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क्या आप जानते हैं कि आपकी श्वास केवल हवा नहीं, बल्कि ऊर्जा का प्रवाह है? 🧘‍♂️✨​योग विज्ञान के अनुसार, हमारे शरीर में ७२,...
29/03/2026

क्या आप जानते हैं कि आपकी श्वास केवल हवा नहीं, बल्कि ऊर्जा का प्रवाह है? 🧘‍♂️✨

​योग विज्ञान के अनुसार, हमारे शरीर में ७२,००० नाड़ियाँ होती हैं, जिनमें ईडा, पिंगला और सुषुम्ना सबसे महत्वपूर्ण हैं। जब ये संतुलित होती हैं, तभी हम गहरे ध्यान और मानसिक शांति का अनुभव कर पाते हैं।
स्रोत: आयुष मंत्रालय

चक्र और संबंधित प्राण वायु
24/03/2026

चक्र और संबंधित प्राण वायु

According to classical yogic texts like the Hatha Yoga Pradipika, Shiva Samhita, and Gheranda Samhita, the human body is...
23/03/2026

According to classical yogic texts like the Hatha Yoga Pradipika, Shiva Samhita, and Gheranda Samhita, the human body is not just physical ,it is an intricate network of energy channels (Nadis).

Out of 72,000 nadis, three are considered the most important:

🔵 Ida Nadi (Lunar Energy)
• Flows along the left side of the spine
• Represents coolness, calmness, and intuition
• Connected with the parasympathetic nervous system
• Active during rest, reflection, and meditation

👉 When Ida dominates → the mind becomes calm, inward, and stable

🔴 Pingala Nadi (Solar Energy)
• Flows along the right side of the spine
• Represents heat, action, and vitality
• Linked to the sympathetic nervous system
• Active during movement, focus, and productivity

👉 When Pingala dominates → energy, drive, and alertness increase

🟡 Sushumna Nadi (Central Channel)
• Runs through the center of the spine
• The pathway for higher consciousness and awakening
• Activated only when Ida and Pingala are in balance

According to the Hatha Yoga Pradipika:

“When prana flows through Sushumna, the mind becomes still and liberation begins.”

👉 This is the state where meditation becomes effortless

⚖️ The True Goal of Yoga

Yoga is not just physical exercise.

It is the science of:
• Balancing Ida (mind) and Pingala (body)
• So energy can rise through Sushumna (awareness)

This balance is cultivated through:
• Pranayama (especially Nadi Shodhana)
• Asana
• Meditation

🔥 The Reality Most People Miss
• Constant stress → Pingala overactive
• Laziness / low energy → Ida dominant

👉 Both are imbalances

True mastery = balance → activation of Sushumna

षट्कर्म का अर्थ एवं हठयोग साधना में महत्त्व
23/03/2026

षट्कर्म का अर्थ एवं हठयोग साधना में महत्त्व

19/03/2026

Kapha Spring Ayurveda - बसंत ऋतु का आगमन और स्वास्थ्य पर असर - मार्च और अप्रैल का महीना आते ही मौसम में बदलाव शुरू हो जाता है और बसंत ऋतु का आगमन होता है।

यह मौसम प्रकृति को बहुत सुंदर बना देता है। चारों ओर हरियाली, हल्की धूप और सुहावना वातावरण मन को प्रसन्न कर देते हैं।

लेकिन आयुर्वेद के अनुसार यही समय ऐसा भी होता है जब शरीर में कई तरह की छोटी-मोटी बीमारियां बढ़ने लगती हैं। इस मौसम में बहुत से लोगों को बार-बार खांसी, जुकाम, बुखार, गले में खराश और शरीर में आलस जैसी समस्याएं महसूस होने लगती हैं।

कई लोग सोचते हैं कि मौसम इतना अच्छा है फिर भी बीमारियां क्यों बढ़ जाती हैं। आयुर्वेद इसके पीछे एक खास कारण बताता है।

सर्दियों का जमा हुआ कफ पिघलने लगता है
आयुर्वेद के अनुसार सर्दियों के मौसम में शरीर के अंदर कफ जमा होने लगता है। ठंड के कारण यह कफ शरीर में गाढ़ा होकर जमा रहता है और उस समय ज्यादा परेशानी नहीं देता।

लेकिन जैसे ही बसंत ऋतु में हल्की गर्मी और धूप बढ़ती है, वैसे-वैसे शरीर में जमा हुआ कफ पिघलने लगता है।

इसे एक आसान उदाहरण से समझा जा सकता है। जैसे ठंड में रखा हुआ घी या मक्खन गर्मी मिलने पर धीरे-धीरे पिघलने लगता है, उसी तरह शरीर के अंदर जमा हुआ कफ भी इस मौसम में ढीला होकर पिघलने लगता है।

जब यह कफ पिघलकर श्वसन नली की ओर जाता है, तो वहां रुकावट पैदा करने लगता है। इसी कारण इस मौसम में सर्दी, खांसी और जुकाम की समस्या अधिक देखने को मिलती है।

इस मौसम में भूख क्यों कम हो जाती है
बसंत ऋतु में बहुत से लोगों को यह भी महसूस होता है कि उनकी भूख पहले की तुलना में कम हो गई है। इसका संबंध भी कफ से ही होता है।

जब शरीर में जमा हुआ कफ पिघलकर पेट तक पहुंचता है, तो वह जठराग्नि को प्रभावित करता है। जठराग्नि वही शक्ति है जो भोजन को पचाने और भूख पैदा करने का काम करती है।

जब यह अग्नि थोड़ी मंद हो जाती है, तो स्वाभाविक रूप से भूख और प्यास दोनों कम हो जाती हैं। इसलिए आयुर्वेद कहता है कि इस मौसम में भोजन और जीवनशैली में विशेष सावधानी रखना जरूरी है।

बसंत ऋतु में कैसा भोजन करना चाहिए
इस मौसम में ऐसे भोजन करने की सलाह दी जाती है जो कफ को कम करने में मदद करें। आयुर्वेद के अनुसार कड़वे, तीखे और हल्के भोजन इस समय अधिक लाभदायक होते हैं।

कुछ ऐसी चीजें हैं जिनका सेवन इस मौसम में नियमित रूप से करना अच्छा माना जाता है।

जौ, मक्का और बाजरा जैसे अनाज
अदरक, शहद, गुनगुना पानी

ये सभी चीजें शरीर में कफ को कम करने में मदद करती हैं और पाचन को भी बेहतर बनाती हैं।

