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जय श्री शनिदेव!
08/04/2023

जय श्री शनिदेव!

चन्द्रमा के ठीक नीचे शुक्रचन्द्रमा मेष राशि के भरणी नक्षत्र के द्वितीय चरण में 17°01’ पर,और शुक्र मेष राशि के भरणी नक्षत...
24/03/2023

चन्द्रमा के ठीक नीचे शुक्र

चन्द्रमा मेष राशि के भरणी नक्षत्र के द्वितीय चरण में 17°01’ पर,
और शुक्र मेष राशि के भरणी नक्षत्र के प्रथम चरण में
15°01’ पर।

प्रेमी जोड़ों और सौन्दर्य सम्बन्धी कार्य करने वालों के लिए श्रेष्ठ दिन।

*नागा_साधुओं_का_इतिहास।*साधुओं में नागा साधुओं को सबसे ज्यादा हैरत और अचरज से देखा जाता है। यह आम जनता के बीच एक कौतुहल ...
19/03/2023

*नागा_साधुओं_का_इतिहास।*

साधुओं में नागा साधुओं को सबसे ज्यादा हैरत और अचरज से देखा जाता है। यह आम जनता के बीच एक कौतुहल का विषय होते है। यदि आप यह सोचते है की नागा साधु बनना बड़ा आसान है तो यह आपकी गलत सोच है। नागा साधुओं की ट्रेनिंग सेना के कमांडों की ट्रेनिंग से भी ज्यादा कठिन होती है, उन्हें दीक्षा लेने से पूर्व खुद का पिंड दान और श्राद्ध तर्पण करना पड़ता है। पुराने समय में अखाड़ों में नाग साधुओं को मठो की रक्षा के लिए एक योद्धा की तरह तैयार किया जाता था। आपको यह जानकार आश्चर्य होगा की मठों और मंदिरों की रक्षा के लिए इतिहास में नागा साधुओं ने कई लड़ाइयां भी लड़ी है।

*नागा_साधुओं_के_नियम:-*

वर्त्तमान में भारत में नागा साधुओं के कई प्रमुख अखाड़े है। वैसे तो हर अखाड़े में दीक्षा के कुछ अपने नियम होते हैं, लेकिन कुछ कायदे ऐसे भी होते हैं, जो सभी दशनामी अखाड़ों में एक जैसे होते हैं।

1) ब्रह्मचर्य का पालन: कोई भी आम आदमी जब नागा साधु बनने के लिए आता है, तो सबसे पहले उसके स्वयं पर नियंत्रण की स्थिति को परखा जाता है। उससे लंबे समय ब्रह्मचर्य का पालन करवाया जाता है। इस प्रक्रिया में सिर्फ दैहिक ब्रह्मचर्य ही नहीं, मानसिक नियंत्रण को भी परखा जाता है। अचानक किसी को दीक्षा नहीं दी जाती। पहले यह तय किया जाता है कि दीक्षा लेने वाला पूरी तरह से वासना और इच्छाओं से मुक्त हो चुका है अथवा नहीं।

2) सेवा कार्य: ब्रह्मचर्य व्रत के साथ ही दीक्षा लेने वाले के मन में सेवाभाव होना भी आवश्यक है। यह माना जाता है कि जो भी साधु बन रहा है, वह धर्म, राष्ट्र और मानव समाज की सेवा और रक्षा के लिए बन रहा है। ऐसे में कई बार दीक्षा लेने वाले साधु को अपने गुरु और वरिष्ठ साधुओं की सेवा भी करनी पड़ती है। दीक्षा के समय ब्रह्मचारियों की अवस्था प्राय: 17-18 से कम की नहीं रहा करती और वे ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य वर्ण के ही हुआ करते हैं।

3) खुद का पिंडदान और श्राद्ध: दीक्षा के पहले जो सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, वह है खुद का श्राद्ध और पिंडदान करना। इस प्रक्रिया में साधक स्वयं को अपने परिवार और समाज के लिए मृत मानकर अपने हाथों से अपना श्राद्ध कर्म करता है। इसके बाद ही उसे गुरु द्वारा नया नाम और नई पहचान दी जाती है।

4) वस्त्रों का त्याग: नागा साधुओं को वस्त्र धारण करने की भी अनुमति नहीं होती। अगर वस्त्र धारण करने हों, तो सिर्फ गेरुए रंग के वस्त्र ही नागा साधु पहन सकते हैं। वह भी सिर्फ एक वस्त्र, इससे अधिक गेरुए वस्त्र नागा साधु धारण नहीं कर सकते। नागा साधुओं को शरीर पर सिर्फ भस्म लगाने की अनुमति होती है। भस्म का ही श्रंगार किया जाता है।

5) भस्म और रुद्राक्ष: नागा साधुओं को विभूति एवं रुद्राक्ष धारण करना पड़ता है, शिखा सूत्र (चोटी) का परित्याग करना होता है। नागा साधु को अपने सारे बालों का त्याग करना होता है। वह सिर पर शिखा भी नहीं रख सकता या फिर संपूर्ण जटा को धारण करना होता है।

6) एक समय भोजन: नागा साधुओं को रात और दिन मिलाकर केवल एक ही समय भोजन करना होता है। वो भोजन भी भिक्षा मांग कर लिया गया होता है। एक नागा साधु को अधिक से अधिक सात घरों से भिक्षा लेने का अधिकार है। अगर सातों घरों से कोई भिक्षा ना मिले, तो उसे भूखा रहना पड़ता है। जो खाना मिले, उसमें पसंद- नापसंद को नजर अंदाज करके प्रेमपूर्वक ग्रहण करना होता है।

