05/02/2026
माया सगी ना तन सगो, सगो ना यह संसार।
कहें कबीर जीव का, सगा है सिरजनहार।।
माया (धन-संपत्ति और रिश्ते-नाते) स्थाई नहीं हैं, शरीर जिसे हम अपना समझते हैं वह भी एक दिन हमें छोड़ना पड़ता है और रही बात दुनिया की तो यह किसी की सगी नहीं यह तो मतलब की है। हमारा सगा तो केवल परमात्मा है और परमात्मा ही सद्गुरु रूप में प्रकट होकर हमारा मार्गदर्शन करता है परमात्मा तक पहुंचने के लिए।
राम राम जी