02/01/2026
नॉन-हीलिंग वूंड्स के लिए हाइपरबेरिक ऑक्सीजन थेरेपी (HBOT) - एक मजबूत उम्मीद की किरण
दोस्तों, अगर आप या आपके किसी करीबी को ऐसा घाव है जो महीनों से ठीक नहीं हो रहा, जिसे डॉक्टर "नॉन-हीलिंग" या "क्रॉनिक वूंड" कहते हैं, तो यह लेख आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण है। ऐसे घाव आमतौर पर डायबिटीज, खराब ब्लड सर्कुलेशन, रेडिएशन थेरेपी के साइड इफेक्ट्स, गंभीर बर्न, क्रश इंजरी, एक्सीडेंटल ट्रॉमा या वैस्कुलर इंसफिशिएंसी जैसी वजहों से होते हैं। इनमें टिश्यूज तक ऑक्सीजन और न्यूट्रिएंट्स नहीं पहुंच पाते, जिससे घाव बढ़ता जाता है और कभी-कभी एम्प्यूटेशन (अंग कटाई) तक की नौबत आ जाती है। खासकर डायबिटीज के मरीजों में फुट अल्सर (पैर के घाव) बहुत आम हैं, जो अगर समय पर सही इलाज न मिले तो जीवन को खतरे में डाल सकते हैं।लेकिन अच्छी खबर यह है कि हाइपरबेरिक ऑक्सीजन थेरेपी (HBOT) इन मुश्किल घावों के लिए एक सिद्ध और प्रभावी एडजंक्टिव (सहायक) ट्रीटमेंट साबित हो रही है। आइए विस्तार से समझते हैं कि HBOT क्या है, कैसे काम करती है, इसकी सफलता दर क्या है, किन घावों में फायदेमंद है, और लखनऊ में इसे कहां उपलब्ध है।HBOT क्या है और यह कैसे काम करती है?हाइपरबेरिक ऑक्सीजन थेरेपी एक स्पेशल प्रक्रिया है जिसमें मरीज को एक पारदर्शी या बंद चैंबर (हाइपरबेरिक चैंबर) में रखा जाता है। चैंबर में दबाव सामान्य वायुमंडलीय दबाव से 2 से 3 गुना ज्यादा बढ़ाया जाता है (आमतौर पर 2.0 से 2.8 ATA), और मरीज को 100% शुद्ध मेडिकल ग्रेड ऑक्सीजन सांस के जरिए दी जाती है। सामान्य स्थिति में हमारी खून की प्लाज्मा में बहुत कम ऑक्सीजन घुलती है, लेकिन हाई प्रेशर के कारण ऑक्सीजन का घुलना 10-15 गुना तक बढ़ जाता है। इससे ऑक्सीजन-युक्त प्लाज्मा सीधे टिश्यूज तक पहुंचता है, जहां ब्लड वेसल्स ब्लॉक या डैमेज होने के कारण ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती थी। HBOT के मुख्य फायदे:टिश्यू हाइपोक्सिया (ऑक्सीजन की कमी) को दूर करता है
सूजन (एडिमा) कम करता है
नई ब्लड वेसल्स (एंजियोजेनेसिस) और कोलेजन बनने में मदद करता है
इन्फेक्शन से लड़ने वाली वाइट ब्लड सेल्स की क्षमता बढ़ाता है
बैक्टीरिया के टॉक्सिन्स को निष्क्रिय करता है
स्टेम सेल्स की मॉबिलाइजेशन बढ़ाता है
Johns Hopkins Medicine के अनुसार, HBOT घावों में ऑक्सीजन स्टार्वेशन को रोकता है, नई स्किन सेल्स और ब्लड वेसल्स बनने में मदद करता है, और रीपरफ्यूजन इंजरी (खून वापस आने पर होने वाला अतिरिक्त नुकसान) को कम करता है।HBOT की सफलता दर: स्टडीज क्या कहती हैं?HBOT की प्रभावशीलता पर कई रिसर्च और मेटा-एनालिसिस हुए हैं, खासकर डायबिटिक फुट अल्सर्स और क्रॉनिक नॉन-हीलिंग वूंड्स पर। यहां कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष हैं:एक बड़े रेट्रोस्पेक्टिव कोहोर्ट स्टडी (2017-2020) में 774 वूंड्स का विश्लेषण किया गया, जहां HBOT + स्टैंडर्ड वूंड केयर से 61% घाव पूरी तरह ठीक हो गए, 22.9% आंशिक रूप से ठीक हुए, और क्वालिटी ऑफ लाइफ में काफी सुधार देखा गया।
क्रॉनिक वूंड्स (3 महीने से ज्यादा पुराने) में एक सेंटर स्टडी में 75-79% मामलों में घाव पूरी तरह या लगभग ठीक हो गए।