7) केवल पृथ्वी पर ही सोना: नागा साधु सोने के लिए पलंग, खाट या अन्य किसी साधन का उपयोग नहीं कर सकता। यहां तक कि नागा साधुओं को गादी पर सोने की भी मनाही होती है। नागा साधु केवल पृथ्वी पर ही सोते हैं। यह बहुत ही कठोर नियम है, जिसका पालन हर नागा साधु को करना पड़ता है।

8) मंत्र में आस्था: दीक्षा के बाद गुरु से मिले गुरुमंत्र में ही उसे संपूर्ण आस्था रखनी होती है। उसकी भविष्य की सारी तपस्या इसी गुरु मंत्र पर आधारित होती है।

9) अन्य नियम: बस्ती से बाहर निवास करना, किसी को प्रणाम न करना और न किसी की निंदा करना तथा केवल संन्यासी को ही प्रणाम करना आदि कुछ और नियम हैं, जो दीक्षा लेने वाले हर नागा साधु को पालन करना पड़ते हैं।

*नागा_साधु_बनने_की_प्रक्रिया:-*

नाग साधु बनने के लिए इतनी कठिन परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है कि शायद कोई आम आदमी इसे पार ही नहीं कर पाए। नागाओं को सेना की तरह तैयार किया जाता है। उनको आम दुनिया से अलग और विशेष बनना होता है। इस प्रक्रिया में सालों लग जाते हैं। जानिए कौन सी प्रक्रियाओं से एक नागा को गुजरना होता है...

तहकीकात: जब भी कोई व्यक्ति साधु बनने के लिए किसी अखाड़े में जाता है, तो उसे कभी सीधे-सीधे अखाड़े में शामिल नहीं किया जाता। अखाड़ा अपने स्तर पर ये तहकीकात करता है कि वह साधु क्यों बनना चाहता है? उस व्यक्ति की तथा उसके परिवार की संपूर्ण पृष्ठभूमि देखी जाती है। अगर अखाड़े को ये लगता है कि वह साधु बनने के लिए सही व्यक्ति है, तो ही उसे अखाड़े में प्रवेश की अनुमति मिलती है। अखाड़े में प्रवेश के बाद उसके ब्रह्मचर्य की परीक्षा ली जाती है। इसमें 6 महीने से लेकर 12 साल तक लग जाते हैं। अगर अखाड़ा और उस व्यक्ति का गुरु यह निश्चित कर लें कि वह दीक्षा देने लायक हो चुका है फिर उसे अगली प्रक्रिया में ले जाया जाता है।

महापुरुष: अगर व्यक्ति ब्रह्मचर्य का पालन करने की परीक्षा से सफलतापूर्वक गुजर जाता है, तो उसे ब्रह्मचारी से महापुरुष बनाया जाता है। उसके पांच गुरु बनाए जाते हैं। ये पांच गुरु पंच देव या पंच परमेश्वर (शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य और गणेश) होते हैं। इन्हें भस्म, भगवा, रूद्राक्ष आदि चीजें दी जाती हैं। यह नागाओं के प्रतीक और आभूषण होते हैं।

अवधूत: महापुरुष के बाद नागाओं को अवधूत बनाया जाता है। इसमें सबसे पहले उसे अपने बाल कटवाने होते हैं। इसके लिए अखाड़ा परिषद की रसीद भी कटती है। अवधूत रूप में दीक्षा लेने वाले को खुद का तर्पण और पिंडदान करना होता है। ये पिंडदान अखाड़े के पुरोहित करवाते हैं। ये संसार और परिवार के लिए मृत हो जाते हैं। इनका एक ही उद्देश्य होता है सनातन और वैदिक धर्म की रक्षा।
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लिंग भंग: इस प्रक्रिया के लिए उन्हें 24 घंटे नागा रूप में अखाड़े के ध्वज के नीचे बिना कुछ खाए-पीए खड़ा होना पड़ता है। इस दौरान उनके कंधे पर एक दंड और हाथों में मिट्टी का बर्तन होता है। इस दौरान अखाड़े के पहरेदार उन पर नजर रखे होते हैं। इसके बाद अखाड़े के साधु द्वारा उनके लिंग को वैदिक मंत्रों के साथ झटके देकर निष्क्रिय किया जाता है। यह कार्य भी अखाड़े के ध्वज के नीचे किया जाता है। इस प्रक्रिया के बाद वह नागा साधु बन जाता है।

नागाओं के पद और अधिकार: नागा साधुओं के कई पद होते हैं। एक बार नागा साधु बनने के बाद उसके पद और अधिकार भी बढ़ते जाते हैं। नागा साधु के बाद महंत, श्रीमहंत, जमातिया महंत, थानापति महंत, पीर महंत, दिगंबरश्री, महामंडलेश्वर और आचार्य महामंडलेश्वर जैसे पदों तक जा सकता है।

महिलाएं भी बनती है नाग साधू:- वर्तमान में कई अखाड़ों मे महिलाओं को भी नागा साधू की दीक्षा दी जाती है। इनमे विदेशी महिलाओं की संख्या भी काफी है। वैसे तो महिला नागा साधू और पुरुष नाग साधू के नियम कायदे समान ही है। फर्क केवल इतना ही है की महिला नागा साधू को एक पिला वस्त्र लपेट केर रखना पड़ता है और यही वस्त्र पहन कर स्नान करना पड़ता है। नग्न स्नान की अनुमति नहीं है, यहाँ तक की कुम्भ मेले में भी नहीं।

