15/01/2026
#नेशनल हाईवे 52 पर लक्ष्मणगढ़–फतेहपुर के बीच हरसावा बड़ा गांव के पास हुआ हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सिस्टम की #सामूहिक विफलता है।
#एक ही परिवार के सात लोगों की मौत ने पूरे समाज की आत्मा को झकझोर दिया है।
हां, #प्रथम दृष्टया यह हादसा ड्राइवर की घोर लापरवाही और ओवरटेक की अंधी होड़ का नतीजा था।
#लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होते—क्योंकि जब मौतें रोज़ हों, तो जिम्मेदारी केवल ड्राइवर की नहीं रह जाती।
#यह वही नेशनल हाईवे 52 है,
जहां हर दिन कोई मां अपने बेटे को खोती है,
कोई बच्चा अपने पिता को,
और कोई परिवार हमेशा के लिए उजड़ जाता है।
#क्या यह सिर्फ इत्तेफाक है?
या फिर यह उस बदहाल सड़क व्यवस्था का परिणाम है,
जिसे पिछले दो साल से “फोर लेन बनेगा” कहकर
फाइलों और घोषणाओं में जिंदा रखा गया है?
#हर हादसे के बाद वही रस्में निभाई जाती हैं—
जांच के आदेश,
मुआवजे की घोषणा,
और फिर… खामोशी।
#क्या सरकार और प्रशासन इस खामोशी की जिम्मेदारी भी लेंगे?
या फिर जांच हमेशा की तरह केवल #औपचारिकता बनकर रह जाएगी?
कब तक हम लाशें गिनते रहेंगे?
कब तक परिवारों की चीखें सिर्फ खबरों की सुर्खियां बनेंगी?
और कब तक #फोर लेन का सपना
#मौतों की कीमत पर टलता रहेगा?
#सड़कें सिर्फ डामर से नहीं बनतीं,
वे इच्छाशक्ति और #संवेदनशीलता से बनती हैं।
अब भी वक्त है।
वरना इतिहास यही लिखेगा कि
नेशनल हाईवे 52 पर
मौतें सिर्फ हादसा नहीं थीं,
बल्कि #लापरवाही की सरकारी कीमत थीं।
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