डायबिटिक फुट अल्सर्स पर मेटा-एनालिसिस से पता चला कि HBOT से हीलिंग रेट 1.9 गुना तक बढ़ जाती है, हीलिंग टाइम 19-20 दिन कम होता है, और मेजर एम्प्यूटेशन का रिस्क 48-53% तक कम हो जाता है।
Undersea and Hyperbaric Medical Society (UHMS) HBOT को "Enhancement of Healing in Selected Problem Wounds" (जैसे डायबिटिक फुट अल्सर्स), Refractory Osteomyelitis, Delayed Radiation Injury, Compromised Grafts/Flaps, और Acute Thermal Burns के लिए अप्रूव्ड इंडिकेशन मानता है।
Cochrane और PubMed रिव्यूज भी कन्फर्म करते हैं कि डायबिटिक फुट अल्सर्स में HBOT एम्प्यूटेशन रिस्क कम करता है और हीलिंग चांस बढ़ाता है।
ध्यान दें: HBOT अकेले नहीं, बल्कि स्टैंडर्ड वूंड केयर (डिब्रिडमेंट, एंटीबायोटिक्स, ऑफलोडिंग, वैस्कुलर इंटरवेंशन) के साथ इस्तेमाल होने पर सबसे ज्यादा प्रभावी है। कुछ स्टडीज में रिजल्ट्स मिक्स्ड हैं, लेकिन कुल मिलाकर सिलेक्टेड केसेज में यह बहुत फायदेमंद है।HBOT किन-किन घावों और स्थितियों में फायदेमंद है?UHMS और Johns Hopkins के अनुसार, HBOT निम्न स्थितियों में अप्रूव्ड या मजबूत एविडेंस वाली है:डायबिटिक फुट अल्सर्स (खासकर Wagner Grade 3 या ज्यादा)
रेडिएशन इंड्यूस्ड इंजरीज (सॉफ्ट टिश्यू रेडियोनेक्रोसिस, ऑस्टियो रेडियोनेक्रोसिस)
क्रॉनिक नॉन-हीलिंग वूंड्स (वैस्कुलर इंसफिशिएंसी से)
क्रश इंजरीज और कॉम्प्रोमाइज्ड स्किन ग्राफ्ट्स/फ्लैप्स
गैस गैंग्रीन (क्लॉस्ट्रिडियल मायोसाइटिस)
एक्यूट थर्मल बर्न इंजरीज
रेफ्रैक्टरी ऑस्टियोमायेलाइटिस (हड्डी का पुराना इन्फेक्शन)
नेक्रोटाइजिंग सॉफ्ट टिश्यू इन्फेक्शन्स
कुछ क्रॉनिक इन्फेक्शन्स जैसे एक्टिनोमाइकोसिस
ट्रॉमेटिक वूंड्स जहां सर्कुलेशन कम हो
यह कार्बन मोनोऑक्साइड पॉइजनिंग, डीकंप्रेशन सिकनेस आदि में भी इस्तेमाल होती है, लेकिन हमारा फोकस नॉन-हीलिंग वूंड्स पर है।लखनऊ में HBOT कहां उपलब्ध है?अगर आप लखनऊ या आसपास हैं, तो यहां एक प्रमुख और स्थापित सेंटर है:लखनऊ हाइपरबेरिक ऑक्सीजन थेरेपी सेंटर (HBOT Lucknow) एड्रेस: S-69/70, माउंट कार्मेल क्रॉसिंग, महानगर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश - 226006 (महानगर पोस्ट ऑफिस के सामने)
कॉन्टैक्ट नंबर: +91-9935015221, +91-9792100134
ईमेल: lko.hbot@gmail.com
वेबसाइट: hbotlucknow.com
यह सेंटर डायबिटिक वूंड्स, पोस्ट-सर्जरी रिकवरी, रेडिएशन इंजरीज, स्ट्रोक आदि के लिए जाना जाता है। डॉ. पंकज श्रीवास्तव जैसे स्पेशलिस्ट यहां उपलब्ध हैं।
सलाह: HBOT शुरू करने से पहले हमेशा अपने डॉक्टर या वाउंड स्पेशलिस्ट से सलाह लें। वे TcPO2 (ट्रांसक्यूटेनियस ऑक्सीजन मेजरमेंट) जैसे टेस्ट से चेक कर सकते हैं कि HBOT आपके लिए फायदेमंद होगा या नहीं। यह थेरेपी सुरक्षित है, लेकिन कुछ साइड इफेक्ट्स जैसे कान में दबाव, थकान या क्लॉस्ट्रोफोबिया हो सकते हैं, जो आमतौर पर माइल्ड होते हैं।अगर आपके पास ऐसे घाव है जो ठीक नहीं हो रहा, तो देर न करें। HBOT कई मरीजों के लिए एम्प्यूटेशन रोकने और जीवन की क्वालिटी सुधारने वाली साबित हुई है। अधिक जानकारी के लिए ऊपर दिए नंबर पर संपर्क करें या अपने डॉक्टर से बात करें।स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है – इसे संभालें!
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