अजब-गजब है नागाओं का श्रंगार: श्रंगार सिर्फ महिलाओं को ही प्रिय नहीं होता, नागाओं को भी सजना-संवरना अच्छा लगता है। फर्क सिर्फ इतना है कि नागाओं की श्रंगार सामग्री, महिलाओं के सौंदर्य प्रसाधनों से बिलकुल अलग होती है। उन्हें भी अपने लुक और अपनी स्टाइल की उतनी ही फिक्र होती है जितनी आम आदमी को। नागा साधु प्रेमानंद गिरि के मुताबिक नागाओं के भी अपने विशेष श्रंगार साधन हैं। ये आम दुनिया से अलग हैं, लेकिन नागाओं को प्रिय हैं। जानिए नागा साधु कैसे अपना श्रंगार करते हैं...

भस्म: नागा साधुओं को सबसे ज्यादा प्रिय होती है भस्म। भगवान शिव के औघड़ रूप में भस्म रमाना सभी जानते हैं। ऐसे ही शैव संप्रदाय के साधु भी अपने आराध्य की प्रिय भस्म को अपने शरीर पर लगाते हैं। रोजाना सुबह स्नान के बाद नागा साधु सबसे पहले अपने शरीर पर भस्म रमाते हैंं। यह भस्म भी ताजी होती है। भस्म शरीर पर कपड़ों का काम करती है।

फूल: कईं नागा साधु नियमित रूप से फूलों की मालाएं धारण करते हैं। इसमें गेंदे के फूल सबसे ज्यादा पसंद किए जाते हैं। इसके पीछे कारण है गेंदे के फूलों का अधिक समय तक ताजे बना रहना। नागा साधु गले में, हाथों पर और विशेषतौर से अपनी जटाओं में फूल लगाते हैं। हालांकि कई साधु अपने आप को फूलों से बचाते भी हैं। यह निजी पसंद और विश्वास का मामला है।

तिलक: नागा साधु सबसे ज्यादा ध्यान अपने तिलक पर देते हैं। यह पहचान और शक्ति दोनों का प्रतीक है। रोज तिलक एक जैसा लगे, इस बात को लेकर नागा साधु बहुत सावधान रहते हैं। वे कभी अपने तिलक की शैली को बदलते नहीं है। तिलक लगाने में बारीकी से काम करते हैं।

रुद्राक्ष: भस्म ही की तरह नागाओं को रुद्राक्ष भी बहुत प्रिय है। कहा जाता है रुद्राक्ष भगवान शिव के आंसुओं से उत्पन्न हुए हैं। यह साक्षात भगवान शिव के प्रतीक हैं। इस कारण लगभग सभी शैव साधु रुद्राक्ष की माला पहनते हैं। ये मालाएं साधारण नहीं होतीं। इन्हें बरसों तक सिद्ध किया जाता है। ये मालाएं नागाओं के लिए आभा मंडल जैसा वातावरण पैदा करती हैं। कहते हैं कि अगर कोई नागा साधु किसी पर खुश होकर अपनी माला उसे दे दे तो उस व्यक्ति के वारे-न्यारे हो जाते हैं।

लंगोट: आमतौर पर नागा साधु निर्वस्त्र ही होते हैं, लेकिन कई नागा साधु लंगोट धारण भी करते हैं। इसके पीछे कई कारण हैं, जैसे भक्तों के उनके पास आने में कोई झिझक ना रहे। कई साधु हठयोग के तहत भी लंगोट धारण करते हैं- जैसे लोहे की लंगोट, चांदी की लंगोट, लकड़ी की लंगोट। यह भी एक तप की तरह होता है।

हथियार: नागाओं को सिर्फ साधु नहीं, बल्कि योद्धा माना गया है। वे युद्ध कला में माहिर, क्रोधी और बलवान शरीर के स्वामी होते हैं। अक्सर नागा साधु अपने साथ तलवार, फरसा या त्रिशूल लेकर चलते हैं। ये हथियार इनके योद्धा होने के प्रमाण तो हैं ही, साथ ही इनके लुक का भी हिस्सा हैं।

चिमटा: नागाओं में चिमटा रखना अनिवार्य होता है। धुनि रमाने में सबसे ज्यादा काम चिमटे का ही पड़ता है। चिमटा हथियार भी है और औजार भी। ये नागाओं के व्यक्तित्व का एक अहम हिस्सा होता है। ऐसा उल्लेख भी कई जगह मिलता है कि कई साधु चिमटे से ही अपने भक्तों को आशीर्वाद भी देते थे। महाराज का चिमटा लग जाए तो नैया पार हो जाए।

रत्न: कईं नागा साधु रत्नों की मालाएं भी धारण करते हैं। महंगे रत्न जैसे मूंगा, पुखराज, माणिक आदि रत्नों की मालाएं धारण करने वाले नागा कम ही होते हैं। उन्हें धन से मोह नहीं होता, लेकिन ये रत्न उनके श्रंगार का आवश्यक हिस्सा होते हैं।

