06/12/2023
"आप लोग नहीं जानते कि मुझे क्या परेशान कर रहा है, और किस बात से मैं इतना दुखी हूं। मेरे मन में पहली चिंता यही है। मैं अपने जीवन के मिशन को पूरा करने में सक्षम नहीं हूं। मैं अपने जीवनकाल में अपने लोगों को, अन्य दूसरे समुदायों के साथ समानता में राजनीतिक शक्ति साझा करते हुये एक शासक वर्ग के रूप मे देखना चाहता था। मैं अब लगभग अपंग हो गया हूं और बीमारी से ग्रस्त हूं। मैं जो कुछ भी हासिल करने में सक्षम हुआ, उसका आनंद कुछ शिक्षित लोग उठा रहे हैं, जिन्होंने अपने मक्कारी से यह साबित कर दिया है कि वे बेकार लोग हैं, जिनके पास अपने पीड़ित-शोषित भाइयों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं है। वे मेरी कल्पना से भी आगे निकल गए हैं। वे अपने लिए और अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए जीते हैं। उनमे एक भी नहीं जिसका पतन नहीं हुआ हो। मैं अब अपना ध्यान विशाल अशिक्षित गाँव की जनता की ओर मोड़ना चाहता था, जो लगातार पीड़ित हैं और आर्थिक रूप से लगभग अपरिवर्तित बने हुए हैं। लेकिन जीवन छोटा लगता है।”
“मैं यह भी चाहता था कि मेरी सभी पुस्तकें मेरे जीवन काल में ही प्रकाशित हो जायें। मेरी पुस्तकों : "बुद्ध और कार्ल मार्क्स" "प्राचीन भारत में क्रांति और प्रति-क्रांति" और "हिंदू धर्म की पहेलियां”, के प्रकाशन के महत्वपूर्ण कार्य को पूरा करने में असहाय होने का विचार ही मुझे बहुत परेशान करता हैं क्योंकि मेरे बाद कोई भी इन्हें प्रकाशित नहीं कर पाएगा।”
"मैं यह भी चाहता था कि डिप्रेस्ड क्लास में से कोई मेरे जीवन काल में आगे आए, और मेरे बाद आंदोलन चलाने की बड़ी ज़िम्मेदारी ले। हालांकि, ऐसा कोई नहीं दिखता इस अवसर पर कौन खड़ा होगा। मेरे लेफ्टिनेंट, जिन पर मुझे आंदोलन चलाने के लिए पूरी आस्था और विश्वास था, नेतृत्व और शक्ति के लिए आपस में लड़ रहे हैं, इस बात से बेपरवाह कि उन पर आने वाली भारी जिम्मेदारी है...। मैं अभी भी इस देश और यहाँ के लोगों की सेवा करनी चाहता था। ऐसे देश में जन्म लेना पाप है जिसके लोग किसी अन्य विचार को सुनने के लिए तैयार नहीं हैं जो प्रधान मंत्री के विचारों से सहमत नहीं है। देश किस हद तक डूब रहा है,''?
"कैसे भी करके मैंने हर तरफ से मुझे मिलने वाली गालियों के बावजूद बहुत कुछ किया है, और मैं आगे भी अपनी मृत्यु तक ऐसा करना जारी रखूंगा।"
"हिम्मत रखो, परेशान मत हो, जीवन एक न एक दिन ख़त्म होना ही है”
"नानक चंद, मेरे लोगों से कहो: मैंने जो कुछ भी किया है, वह जीवन भर भारी दुखों और अंतहीन परेशानियों से गुज़रने के बाद और जीवन भर अपने विरोधियों से लड़ते हुये ही कर पाया हूँ।"
"बड़ी मुश्किल से मैं इस कारवां को वहां लाया हूं जहां यह आज दिख रहा है। बाधाओं, संकटों और कठिनाइयों के बावजूद इस कारवां को आगे बढ़ने दें। अगर मेरे लोग, मेरे लेफ्टिनेंट कारवां को आगे नहीं ले जा पा रहें हैं, उन्हें इसे यहीं छोड़ देना चाहिए जहां यह आज दिख रहा है, लेकिन किसी भी परिस्थिति में उन्हें कारवां को पीछे नहीं जाने देना चाहिए"।
"यह मेरा संदेश है, संभवतः मेरी पूरी गंभीरता के साथ, मेरे लोगों के लिए आखिरी संदेश है, जिसके बारे में मुझे विश्वास है कि इसे अनदेखा नहीं किया जाएगा। जाओ और उन्हें बताओ; जाओ और उन्हें बताओ; जाओ और उन्हें बताओ”
"You people do not know what is troubling me, and what makes me so sad. The first worry to my mind is that. I have not been able to fulfil my life's Mission. I wanted to see my people a Governing Class in my life time, sharing the Political Power in Terms of Equality with other Communities. I am now almost crippled and prostrate with illness. Whatever I have been able to achieve, is being enjoyed by the educated few, who with their de- ceitful performances, have proved to be the worthless lot, with no sympathies for their down-trodden brethren. They have surpassed my imagination. They live for themselves and their personal gains. Not one of their ruination. I now wanted to divert my attention towards the vast illiterate masses in the villages, who continue to suffer and remained almost unchanged economically. But life seems short.
I also wanted that all my books be published during my life time. The very idea of my being helpless to complete the monumental task of publishing my books: "Buddha and Karl Marx." "Revolution and Counter-Revolution in Ancient India," and "Riddles of Hinduism, distress me terribly as nobody will be able to publish these after me." He was over whelmed with emotion. Just as I wanted to intervene, he proceeded further: "I also wanted some one from among the Depressed Classes to come forward, in my life-time, and take the heavy responsibility of running the Movement after me. There, however, seems none who would rise to the occasion. My lieutenants, in whom I had full faith and confidence to run the Movement, are fighting among themselves for leadership and power, unmindful of the heavy responsibility that is going to fall upon them... I also wanted still to serve this Country and its people. It is a sin to take birth is a Country whose people are not prepared to listen to any other view which does not concur with that of the Prime Minister. To what extent the Country is sinking,"?
"Any how I have done a lot inspite of the abuses hurled at me from all sides, and I will continue to do so till my death."
"Take courage, don't get upset, life is to come an end one day or the other".
"Tell my people Nanak Chand: Whatever I have done, I have been able to do after passing through crushing miseries and endless troubles all my life fighting with my opponents."
"With great difficulty, I have brought this Caravan where it is seen today. Let the Caravan march on and further on despite the hurdles, pitfalls and difficulties that may. If my people, my lieu-tenants are not able to take the Caravan ahead, they should leave it where it is seen today, but in no circumstances should they allow the Caravan to role back".
"my Message, probably the last Message to my people, in all my seriousness, which I am sure will not go unheeded. Go and tell them; go and tell them; go and tell them"
मंगलवार, 5 दिसंबर 2023, रात्रि 8:30 बजे, MNT News Networkविषय : मेरा कारवां आगे बढ़ाना, पीछे नहीं - डाॅ आंबेडकर का अंतिम संदेश और वर्तम....