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देश में पहली FIR कब, किसने और क्यों दर्ज कराई थी, किस पुलिस थाने में लिखी गई थी रिपोर्ट?-–------------------------------...
26/10/2021

देश में पहली FIR कब, किसने और क्यों दर्ज कराई थी, किस पुलिस थाने में लिखी गई थी रिपोर्ट?
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आख़िरकार भारत में 6 अक्टूबर, 1860 में 'ताज-ए-रात-ए हिंद' यानी इंडियन पीनल कोड (Indian Penal Code) की शुरुआत हुई. साल 2021 में इस सिस्टम को अपनाये पूरे 160 साल हो चुके हैं. भारत में आज भी आईपीसी की बहुत सी धाराएं वहीं हैं, जो 160 साल पहले हुआ करती थीं. इस दौरान अंग्रेज़ों ने आईपीसी बनाने के साथ ही दिल्ली में 5 थाने भी बनाये थे. इनमें कोतवाली, सदर बाज़ार, सब्जी मंडी, महरौली और मुंडका (नांगलोई) शामिल थे.

भारतीय पुलिस विभाग के पुराने रेकॉर्ड्स के मुताबिक़, 'इंडियन पीनल कोड' सिस्टम के तहत देश की पहली एफ़आईआर (India’s First FIR) 18 अक्टूबर, 1861 को दिल्ली के 'सब्जी मंडी थाने' में दर्ज की गई थी. इस दौरान कटरा शीशमहल निवासी मयुद्दीन, पुत्र मुहम्मद यार ख़ान ने चोरी की FIR दर्ज कराई थी.

इस FIR के मुताबिक़,17 अक्टूबर की रात मयुद्दीन के घर से 3 डेगचे, 3 डेगची, 1 कटोरा, 1 कुल्फी बनाने का फ्रेम, 1 हुक्का और घर की औरतों के कपड़े चोरी हो गये थे. इस दौरान चोरी हुए सामान की क़ीमत उस समय 45 आने थी. 16 आने का 1 रुपया होता है. इस हिसाब से ये क़रीब 2 रुपये 70 पैसे की चोरी हुई.

First FIR Report Lodged by Delhi Police in British India: साल 2017 में दिल्ली पुलिस ने 'खास है इतिहास' टैगलाइन के साथ अपने ट्विटर हैंडल से इस रोचक जानकारी को साझा किया था. इस दौरान पुलिस विभाग ने तारीख के साथ-साथ उस पहली FIR की फ़ोटो भी शेयर की थी. 18 अक्टूबर, 1861 को दर्ज की गई ये FIR उर्दू में लिखी गई थी.

~ Mohd Jilani

24 अक्टूबर 1260 ई को रुक्नुद्दीन बेबर्स ने मिस्र के सुल्तान सैफ़-उद-दीन का ख़ात्मा कर के इक़तिदार अपने हाथों में लिया था।बे...
25/10/2021

24 अक्टूबर 1260 ई को रुक्नुद्दीन बेबर्स ने मिस्र के सुल्तान सैफ़-उद-दीन का ख़ात्मा कर के इक़तिदार अपने हाथों में लिया था।

बेबर्स ममलूक सल्तनत का पहला नामूर हुक्मरां है... उसने 1260 ई से 1277 ई तक 17 साल मिस्र और शाम पर हुकूमत की.... वह हलाकू ख़ान और दिल्ली के ग़यास-उद-दीन बलबन का हम'असर था.... वह नसलन एक तुर्क था जिसे ग़ुलाम बनाने के बाद फ़रोख़्त कर दिया गया था....
कहते हैं के मंगोलों ने भी इसे ग़ुलाम बना कर शाम में बेच दिया था.... वह अय्यूबी सुल्तान अस'सालेह अय्यूब का ज़ाती मुहाफ़िज़ भी था.... वह सातवीं सुलेबी जंग में फ़्रांस के लुईस नहम(9)और 1260 ई में जंग ऐन जालूत में मंगोलों को शिकस्त देने वाले लश्करों का कमांडर था.... बग़दाद को तबाह करने के बाद जब हलाकू की फौजें शाम की तऱफ बढ़ीं तो #बेबर्स और एक दुसरे सरदार सैफ़-उद-दीन ने मिल कर 1260 ई में ऐन जालूत के मक़ाम पर उन को फ़ैसला कुन शिकस्त दी और शाम से मंगोल फ़ौजों को निकाल बाहर किया.... उसने मिस्री सल्तनत की शिमाली सरहद ऐश्या-ए-कूचक के वस्ती इलाक़ों तक पहुंचा दी....