जटा: जटाएं भी नागा साधुओं की सबसे बड़ी पहचान होती हैं। मोटी-मोटी जटाओं की देख-रेख भी उतने ही जतन से की जाती है। काली मिट्टी से उन्हें धोया जाता है। सूर्य की रोशनी में सुखाया जाता है। अपनी जटाओं के नागा सजाते भी हैं। कुछ फूलों से, कुछ रुद्राक्षों से तो कुछ अन्य मोतियों की मालाओं से जटाओं का श्रंगार करते हैं।

दाढ़ी: जटा की तरह दाढ़ी भी नागा साधुओं की पहचान होती है। इसकी देखरेख भी जटाओं की तरह ही होती है। नागा साधु अपनी दाढ़ी को भी पूरे जतन से साफ रखते हैं।

पोषाक चर्म: जिस तरह भगवान शिव बाघंबर यानी शेर की खाल को वस्त्र के रूप में पहनते हैं, वैसे ही कई नागा साधु जानवरों की खाल पहनते हैं, जैसे हिरण या शेर। हालांकि शिकार और पशु खाल पर लगे कड़े कानूनों के कारण अब पशुओं की खाल मिलना मुश्किल होती है, फिर भी कई साधुओं के पास जानवरों की खाल देखी जा सकती है।

*नाग साधुओं का इतिहास:-*

भारतीय सनातन धर्म के वर्तमान स्वरूप की नींव आदिगुरू शंकराचार्य ने रखी थी। शंकर का जन्म ८वीं शताब्दी के मध्य में हुआ था जब भारतीय जनमानस की दशा और दिशा बहुत बेहतर नहीं थी। भारत की धन संपदा से खिंचे तमाम आक्रमणकारी यहाँ आ रहे थे। कुछ उस खजाने को अपने साथ वापस ले गए तो कुछ भारत की दिव्य आभा से ऐसे मोहित हुए कि यहीं बस गए, लेकिन कुल मिलाकर सामान्य शांति-व्यवस्था बाधित थी। ईश्वर, धर्म, धर्मशास्त्रों को तर्क, शस्त्र और शास्त्र सभी तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। ऐसे में शंकराचार्य ने सनातन धर्म की स्थापना के लिए कई कदम उठाए जिनमें से एक था देश के चार कोनों पर चार पीठों का निर्माण करना। यह थीं गोवर्धन पीठ, शारदा पीठ, द्वारिका पीठ और ज्योतिर्मठ पीठ। इसके अलावा आदिगुरू ने मठों-मन्दिरों की सम्पत्ति को लूटने वालों और श्रद्धालुओं को सताने वालों का मुकाबला करने के लिए सनातन धर्म के विभिन्न संप्रदायों की सशस्त्र शाखाओं के रूप में अखाड़ों की स्थापना की शुरूआत की।

आदिगुरू शंकराचार्य को लगने लगा था कि सामाजिक उथल-पुथल के उस युग में केवल आध्यात्मिक शक्ति से ही इन चुनौतियों का मुकाबला करना काफी नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि युवा साधु व्यायाम करके अपने शरीर को सुदृढ़ बनायें और हथियार चलाने में भी कुशलता हासिल करें। इसलिए ऐसे मठ बने जहाँ इस तरह के व्यायाम या शस्त्र संचालन का अभ्यास कराया जाता था, ऐसे मठों को अखाड़ा कहा जाने लगा। आम बोलचाल की भाषा में भी अखाड़े उन जगहों को कहा जाता है जहां पहलवान कसरत के दांवपेंच सीखते हैं। कालांतर में कई और अखाड़े अस्तित्व में आए। शंकराचार्य ने अखाड़ों को सुझाव दिया कि मठ, मंदिरों और श्रद्धालुओं की रक्षा के लिए जरूरत पडऩे पर शक्ति का प्रयोग करें। इस तरह बाह्य आक्रमणों के उस दौर में इन अखाड़ों ने एक सुरक्षा कवच का काम किया। कई बार स्थानीय राजा-महाराज विदेशी आक्रमण की स्थिति में नागा योद्धा साधुओं का सहयोग लिया करते थे। इतिहास में ऐसे कई गौरवपूर्ण युद्धों का वर्णन मिलता है जिनमें 40 हजार से ज्यादा नागा योद्धाओं ने हिस्सा लिया। अहमद शाह अब्दाली द्वारा मथुरा-वृन्दावन के बाद गोकुल पर आक्रमण के समय नागा साधुओं ने उसकी सेना का मुकाबला करके गोकुल की रक्षा की।

नागा साधुओं के प्रमुख अखाड़े:- भारत की आजादी के बाद इन अखाड़ों ने अपना सैन्य चरित्र त्याग दिया। इन अखाड़ों के प्रमुख ने जोर दिया कि उनके अनुयायी भारतीय संस्कृति और दर्शन के सनातनी मूल्यों का अध्ययन और अनुपालन करते हुए संयमित जीवन व्यतीत करें। इस समय 13 प्रमुख अखाड़े हैं जिनमें प्रत्येक के शीर्ष पर महन्त आसीन होते हैं। इन प्रमुख अखाड़ों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार हैं:-

1) श्री निरंजनी अखाड़ा:- यह अखाड़ा 826 ईस्वी में गुजरात के मांडवी में स्थापित हुआ था। इनके ईष्ट देव भगवान शंकर के पुत्र कार्तिकस्वामी हैं। इनमें दिगम्बर, साधु, महन्त व महामंडलेश्वर होते हैं। इनकी शाखाएं इलाहाबाद, उज्जैन, हरिद्वार, त्र्यंबकेश्वर व उदयपुर में हैं।