जो लोग इन चीजों को अपनी दिनचर्या में शामिल करते हैं, उन्हें मौसम बदलने पर होने वाली परेशानियां अपेक्षाकृत कम होती हैं।

किन चीजों से दूरी रखना बेहतर है
बसंत ऋतु में कुछ ऐसे भोजन भी होते हैं जिनसे बचना बेहतर माना जाता है। खासकर वे चीजें जो कफ को बढ़ाने वाली होती हैं।

जैसे
दही, बहुत ज्यादा खटाई, भारी भोजन, जंक फूड, प्रोसेस्ड फूड

इन चीजों का अधिक सेवन करने से शरीर में कफ और बढ़ सकता है, जिससे सर्दी-खांसी जैसी समस्याएं जल्दी हो सकती हैं।

दिनचर्या में छोटे लेकिन जरूरी बदलाव
सिर्फ भोजन ही नहीं, बल्कि जीवनशैली में कुछ छोटे बदलाव भी इस मौसम में काफी लाभ दे सकते हैं।

सुबह उठकर गुनगुने पानी का सेवन करना अच्छा माना जाता है। इसमें थोड़ा शहद मिलाकर पीना भी फायदेमंद हो सकता है। हालांकि जिन्हें डायबिटीज की समस्या है, उन्हें शहद नहीं मिलाना चाहिए। वे सिर्फ गुनगुना पानी पी सकते हैं या उसमें थोड़ा नींबू और सेंधा नमक मिला सकते हैं।

इसके अलावा रोजाना व्यायाम, योग और प्राणायाम करना भी शरीर को सक्रिय और संतुलित बनाए रखने में मदद करता है।

दिन में सोने से बचें
आयुर्वेद के अनुसार बसंत ऋतु में दिन के समय सोने से बचना चाहिए। दिन में सोने से शरीर में कफ और बढ़ सकता है, जिससे आलस और भारीपन महसूस हो सकता है।

इसलिए दिन में सक्रिय रहना और हल्की शारीरिक गतिविधि करना बेहतर माना जाता है।

स्नान और पेय पदार्थों पर ध्यान दें
इस मौसम में बहुत ठंडे पानी से स्नान करने की बजाय गुनगुने पानी का उपयोग करना ज्यादा अच्छा माना जाता है।

साथ ही शरीर को संतुलित रखने के लिए समय-समय पर हर्बल या हल्की आयुर्वेदिक चाय का सेवन भी किया जा सकता है। अगर हर्बल चाय उपलब्ध न हो, तो साधारण तरीका भी अपनाया जा सकता है—जैसे जीरे को पानी में उबालकर पीना।

यह पाचन को बेहतर बनाने और शरीर को हल्का रखने में मदद करता है।

मौसम के अनुसार जीवनशैली जरूरी
हर ऋतु का शरीर पर अलग प्रभाव होता है। इसलिए आयुर्वेद हमेशा कहता है कि मौसम के अनुसार अपने आहार और दिनचर्या में थोड़ा बदलाव करना चाहिए।

अगर हम बसंत ऋतु में सही भोजन और सही जीवनशैली अपनाते हैं, तो इस मौसम में होने वाली सामान्य परेशानियों से काफी हद तक बचा जा सकता है।

क्या आपको भी मौसम बदलते ही सर्दी-खांसी होने लगती है?

थायरॉयड नियंत्रण में योग सहायक हो सकता है। 🧘‍♂️सर्वांगासन, हलासन, मत्स्यासन, भुजंगासन और उज्जायी प्राणायाम नियमित करने स...
14/03/2026

थायरॉयड नियंत्रण में योग सहायक हो सकता है। 🧘‍♂️

सर्वांगासन, हलासन, मत्स्यासन, भुजंगासन और उज्जायी प्राणायाम नियमित करने से थायरॉयड ग्रंथि को संतुलित रखने में मदद मिल सकती है।

हेंप सीड्स यानी भांग के बीज का नाम सुनते ही कुछ लोगों को सुरूर छाने लगता है, तो कुछ घबरा जाते हैं,,,। जबकि प्रचलित विज्ञ...
14/03/2026

हेंप सीड्स यानी भांग के बीज का नाम सुनते ही कुछ लोगों को सुरूर छाने लगता है, तो कुछ घबरा जाते हैं,,,।
जबकि प्रचलित विज्ञापनों और मिथ्स से अलग भांग के बीज पोषक तत्वों का खजाना हैं। पहाड़ी इलाकों में इन्हें अलग–अलग व्यंजनों में इस्तेमाल किया जाता है। हैम्प सीड्स के इन्हीं पोषक तत्वों के कारण अब इन्हें विदेशों में भी निर्यात किया जा रहा है। असल में भांग के बीज आपकी इम्युनिटी, गट हेल्थ, त्वचा और ब्रेन हेल्थ के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं। अगर आप भी भांग के बीज के फायदे और इसके इस्तेमाल का तरीका जानना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक पढ़ें।

भांग के बीच में पोषक तत्वों की भरमार होती है जिसमें
100 ग्राम बन के बीच में 554 गैलरी 4 ग्राम डाइटरी फाइबर 1.5 ग्राम शर्करा 31.56 ग्राम प्रोटीन 48.75ग्राम वसा विटामिन b2 b3 b6 विटामिन ए कैल्शियम फॉस्फोरस मैग्नीशियम पोटैशियम ओमेगा 6 फैटी एसिड होते हैं....

सेहत पर भांग के फायदे और नुकसान दोनों, इसे खाने की मात्रा और तरीके पर निर्भर करते हैं। इसका एक उदाहरण है, भांग के बीज, जिसे आयुर्वेद में इसके औषधीय गुणों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसमें कई महत्वपूर्ण पोषक तत्वों की गुणवत्ता पाई जाती है, जैसे कि प्रोटीन, आयरन, फाइबर, विटामिन और महत्वपूर्ण मिनरल्स जो आपकी सेहत के लिए बेहद जरूरी होते हैं

हेंप सीड्स ओमेगा-3 और ओमेगा-6 फैटी एसिड जैसे हेल्दी फैट से भरपूर होते हैं। ये पॉलीअनसेचुरेटेड फैट हैं, जो हृदय स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद होते हैं। इसका सेवन खराब कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित करता है, और गुड कोलेस्ट्रॉल के स्तर को बेहतर बनाने में मदद करता है। इससे आपकी आर्टरीज में रुकावटें आने का जोखिम कम हो जाता है और एक स्वस्थ हृदय के निर्माण में मदद मिलती है है।

