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01/02/2026

Desi Ghee - इन बीमारियों में नुकसानदायक होता है देसी घी! हम सभी ने बचपन से यही सुना है कि देसी घी आयुर्वेद में अमृत माना गया है।

यह हड्डियों को मजबूत करता है, दिमाग को तेज करता है और आंखों की रोशनी बढ़ाता है। लेकिन आयुर्वेद सिर्फ तारीफ नहीं करता, वह चेतावनी भी देता है।

चरक संहिता जैसे प्राचीन ग्रंथों में साफ लिखा है कि कुछ खास परिस्थितियों में यही अमृत शरीर के लिए ज़हर की तरह काम कर सकता है।

मतलब साफ है। घी अच्छा है, लेकिन हर किसी के लिए, हर समय और हर बीमारी में नहीं।
गलत समय पर और गलत हालत में खाया गया घी बीमारी को ठीक नहीं, बल्कि कई गुना बढ़ा सकता है।

इसी Post में हम जानेंगे वे आठ स्थितियां जहां देसी घी से दूरी बनाना ही समझदारी है।

सबसे पहले साइंस समझिए: घी और पाचन का रिश्ता
आयुर्वेद के अनुसार घी को पचाने के लिए बहुत तेज़ जठराग्नि यानी डाइजेस्टिव फायर की जरूरत होती है।
अगर आपकी पाचन शक्ति मजबूत है, पेट हल्का रहता है और जीभ साफ है, तभी घी शरीर में सही तरह से काम करता है।

लेकिन अगर

पेट भारी रहता है
खाना देर से पचता है
जीभ पर सफेद परत जमी रहती है

तो यह संकेत है कि आपकी अग्नि कमजोर है।

ऐसी स्थिति में घी पचता नहीं, बल्कि सड़कर आम बनाता है।
यह आम एक चिपचिपा टॉक्सिन होता है, जो नसों में जमा होकर ब्लॉकेज और सूजन जैसी समस्याएं पैदा करता है।

1. कफ प्रकृति वालों के लिए घी क्यों खतरनाक है
अगर आपकी प्रकृति कफ प्रधान है यानी

वजन आसानी से बढ़ता है
ज्यादा नींद आती है
शरीर भारी और सुस्त रहता है
तो घी आपके लिए दोस्त नहीं, दुश्मन बन सकता है।

क्योंकि घी और कफ दोनों के गुण एक जैसे होते हैं।
ठंडा, भारी और चिकना।

ऐसे में घी खाने से कफ और ज्यादा बढ़ेगा, वजन बढ़ेगा, आलस्य बढ़ेगा और मेटाबॉलिज्म और स्लो हो जाएगा।

2. पित्त में भी हर बार घी सही नहीं होता
अक्सर लोग सोचते हैं कि एसिडिटी या गर्मी में घी खा लो, सब ठीक हो जाएगा।
लेकिन यहां एक बड़ा फर्क समझना जरूरी है।

अगर पित्त निराम है यानी शुद्ध है, तब घी फायदेमंद होता है।
लेकिन अगर पित्त साम है यानी टॉक्सिन से भरा हुआ है, तब घी नुकसान करता है।

साम पित्त के लक्षण होते हैं

खट्टी डकारें
मुंह में खट्टा स्वाद
जलन के साथ पेट में भारीपन

ऐसी हालत में घी आग में घी डालने जैसा काम करता है और जलन और एसिडिटी बढ़ा देता है।

3. बुखार में घी क्यों मना है
अगर आपको बुखार आया है, खासकर शुरुआती सात दिन जिसे आयुर्वेद में तरुण ज्वर कहा जाता है, तो घी बिल्कुल नहीं खाना चाहिए।

बुखार में शरीर की अग्नि त्वचा पर काम कर रही होती है और पेट की अग्नि कमजोर होती है।
ऐसे समय में घी पेट में जाकर पचता नहीं और बुखार को शरीर के अंदर ही फंसा देता है।

4. लीवर और पीलिया में घी से दूरी जरूरी
लीवर ही शरीर में फैट को पचाने का काम करता है।
अगर आपको पीलिया या फैटी लीवर है, तो इसका मतलब है कि लीवर पहले से ही कमजोर है।