2) श्री जूनादत्त या जूना अखाड़ा:- यह अखाड़ा 1145 में उत्तराखण्ड के कर्णप्रयाग में स्थापित हुआ। इसे भैरव अखाड़ा भी कहते हैं। इनके ईष्ट देव रुद्रावतार दत्तात्रेय हैं। इसका केंद्र वाराणसी के हनुमान घाट पर माना जाता है। हरिद्वार में मायादेवी मंदिर के पास इनका आश्रम है। इस अखाड़े के नागा साधु जब शाही स्नान के लिए संगम की ओर बढ़ते हैं तो मेले में आए श्रद्धालुओं समेत पूरी दुनिया की सांसें उस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए रुक जाती हैं।

3) श्री महानिर्वाण अखाड़ा:- यह अखाड़ा 681 ईस्वी में स्थापित हुआ था, कुछ लोगों का मत है कि इसका जन्म बिहार-झारखण्ड के बैजनाथ धाम में हुआ था, जबकि कुछ इसका जन्म स्थान हरिद्वार में नील धारा के पास मानते हैं। इनके ईष्ट देव कपिल महामुनि हैं। इनकी शाखाएं इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन, त्र्यंबकेश्वर, ओंकारेश्वर और कनखल में हैं। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि 1260 में महंत भगवानंद गिरी के नेतृत्व में 22 हजार नागा साधुओं ने कनखल स्थित मंदिर को आक्रमणकारी सेना के कब्जे से छुड़ाया था।

4) श्री अटल अखाड़ा:- यह अखाड़ा 569 ईस्वी में गोंडवाना क्षेत्र में स्थापित किया गया। इनके ईष्ट देव भगवान गणेश हैं। यह सबसे प्राचीन अखाड़ों में से एक माना जाता है। इसकी मुख्य पीठ पाटन में है लेकिन आश्रम कनखल, हरिद्वार, इलाहाबाद, उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर में भी हैं।

5) श्री आह्वान अखाड़ा:- यह अखाड़ा 646 में स्थापित हुआ और 1603 में पुनर्संयोजित किया गया। इनके ईष्ट देव श्री दत्तात्रेय और श्री गजानन हैं। इस अखाड़े का केंद्र स्थान काशी है। इसका आश्रम ऋषिकेश में भी है। स्वामी अनूपगिरी और उमराव गिरी इस अखाड़े के प्रमुख संतों में से हैं।

6) श्री आनंद अखाड़ा:- यह अखाड़ा 855 ईस्वी में मध्यप्रदेश के बेरार में स्थापित हुआ था। इसका केंद्र वाराणसी में है। इसकी शाखाएं इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन में भी हैं।

7) श्री पंचाग्नि अखाड़ा:- इस अखाड़े की स्थापना 1136 में हुई थी। इनकी इष्ट देव गायत्री हैं और इनका प्रधान केंद्र काशी है। इनके सदस्यों में चारों पीठ के शंकराचार्य, ब्रहमचारी, साधु व महामंडलेश्वर शामिल हैं। परंपरानुसार इनकी शाखाएं इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर में हैं।

8) श्री नागपंथी गोरखनाथ अखाड़ा:- यह अखाड़ा ईस्वी 866 में अहिल्या-गोदावरी संगम पर स्थापित हुआ। इनके संस्थापक पीर शिवनाथजी हैं। इनका मुख्य दैवत गोरखनाथ है और इनमें बारह पंथ हैं। यह संप्रदाय योगिनी कौल नाम से प्रसिद्ध है और इनकी त्र्यंबकेश्वर शाखा त्र्यंबकंमठिका नाम से प्रसिद्ध है।

9) श्री वैष्णव अखाड़ा:- यह बालानंद अखाड़ा ईस्वी 1595 में दारागंज में श्री मध्यमुरारी में स्थापित हुआ। समय के साथ इनमें निर्मोही, निर्वाणी, खाकी आदि तीन संप्रदाय बने। इनका अखाड़ा त्र्यंबकेश्वर में मारुति मंदिर के पास था। 1848 तक शाही स्नान त्र्यंबकेश्वर में ही हुआ करता था। परंतु 1848 में शैव व वैष्णव साधुओं में पहले स्नान कौन करे इस मुद्दे पर झगड़े हुए। श्रीमंत पेशवाजी ने यह झगड़ा मिटाया। उस समय उन्होंने त्र्यंबकेश्वर के नजदीक चक्रतीर्था पर स्नान किया। 1932 से ये नासिक में स्नान करने लगे। आज भी यह स्नान नासिक में ही होता है।

10) श्री उदासीन पंचायती बड़ा अखाड़ा:- इस संप्रदाय के संस्थापक श्री चंद्रआचार्य उदासीन हैं। इनमें सांप्रदायिक भेद हैं। इनमें उदासीन साधु, मंहत व महामंडलेश्वरों की संख्या ज्यादा है। उनकी शाखाएं शाखा प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, त्र्यंबकेश्वर, भदैनी, कनखल, साहेबगंज, मुलतान, नेपाल व मद्रास में है।

11) श्री उदासीन नया अखाड़ा:- इसे बड़ा उदासीन अखाड़ा के कुछ सांधुओं ने विभक्त होकर स्थापित किया। इनके प्रवर्तक मंहत सुधीरदासजी थे। इनकी शाखाएं प्रयागए हरिद्वार, उज्जैन, त्र्यंबकेश्वर में हैं।