इनमें भरपूर पोषण होता है और ये कई तरह के स्वास्थ्य लाभ प्रदान करते हैं। भांग के बीजों के लाभों में मस्तिष्क की सुरक्षा, हृदय स्वास्थ्य को बढ़ावा देना और त्वचा की स्थिति में सुधार करना शामिल है। यद्यपि भांग के बीज कैनाबिस सैटिवा पौधे से आते हैं , लेकिन वे मन को बदलने वाला प्रभाव उत्पन्न नहीं करते हैं।

भांग का बीज एंजायटी डिप्रैशन के पेशेंट के लिए बहुत अच्छा है जिनको कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ है डाइजेशन के इशू है उनके लिए बहुत अच्छा होता है डाइजेशन को अच्छा करता है कांसेपशियन को तोड़ता है सभी अंग को पावर देता है डायबिटीज को कंट्रोल करता है शरीर में कोई भी अकड़न मसल्स मसल्स डिस्ट्रॉफी में भी बहुत कारगर है किसी भी नदी या नस के विरोध को ठीक करता है शरीर में किसी भी प्रकार की आई डी जनरेशन को खत्म करता है

महिलाओं में होने वाली कमजोरी , जोड़ो का दर्द , माहवारी की समस्या में बहुत फायदेमंद है, हड्डियो को मजबूती देता है, महिला और पुरषों की यौन इच्छा को बढ़ाता है ।
भाग का बीज कैंसर सेल्स से लड़ने की शक्ति देता है और कैंसर सेल्स को खत्म करने में बहुत सहयोग करता है ।

भंग के बीज की चटनी बीपी मरीज के लिए बहुत अच्छी होती है, शुगर के मरीज़ के लिए भी भांग के बीज बहुत लाभदायक है, जिनको नजला , जुकाम जल्दी होता है उनके लिए बहुत उपयोगी है , त्वचा के लिए बहुत लाभदायक है , सोरियासिस के मरीज़ भांग के बीज को पीस कर तिल के तेल में मिलाकर लगा सकते है

भांग के बीज अमिनो एसिड से भरे होते हैं, विशेष रूप से आर्जिनिन जो कि एक शक्तिशाली न्यूरोट्रांसमिटर है। आर्जिनिन शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड बनाने में मदद करता है। शरीर में इसकी अधिक मात्रा रक्त के प्रवाह को बेहतर बनाने और हृदय की सेहत को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाती है।

नाइट्रिक ऑक्साइड विभिन्न क्रियाओं को करने में शरीर की मदद करता है जैसे- हीमोस्टेसिस (जेल के रूप में खून का जमना जो घाव के भरने का पहला चरण है) और फाइब्रिनोलाइसिस (खून के थक्के को बढ़ने से रोकना)। यह धमनी की दीवारों में प्लेटलेट और ल्यूकोसाइट इंटरैक्शन में भी सुधार करता है, वैस्क्युलर टोन और मांसपेशियों को नियंत्रित करता है और रक्तचाप को नियंत्रित करने में भी मदद करता है। सामान्य वैस्क्युलर टोन रक्त वाहिकाओं के सही व्यास की ओर इशारा करता है ताकि खून का सर्कुलेशन उचित ढंग से हो सके।
संतान प्राप्ति के लिए बहुत उत्तम औषधि बताई गई है पुत्र प्राप्ति के लिए भी समृद्ध औषधि है, आयुर्वेद सार संग्रह के अनुसार
पुत्र प्राप्ति की इच्छा रखने वाले इंसान को किसी बहुत अच्छे वैद्याचार्य से ही पूछ कर इसका उपयोग करना चाहिए

भांग के बीज का बहुत जायदा फायदे है इस के ऊपर एक किताब लिख सकते है I

याद रखे ऐसी चीजों को उपयोग करने से पहले किसी अच्छे आयुर्वेद के मार्गदर्शन में ही उपयोग करे,,,,

07/03/2026

Seasonal Detox - मार्च और अप्रैल महीने की दिनचर्या - वसंत ऋतुचर्या क्या है और क्यों जरूरी है इस पोस्ट का विषय है वसंत ऋतु और आयुर्वेद में बताई गई ऋतुचर्या, यानी मौसम के अनुसार अपनी दिनचर्या और खान-पान को बदलना।

ऋतुचर्या दो शब्दों से मिलकर बना है — ऋतु मतलब मौसम और चर्या यानी उस मौसम के अनुसार जीवनशैली अपनाना।

आयुर्वेद के अनुसार पूरे वर्ष में छह ऋतुएँ होती हैं — शिशिर, वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद और हेमंत। हर ऋतु लगभग दो महीने की होती है। इन मौसमों के बदलने के साथ शरीर के तीनों दोष — वात, पित्त और कफ — भी स्वाभाविक रूप से बढ़ते और घटते रहते हैं।

जब एक मौसम खत्म होकर दूसरा शुरू होता है, जिसे ऋतु संधि काल कहा जाता है, उस समय वायरल संक्रमण, एलर्जी और कई मौसमी बीमारियाँ ज्यादा देखने को मिलती हैं। अगर इस समय सही ऋतुचर्या अपनाई जाए तो शरीर आसानी से इन समस्याओं से बच सकता है।

वसंत ऋतु को ऋतुओं का राजा क्यों कहा गया है
वसंत ऋतु यानी चैत्र और वैशाख यानी मार्च और अप्रैल का समय। इस मौसम में प्रकृति पूरी तरह बदलती दिखाई देती है — पेड़ों पर नए पत्ते आते हैं, फूल खिलते हैं और वातावरण में नई ऊर्जा महसूस होती है।

लेकिन शरीर के अंदर भी इसी समय एक बड़ा बदलाव होता है।

सर्दियों यानी हेमंत और शिशिर ऋतु में शरीर में कफ दोष जमा होने लगता है, जिसे संचय अवस्था कहा जाता है। जैसे ही वसंत में तापमान बढ़ता है, सूर्य की गर्मी से यह जमा हुआ कफ पिघलने लगता है। यही स्थिति कफ प्रकोप कहलाती है।

वसंत ऋतु में कफ बढ़ने के लक्षण
जब शरीर में कफ अधिक बढ़ जाता है तो कई प्रकार की समस्याएँ दिखाई देने लगती हैं

पाचन शक्ति कमजोर होना

भूख कम लगना
खाना ठीक से न पचना
बार-बार सर्दी, खांसी या एलर्जी
दमा या कफ से जुड़ी सांस की समस्या
त्वचा पर खुजली, फोड़े-फुंसी
शरीर में भारीपन
ज्यादा नींद और आलस
काम करने की इच्छा कम होना