ऐसी स्थिति में घी जैसा भारी फैट देना लीवर पर अतिरिक्त बोझ डालता है।
इसीलिए आयुर्वेद में पीलिया के मरीज को शुरुआत में बिल्कुल फैट फ्री डाइट दी जाती है।

5. खांसी और अस्थमा में घी कब ज़हर बनता है
अगर खांसी सूखी है, तब घी फायदेमंद हो सकता है।
लेकिन अगर खांसी बलगम वाली है, तो घी जहर जैसा काम करता है।

घी बलगम को और गाढ़ा और चिपचिपा बना देता है, जिससे सांस लेने में दिक्कत बढ़ जाती है।
अस्थमा के मरीजों में यह स्थिति और भी खतरनाक हो सकती है।

6. हार्ट और हाई कोलेस्ट्रॉल में सावधानी जरूरी
अगर आपका कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ है और आपकी लाइफस्टाइल सुस्त है, तो घी धमनियों में ब्लॉकेज बढ़ा सकता है।

ऐसे लोगों के लिए आयुर्वेद में मेदोहर यानी फैट घटाने वाले आहार की सलाह दी जाती है, ना कि घी बढ़ाने की।

7. घी के साथ ये गलत कॉम्बिनेशन ज़हर बन जाते हैं
सिर्फ घी ही नहीं, उसे किसके साथ खा रहे हैं यह भी उतना ही जरूरी है।
आयुर्वेद इसे विरुद्ध आहार कहता है।

घी और शहद बराबर मात्रा में कभी न मिलाएं
घी खाने के तुरंत बाद ठंडा पानी न पिएं, हमेशा गुनगुना पानी लें
कांसे के बर्तन में 10 दिन से ज्यादा रखा घी जहरीला माना गया है

8. मौसम का असर: वसंत ऋतु में घी क्यों कम करें
मार्च और अप्रैल के महीने यानी वसंत ऋतु में सर्दियों का जमा हुआ कफ पिघल रहा होता है।
अगर इस समय ज्यादा घी खाया जाए तो सर्दी, जुकाम और एलर्जी की संभावना बढ़ जाती है।

Conclusion: घी अमृत है, लेकिन शर्तों के साथ
देसी घी वाकई अमृत है, लेकिन
सही अग्नि, सही मौसम और सही बीमारी में।

अगर आप ऊपर बताई गई किसी भी स्थिति में आते हैं, तो बिना सोचे समझे घी न खाएं।
आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह से औषधीय घी या सही विकल्प चुनें।

अगर आपको यह जानकारी उपयोगी लगी, तो इसे उन लोगों के साथ जरूर शेयर करें जिन्हें घी बहुत पसंद है।
आप घी खाते हैं रोज़? YES / NO कमेंट करें

30/01/2026

बार-बार सर्दी लगना आज के समय में बहुत आम समस्या बन चुकी है। ज़रा-सी ठंडी हवा, मौसम का बदलाव या ठंडा पानी पीते ही नाक बहने लगती है, गला बैठ जाता है और शरीर भारी-सा महसूस होने लगता है। आम तौर पर इसे कमजोर प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी से जोड़ दिया जाता है, लेकिन आयुर्वेद इस समस्या को केवल प्रतिरोध की कमजोरी नहीं मानता। आयुर्वेद के अनुसार इसका मूल कारण अक्सर अग्नि का दोष होता है।

आयुर्वेद में अग्नि को शरीर की जीवनशक्ति कहा गया है। यही अग्नि भोजन को पचाती है, रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र जैसे धातुओं का निर्माण करती है और ओज को बढ़ाती है। जब अग्नि संतुलित रहती है, तो शरीर स्वयं रोगों से रक्षा करता है। लेकिन जब अग्नि मंद हो जाती है, तब अधपचा अन्न शरीर में आम (विषाक्त तत्व) बनाता है। यही आम आगे चलकर कफ को बढ़ाता है और सर्दी-जुकाम की नींव डालता है।