12) श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा:- यह अखाड़ा 1784 में स्थापित हुआ। 1784 में हरिद्वार कुंभ मेले के समय एक बड़ी सभा में विचार विनिमय करके श्री दुर्गासिंह महाराज ने इसकी स्थापना की। इनकी ईष्ट पुस्तक श्री गुरुग्रन्थ साहिब है। इनमें सांप्रदायिक साधु, मंहत व महामंडलेश्वरों की संख्या बहुत है। इनकी शाखाएं प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और त्र्यंबकेश्वर में हैं।

13) निर्मोही अखाड़ा:- निर्मोही अखाड़े की स्थापना 1720 में रामानंदाचार्य ने की थी। इस अखाड़े के मठ और मंदिर उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात और बिहार में हैं। पुराने समय में इसके अनुयायियों को तीरंदाजी और तलवारबाजी की शिक्षा भी दिलाई जाती थी।
राधे राधे
*साभार*
अखंड भारत सनातन संस्कृति
पंडित अनूप चौबे

Anoop Awasthi

श्री शनि चालीसा (Forty Dohaas of Lord Shani) – with translation in Englishजय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल।दीनन के दु...
18/03/2023

श्री शनि चालीसा (Forty Dohaas of Lord Shani) – with translation in English

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल।
दीनन के दुःख दूर करी, कीजै नाथ निहाल।।
O Ganesha, the Son of Girija! I hail thee. You are benign and benefactor. O Master! Banish the woes of poor and bless them with happiness.
जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज।
करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज।।
O Lord Shanidev! Victory be to You! O Son of Surya! Answer my prayer with grace and protect the honor of the people.

चौपाई Chaupaai
जयति जयति शनिदेव दयाला, करत सदा भक्तन प्रतिपाला।
O Merciful Shanideva! I hail thee!! You are ever generous to the faithful.
चारि भुजा तनु श्याम विराजे, माथे रतन मुकुट छवि छाजे।
Four arms You have, darkish complexion adds beauty to Your body and gem studded crown graces Your head.
परम विशाल मनोहर भाला, टेढ़ी दृष्टि भृकुटी विकराला।
Your broad forehead is magnificent, the eye-brows are very bold and glance slanted (meaningfully).
कुंडल श्रवण चमाचम चमके, हिये माल मुक्तन मणि दमके।
Large shiny rings grace Your ears and on Your chest undulates a garland of mukta gems.
कर में गदा त्रिशूल कुठारा, पल बिच करैं अरिहिं संहारा।
Your hands hold a mace, trident and bolt. In a trice You slay Your enemies.
पिंगल कृष्णे छाया नंदन, यम कोणस्थ रौद्र दुःख भंजन।
The woe banisher Pingal, Krishna, Chhayanandana (Son of Chhaya), Yama (God of Death), Konastha and Rudra --
सौरी मंद शनि दस नामा, भानु पुत्र पूजहिं सब कामा।
--Sauri, Manda, Shani and Suryaputra (Son of Surya) are Your ten names. The chant of them fulfill wishes.
जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वै जाहीं, रंकहु राव करैं क्षण माहीं।
O Lord! The one You are pleased with, gets elevated to royalty instantly, even if poor.
पर्वतहू तृण होई निहारत, तृणहू को पर्वत करि डारत।
Your one look turns a mountain into a straw and straw gets turned into a mount.
राज मिलत वन रामहिं दीन्हों, कैकेयी की मति हरि लीन्हों।
When Rama was about to be coronated, You cast your shadow on the mind of Kaikeyi and got Rama exiled.
वनहूँ में मृग कपट दिखाई, मातु जानकी गयी चुराई।
In the forest You created an illusion of a deer and it resulted in the abduction of Mother Sita (Janaki).
लखनहिं शक्ति विकल करि डारा, मचि गा दल में हाहाकारा।
Your bolt blow wounded Lakshamana and He fell as Rama camp plunged in grief and dismay.
रावण की गति मति बौराई, रामचन्द्र सों बैर बढाई।
You warped up the mind of a scholar like Ravana and he antagonized Rama with an outrageous act.
दियो कीट करि कंचन लंका, बजि बजरंग बीर की डंका।
The golden Lanka, You turned into rubble and ash to add glory to Hanuman.
नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा, चित्र मयूर निगलि गै हारा।
King Vikramaditya was stepped upon by you and a picture of peacock swallowed down the necklace of the queen.
हार नौलखा लाग्यो चोरी, हाथ पैर डरवायो तोरी।
Vikramaditya was accused of stealing the necklace and his legs and hands were got broken in punishment.
भारी दशा निकृष्ट दिखायो, तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो।
You pushed down the king in a deep hole and he had to toil at kolhu (desi oil extruder) for the oil man.
विनय राग दीपक मंह कीन्हों, तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हों।
Then, he prayed to Yoy in Deepaka Raga and You restored his happiness propitiated.
हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी, आपहुं भरे डोम घर पानी।
You cast Your slanted glance at King Harishchandra and he had to sell his wife and he himself work for cremation undertaker.
तैसे नल पर दशा सिरानी, भूंजी मीन कूद गयी पानी।
When Your displeasure affected King Nala, the fish he had fried, flew off into the water.
श्री संकरहिं गह्यो जब जाई, पार्वती को सती कराई।
When You got cross with Lord Shiva, His wife had to immolate herself in yajna firepit.
तनिक विलोकत ही करी रीसा, नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा।
Your instant glance of angst made the head of the son of Gauri fly off into the sky severed.
पाण्डव पर भये दशा तुम्हारी, बची द्रौपदी होती उघारी।
The wife of Pandava’s, Draupadi, almost got stripped naked in public, when You paid them an unkind attention.
कौरव के भी गति मति मारयो, युद्ध महाभारत करि डारयो।
You also warped up the minds of Kaurava’s, who pushed themselves into Mahabharata war.
रवि कहं मुख महं धरि तत्काला, लेकर कूदि परयो पाताला।
You put a mighty deity like Surya (Sun) in Your mouth (like a sweet ball) and went to Pataal Lok (under the earth).
शेष देव लखि विनती लायी, रवि को मुख ते दियो छुड़ाई।
When all Gods prayed to You, then Surya was freed by You (as an kind act).
वाहन प्रभु के सात सुजाना, हय दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना।
All know that You have seven carriers – horse, elephant, donkey, deer, dog ---
जम्बुक सिंह आदि नग धारी, सो फल ज्योतिष कहत पुकारी।
--- jackal and a lion. Astrologers claim different effects of them.
गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं, हय ते सुख सम्पति उपजावैं।
The elephant ushers in Goddess Lakshmi into a house. The horse carries in riches and many joys.
गर्दभ हानि करै बहु काजा, सिंह सिद्ध कर राज समाजा।
The donkey ride is inauspicious and causes works to go wrong. The lion ride gains success in court or society.
जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै, मृग दे कष्ट प्राण संहारै।
Jackal riding Shani destroys intellect. The deer ride means pain and woeful death.
जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी, चोरी आदि होय डर भारी।
When Shani arrives on a dog, thefts may occur. Fears will also sit in.
तैसहिं चार चरण यह नामा, स्वर्ण लौह चांदी अरु तामा।
The foot of a new born is examined for Shani effect of four kinds – gold, iron, silver and copper foot.
लौह चरण पर जब प्रभु आवैं, धन जन सम्पति नष्ट करावैं।
When Lord Shani arrives on iron foot, then all the money and properties are lost.
समता ताम्र रजत शुभ कारी , स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी।
The copper and iron feet are equally auspicious. The gold foot, beget all the happiness and benefactions.
जो यह शनी चरित नित गावै, कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै।
Anyone who sings this Shani-Charitra every day, he suffers no bad tidings or low periods.
अद्भुत नाथ दिखावैं लीला, करैं शत्रु के नशि बलि ढीला।
Lord is great miracle worker. He weakens the nerves and the power of the enemies.
जो पंडित सुयोग्य बुलवाई, विधिवत शनि ग्रह शान्ति कराई।
Any person who gets an able pundit to undertake the regime to appease Shani --
पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत, दीप दान दै बहु सुख पावत।
--- offers water to pipal tree on Saturday and lights a lamp there, he begets a great happiness.
कहत रामसुन्दर प्रभु दासा, शनि सुमिरत सुख होत प्रकासा।
The servant of the Lord, Ramasundara says that the very thought of Shanideva, lights up the place and person with happiness.