ये सभी संकेत बताते हैं कि शरीर में कफ संतुलन बिगड़ चुका है।

वसंत ऋतु में कौन से स्वाद फायदेमंद हैं
इस मौसम में कफ कम करने के लिए भोजन में तीन रस विशेष रूप से शामिल करने चाहिए

कड़वा
कसैला
तीखा

तीखे स्वाद के लिए अजवायन, सोंठ, पिप्पली जैसे मसाले उपयोगी हैं।
कड़वे और कसैले स्वाद के लिए करेला, नीम, मेथी, हल्दी और हरड़ का सेवन किया जा सकता है।

सब्जियों में लौकी, परवल और मूली इस मौसम में बहुत लाभकारी मानी जाती हैं।

वसंत ऋतु की सबसे प्रभावी औषधि — नीम
वसंत ऋतु में आसानी से मिलने वाली सबसे उपयोगी वनस्पति है नीम।

सुबह खाली पेट नीम के 5–10 कोमल पत्ते चबाकर 15–20 दिन तक सेवन करने से

बढ़ा हुआ कफ कम होता है
त्वचा साफ रहती है
शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है

भारतीय परंपराओं में भी नीम का विशेष महत्व इसी कारण दिया गया है।

किन स्वादों और खाद्य पदार्थों से बचना चाहिए
वसंत ऋतु में तीन स्वाद कम करने चाहिए

मीठा
खट्टा
नमकीन

ये तीनों कफ बढ़ाने वाले होते हैं।
सर्दियों में भारी और तले हुए भोजन आसानी से पच जाते हैं क्योंकि उस समय पाचन अग्नि तेज होती है, लेकिन वसंत में अग्नि मंद रहती है। इसलिए ज्यादा मिठाई, तला भोजन या स्निग्ध आहार लेने से पाचन बिगड़ सकता है।

वसंत ऋतु में सही आहार कैसा हो
इस मौसम में हल्का और जल्दी पचने वाला भोजन लेना चाहिए।

उपयोगी आहार

पुराना अनाज — गेहूं, जौ, ज्वार, बाजरा
मूंग, मसूर और अरहर दाल
शहद का सीमित उपयोग
उबला हुआ पानी

पानी उबालते समय उसमें काली मिर्च, अजवायन या सोंठ डालना कफ कम करने में मदद करता है।

किन चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए
इस ऋतु में इन चीजों से बचना बेहतर है

तली हुई और भारी मिठाइयाँ
मैदे से बने पदार्थ
खोये वाली मिठाई
भैंस का दूध
दही
दही की जगह मसालेदार छाछ लेना ज्यादा फायदेमंद है। छाछ में जीरा, अजवायन और हींग मिलाकर सेवन किया जा सकता है।

वसंत ऋतु में दिनचर्या कैसे रखें
इस मौसम में जीवनशैली में कुछ जरूरी बदलाव करने चाहिए

सुबह जल्दी उठें
रोज व्यायाम करें
योग और प्राणायाम करें
सूर्य नमस्कार शामिल करें

उद्वर्तन (उबटन)
चना या जौ का आटा, हल्दी और थोड़ा तेल मिलाकर शरीर पर रगड़ने से

कफ कम होता है
मोटापा घटता है
त्वचा निखरती है

स्नान और नींद से जुड़े नियम
वसंत ऋतु में

बहुत ठंडे पानी से स्नान न करें
हल्के गुनगुने पानी का उपयोग करें
स्नान के पानी में नीम पत्ते डाल सकते हैं

दिन में सोने से बचना चाहिए क्योंकि दिन की नींद कफ को और बढ़ाती है।

वसंत ऋतु में कौन सा पंचकर्म श्रेष्ठ है
आयुर्वेद में पंचकर्म को शरीर शुद्धि की प्रमुख चिकित्सा माना गया है।
वसंत ऋतु में बढ़े हुए कफ को बाहर निकालने के लिए वमन चिकित्सा सबसे उपयुक्त मानी गई है।

इस प्रक्रिया में औषधियों की सहायता से शरीर से अतिरिक्त कफ को बाहर निकाला जाता है, जिससे शरीर हल्का और संतुलित बनता है।

Conclusion
वसंत ऋतु शरीर के लिए बदलाव का समय है। यदि इस मौसम में सही खान-पान, दिनचर्या और आयुर्वेदिक नियमों का पालन किया जाए तो न केवल मौसमी बीमारियों से बचाव संभव है बल्कि पूरे वर्ष स्वास्थ्य बेहतर बना रह सकता है।

मौसम बदले तो आदतें भी बदलें — यही ऋतुचर्या का मूल सिद्धांत है।
क्या वसंत में आपको भी बार-बार सर्दी-खांसी या आलस महसूस होता है