बार-बार सर्दी लगने वाले लोगों में अक्सर भूख कम लगना, पेट भारी रहना, गैस, अपच, आलस्य और शरीर में जकड़न जैसे लक्षण भी पाए जाते हैं। ये सभी अग्नि की कमजोरी के संकेत हैं। कमजोर अग्नि के कारण कफ दोष बढ़ जाता है, और कफ का मुख्य स्थान छाती, गला और सिर होता है। यही कारण है कि बार-बार नाक बहना, छींक आना, गले में खराश और कफ जमने की समस्या होती है।

गलत खान-पान अग्नि को कमजोर करने का सबसे बड़ा कारण है। ठंडे पेय, फ्रिज का पानी, आइसक्रीम, दही का अत्यधिक सेवन, बासी भोजन, अधिक मीठा और मैदे से बने पदार्थ अग्नि को मंद कर देते हैं। इसके अलावा अनियमित भोजन समय, भूख न लगने पर भी खाना, देर रात भोजन करना और दिन में बार-बार कुछ न कुछ खाते रहना भी अग्नि दोष को बढ़ाता है।

जीवनशैली भी इस समस्या में बड़ी भूमिका निभाती है। देर तक सोना, शारीरिक श्रम का अभाव, दिन में सोने की आदत, लगातार एसी या कूलर में रहना और पसीने के बाद ठंडी हवा लगना कफ को बढ़ाता है। जब कफ बढ़ा हुआ होता है और अग्नि कमजोर होती है, तब शरीर थोड़े-से मौसम परिवर्तन को भी सहन नहीं कर पाता।

आयुर्वेद के अनुसार समाधान इम्यूनिटी बूस्टर लेने से ज्यादा, अग्नि को सुधारने में है। जब अग्नि मजबूत होती है, तो अपने आप कफ संतुलित होता है और प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है। इसके लिए सबसे पहले भोजन को औषधि की तरह लेना जरूरी है। हल्का, ताजा, गर्म और सुपाच्य भोजन अग्नि को बल देता है। भोजन में अदरक, काली मिर्च, पिप्पली, जीरा और हींग जैसे दीपनीय पदार्थों का प्रयोग लाभकारी होता है।

सुबह खाली पेट गुनगुना पानी पीना, भोजन से पहले थोड़ा-सा अदरक-नींबू-सेंधा नमक लेना और रात का भोजन हल्का रखना अग्नि को जाग्रत करता है। दही, ठंडा दूध और भारी मिठाइयों का सेवन सीमित करना चाहिए, खासकर रात के समय। मौसम के अनुसार आहार-विहार अपनाना भी बहुत जरूरी है।

दिनचर्या में नियमित व्यायाम, प्राणायाम और हल्की धूप में समय बिताना कफ को कम करता है। भस्त्रिका और कपालभाति जैसे प्राणायाम अग्नि को तेज करते हैं और श्वसन तंत्र को मजबूत बनाते हैं। पर्याप्त नींद और तनाव से दूरी भी अग्नि संतुलन में सहायक होती है।

बार-बार सर्दी लगना केवल कमजोर प्रतिरोधक क्षमता का संकेत नहीं है, बल्कि यह शरीर की जठराग्नि के असंतुलन का परिणाम है। जब तक अग्नि को सुधारा नहीं जाएगा, तब तक बार-बार दवाइयों या काढ़ों से केवल अस्थायी राहत ही मिलेगी। अग्नि के संतुलन के साथ ही शरीर स्थायी रूप से स्वस्थ और रोग-प्रतिरोधी बनता है।

प्रकृति का अनमोल वरदान: आंवला! ​क्या आप जानते हैं कि एक छोटा सा आंवला आपकी सेहत के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है? इसे '...
30/01/2026

प्रकृति का अनमोल वरदान: आंवला!
​क्या आप जानते हैं कि एक छोटा सा आंवला आपकी सेहत के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है? इसे 'अमृतफल' भी कहा जाता है और यह इन्फोग्राफिक बताता है कि क्यों!
​आंवला के मुख्य फायदे:
✅ इम्यूनिटी बूस्टर: विटामिन C का खजाना, जो बीमारियों से लड़ने में मदद करता है।
✅ आंखों की रोशनी: इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स आंखों को स्वस्थ रखते हैं।
✅ मजबूत और काले बाल: बालों का झड़ना रोकता है और उन्हें प्राकृतिक रूप से काला रखता है।
✅ दिमाग की शक्ति: याददाश्त बढ़ाने और तनाव कम करने में सहायक।
​कैसे करें इस्तेमाल?
आप इसे कच्चा खा सकते हैं, जूस पी सकते हैं, या मुरब्बा और चूर्ण के रूप में ले सकते हैं। रोजाना 1-2 आंवला काफी है!

