01/02/2026
Desi Ghee - इन बीमारियों में नुकसानदायक होता है देसी घी! हम सभी ने बचपन से यही सुना है कि देसी घी आयुर्वेद में अमृत माना गया है।
यह हड्डियों को मजबूत करता है, दिमाग को तेज करता है और आंखों की रोशनी बढ़ाता है। लेकिन आयुर्वेद सिर्फ तारीफ नहीं करता, वह चेतावनी भी देता है।
चरक संहिता जैसे प्राचीन ग्रंथों में साफ लिखा है कि कुछ खास परिस्थितियों में यही अमृत शरीर के लिए ज़हर की तरह काम कर सकता है।
मतलब साफ है। घी अच्छा है, लेकिन हर किसी के लिए, हर समय और हर बीमारी में नहीं।
गलत समय पर और गलत हालत में खाया गया घी बीमारी को ठीक नहीं, बल्कि कई गुना बढ़ा सकता है।
इसी Post में हम जानेंगे वे आठ स्थितियां जहां देसी घी से दूरी बनाना ही समझदारी है।
सबसे पहले साइंस समझिए: घी और पाचन का रिश्ता
आयुर्वेद के अनुसार घी को पचाने के लिए बहुत तेज़ जठराग्नि यानी डाइजेस्टिव फायर की जरूरत होती है।
अगर आपकी पाचन शक्ति मजबूत है, पेट हल्का रहता है और जीभ साफ है, तभी घी शरीर में सही तरह से काम करता है।
लेकिन अगर
पेट भारी रहता है
खाना देर से पचता है
जीभ पर सफेद परत जमी रहती है
तो यह संकेत है कि आपकी अग्नि कमजोर है।
ऐसी स्थिति में घी पचता नहीं, बल्कि सड़कर आम बनाता है।
यह आम एक चिपचिपा टॉक्सिन होता है, जो नसों में जमा होकर ब्लॉकेज और सूजन जैसी समस्याएं पैदा करता है।
1. कफ प्रकृति वालों के लिए घी क्यों खतरनाक है
अगर आपकी प्रकृति कफ प्रधान है यानी
वजन आसानी से बढ़ता है
ज्यादा नींद आती है
शरीर भारी और सुस्त रहता है
तो घी आपके लिए दोस्त नहीं, दुश्मन बन सकता है।
क्योंकि घी और कफ दोनों के गुण एक जैसे होते हैं।
ठंडा, भारी और चिकना।
ऐसे में घी खाने से कफ और ज्यादा बढ़ेगा, वजन बढ़ेगा, आलस्य बढ़ेगा और मेटाबॉलिज्म और स्लो हो जाएगा।
2. पित्त में भी हर बार घी सही नहीं होता
अक्सर लोग सोचते हैं कि एसिडिटी या गर्मी में घी खा लो, सब ठीक हो जाएगा।
लेकिन यहां एक बड़ा फर्क समझना जरूरी है।
अगर पित्त निराम है यानी शुद्ध है, तब घी फायदेमंद होता है।
लेकिन अगर पित्त साम है यानी टॉक्सिन से भरा हुआ है, तब घी नुकसान करता है।
साम पित्त के लक्षण होते हैं
खट्टी डकारें
मुंह में खट्टा स्वाद
जलन के साथ पेट में भारीपन
ऐसी हालत में घी आग में घी डालने जैसा काम करता है और जलन और एसिडिटी बढ़ा देता है।
3. बुखार में घी क्यों मना है
अगर आपको बुखार आया है, खासकर शुरुआती सात दिन जिसे आयुर्वेद में तरुण ज्वर कहा जाता है, तो घी बिल्कुल नहीं खाना चाहिए।
बुखार में शरीर की अग्नि त्वचा पर काम कर रही होती है और पेट की अग्नि कमजोर होती है।
ऐसे समय में घी पेट में जाकर पचता नहीं और बुखार को शरीर के अंदर ही फंसा देता है।
4. लीवर और पीलिया में घी से दूरी जरूरी
लीवर ही शरीर में फैट को पचाने का काम करता है।
अगर आपको पीलिया या फैटी लीवर है, तो इसका मतलब है कि लीवर पहले से ही कमजोर है।
ऐसी स्थिति में घी जैसा भारी फैट देना लीवर पर अतिरिक्त बोझ डालता है।
इसीलिए आयुर्वेद में पीलिया के मरीज को शुरुआत में बिल्कुल फैट फ्री डाइट दी जाती है।
5. खांसी और अस्थमा में घी कब ज़हर बनता है
अगर खांसी सूखी है, तब घी फायदेमंद हो सकता है।
लेकिन अगर खांसी बलगम वाली है, तो घी जहर जैसा काम करता है।
घी बलगम को और गाढ़ा और चिपचिपा बना देता है, जिससे सांस लेने में दिक्कत बढ़ जाती है।
अस्थमा के मरीजों में यह स्थिति और भी खतरनाक हो सकती है।
6. हार्ट और हाई कोलेस्ट्रॉल में सावधानी जरूरी
अगर आपका कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ है और आपकी लाइफस्टाइल सुस्त है, तो घी धमनियों में ब्लॉकेज बढ़ा सकता है।
ऐसे लोगों के लिए आयुर्वेद में मेदोहर यानी फैट घटाने वाले आहार की सलाह दी जाती है, ना कि घी बढ़ाने की।
7. घी के साथ ये गलत कॉम्बिनेशन ज़हर बन जाते हैं
सिर्फ घी ही नहीं, उसे किसके साथ खा रहे हैं यह भी उतना ही जरूरी है।
आयुर्वेद इसे विरुद्ध आहार कहता है।
घी और शहद बराबर मात्रा में कभी न मिलाएं
घी खाने के तुरंत बाद ठंडा पानी न पिएं, हमेशा गुनगुना पानी लें
कांसे के बर्तन में 10 दिन से ज्यादा रखा घी जहरीला माना गया है
8. मौसम का असर: वसंत ऋतु में घी क्यों कम करें
मार्च और अप्रैल के महीने यानी वसंत ऋतु में सर्दियों का जमा हुआ कफ पिघल रहा होता है।
अगर इस समय ज्यादा घी खाया जाए तो सर्दी, जुकाम और एलर्जी की संभावना बढ़ जाती है।
Conclusion: घी अमृत है, लेकिन शर्तों के साथ
देसी घी वाकई अमृत है, लेकिन
सही अग्नि, सही मौसम और सही बीमारी में।
अगर आप ऊपर बताई गई किसी भी स्थिति में आते हैं, तो बिना सोचे समझे घी न खाएं।
आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह से औषधीय घी या सही विकल्प चुनें।
अगर आपको यह जानकारी उपयोगी लगी, तो इसे उन लोगों के साथ जरूर शेयर करें जिन्हें घी बहुत पसंद है।
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