04/03/2026

🌹पत्नी के धोखे से आहत राजा भरथरी के साधू बनने
कि कहानी🌹

उज्जैन_को_उज्जयिनी_के_नाम_सेभी_जाना_जाता_था।

उज्जयिनी शहर के परम
प्रतापी राजा हुए थे विक्रमादित्य।
विक्रमादित्य के पिता महाराज गंधर्वसेन थे और
उनकी दो पत्नियां थीं। एक पत्नी के पुत्र
विक्रमादित्य और दूसरी पत्नी के पुत्र थे भर्तृहरि।
गंधर्वसेन के बाद उज्जैन का राजपाठ
भर्तृहरि को प्राप्त हुआ,
क्योंकि भरथरी विक्रमादित्य से बड़े थे।
राजा भर्तृहरि धर्म और नीतिशास्त्र के ज्ञाता थे।
प्रचलित कथाओं के अनुसार
भरथरी की दो पत्नियां थीं, लेकिन फिर
भी उन्होंने तीसरा विवाह किया पिंगला से।
पिंगला बहुत सुंदर थीं और इसी वजह से
भरथरी तीसरी पत्नी पर अत्यधिक मोहित हो गए
थे। राजा भरथरी कि प्रतिमा
कथाओं के अनुसार
भरथरी अपनी तीसरी पत्नी पिंगला पर
काफी मोहित थे और वे उस पर अंधा विश्वास करते
थे। राजा पत्नी मोह में अपने कर्तव्यों को भी भूल
गए थे। उस समय उज्जैन में एक तपस्वी गुरु गोरखनाथ
का आगमन हुआ। गोरखनाथ राजा के दरबार में पहुंचे।
भरथरी ने गोरखनाथ का उचित आदर-सत्कार
किया। इससे तपस्वी गुरु अति प्रसन्न हुए। प्रसन्न
होकर गोरखनाथ ने राजा एक फल दिया और
कहा कि यह खाने से वह सदैव जवान बने रहेंगे,
कभी बुढ़ापा नहीं आएगा, सदैव सुंदरता बनी रहेगी।
पहली गुफा में जाने
का रास्ता जहा कि राजा भरथरी ने तपस्या करी
यह चमत्कारी फल देकर गोरखनाथ वहां से चले गए।
राजा ने फल लेकर सोचा कि उन्हें जवानी और
सुंदरता की क्या आवश्यकता है।
चूंकि राजा अपनी तीसरी पत्नी पर अत्यधिक
मोहित थे, अत: उन्होंने सोचा कि यदि यह फल
पिंगला खा लेगी तो वह सदैव सुंदर और जवान
बनी रहेगी। यह सोचकर राजा ने पिंगला को वह
फल दे दिया।रानी पिंगला भर्तृहरि पर
नहीं बल्कि उसके राज्य के कोतवाल पर मोहित थी।
यह बात राजा नहीं जानते थे। जब राजा ने वह
चमत्कारी फल रानी को दिया तो रानी ने
सोचा कि यह फल यदि कोतवाल खाएगा तो वह लंबे
समय तक उसकी इच्छाओं की पूर्ति कर सकेगा।
रानी ने यह सोचकर चमत्कारी फल कोतवाल को दे
दिया। वह कोतवाल एक वैश्या से प्रेम
करता था और उसने चमत्कारी फल उसे दे दिया।
ताकि वैश्या सदैव जवान और सुंदर बनी रहे।
वैश्या ने फल पाकर सोचा कि यदि वह जवान और
सुंदर बनी रहेगी तो उसे यह गंदा काम
हमेशा करना पड़ेगा। नर्क समान जीवन से
मुक्ति नहीं मिलेगी। इस फल की सबसे ज्यादा जरूरत
हमारे राजा को है। राजा हमेशा जवान
रहेगा तो लंबे समय तक प्रजा को सभी सुख-सुविधाएं
देता रहेगा। यह सोचकर उसने चमत्कारी फल
राजा को दे दिया। राजा वह फल देखकर हतप्रभ
रह गए।
राजा ने वैश्या से पूछा कि यह फल उसे कहा से
प्राप्त हुआ। वैश्या ने बताया कि यह फल उसे
कोतवाल ने दिया है। भरथरी ने तुरंत कोतवाल
को बुलवा लिया। सख्ती से पूछने पर कोतवाल ने
बताया कि यह फल उसे रानी पिंगला ने दिया है।
जब भरथरी को पूरी सच्चाई मालूम हुई तो वह समझ
गया कि पिंगला उसे धोखा दे रही है। पत्नी के धोखे
से भरथरी के मन में वैराग्य जाग गया और वे
अपना संपूर्ण राज्य विक्रमादित्य को सौंपकर
उज्जैन की एक गुफा में आ गए। इसी गुफा में भरथरी ने
12 वर्षों तक तपस्या की थी।
वह स्थान जहा भरथरी ने 12 वर्ष तपस्या कि
राजा भरथरी की कठोर तपस्या से देवराज इंद्र
भयभीत हो गए। इंद्र ने सोचा की भरथरी वरदान
पाकर स्वर्ग पर आक्रमण करेंगे। यह सोचकर इंद्र ने
भरथरी पर एक विशाल पत्थर गिरा दिया।
तपस्या में बैठे भरथरी ने उस पत्थर को एक हाथ से
रोक लिया और तपस्या में बैठे रहे। इसी प्रकार कई
वर्षों तक तपस्या करने से उस पत्थर पर भरथरी के
पंजे का निशान बन गया। यह निशान आज
भी भरथरी की गुफा में राजा की प्रतिमा के ऊपर
वाले पत्थर पर दिखाई देता है। यह पंजे का निशान
काफी बड़ा है, जिसे देखकर सहज
ही अंदाजा लगाया जा सकता है
कि राजा भरथरी की कद-
काठी कितनी विशालकाय रही होगी।
छत पर बना हुआ राजा भरथरी के पंजे का निशान
भरथरी ने वैराग्य पर वैराग्य शतक की रचना की,
जो कि काफी प्रसिद्ध है। इसके साथ ही भरथरी ने
श्रृंगार शतक और नीति शतक की भी रचना की। यह
तीनों ही शतक आज भी उपलब्ध हैं और पढ़ने योग्य है।
गुरु गोरखनाथ के द्वारा शिष्य भरथरी (भर्तृहरि)
की परीक्षा :-
गुरु गोरखनाथ
उज्जैन के राजा भरथरी के पास 365
पाकशास्त्री यानि रसोइए थे, जो राजा और उसके
परिवार और अतिथियों के लिए भोजन बनाने के
लिए। एक रसोइए को वर्ष में केवल एक ही बार
भोजन बनाने का मोका मिलता था।लेकिन इस
दौरान भरथरी जब गुरु गोरखनाथ जी के चरणों में
चले गये तो भिक्षा मांगकर खाने लगे थे।
एक बार गुरु गोरखनाथजी ने अपने शिष्यों से कहा,
‘देखो, राजा होकर भी इसने काम, क्रोध, लोभ
तथा अहंकार को जीत लिया है और दृढ़निश्चयी है।‘
शिष्यों ने कहा, ‘गुरुजी ! ये तो राजाधिराज हैं,
इनके यहां 365 तो बावर्ची रहते थे। ऐसे भोग
विलास के वातावरण में से आए हुए राजा और कैसे