​आज ही अपनी डाइट में इसे शामिल करें और स्वस्थ रहें!

जाने औषधीय हल्दियों के प्रकार,किस बीमारी में कौनसी हल्दी का सेवन करना है लाभदायक व कैसे करें उपयोग...🌿 हल्दी के प्रकार ए...
22/01/2026

जाने औषधीय हल्दियों के प्रकार,किस बीमारी में कौनसी हल्दी का सेवन करना है लाभदायक व कैसे करें उपयोग...

🌿 हल्दी के प्रकार एवं उनके औषधीय उपयोग
1️⃣ साधारण पीली हल्दी (घर की हल्दी)
उपयोगी रोग• सूजन, चोट, दर्द• सर्दी-खांसी
• इम्यूनिटी कम होना
• त्वचा रोग
सेवन तरीका
½ चम्मच हल्दी + गुनगुना दूध रात में
2️⃣ कस्तूरी हल्दी (जंगली हल्दी)
उपयोगी रोग• चेहरे के दाग-धब्बे• मुहांसे
• त्वचा की एलर्जी
• सौंदर्य उपचार
उपयोग
चेहरे पर लेप (खाने में प्रयोग नहीं)
3️⃣ लक्ष्मी हल्दी
उपयोगी रोग• घाव जल्दी भरना• संक्रमण
• पूजा एवं आयुर्वेदिक प्रयोग
उपयोग
घाव पर हल्दी + नारियल तेल का लेप
4️⃣ काली हल्दी
उपयोगी रोग• जोड़ों का दर्द• अस्थमा• कमजोरी
• रोग प्रतिरोधक क्षमता
सेवन बहुत कम मात्रा, वैद्य की सलाह से
5️⃣ दारुहल्दी (दारुहरिद्रा)
उपयोगी रोग• जिगर की समस्या• पीलिया• पेट के रोग
• संक्रमण
सेवन
चूर्ण ¼ चम्मच शहद के साथ
6️⃣ सफेद हल्दी
उपयोगी रोग• पाचन समस्या• सूजन• गैस, अपच
सेवन
चूर्ण रूप में या काढ़ा बनाकर
7️⃣ लाल हल्दी
उपयोगी रोग• रक्त शुद्धि• त्वचा रोग• घाव
उपयोग
लेप या काढ़ा
8️⃣ नारंगी हल्दी
उपयोगी रोग• गठिया (Arthritis)• मांसपेशियों का दर्द• सूजन• शरीर में जकड़न
सेवन
½ चम्मच दूध या गर्म पानी के साथ
9️⃣ सुगंधित हल्दी
उपयोगी रोग• तनाव• अनिद्रा• मानसिक थकान
• सिरदर्द
उपयोग
काढ़ा या तेल मालिश
🔟 अमर हल्दी (वन हल्दी)
उपयोगी रोग• बार-बार बीमार होना• कमजोरी
• संक्रमण
सेवन
चूर्ण शहद के साथ सुबह
1️⃣1️⃣ मदर हल्दी (जड़ वाली ताजी हल्दी)
उपयोगी रोग• खून की कमी• पाचन शक्ति कमजोर
• शरीर में सूजन
सेवन
कच्ची हल्दी का छोटा टुकड़ा चबाएँ या रस
1️⃣2️⃣ कृष्णा हल्दी
उपयोगी रोग• पुराने जोड़ों का दर्द• नसों की कमजोरी
• वात रोग
सेवन
तेल बनाकर मालिश (खाने में कम प्रयोग)
1️⃣3️⃣ औषधीय हल्दी (आयुर्वेदिक ग्रेड)
उपयोगी रोग• कैंसर से बचाव (सहायक)• सूजन
• रोग प्रतिरोधक क्षमता
• हृदय रोग
सेवन
डॉक्टर/वैद्य की सलाह से कैप्सूल या चूर्ण