बेबर्स सिर्फ़ एक फ़ातेह नहीं था बल्कि समझदार और आदिल हुकुमरां भी था... उस के दौर-ए-हुकूमत में कई अहम् काम अंजाम दिये गए।।।

उनमें से एक ख़िलाफ़त के सिलसिले की बहाली है। सुक़ूत बग़दाद और ख़लीफ़ा मोतसिम बिल्लाह की शहादत के बाद इस्लामी दुनिया 3 साल तक बग़ैर ख़िलाफ़त के रही... इत्तेफ़ाक़ से ज़ाहिर बिल्लाह अब्बासी का एक लड़का अबुल क़ासिम अहमद मंगोलों की क़ैद से छूट कर 1262 ई में मिस्र आ गया।।।

बेबर्स इसको इज़्ज़त-ओ-एहतराम के साथ #क़ाहेरा लाया और उस ज़माने के मश्हूर आलिम अज़ीज़-उद-दीन के हाथ पर बे'अत की और मिस्र में उसके नाम का ख़ुत्बा और सिक्का जारी हुआ... इस तरह अब्बासी ख़िलाफ़त अब बग़दाद से क़ाहेरा मुंतकिल हो गई।।।

वह सलाह-उद-दीन अय्यूबी (र) की जंगी कामयाबियों से बहुत मुता'अस्सिर था और उसके कारनामों को दोहराना चाहता था।।।

उसकी सवानेह हयात #सीरत_सुल्तान_बेबर्स नामी किताब में दर्ज है....

25 अक्टूबर 1147 को स्लजूक़ी तुर्कों ने जर्मनी के बादशाह कोनराड सोम(3rd) को शिकस्त दी, स्लजूक़ी तुर्कों की जानिब से Mesud I...
25/10/2021

25 अक्टूबर 1147 को स्लजूक़ी तुर्कों ने जर्मनी के बादशाह कोनराड सोम(3rd) को शिकस्त दी, स्लजूक़ी तुर्कों की जानिब से Mesud I कमांडर की हैसियत से थे। इस जंग के बाद जर्मन बिलकुल ही कमज़ोर हो गए।

और इस तरह दूसरी सुलेबी जंग में ईसाईयों को नाकामी का मुंह देखना पड़ा, दरअसल इमाम-उद-दीन की वफ़ात के बाद 1144 ई में उनके लाएक़ बेटे नूर-उद-दीन ज़ंगी(र) उनके जानशीं हुए, सुलेबियों के मुक़ाबले में वह अपने वालिद से कम लाएक़ ना थे, तख़्त नशीन होने के बाद उन्हों ने मुसलमानों में जिहाद की एक नई रूह फूँक दी, और ईसाईयों से ज़ियादा तर ईलाक़ै छीन लिये और उन्हें हर जगह पर शिकस्त देते हुए डेसा(रोहा)के शहर पर दोबारा क़ाबिज़ हो गए।