काम, क्रोध, लोभ रहित हो गए?’ गुरु गोरखनाथ
जी ने राजा भरथरी से कहा, ‘भरथरी! जाओ, भंडारे
के लिए जंगल से लकड़ियां ले आओ।' राजा भरथरी ंगे
पैर गए, जंगल से लकड़ियां एकत्रित करके सिर पर
बोझ उठाकर ला रहे थे। गोरखनाथ जी ने दूसरे
शिष्यों से कहा, ‘जाओ,
उसको ऐसा धक्का मारो कि बोझ गिर जाए।‘ चेले
गए और ऐसा धक्का मारा कि बोझ गिर गया और
भरथरी गिर गए। भरथरी ने बोझ उठाया, लेकिन न
चेहरे पर शिकन, न आंखों में आग के गोले, न होंठ फड़के।
गुरु जी ने चेलों से क, ‘देखा! भरथरी ने क्रोध को जीत
लिया है।'
शिष्य बोले, ‘गुरुजी! अभी तो और
भी परीक्षा लेनी चाहिए।' थोड़ा सा आगे जाते
ही गुरुजी ने योगशक्ति से एक महल रच दिया।
गोरखनाथ जी भरथरी ो महल दिखा रहे थे।
युवतियां नाना प्रकार के व्यंजन आदि से सेवक
उनका आदर सत्कार करने लगे।
भरथरी युवतियों को देखकर कामी भी नहीं हुए और
उनके नखरों पर क्रोधित भी नहीं हुए, चलते ही गए।
गोरखनाथजी ने शिष्यों को कहा, अब तो तुम
लोगों को विश्वास हो ही गया है
कि भरथरी े काम, क्रोध, लोभ आदि को जीत
लिया है। शिष्यों ने कहा, गुरुदेव एक परीक्षा और
लीजिए। गोरखनाथजी ने कहा,
अच्छा भरथरी हमारा शिष्य बनने के लिए
परीक्षा से गुजरना पड़ता है। जाओ, तुमको एक
महीना मरुभूमि में नंगे पैर पैदल
यात्रा करनी होगी।' भरथरी अपने निर्दिष्ट
मार्ग पर चल पड़े। पहाड़ी इलाका लांघते-लांघते
राजस्थान की मरुभूमि में पहुंचे। धधकती बालू, कड़ाके
की धूप मरुभूमि में पैर रखो तो बस जल जाए। एक
दिन, दो दिन यात्रा करते-करते छः दिन बीत गए।
सातवें दिन गुरु गोरखनाथजी अदृश्य शक्ति से अपने
प्रिय चेलों को भी साथ लेकर वहां पहुंचे। गोरखनाथ
जी बोले, ‘देखो, यह भरथरी जा रहा है। मैं
अभी योगबल से वृक्ष खड़ा कर देता हूं। वृक्ष
की छाया में भी नहीं बैठेगा।' अचानक वृक्ष खड़ा कर
दिया। चलते-चलते भरथरी का पैर वृक्ष
की छाया पर आ गया तो ऐसे उछल पड़े,
मानो अंगारों पर पैर पड़ गया हो।
‘मरुभूमि में वृक्ष कैसे आ गया? छायावाले वृक्ष के नीचे
पैर कैसे आ गया? गुरु जी की आज्ञा थी मरुभूमि में
यात्रा करने की।’ कूदकर दूर हट गए। गुरु
जी प्रसन्न हो गए कि देखो! कैसे गुरु
की आज्ञा मानता है। जिसने कभी पैर गलीचे से नीचे
नहीं रखा, वह मरुभूमि में चलते-चलते पेड़
की छाया का स्पर्श होने से अंगारे जैसा एहसास
करता है।’ गोरखनाथ जी दिल में चेले की दृढ़ता पर
बड़े खुश हुए, लेकिन और शिष्यों के मन में ईर्ष्या थी।
शिष्य बोले, ‘गुरुजी! यह तो ठीक है लेकिन
अभी तो परीक्षा पूरी नहीं हुई।' गोरखनाथ
जी (रूप बदल कर) भर्तृहरि से मिले और बोले,
‘जरा छाया का उपयोग कर लो।' भरथरी बोले,
‘नहीं, मेरे गुरुजी की आज्ञा है कि नंगे पैर मरुभूमि में
चलूं।' गोरखनाथ जी ने सोचा, ‘अच्छा! कितना चलते
हो देखते हैं।’ थोड़ा आगे गए तो गोरखनाथ जी ने
योगबल से कांटे पैदा कर दिए।
ऐसी कंटीली झाड़ी कि कंथा (फटे-पुराने
कपड़ों को जोड़कर बनाया हुआ वस्त्र) फट गया।
पैरों में शूल चुभने लगे, फिर भी भरथरी ने ‘आह’ तक
नहीं की। भरथरी तो और अंतर्मुख हो गए, ’यह सब
सपना है, गुरु जी ने जो आदेश दिया है,
वही तपस्या है। यह भी गुरुजी की कृपा है’।
अंतिम परीक्षा के लिए गुरु गोरखनाथ जी ने अपने
योगबल से प्रबल ताप पैदा किया। प्यास के मारे
भरथरी के प्राण कंठ तक आ गये। तभी गोरखनाथ
जी ने उनके अत्यन्त समीप एक हरा-भरा वृक्ष
खड़ा कर दिया, जिसके नीचे पानी से
भरी सुराही और सोने की प्याली रखी थी। एक बार
तो भर्तृहरि ने उसकी ओर देखा पर तुरंत ख्याल
आया कि कहीं गुरु आज्ञा भंग तो नहीं हो रही है।
उनका इतना सोचना ही हुआ कि सामने से गोरखनाथ
आते दिखाई दिए। भरथरी ने दंडवत प्रणाम किया।
गुरुजी बोले, ”शाबाश भरथरी, वर मांग लो।
अष्टसिद्धि दे दूं, नवनिधि दे दूं। तुमने सुंदर-सुंदर
व्यंजन ठुकरा दिए, युवतियां तुम्हारे चरण पखारने के
लिए तैयार थीं, लेकिन तुम उनके चक्कर में नहीं आए।
तुम्हें जो मांगना है, वो मांग लो। भर्तृहरि बोले,
‘गुरुजी! बस आप प्रसन्न हैं, मुझे सब कुछ मिल गया।
शिष्य के लिए गुरु की प्रसन्नता सब कुछ है। आप मुझसे
संतुष्ट हुए, मेरे करोड़ों पुण्यकर्म और यज्ञ, तप सब
सफल हो गए।' गोरखनाथ बोले, ‘नहीं भरथरी!
अनादर मत करो। तुम्हें कुछ-न-कुछ
तो लेना ही पड़ेगा, कुछ-न-कुछ मांगना ही पड़ेगा।'
इतने में रेती में एक चमचमाती हुई सूई दिखाई दी।
उसे उठाकर भरथरी बोले, ‘गुरुजी! कंठा फट गया है,
सूई में यह धागा पिरो दीजिए ताकि मैं
अपना कंठा सी लूं।'
गोरखनाथ जी और खुश हुए कि ’हद हो गई!
कितना निरपेक्ष है, अष्टसिद्धि-नवनिधियां कुछ
नहीं चाहिए। मैंने कहा कुछ मांगो, तो बोलता है
कि सूई में जरा धागा डाल दो। गुरु का वचन रख
लिया। कोई अपेक्षा नहीं? भर्तृहरि तुम धन्य
हो गए! कहां उज्जयिनी का सम्राट नंगे पैर
मरुभूमि में। एक महीना भी नहीं होने दिया, सात-
आठ दिन में ही परीक्षा से उत्तीर्ण हो गए।'