🌼 रोग अनुसार सही हल्दी चुनें
रोग उपयोगी हल्दी
सर्दी-खांसी पीली हल्दी
त्वचा रोग कस्तूरी / लाल हल्दी
जोड़ दर्द काली / नारंगी हल्दी
पाचन सफेद / दारुहल्दी
पीलिया दारुहल्दी
कमजोरी अमर / मदर हल्दी
घाव लक्ष्मी / लाल हल्दी
तनाव सुगंधित हल्दी

21/01/2026

Kapha Dosha - कफ प्रकृति: पहचान, लक्षण और संतुलन के आयुर्वेदिक उपाय - आयुर्वेद के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में वात, पित्त और कफ—तीनों दोष उपस्थित रहते हैं। जब ये दोष संतुलन में रहते हैं, तब शरीर और मन स्वस्थ रहते हैं।

लेकिन जब किसी एक दोष की प्रधानता हो जाती है, तो उसी के अनुरूप व्यक्ति की प्रकृति बनती है।

कफ प्रकृति क्या है?
जिन व्यक्तियों में कफ दोष की मात्रा अधिक और वात-पित्त अपेक्षाकृत कम होते हैं, उन्हें कफ प्रकृति कहा जाता है। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि प्रकृति के लक्षण व्यक्ति-विशेष में कुछ कम या अधिक हो सकते हैं।

कफ प्रकृति के शारीरिक लक्षण
कफ प्रकृति के लोग सामान्यतः:

आकर्षक, गोरे या उजले रंग के
मजबूत, स्थूल और बलवान शरीर वाले
चौड़े कंधे, छाती, माथा और मजबूत हड्डियाँ
त्वचा मुलायम, चिकनी, ठंडी और तैलीय
बाल काले, घने, मजबूत और चमकदार
नाखून स्निग्ध और कोमल
आवाज़ भारी, मधुर और प्रभावशाली

इनमें स्निग्धता अधिक होने के कारण:

चलते समय जोड़ों से आवाज़ नहीं आती
पसीना कम आता है
भूख और प्यास कम लगती है (मंद जठराग्नि)
वजन बढ़ने और पेट निकलने की प्रवृत्ति हो सकती है
शारीरिक श्रम करने पर देर से थकान महसूस होती है

कफ प्रकृति के लोग ठंड के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, जबकि गर्मी को अपेक्षाकृत बेहतर सहन कर लेते हैं।

मानसिक और भावनात्मक लक्षण
मानसिक रूप से कफ प्रकृति के व्यक्ति:

शांत, धैर्यवान और स्थिर स्वभाव के
सीखने में थोड़े धीमे, लेकिन स्मरण शक्ति उत्कृष्ट
एक बार सीखी बात को लंबे समय तक याद रखने वाले
बच्चों में पढ़ाई में धीमे दिख सकते हैं, पर परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करते हैं
नींद प्रिय और आलस्य की प्रवृत्ति
क्रोध और उत्तेजना कम, लेकिन बातों को मन में लंबे समय तक रखने वाले
दयालु, सहानुभूतिपूर्ण और मददगार

ये लोग दीर्घकालिक योजना बनाते हैं और लक्ष्य पर टिके रहते हैं।

आचार्य चरक का मत
आचार्य चरक के अनुसार कफ प्रकृति के व्यक्ति:
बलवान, शांत चित्त, स्थिर, संयमी, धनवान, विद्वान, दृढ़ निश्चयी और दीर्घायु होते हैं।

कफ दोष बढ़ने पर दिखाई देने वाले संकेत
जब कफ अपनी सीमा से अधिक बढ़ जाता है, तब लक्षण दिखाई देते हैं:

शरीर में भारीपन, सुस्ती
अधिक नींद
बिना खाए पेट भरा-भरा लगना
मोटापा
शरीर में चिपचिपाहट
ठंड अधिक लगना
बलगम, कफ जमना
खुजली और एलर्जी

आचार्य चरक ने कफ वृद्धि से जुड़े लगभग 20 प्रकार के विकारों का वर्णन किया है।

कफ दोष को शांत करने के आयुर्वेदिक उपाय
1. आहार (Diet)
कफ शमन के लिए:

