23/03/2026
हिमालय की नीरव, दिव्य और अलौकिक गोद में जहाँ शिखर स्वयं आकाश से संवाद करते प्रतीत होते हैं, वहीं विराजती हैं लोकआस्था की अधिष्ठात्री, करुणा और शक्ति की मूर्त स्वरूप माँ नंदा देवी। वे केवल एक देवी नहीं, अपितु उत्तराखंड की आत्मा हैं एक ऐसी बेटी, जो जन्म लेती है, स्नेह पाती है, और फिर अपने कर्तव्यों की राह पर अग्रसर हो जाती है।
पुराणों और लोकगाथाओं में वर्णित है कि नंदा देवी राजा हेमंत और माता मेनावती की सुकन्या के रूप में अवतरित हुईं। उनके व्यक्तित्व में कोमलता और अदम्य शक्ति का अद्भुत समन्वय था। समय के साथ उनका विवाह भगवान शिव से हुआ और वे हिमालय की उच्चतम, निर्मल और दिव्य शिखरों में सदैव के लिए प्रतिष्ठित हो गईं मानो स्वयं प्रकृति ने उन्हें अपने हृदय में स्थान दिया हो।
किन्तु यह कथा केवल दिव्यता की नहीं, भावनाओं की भी है। नंदा देवी हर बारह वर्षों में अपने मायके नौटी गाँव लौटती हैं। यह आगमन केवल एक देवी का आगमन नहीं, बल्कि हर उस बेटी की वापसी है, जो अपने जन्मस्थान से दूर जाकर भी अपने मूल से जुड़ी रहती है। इसी भावभूमि पर आरंभ होती है महान और तपःपूर्ण नंदा देवी राजजात लगभग 280 किलोमीटर की वह यात्रा, जो श्रद्धा को पग-पग पर परखती है।
दुर्गम पथ, ऊँचे पर्वत, शीतल वायु और अनिश्चित मौसम सब कुछ मानो भक्त की आस्था की परीक्षा लेते हैं। परन्तु जब हृदय में माँ के प्रति समर्पण हो, तब हर कठिनाई सरल प्रतीत होती है। यह यात्रा केवल पैरों से नहीं, आत्मा से तय की जाती है
जहाँ हर कदम एक प्रार्थना बन जाता है और हर श्वास एक मंत्र।
यह परंपरा हमें यह भी सिखाती है कि जीवन केवल प्राप्ति का नहीं, त्याग और समर्पण का भी नाम है। जैसे एक पुत्री अपने कर्तव्यों के लिए अपने घर से विदा होती है, वैसे ही माँ नंदा देवी का यह आवागमन हमें जीवन के गहनतम भावों से परिचित कराता है विरह, प्रेम, स्मृति और पुनर्मिलन।
नन्दे देवि जगन्माते शैलराजसुते शुभे।
त्वं नमामि जगद्धात्रि सर्वकामार्थसिद्धये॥
हिमालये तु निवसन्तीं पार्वतीं परमेश्वरीम्।
भक्तानुग्रहकर्त्रीं तां नन्दां वन्दे पुनः पुनः॥
माँ नंदा देवी की यह कथा केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतना है—एक ऐसा आलोक, जो हमें अपनी संस्कृति, अपनी जड़ों और अपने संबंधों की गहराई का अनुभव कराता है।
🙏 उनकी कृपा से जीवन में सदैव संतुलन, श्रद्धा और शांति बनी रहे। 🙏 जय माता दी ☺️🙏
— डा. एकता सिंह