"सोहम जिनकी शक्ति है, शुन्य जिनकी माता है,
अवगत जिनके पिता हैं, अभय जिनका पंथ है, अचल
जिनकी पदवी हैं, निरंजन जिनका गोत्र हैं, विहंगम
जिनकी जाति हैँ यही पहचान गुरू गोरखनाथ
जी की हैं" जय हो चतुर्भुज शंभुजति शिव गोरक्षनाथ
की !!! ना कोई साई, ना कोई माई! भुवन के गुरु
श्री गोरख राई !!

हरीतकी: आयुर्वेद की अनमोल विरासत और हर रोग की संजीवनीभारतीय आयुर्वेद परंपरा में कुछ ऐसी औषधियां हैं जिन्हें 'संजीवनी' की...
03/03/2026

हरीतकी: आयुर्वेद की अनमोल विरासत और हर रोग की संजीवनी

भारतीय आयुर्वेद परंपरा में कुछ ऐसी औषधियां हैं जिन्हें 'संजीवनी' की संज्ञा दी गई है। उन्हीं में से एक अत्यंत प्रभावशाली और बहुगुणकारी औषधि है हरीतकी, जिसे साधारण बोलचाल में 'हरड़' भी कहा जाता है। संस्कृत में इसे 'अभया' के नाम से विभूषित किया गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ है 'वह जो भय (रोगों के भय) को दूर करती है'। आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों में इसे 'रसायन' माना गया है, अर्थात एक ऐसी औषधि जो शरीर को नया जीवन और यौवन प्रदान करने की क्षमता रखती है। यह प्रसिद्ध आयुर्वेदिक योग 'त्रिफला' का भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अनिवार्य घटक है।

हरीतकी का स्वरूप और आयुर्वेदिक गुणधर्म

मूलतः, हरीतकी एक विशाल पेड़ का फल है, जो मुख्य रूप से भारत, नेपाल, श्रीलंका और दक्षिण एशिया के कई अन्य हिस्सों में पाया जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम टर्मिनेलिया चेबुला (Terminalia chebula) है। हरीतकी के उपयोग का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है और आयुर्वेद में इसे बहुत ऊंचा स्थान प्राप्त है। इसके फलों को सुखाकर और फिर उन्हें चूर्ण, काढ़ा या गोली के रूप में प्रयोग में लाया जाता है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से, हरीतकी को एक 'त्रिदोषहर' औषधि माना गया है, जिसका अर्थ है कि यह शरीर के तीन मुख्य दोषों - वात, पित्त और कफ - को संतुलित करने की क्षमता रखती है। यह न केवल भूख और पाचन में सुधार करती है (दीपन पाचन), बल्कि जीवन शक्ति को बढ़ाती है (रसायन), घावों को भरने में मदद करती है (व्रणरोपण), और रक्त को शुद्ध करने का कार्य भी करती है (रक्तशुद्धि)। 'अष्टांग हृदय', 'चरक संहिता', और 'भावप्रकाश' जैसे प्रतिष्ठित आयुर्वेदिक ग्रंथों में हरीतकी की अत्यधिक प्रशंसा और सम्मान किया गया है। इसके मुख्य गुणधर्मों की बात करें तो, इसका रस (स्वाद) कसैला, मधुर और अम्ल होता है; गुण लघु (हल्का) और रुक्ष (शुष्क) होते हैं; वीर्य (तासीर) उष्ण (गर्म) होती है; और विपाक (पाचन के बाद का प्रभाव) मधुर (मीठा) होता है।

हरीतकी के चमत्कारी स्वास्थ्य लाभ और उपयोग विधि

हरीतकी एक समग्र स्वास्थ्य रक्षक है। यहाँ इसके कुछ प्रमुख लाभ और उनके उपयोग की विधियाँ दी गई हैं:

पाचन तंत्र और कब्ज के लिए रामबाण: हरीतकी पाचन शक्ति को बढ़ाने में अत्यंत सहायक है। कब्ज की समस्या से निजात पाने के लिए, रात को सोने से पहले एक चम्मच हरीतकी चूर्ण को गुनगुने पानी या गाय के दूध के साथ लें। यह आंतों को साफ करता है, मल को मुलायम बनाता है, और पेट को हल्का रखता है। भूख बढ़ाने, गैस, अपच और पेट के भारीपन से राहत पाने के लिए, हरीतकी चूर्ण को सेंधा नमक और अदरक के साथ मिलाकर भोजन से पहले सेवन करें।

मुख स्वास्थ्य: मुंह के छालों और दुर्गंध की समस्या में, हरीतकी के चूर्ण को पानी में उबालकर कुल्ला करें। यह छालों, सूजन और दुर्गंध में तुरंत राहत प्रदान करता है और मुंह की सफाई में बेहद असरदार है।

बालों और त्वचा की देखभाल: बालों के झड़ने और डैंड्रफ (रूसी) को नियंत्रित करने के लिए, हरीतकी चूर्ण को आंवला और रीठा के साथ मिलाकर पानी में उबालें। इस पानी से बाल धोने पर बालों का झड़ना कम होता है, डैंड्रफ नियंत्रित होता है, और बाल मजबूत बनते हैं। त्वचा रोगों के लिए, हरीतकी चूर्ण को नीम की पत्तियों के पेस्ट और हल्दी के साथ मिलाकर प्रभावित स्थान पर लगाने से खुजली, फोड़े-फुंसी, एक्जिमा, और त्वचा संक्रमण में बहुत लाभ मिलता है।

मेटाबॉलिज्म और वजन नियंत्रण: मधुमेह (डायबिटीज) को नियंत्रित करने में हरीतकी सहायक है। सुबह खाली पेट हरीतकी चूर्ण को गुनगुने पानी के साथ लेने से ब्लड शुगर लेवल को प्रबंधित करने में मदद मिलती है। वजन घटाने के लिए, सुबह खाली पेट हरीतकी चूर्ण को गुनगुने पानी और शहद के साथ सेवन करें। यह मेटाबॉलिज्म को तेज करता है और शरीर की अतिरिक्त चर्बी को घटाने में सक्रिय भूमिका निभाता है।