कटु (तीखा), तिक्त (कड़वा), कषाय (कसैला) रस उपयोगी
अदरक, सोंठ, काली मिर्च, पीपली, हल्दी, लहसुन
करेला, मेथी, नीम, गिलोय
त्रिकटु चूर्ण (चिकित्सक की सलाह से)

शहद कफ नाशक है, लेकिन:
कभी भी गर्म पानी या गर्म पदार्थ के साथ न लें

भोजन:

हल्का, रूखा, कम मात्रा में
तला-भुना, मीठा, ठंडा और भारी भोजन सीमित रखें

2. जीवनशैली
नियमित व्यायाम (तेज़ चलना, योग, सूर्य नमस्कार)

दिन में सोने से बचें
अत्यधिक आराम और आलस्य का त्याग करें

3. आयुर्वेदिक उपाय
उपवास / इंटरमिटेंट फास्टिंग
उद्वर्तन (चूर्ण से शुष्क मालिश)
गंडूष और कवल
आयुर्वेदिक औषधीय धूमपान (चिकित्सकीय रूप में)

4. पंचकर्म
कफ दोष के शोधन हेतु:

वमन चिकित्सा सर्वोत्तम मानी गई है

वसंत ऋतु (मार्च–अप्रैल) में विशेष लाभकारी
केवल योग्य आयुर्वेद चिकित्सक की देखरेख में

कफ प्रकृति स्थिरता, सहनशक्ति और दीर्घायु का प्रतीक है।
लेकिन यदि कफ बढ़ जाए, तो सक्रिय जीवनशैली, सही आहार और अनुशासन से ही संतुलन संभव है।

21/01/2026

बवासीर एक ऐसी समस्या है जो धीरे-धीरे पनपती है और अक्सर व्यक्ति को तब तक पता नहीं चलता जब तक दर्द, जलन या खून आने जैसी शिकायतें शुरू न हो जाएँ। इसके पीछे खान-पान के साथ-साथ शौच की गलत आदतों की बहुत बड़ी भूमिका होती है। आधुनिक जीवनशैली में लोग प्राकृतिक नियमों को अनदेखा कर देते हैं और वही आदतें आगे चलकर बवासीर का कारण बनती हैं।

सबसे पहली और सामान्य गलती है शौच की इच्छा को रोकना। काम की व्यस्तता, बाहर होने की झिझक या साफ शौचालय न मिलने के कारण लोग घंटों तक मल त्याग को टालते रहते हैं। इससे मल आंतों में सूखने लगता है, कठोर हो जाता है और बाहर निकलते समय अधिक जोर लगाना पड़ता है। यही जोर धीरे-धीरे गुदा की नसों को कमजोर कर देता है और बवासीर की शुरुआत हो जाती है।

दूसरी बड़ी गलती है बहुत देर तक टॉयलेट में बैठे रहना। आजकल मोबाइल फोन या अखबार लेकर लोग शौचालय में काफी समय बिताते हैं। लंबे समय तक बैठे रहने से गुदा क्षेत्र की नसों पर दबाव बढ़ता है और रक्त संचार बाधित होता है। यह आदत बवासीर के लिए सबसे खतरनाक मानी जाती है क्योंकि इससे सूजन और मस्से बनने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।

तीसरी आदत है अत्यधिक जोर लगाना। कब्ज होने पर लोग पूरी ताकत लगाकर मल निकालने की कोशिश करते हैं। इस दौरान पेट और गुदा की मांसपेशियों पर अनावश्यक दबाव पड़ता है। बार-बार ऐसा करने से नसें फूलने लगती हैं और धीरे-धीरे स्थायी समस्या बन जाती है। यह स्थिति न केवल दर्दनाक होती है बल्कि आगे चलकर खून बहने और संक्रमण का कारण भी बन सकती है।

गलत बैठने की मुद्रा भी एक कारण है। भारतीय शैली में पांव मोड़कर बैठना प्राकृतिक माना जाता है, लेकिन पश्चिमी कमोड पर सीधे बैठकर जोर लगाना कई लोगों के लिए कठिन होता है। इससे मल पूरी तरह साफ नहीं हो पाता और बार-बार प्रयास करना पड़ता है। गलत मुद्रा गुदा की नसों पर अतिरिक्त दबाव डालती है और बवासीर को जन्म देती है।