ईसाईयों की शिकस्त की ख़बरें पूरे योरोप में पहुँची तो एक बार पोप यूजेन सोम(3rd) ने सुलेबी जंग का ऐलान किया और इस तरह दूसरी सुलेबी जंग का आग़ाज़ हुआ, 1147ई में जर्मनी के बादशाह कोनराड सोम(3rd) और फ़्रांस के हुकुमरां लूई हफ़तुम(7th) की क़यादत में 9 लाख अफ़राद पर मुश्तमिल फ़ौज मुसलमानों के मुक़ाबला के लिये योरोप से रवाना हुई, इसमें औरतें भी शामिल थीं, पहले सुलेबी जंगों की तरह इन फौजियों ने भी ख़ूब इख़लाक़ सोज़ हरकतें दोबारा की, लुई हफ़तुम(7th) की फ़ौज का एक बड़ा हिस्सा स्लजूक़ीयों के हाथों तबाह हुआ; जिनका क़ायद Mesud I था, इस लिये जब वह इंताकिया पहुंचा तो इसकी तीन चौथाई फ़ौज बर्बाद हो चुकी थी, अब उसकी बाक़ी मांदह फ़ौज आगे बढ़ कर दमिश्क़ का मुहासिरा कर लिया लेकिन सैफ़-उद-दीन ज़ंगी और नूर-उद-दीन ज़ंगी(र) की आपसी कोशिशों से सुलेबी अपने इरादे में नाकाम रहे, लूई हफ़तुम और कोनराड को दोबारा योरोप की सरहदों में धकेल दिया गया, और इस तरह दूसरी सुलेबी जंग नाकाम हो गई।

एक ज़माना था के जब भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और बर्मा सब एक-दूसरे से जुड़े थे; यानी एक मुल्क थे। और आज एक दूसरे से अलग-...
24/10/2021

एक ज़माना था के जब भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और बर्मा सब एक-दूसरे से जुड़े थे; यानी एक मुल्क थे। और आज एक दूसरे से अलग- अलग हैं। वो दौर था जब लोग काबुल से निकलते थे, पेशावर, दिल्ली, कलकत्ता होते हुए सीधे रंगून निकल जाते थे।

हाल तक हमें रंगून से एक गाना जोड़ते आया है, जिसका बोल है - ‘मेरे पिया गए रंगून, वहां से किया है टेलीफ़ून, तुम्हारी याद सताती है।’ वैसे रंगून आज से नहीं पिछले डेढ़ सदी से हमारी यादों का हिस्सा है। अंग्रेज़ों ने 1857 में दिल्ली पर क़ब्ज़ा किया। मेजर हडसन ने मुग़ल शहज़ादों का ख़ून पीया, उनके सिर तश्त में रखकर अस्सी बरस के बूढ़े बाप को दस्तऱख्वान पर भिजवाए। बहादुर शाह ज़फ़र को एक नाजायज़ और ज़ालिमाना मुक़दमा चलाकर जिलावतन किया। फिर रंगून में उन्हें क़ैद किया और मरने के छोड़ दिया और उन्हे उनके मुल्क हिंदुस्तान में दफ़न होने की ख़ातिर दो ग़ज़ ज़मीन के लिए तरसाया। हद तो यह है के बादशाह के लिए रंगून में ज़मीन नही थी … उनके लिए उस सरकारी बंगले के पीछे ज़मीन पर खुदाई की गयी जहां उन्होने 7 नवंबर 1862 को आख़री सांस ली.. और बादशाह को ख़ैरात में मिली मिटटी के निचे डाल दिया गया ... और इस तरह एक सूरज ग़ुरूब हो जाता है।

