द हो जाएगा। जैसे बिजली का कनैक्शन कट जाने पर सर्व लाभ बन्द हो जाते हैं। जो कार्य बिजली से होने थे वे रूक जाते हैं। इसी प्रकार परमात्मा की शक्ति से जो आपको तथा आपके परिवार को लाभ मिलना था वह रूक जाता है। एक बहन ने बताया कि उसके पति ने दीक्षा भी ले रखी है किसी भी नियम का पालन नहीं करता। इसी प्रकार एक भक्त ने अपनी पत्नी की शिकायत की। उसके विषय में यह जाने‌कि उनका नाम खण्डित हो चुका है ऐसे व्यक्तियों का कोई भयंकर पाप कर्म है। नाम खण्डित होने पर वह पापकर्म अपना प्रभाव करके हानि करेगा जब तक मर्यादा में रहकर भक्ति करते हैं तो वह पाप कर्म हानि नहीं कर सकता।

एक बहन ने ऐसे ही नाम खण्डित कर रखा था कुछ वर्षों के पश्चात् उसकी जीभ में कैंसर का रोग हो गया। उस बहन से पूछा कि क्या अब आपको टी.वी. देखना, लिपिस्टीक लगाना अच्छा लगता है? उसने रोते हुए कहा नहीं-नहीं।
इसी प्रकार परिवार व शरीर में हानी से बचने के लिए तथा परमात्मा से लाभ प्राप्त करके मोक्ष प्राप्ति के लिए मर्यादा में रहें अन्यथा पाप कर्म आपको क्षति कर देगा।
इसलिए सर्व पुण्यात्माओं से पुनः निवेदन है कि सर्व नियमों का विधीवत् पालन करके मानव जीवन को सफल बनाये तथा पूर्ण मोक्ष प्राप्त करके सदा सुखी बने, सतलोक में निवास करें।
जो विद्यार्थी शिक्षा समय में मौज मस्ती करते हैं वे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं आजीवन कष्ट उठाते हैं। जो शिक्षा के समय में मौज मस्ती न करके लगन से शिक्षा पूरी कर जाते हैं तो उनको विद्यालय में किये प्रयत्न का फल बाहर क्षेत्र में नौकरी द्वारा प्राप्त होता है। इसी प्रकार सर्व मानव परमात्मा प्राप्ति के विद्यालय में विद्यार्थी (भक्त) हैं। जो भक्त मौज मस्ती करते हैं। भक्ति तथा नियमों का पालन न करके अन्य प्राणियों के शरीरों में घोर कष्ट उठायेंगे। जो लगन के साथ मर्यादा में रहकर परमेश्वर कबीर जी की भक्ति साधना जगत गुरु संत रामपाल जी महाराज से प्राप्त करके आजीवन करते रहेंगे उनको सत्यलोक में सर्व सुविधाऐं प्राप्त होगीं वहां वृद्ध अवस्था नहीं है मृत्यु भी नहीं होती ऐसा ही जीवन है, नर-नारी व परिवार है वह कभी मृत्यु को प्राप्त नहीं होता। इसलिए सत्य भक्ति करके अपना जीवन सफल बनायें। जिस सत्य भक्ति से आपको यहां भी सर्व आवश्यक सुख सुविधायें प्राप्त होंगी तथा पूर्ण मोक्ष भी मिलेगा।
विशेष छूट:- समाज में स्थान बनाने के लिए विशेष छूट दी जाती है।

19/09/2025

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