अपर्याप्त पानी पीना भी एक बड़ी भूल है। शरीर में पानी की कमी होने पर मल कठोर हो जाता है और बाहर निकालना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में व्यक्ति को अधिक जोर लगाना पड़ता है, जो बवासीर की जड़ बनता है। दिन भर में पर्याप्त मात्रा में पानी न पीने वाले लोगों में यह समस्या अधिक देखी जाती है।

रेशे की कमी वाला भोजन भी शौच की आदतों को बिगाड़ देता है। अधिक तला-भुना, मैदा, फास्ट फूड और मसालेदार भोजन आंतों को सुस्त बना देता है। इससे कब्ज की शिकायत बढ़ती है और मल त्याग अनियमित हो जाता है। जब रोज़ समय पर और आराम से शौच नहीं होता, तो बवासीर का खतरा बढ़ जाता है।

सुबह की प्राकृतिक दिनचर्या को न मानना भी नुकसानदायक है। शरीर का एक निश्चित जैविक समय होता है जब आंतें स्वाभाविक रूप से खाली होने के लिए तैयार रहती हैं। देर से उठना, जल्दी में घर से निकल जाना या नाश्ता किए बिना बाहर चले जाना इस प्राकृतिक प्रक्रिया को बिगाड़ देता है। इससे कब्ज और बवासीर दोनों की संभावना बढ़ जाती है।

अत्यधिक साफ-सफाई या गलत तरीके से सफाई करना भी हानिकारक है। बहुत कड़े टॉयलेट पेपर का प्रयोग, बार-बार जोर से पोंछना या रासायनिक साबुनों का इस्तेमाल गुदा की त्वचा को नुकसान पहुँचा सकता है। इससे जलन, खुजली और सूजन बढ़ती है, जो बवासीर को और गंभीर बना देती है।

इन गलत आदतों से बचने के लिए कुछ सरल नियम अपनाना जरूरी है। शौच की इच्छा होते ही उसे टालें नहीं। रोज़ एक निश्चित समय पर, शांत मन से शौच करें। टॉयलेट में मोबाइल या किताब लेकर न बैठें और अधिक देर न लगाएँ। जोर लगाने से बचें, यदि कब्ज है तो पहले उसे ठीक करें।

खान-पान में रेशेदार पदार्थ जैसे फल, सब्ज़ियाँ, सलाद और साबुत अनाज शामिल करें। दिन भर में पर्याप्त पानी पिएँ ताकि मल नरम रहे। सुबह उठकर गुनगुना पानी पीना आंतों की गति को सुधारता है। हल्का व्यायाम और नियमित चलना भी पाचन तंत्र को मजबूत बनाता है।

सही मुद्रा अपनाना भी लाभकारी है। यदि संभव हो तो भारतीय शौचालय का प्रयोग करें या पश्चिमी कमोड पर बैठते समय पैरों के नीचे छोटा स्टूल रखकर घुटनों को थोड़ा ऊपर उठाएँ। इससे मल आसानी से बाहर निकलता है और नसों पर दबाव कम पड़ता है।

इस प्रकार बवासीर केवल एक बीमारी नहीं बल्कि हमारी गलत दिनचर्या और शौच की गलत आदतों का परिणाम है। समय रहते यदि इन आदतों को सुधारा जाए तो न केवल बवासीर से बचा जा सकता है बल्कि पाचन तंत्र भी स्वस्थ बना रहता है।

20/01/2026

औषधीय गोंद जो आती हैं A-Z बीमारी में काम,जाने किस गोंद का सेवन कब और कैसे करें...