1947 में हिंदुस्तान आज़ाद होता है, साथ मे बटवारा भी, बर्मा पहले से वजूद में था; पाकिस्तान वजूद में आता है, फिर 1971 में बंग्लादेश! रह रह कर इन मुल्क के लीडर आख़री मुग़ल शहंशाह के मज़ार पर हाज़री देने गए। पाकिस्तान के के प्रधानमंत्री रहते हुए मियां नवाज़ शरीफ़ और राष्ट्रपति रहते हुए अयूब ख़ान, परवेज़ मुशर्रफ़ और आसिफ़ अली ज़रदारी ने बहादुर शाह ज़फ़र के मज़ार पर हाज़री दी और फूल चढ़ाए। साथ ही बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रहते हुए बेगम ख़ालिदा ज़िया ने बहादुर शाह ज़फ़र के मक़बरे कि ज़यारत की। हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री रहते हुए राजवी गांधी और नरेंद्र मोदी ने, राष्ट्रपति रहते हुए एपीजे अब्दुल कलाम ने, उपराष्ट्रपति रहते हुए भैरोंसिंह शेखावत और हामिद अंसारी ने, विदेशमंत्री रहते हुए अटल बिहारी वाजपेयी और जसवंत सिंह ने हिंदुस्तान के इस जिलावतन हुक्मरां बहादुर शाह ज़फ़र की क़ब्र पर हाज़री दी।

पर हिंदुस्तान के आख़री मुग़ल शहंशाह बहादुरशाह ज़फ़र के मज़ार पर हाज़री देने वालों में सबसे बड़ा नाम नेताजी सुभाष चंद्र बोस का है, जिन्होंने अखंड भारत के लीडर की हैसियत से रंगून में बहादुरशाह ज़फ़र की मज़ार पर आज़ाद हिंद फ़ौज के अफ़सरों के साथ 1942 में सलामी दी थी और ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया था।

आज़ाद हिंद फ़ौज के सिपाही 'कर्नल' निज़ामुद्दीन के हिसाब से सुभाष बोस ही वो इंसान थे जिन्होंने आख़िरी मुग़ल शहंशाह बहादुरशाह ज़फर की क़ब्र को पूरी इज़्ज़त दिलवाई। उनके अनुसार "ज़फर की क़ब्र को नेताजी बोस ने ही पक्का करवाया था। वहाँ क़ब्रिस्तान में गेट लगवाया और उनकी क़ब्र के सामने चारदीवारी बनवाई थी।"

16 दिस्मबर 1987 को प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने यहां के विज़िटर्स बुक में अपना पैग़ाम लिख कर ख़िराज ए अक़ीदत पेश किया था, जो कुछ इस तरह था के अगर्चे आप हिंदुस्तान में दफ़न नही हैं, मगर हिन्दुस्तान आपका है, आपका नाम ज़िन्दा है, मै उस याद को ख़िराज ए अक़ीदत पेश करता हुं जो हमें हमारी पहली जंग ए आज़ादी की याद दिलाती है, जो हमने जीती थी।

9 मार्च 2006 को जब हिंदुस्तान के राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने मज़ार पर हाज़िरी दी; तब उन्होने वहां के विज़िटर्स बुक में लिखा : ‘आपने अपने एक शेर में लिखा है कि मेरे मज़ार पर कोई नहीं आएगा, न कोई फूल चढ़ाएगा, न शमा जलाएगा.. लेकिन आज मैं यहां सारे हिंदुस्तान की तरफ़ से आपके लिए फूल लेकर आया हूं और मैंने शमां रौशन की हैं।’

26 दिस्मबर 1943 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने बर्मा के महामहिम डॉक्टर बॉ मॉऊ के साथ आख़री मुग़ल शहंशाह बहादुर शाह ज़फ़र के मज़ार पर हाज़री देने के बाद एक ऐतिहासिक भाषण दिया जो कुछ इस तरह से है :-

महामहिम और मित्रों,
आज हम आज़ाद हिंदुस्तान के आख़री शहंशाह बहादुर शाह ज़फ़र के मज़ार पर जमा हुए हैं, यह शायद इतिहास का अजीब गौरवशाली संयोग है कि जहां भारत के अंतिम सम्राट की क़ब्र बर्मा में सरज़मीन पर है, वहीं स्वातंत्र बर्मा के अंतिम राजा की अस्थियां हिंदुस्तान की मिट्टी में है!