दोहा DOHAA
पाठ शनिश्चर देव को, कियो भक्त तैयार।
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार।।
A faithful has prepared this Shani Chaalisa. Its recital for forty continuous days will gain final salvation.

 िदेवद्वार खड़े शनि देव तुम्हारे,कृपा करो शनि दया करो ।करूं तुम्हारी चरण वंदना,कष्ट हमारे विदा करो ।।द्वार खड़े शनि देव ...
11/03/2023

िदेव

द्वार खड़े शनि देव तुम्हारे,

कृपा करो शनि दया करो ।

करूं तुम्हारी चरण वंदना,

कष्ट हमारे विदा करो ।।

द्वार खड़े शनि देव तुम्हारे ।।

तुम्हे मालुम सभी कुछ

घेरे खड़े है गम कितने,

तुम से नही तो किस से कहे

लाचार बड़े है हम कितने ।

तुम से है ये विनती मेरी

क्षमा करो अपराध मेरे,

भीड़ दु:खो की घेरे खड़ी है

कोई नही है साथ मेरे ।।

करू तुम्हारी चरण वंदना

कष्ट हमारे विदा करो ।

द्वार खड़े शनि देव तुम्हारे ।।

दुनिया की क्या बात करू मैं

परछाई भी मेरी दुश्मन है,

राहे हो गई अंगारों सी

आग में जलता जीवन है ।

हाथ धरो मेरे सिर के ऊपर

शीतल सी छाया कर दो,

हो जाए दुःख दूर हमारे

तुम ऐसी माया करदो ।।

करू तुम्हारी चरण वंदना

कष्ट हमारे विदा करो ।

द्वार खड़े शनि देव तुम्हारे

कष्ट हमारे विदा करो।।

01/03/2023

#होलाष्टक_में_एकादशी -- #क्या_करें

10/02/2023

नौ ग्रहों की अनुकूलता के लिए सूखे मेवे का सेवन

01/02/2023

#वास्तु -- ें_बच्चों_के_पढ़ने_का_स्थान

28/01/2023

#शनि -- #अस्त_अवस्था_में

श्री वासुदेव सरस्वती रचित श्री सरस्वती स्तोत्र :--हृद्वक्षः स्थितविद्रुमाधिकमदात्त्रीशस्य या स्फूर्तिदा मालापुस्तकपद्मभृ...
25/01/2023

