27/03/2026
गर्जेउ मरत घोर रव भारी। कहाँ रामु रन हतौं पचारी॥'
'डोली भूमि गिरत दसकंधर। छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर॥'
यह है रावण का अहंकार जो कि मरते समय भी उसका साथ नहीं छोड़ रहा है। अभी भी वह घोर गर्जना के साथ राम को मिटाने की बात कह रहा है। इसके साथ ही राम रावण को मार देते हैं। यह रावण अति असाधारण है कि मरने के बाद जब वह वीर जमीन पर गिरता है तो भूचाल आ जाता है, समुद्र में तूफान उठ जाता है। नदियाँ अपने मार्ग बदल देती हैं। अनेक वानरों और राक्षसों को दबाते हुए उसका धड़ पृथ्वी पर गिर जाता है।
गजब है राम कथा कि इतने धुराधरस महामानव को मारने के बाद भी राम सिर्फ एक चरित्र है, एक पात्र है। एक पुरुष कितना उत्तम हो सकता है, इसका आदर्श है। मानवीय गरिमा का चरम प्रतिनिधि है। वह ईश्वर नहीं है। वह लीला भी नहीं कर रहा है। वह एक चरित्र है, जो रोता भी है, हँसता भी है। प्रेम भी करता है, क्रोध भी करता है, आशंकित भी है। क्या होगा आगे, इस संबंध में विस्मय से भरा हुआ भी है। विश्वास भी करता है तो शंका भी उसके चरित्र का हिस्सा है।
एक मनुष्य जब अपनी पूरी गरिमा के साथ, पूरी मर्यादा के साथ अपने पूरे स्वभाव के साथ उपस्थित होता है तो वह राम है। राम इस संस्कृति का एक ऐसा आदर्श है, जिसने प्रेम, सत्यता और भायप के अनोखे प्रतिमान स्थापित किए। जिसके सामने आज सदियों बाद भी सम्पूर्ण भारतीय जनमानस नतमस्तक है।
देखा मैंने राम-चरित तो समझ आने लगा है रहस्य ...जीवन का,
देखा मैंने राम-जीवन तो सहज होता लग रहा है पथ जीवन का,
कौन होता है इतना कर्म-मयी जितने हुए प्रभु राम मेरे,
कौन है इतना धीर-अविचल जो सहते चले गये दुःख घनेरे,
किसने देखे थे अश्रु मेरे राम के,मिला जब कंटक सा जीवन,
किसने देखे त्याग राम के जब छोडा अयोध्या सा उपवन,
क्या है कोई इतना सामर्थ्यवान जितने हुए प्रभु राम मेरे,
आत्मा स्वरुप सीता का विरह सहा प्रभु राम ने मेरे,
राजा होते हुए भी रहे आजीवन तपस्वी...
ऐसी अद्भुत छवि है मेरे प्रभु राम की,,,,,,
अब सोचता हूँ के क्या है मेरा दुःख और क्या है मेरा त्याग.
चरणों की धुल की भान्ति हूँ, पाया मैंने ऐसा जो जीवन,
ऋणी हूँ प्रभु राम का जो मिला मुझे ऐसा सौभाग्य,
उन्ही चरणों का अनुसरण करने का मिला है अवसर,
किसका होगा ऐसा स्वर्णिम भाग्य !!!!