श्वसन और हृदय स्वास्थ्य: खांसी और गले की खराश के लिए, हरीतकी को पानी में उबालें और उसमें थोड़ा शहद मिलाकर सेवन करें। यह गले की खराश, सूखी खांसी, और सर्दी-जुकाम में राहत देता है। हृदय स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए, हरीतकी को त्रिफला के रूप में आंवला और बहेड़ा के साथ सेवन करें। यह कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करता है, रक्तवाहिनियों को मजबूत बनाता है, और हृदय को स्वस्थ रखता है।

आँखों की रोशनी: आँखों की रोशनी बढ़ाने के लिए, हरीतकी को रात भर पानी में भिगोकर रखें। सुबह इस पानी को छानकर इससे अपनी आँखें धोएं। यह आँखों की थकान, जलन और सूजन में राहत प्रदान करता है और दृष्टि में सुधार करता है।

हरीतकी से जुड़े कुछ रोचक तथ्य

बुद्ध और हरीतकी: ऐसा माना जाता है कि भगवान बुद्ध के हाथ में हमेशा एक हरीतकी का फल रहता था, जिसे उनकी प्रतीकात्मक 'आयुर्वेदिक लाठी' कहा जाता था।

त्रिफला में केंद्रीय भूमिका: हरीतकी त्रिफला (हरीतकी, विभीतकी, आंवला) का एक प्रमुख घटक है, जहाँ यह 'वात' दोष को संतुलित करने का कार्य करती है।

धूम्रपान छुड़ाने में सहायक: हरीतकी का नियमित सेवन धूम्रपान की आदत को धीरे-धीरे कम करने में मदद कर सकता है।

ताम्र पात्र में सेवन की विशेष विधि: आयुर्वेद की एक विशेष विधि के अनुसार, हरीतकी को रात भर तांबे के पात्र में रखने के बाद सुबह सेवन करना पाचन और त्वचा के लिए अत्यंत लाभकारी होता है।

महत्वपूर्ण सावधानियां

हरीतकी एक शक्तिशाली औषधि है, इसलिए इसके सेवन में कुछ सावधानियां अत्यंत आवश्यक हैं:

गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएं बिना योग्य वैद्य की सलाह के हरीतकी का सेवन न करें।

अत्यधिक मात्रा में सेवन करने से दस्त (डायरिया), डिहाइड्रेशन, या कमजोरी जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

हमेशा अच्छे ब्रांड या शुद्ध स्रोत से प्राप्त हरीतकी का ही उपयोग करें।

निष्कर्ष

हरीतकी केवल एक प्राचीन आयुर्वेदिक औषधि ही नहीं है, बल्कि यह आधुनिक जीवनशैली की कई जटिल स्वास्थ्य समस्याओं का एक सरल, प्राकृतिक और प्रभावी समाधान है। यदि इसका सही विधि और उचित मात्रा में सेवन किया जाए, तो यह न केवल शरीर के रोगों को दूर करती है, बल्कि शरीर, मन और आत्मा - तीनों को शुद्ध और स्वस्थ बनाती है। यह आयुर्वेद की एक ऐसी अनमोल सौगात है, जिसे हर व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए अपनाना चाहिए।

🌼 अमलतास (Cassia fistula)(Golden Shower Tree | आयुर्वेद की स्वर्ण औषधि)✨ आयुर्वेद में अमलतास को “आरोग्य का स्वर्ण पुष्प”...
26/02/2026

🌼 अमलतास (Cassia fistula)
(Golden Shower Tree | आयुर्वेद की स्वर्ण औषधि)
✨ आयुर्वेद में अमलतास को “आरोग्य का स्वर्ण पुष्प” कहा जाता है। इसके फल, गूदा, पत्ते और छाल—सभी औषधीय गुणों से भरपूर हैं।
🌿 अमलतास के प्रमुख लाभ
🔶 1. कब्ज में प्रभावी राहत
अमलतास का गूदा प्राकृतिक व सौम्य रेचक (Laxative) है।
पुरानी कब्ज में आंतों को साफ कर सहज मल त्याग में मदद करता है।
🔶 2. पेट को शीतलता प्रदान करता है
गर्मी, एसिडिटी, गैस और पेट की जलन में ठंडक देता है।
🔶 3. त्वचा रोगों में सहायक
फोड़े-फुंसी, खुजली, दाद-एक्जिमा में उपयोगी।
(आंतरिक सेवन या बाहरी लेप दोनों रूपों में लाभकारी माना जाता है)
🔶 4. बुखार में उपयोगी
विशेषकर गर्मी के बुखार में शरीर की गर्मी कम करने में सहायक।
🔶 5. पाचन शक्ति को मजबूत बनाता है
आंतों की सफाई कर पाचन तंत्र को संतुलित करता है।
🔶 6. मूत्र संबंधी समस्याओं में लाभकारी
पेशाब में जलन या रुकावट जैसी समस्याओं में राहत देने में सहायक।
🥄 सेवन विधि (सामान्य जानकारी)
✔ अमलतास का गूदा – 5–10 ग्राम, रात में गुनगुने पानी या दूध के साथ
✔ काढ़ा / चूर्ण – केवल वैद्य या चिकित्सक की सलाह से
⚠️ सावधानियाँ
❗ अधिक मात्रा लेने से दस्त हो सकते हैं।
❗ गर्भवती महिलाएँ, छोटे बच्चे एवं नियमित दवा लेने वाले व्यक्ति—सेवन से पहले डॉक्टर/वैद्य से परामर्श अवश्य लें।
🌿 प्राकृतिक चिकित्सा अपनाएँ — स्वस्थ जीवन पाएँ।

22/02/2026

Feburary और March की दिनचर्या.........

गुरुशीतदिवास्वप्नस्निग्धाम्लमधुरांस्त्यजेत् ।

वसन्त ऋतु में अपथ्य - इस ऋतु में गुरु (देर से पचने वाले भोज्य पदार्थ), शीतल पदार्थ, दिन में सोना, स्निग्ध (घी-तेल से बने हुए खाद्य) पदार्थों, खट्टे तथा मीठे रस-प्रधान पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये सभी कफवर्धक होते हैं।

Address

Dwarka D D A Sports Complex
New Delhi
110075

Opening Hours

Tuesday 6am - 8:30pm
Wednesday 6am - 8:30pm
Thursday 6am - 8:30pm
Friday 6am - 8:30pm
Saturday 6am - 8:30pm
Sunday 6am - 9am

Telephone

9871624282

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