श्री वासुदेव सरस्वती रचित श्री सरस्वती स्तोत्र :--

हृद्वक्षः स्थितविद्रुमाधिकमदात्त्रीशस्य या स्फूर्तिदा मालापुस्तकपद्मभृच्च वरदा या सर्वभाषास्पदा ।। या शंङ्खस्फटिकर्क्षनाथविशदा सा शारदा सर्वदा प्रीता तिष्ठतु मन्मुखे सुवरदा वाग्जाड्यदा सर्वदा ||१||

यस्यास्त्रीणि गुहागतानि हि पदान्येकं त्वनेकेडितं स्तोतुं तां निगमेडितां बुधकुलं जातं त्वलं व्रीडितम् । ब्रह्माद्या अपि देवता न हि विदुर्यस्याः परं क्रीडितं प्रारब्धाऽत्रनुतिर्मयैव रुरुणा 'शार्दूलविक्रीडितम्' ।।२।।

अयि सर्वगुहास्थितेऽजिते मयि तेऽपाङ्गदृगस्तु पूजिते। त्वदृते नहि वागधीश्वरि व्यवहारोऽपि परावरेश्वरि ! ||३||

समयोचितवाक्प्रदे मुदे विदुषां संसदि वादिवाददे । मयि मातरशेषधारणा दयितेऽजस्य सदाऽस्तु तारणा ||४||

यद्धस्ते कमलं च तत्र कमलालीलाविहारी हरिस्तस्याः । सन्निकटेऽस्य नाभिकमले स्याल्लोकमूले विधिः । भेदाभेदभिदोऽसुखेषु च विधेर्ये स्वप्रमाणा नृणां । तेभ्यो यज्ञविधिस्ततोऽमरगणा जीवंति सा पातु वाक् ||५||

नमो नमस्तेऽस्तु महासरस्वति! प्रसीद मातर्जगतो महत्स्वपि । परेशि वाग्वादिनि भास्वति प्रकाशिके तेऽस्तु नमो यशस्विनी ||६||

त्रिषष्टिवर्णाऽऽशुगयुक्परा या भूत्याऽथ पश्यत्यभिधाऽथ मध्या। स्थानप्रयत्नादिवशन्मुखे च या वैखरीति प्रणमामि गाम् ॥७।।

त्वं ब्रह्मयोनिरपरा सरस्वति परावरा । साक्षात्स्वभक्तहृसंस्थे प्रसीद मतिचेतने ॥८॥

सरस्वतिस्तुतिमिमां वासुदेवसरस्वती चक्रे यमनुजग्राह नरसिंहसरस्वती ||९||

भावार्थ:

जो अपने मनोरम वक्षःस्थल पर धारण किए विद्रुम मणियों के अधिक मद से त्रिदेव को स्फूर्ति देने वाली है, जो माला, पुस्तक और कमल को धारण करने वाली है, जो वरदान प्रदान करने वाली है, जो सभी भाषाओं की आधार स्तम्भ है, जो शंख, स्फटिक एवं शशि के सदृश उज्ज्वल है, वे सब देने वाली है एवं जो अज्ञानता को दूर करने वाली है, ऐसी वाणीदेवी मेरे मुख में सदा वास करे।

जिसके तीनों पद शरीर के आंतरिक विवरो में छुपे हुए हैं और जिनका एक पद अनेक लोगों के द्वारा पूजित है और जो वेदों द्वारा पूजित है, ऐसी (देवी) जिसका स्तवन करने में पंडितगण भी अपने को अक्षम समझते हैं, जिसकी लीला को ब्रह्मा आदि देवगण भी नहीं जान पाये। जिस प्रकार सिंह के जैसा पराक्रम करने का मृग प्रयत्न करता है, वैसा ही मेरे द्वारा तेरी स्तुति करना है।

हे सभी के हृदय रूपी गुहा में निवास करने वाली! हे अपराजिता !
हे पूजा करने के योग्य तेरी कृपा दृष्टि मुझ पर पड़े।

हे वाणी की अधीश्वरी! हे अति उत्तम देवी!
तेरे बिना कोई भी व्यवहार सम्भव नहीं है।

हे समयोचित वाणी प्रदान करने वाली! हे आनन्दरूपा!
हे विद्वानों की सभा में प्रतिद्वन्दी के वाद को खंडित करने वाली!
हे ब्रह्म-प्रिया! हे माता,
मेरे मन की सभी भावनाएँ सदैव तारण करने वाली होवे।

जिसके हाथ में कमल है, जिसमें लक्ष्मी की लीला के साथ विहार करने वाले विष्णु हैं, उसके (देवी के) पास उसके (विष्णु) लोक के (कारण रूप) मूल रूप नाभि-कमल में ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं।

भेद और अभेद को विभाजित करने वाले ब्रह्मा के सुख के विषय पर ही स्वयं प्रमाण (वेद) हैं, लोगों के द्वारा उसके लिये यज्ञ किया जाता है, जिसके कारण देवगण जीवित रहते हैं। वह वाणी रक्षा करे।

मां सरस्वती की कृपा सभी को प्राप्त हो।

25/01/2023

#बुरे_वक्त_का_उपाय

Address

Miranda Hospital Road
Lucknow
226004

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