हम अपना अडिग इरादा इस पवित्र स्मारक के सामने व्यक्त करते हैं, उसकी मज़ार के सामने खड़े हो कर व्यक्त कर रहे हैं, जो हिंदुस्तान की आज़ादी की लड़ाई का अंतिम योद्धा था, वह जो मनुष्यों के बीच एक शहंशाह था और जो शहंशाहों के बीच एक मनुष्य था। हमने बहादुर शाह ज़फ़र की यादों को संजो कर रखा है। हम हिंदुस्तानी, चाहे किसी भी मज़हब के मानने वाले क्युं न हों, बहादुर शाह ज़फ़र को हमेंशा याद करते हैं, न केवल इस लिए कि वह वही आदमी था, जिसने दुशमन पर बाहर से हमला करने के लिए देशवासियों को उत्तेजित किया था, बल्कि इस लिए भी क्युंके उसके झण्डे के नीचे सभी प्रान्तो के हिंदुस्तानी जमा हुए थे और लड़े थे।

24 अक्टूबर 1989 को शुरू हुआ मुस्लिम विरोधी भागलपुर दंगा, हिन्दोस्तान की आज़ादी के बाद बिहार की तारीख़ का सबसे बड़ा दंगा था!...
24/10/2021

24 अक्टूबर 1989 को शुरू हुआ मुस्लिम विरोधी भागलपुर दंगा, हिन्दोस्तान की आज़ादी के बाद बिहार की तारीख़ का सबसे बड़ा दंगा था!

यही वो दंगा था जिसके बाद लालू प्रसाद यादव सियासी तौर पर काफ़ी मज़बूत हुए, इसी दंगे के बाद राजद का मुस्लिम-यादव समीकरण बना, इससे इंकार नही किया जा सकता कि इस दंगे के दौरान लालू प्रसाद यादव ने बेहतर काम किया था। यही वजह थी कि बिहार में जो मुस्लिम कांग्रेस का वोट बैंक था वो कांग्रेस से टूटकर राजद के साथ जुड़ गया, फिर वही M+Y समीकरण तैयार हुआ।

यही वजह रही कि 1990 में जनता दल से लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बने और 1989 के बाद बिहार से कांग्रेस का सफ़ाया हो गया, फिर कांग्रेस कभी सत्ता में नही आ पाई।

1989 में भागलपुर दंगा जब हुआ था तब बिहार में कांग्रेस की सरकार थी सत्येंद्र नारायण सिन्हा मुख्यमंत्री थे, केंद्र में भी कांग्रेस की सरकार थी और राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे।
ये बताने का मक़सद सिर्फ ये है कि हिन्दोस्तान के किसी भी सूबे में जब भी नरसंहार हुआ वो कांग्रेस की शासन में हुआ। हमारे मुल्क में 12 से ज़्यादह बड़े मुस्लिम नरसंहार हुए जिसमें तक़रीबन 10 नरसंहार बाक़ायदा कांग्रेस की देखरेख में हुआ, जिसे आप मुस्लिम विरोधी या सरकारी नरसंहार भी कह सकते हैं।

कहा जाता है भागलपुर दंगे में मुसलमानों के ख़िलाफ़ 2 जातियों ने सबसे ज़्यादा उपद्रव किया था, "यादव और गंगोता"... इस दंगे में 93% मुसलमानों की हत्या हुई थी।

इस मुस्लिम विरोधी दंगे की शिकार और चश्मदीद मलका बेगम बताती हैं...
"भागलपुर दंगे के बाद हालात बहुत बदतरीन थे, मेरे गांव "चंधेरी" में दंगाइयों ने क़रीब 60 मुसलमानों को मार दिया था, मैंने अपनी आंखों से अपने माँ-बाप की हत्या होते हुए देखा है, मुझे दंगाइयों ने मरा हुआ समझकर छोड़ दिया था, मैं एक तालाब में दर्जनभर से ज़्यादह लाशों के साथ घंटो पड़ी रही, मैं जिस तालाब में पड़ी थी वो तालाब मेरे अपनों के खून से सुर्ख़ हो चुकी थी"

1989 में हुए भागलपुर दंगों के बाद से ही 1992 में बाबरी मस्जिद के खिलाफ आंदोलन तेज़ हुआ था, ये वही दौर था जिसके बाद पूरे देश मे हर तरफ हिंसा फैली हुई थी, अगर कांग्रेस सरकार ने भागलपुर दंगों पर कंट्रोल कर लिया होता तो शायद 1992 में हुए बाबरी की शहादत/मुम्बई दंगे को रोका जा सकता था, लेकिन ऐसा कुछ नही हुआ।

भागलपुर दंगे से कुछ वक़्त पहले की बात थी मुहर्रम था, उस मौके पर भागलपुर का तत्कालीन एसएसपी "के एस द्विवेदी" ने अपने एक भाषण में कहा था!
"भागलपुर को हम दूसरा कर्बला बना देंगे, इसी भाषण में एसएसपी "के एस द्विवेदी" ने मुसलमानों के नरसंहार की बात भी कही थी"

इस बयान के बारे में मालूम चलने के बाद भागलपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी ने "के एस द्विवेदी" से माफ़ी मांगने को कहा था, लेकिन वो एसएसपी इतना ताक़तवर था और हिंदूवादी संगठनों में उसकी इतनी मज़बूत पैठ थी कि बिहार के मुख्यमंत्री तो छोड़िए देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी उसका ट्रांसफर तक नही करवा पाए थे, वहां के लोगों का कहना था अगर "द्विवेदी" हट जाता तो बहुत से लोगों की जान बच सकती थी।

तत्कालीन मुख्यमंत्री सिन्हा ने उस वक़्त लिखा था...
"हटाना चाहता था लेकिन हटा नही पाया, मजबूर था"

आज भागलपुर नरसंहार की 31वीं बरसी है। लेकिन 31 साल गुज़र जाने के बाद भी इंसाफ़ के नाम पर एक पत्ता तक नहीं हिला। लालू प्रसाद यादव की दंगों के वक़्त काम की सराहना का मतलब ये नहीं हुआ कि वह बरी हैं। इस नरसंहार के बाद जिन लोगों पर दंगा कराने का आरोप था उन लोगों को लालू ने बाक़ायदा सियासी शरण दिया। उन्हें अपनी गोद में बिठाया। जबकि भागलपुर नरसंहार के बाद लालू 15 साल बिहार की सत्ता पर क़ाबिज़ रहे।



ये आख़री मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र का ताज है। इस सोने के ताज में क़ीमती हीरे, मोती, पन्ना और फ़िरोज़ा लगा हुआ था। 1857 में ब...
23/10/2021

ये आख़री मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र का ताज है। इस सोने के ताज में क़ीमती हीरे, मोती, पन्ना और फ़िरोज़ा लगा हुआ था। 1857 में बादशाह की गिरफ्तारी के बाद उनके तख़्त और ताज को भी बाकी क़ीमती सामानों की तरह अंग्रेज इसे भी लूटकर लन्दन ले गए।

हमारे सर की फटी टोपियों पे तन्ज़ न कर
हमारे ताज आज भी अजायब-घरों में रखे हैं...

23/10/2021
22/10/2021

Breaking.
दिल्ली कोर्ट ने शर्जील इमाम भाई को CAA प्रोटेस्ट के दौरान दिए गए उनके भाषण के मामले में जमानत देने से इनकार कर दिया…😢

इंसाफ़ की लड़ाई में मजलिस का साथ दो, संविधान के सम्मान में ओवैसी साहब मैदान में, हक़ की आवाज़ को पहचानो और मजलिस का साथ द...
22/10/2021

इंसाफ़ की लड़ाई में मजलिस का साथ दो, संविधान के सम्मान में ओवैसी साहब मैदान में, हक़ की आवाज़ को पहचानो और मजलिस का साथ दो। ये सभी स्लोगन है उत्तराखंड प्रदेश अध्यक्ष डॉक्टर नय्यर काज़मी साहब और उत्तराखंड मजलिस कि टीम की तरफ़ से सभी विधानसभाओं में वाल पेंटिंग की जा रही है, अल्हम्दुलिल्लाह काम जारी है।

हिंदुस्तान और तुर्की के रिश्ते आज भले ही खराब हो लेकिन कभी ये रिश्ते बहुत गहरे थे। कभी ख़िलाफत-ए-उस्मानिया की शहज़ादियां...
22/10/2021

हिंदुस्तान और तुर्की के रिश्ते आज भले ही खराब हो लेकिन कभी ये रिश्ते बहुत गहरे थे। कभी ख़िलाफत-ए-उस्मानिया की शहज़ादियां निज़ाम हैदराबाद बहू थीं।

पहली जंगे-अज़ीम/ प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1919) में उस्मानी सल्तनत यानी आज का तुर्की जर्मनी के साथ मिलकर मित्र राष्ट्रों के खिलाफ लड़ा था। इस जंग में तुर्की हार गया और तब आधुनिक तुर्की का उदय हुआ जो असल मे पतन की शुरूआत थी। जंग के बाद तुर्कों ने मुस्तफा कमाल अतातुर्क को अपना सेनापति चुना। अतातुर्क ने पहले तो खलीफा अब्दुल मजीद सानी को ख़िलाफ़त से दस्तबरदार किया और फिर ख़िलाफ़त-ए-उस्मानिया के खातमे का ऐलान कर दिया। खलीफा को जिलावतन कर फ्रांस भेज दिया गया। अतातुर्क कमाल पाशा के इस ज़ालिमाना कदम का सबसे बड़ा विरोध तत्कालीन अविभाजित भारत से हुआ था।

1919 में उस्मानी ख़लीफा की हिफ़ाज़त और ख़िलाफ़त की बक़ा के लिए हिंदोस्तान भर में आंदोलन शुरू हो गया था, जिसे हम ख़िलाफ़त मूवमेंट या ख़िलाफ़त आंदोलन के नाम से जानते हैं। हैदराबाद के निज़ाम ने जिलावतनी में फ्रांस में रह रहे ख़लीफा को पैसे भेजना शुरू किये। दुनिया भर में विरोध को देखते हुए ब्रिटिश और कमाल अतातुर्क ने 3 मार्च, 1924 को ख़िलाफ़त के खात्मे का ऐलान कर दिया। इसके साथ ही भारत में खिलाफत आंदोलन भी खत्म हो गया।

लेकिन रिश्तों को बनाए रखने के लिए हैदराबाद के निज़ाम ने अपने बेटे प्रिंस आज़म जाह के लिए ख़लीफा की बेटी शहज़ादी दुर्रे शेवर ( Dürrüşehvar Sultan ) को निकाह का पैग़ाम भेजा और ये पैग़ाम लेकर गए थे 'अल्लामा इकबाल'।

शहज़ादी दुर्रे शेवर और शहज़ादा आज़म जाह का निकाह 1932 में फ्रांस में हुआ और साथ ही दूसरी शहज़ादी नीलोफ़र का निकाह शहज़ादा मोअज़्ज़म जाह से हुआ, इस तरह तुर्की की शहज़ादियां हैदराबाद निज़ाम के घर बहू बनकर आई।
Shoaib Gazi

अरबी मुस्लिम कारोबारियों की रिवायत थी कि वह सुबह दुकान खोलने के साथ एक छोटी सी कुर्सी दुकान के बाहर देते रखते थे। ज्यों ...
21/10/2021

अरबी मुस्लिम कारोबारियों की रिवायत थी कि वह सुबह दुकान खोलने के साथ एक छोटी सी कुर्सी दुकान के बाहर देते रखते थे।
ज्यों ही पहला ग्राहक आता दुकानदार कुर्सी उस जगह से उठाता और दुकान के अंदर रख लेता था।

लेकिन जब दूसरा ग्राहक आता दुकानदार अपनी दुकान से बाहर निकल कर बाज़ार पर एक नज़र डालता जिस दुकान के बाहर कुर्सी पड़ी होती तो वह ग्राहक से कहता " तुम्हारी ज़रूरत की चीज़ उस दुकान से मिलेगी,, मैं सुबह का आग़ाज़ (बोनी) कर चुका हूँ।

कुर्सी का दुकान के बाहर रखना इस बात की निशानी होती थी के अभी तक इस दुकानदार ने आग़ाज़ नही किया है।

ये मुस्लिम ताजीरों का अख़लाक़ और मोहब्बत थी नतीजतन इन पर बरकतों का नुज़ूल होता था।

अरबी से तर्जुमा

कुतुबुद्दीन ऐबक के बारे में बचपन में एक कहानी पढी थी. ये वही हैं, जिन्होंने क़ुतुब मीनार बनवाया है, वो शिकार खेल रहे थे, ...
21/10/2021

कुतुबुद्दीन ऐबक के बारे में बचपन में एक कहानी पढी थी. ये वही हैं, जिन्होंने क़ुतुब मीनार बनवाया है, वो शिकार खेल रहे थे, तीर चलाया और जब शिकार के नज़दीक गए तो देखा कि एक किशोर उनके तीर से घायल गिरा पड़ा है.

कुछ ही पल में उस घायल किशोर की मौत हो जाती है. पता करने पर मालूम हुआ कि वह पास के ही एक गाँव में रहने वाली वृद्धा का एकमात्र सहारा था और जंगल से लकड़ियाँ चुन कर बेचता और जो मिलता उसी से अपना और अपनी माँ का पेट भरता था.

कुतुबुद्दीन उसकी माँ के पास गया, बताया कि उसके तीर से गलती से उसके बेटे की मौत हो गयी है. माँ रोते-रोते बेहोश हो गयी. फिर कुतुबुद्दीन ने खुद को क़ाज़ी के हवाले किया और अपना ज़ुर्म बताते हुए अपने खिलाफ मुकद्दमा चलाने की अर्ज़ी दी. क़ाज़ी ने मुकदमा शुरू किया मृतक की बूढ़ी माँ को अदालत में बुलाया और कहा कि तुम जो सज़ा कहोगी वही सज़ा इस मुज़रिम को दी जायेगी. वृद्धा ने कहा कि ऐसा बादशाह फिर कहाँ मिलेगा जो अपनी ही सल्तनत में अपने खिलाफ ही मुकदमा चलवाए और उस गलती के लिए जो उसने जानबूझ कर नहीं की .

आज से कुतुबुद्दीन ही मेरा बेटा है. मैं इसे माफी देती हूँ. क़ाज़ी ने कुतुबुद्दीन को बरी किया और कहा – ”अगर तुमने अदालत में ज़रा भी अपनी बादशाहत दिखाई होती तो मैं तुम्हें उस बुढ़िया के हवाले न करके खुद ही सख्त सज़ा देता .”

इस पर कुतुबुद्दीन ने अपनी कमर से खंज़र निकाल कर क़ाज़ी को दिखाते हुए कहा–''अगर तुमने मुझसे मुज़रिम की तरह व्यवहार न करके ज़रा भी मेरी बादशाहत का ख़याल किया होता तो मैं तुम्हें इसी खंज़र से मौत के घाट उतार देता.” ये है असल बादशाहत और ये है असल इन्साफ

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