🌿 बीमारी में काम आने वाले गोंद के प्रकार
1️⃣ गोंद कतीरा (Tragacanth Gum)
गर्मी से होने वाली कमजोरी
पेशाब की जलन
कब्ज
शरीर की गर्मी शांत करता है

2️⃣ गोंद बबूल (Babool Gond)
हड्डियाँ मजबूत करता है
महिलाओं में प्रसव के बाद कमजोरी
कमर दर्द, जोड़ों का दर्द

3️⃣ गोंद गोंदनी / करया गोंद (Karaya Gum)
कब्ज में लाभ
मोटापा कम करने में सहायक
पाचन सुधारता है

4️⃣ गोंद धौरा (Salai Gond)
जोड़ों का दर्द
गठिया
सूजन कम करता है

5️⃣ गोंद मोरिंगा (सहजन गोंद)
हड्डियों की कमजोरी
इम्यूनिटी बढ़ाता है
शरीर की थकान

6️⃣ गोंद आम (आम का गोंद)
अतिसार (दस्त)
कमजोरी
पेट के रोग

7️⃣ गोंद नीम
त्वचा रोग
खून साफ करता है
फोड़े-फुंसी

8️⃣ गोंद पीपल
खांसी
दमा
गले की समस्या

9️⃣ गोंद बरगद
महिलाओं की सफेद पानी की समस्या
कमजोरी
रक्तस्राव रोकने में सहायक

🔟 गोंद बेल
दस्त, पेचिश
पेट की गर्मी
आंतों की मजबूत
1️⃣ गोंद गुग्गुल (Guggul Gum)
जोड़ों का दर्द
गठिया
मोटापा
कोलेस्ट्रॉल कम करने में सहायक
2️⃣ गोंद लोबान (Loban Gum)
मानसिक शांति
सिरदर्द
सूजन व दर्द
3️⃣ गोंद राल (Pine Resin)
घाव भरने में
त्वचा रोग
सूजन
4️⃣ गोंद शल्लकी (Boswellia Gum)
आर्थराइटिस
जोड़ों की सूजन
मांसपेशी दर्द
5️⃣ गोंद हिंग (हींग)
गैस
अपच
पेट दर्द
6️⃣ गोंद अर्जुन
हृदय रोग
हाई बीपी
दिल की कमजोरी
7️⃣ गोंद अशोक
स्त्री रोग
अनियमित मासिक धर्म
अधिक रक्तस्राव
8️⃣ गोंद साल
घाव
सूजन
त्वचा की समस्या
9️⃣ गोंद खैर
मुँह के छाले
दस्त
खून बहना रोकता है
🔟 गोंद इमली
पेट की गर्मी
कब्ज
पाचन सुधार

Vata Dosha - वात दोष की चिकित्सा का मूल सिद्धांत - वात दोष क्या है और कैसे पहचानें?सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि वात दो...
19/01/2026

Vata Dosha - वात दोष की चिकित्सा का मूल सिद्धांत - वात दोष क्या है और कैसे पहचानें?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि वात दोष कब बढ़ा हुआ माना जाता है। आयुर्वेद में वात के लिए कहा गया है -

“तत्र रुक्ष, लघु, शीत, चल गुणः”

वात बढ़ने के प्रमुख लक्षण

1. रुक्ष गुण (ड्राइनेस)

त्वचा में अत्यधिक रूखापन
बालों का ड्राइ और फ्रिज़ी होना
कब्ज, हार्ड स्टूल
मल त्याग में कठिनाई (क्रूर कोष्ठ)

2. जोड़ों से जुड़े लक्षण

जोड़ों में दर्द
कटकट की आवाज
चलने-फिरने में जकड़न

3. लघु गुण (हल्कापन)

वजन बढ़ने में कठिनाई
वजन जल्दी कम हो जाना

4. चल गुण (चंचलता)

मन का अस्थिर रहना
ओवरथिंकिंग
नींद कम आना
एंग्जायटी और बेचैनी

इन लक्षणों से आप पहचान सकते हैं कि आपकी प्रकृति वात प्रधान है या आपके शरीर में वात बढ़ा हुआ है।

वात दोष की चिकित्सा का मूल सिद्धांत
आयुर्वेद में वात दोष की चिकित्सा का पहला सूत्र है —

“वातस्य उपक्रमः स्नेहः”

अर्थात वात को शांत करने के लिए स्नेह (तेल, घी) का प्रयोग सबसे आवश्यक है।

आजकल Zero Oil Diet का ट्रेंड बहुत बढ़ गया है, लेकिन यदि आपकी प्रकृति वात की है तो तेल और घी पूरी तरह बंद करना आपके लिए हानिकारक हो सकता है।

क्योंकि वात में पहले से ही रूखापन होता है, और स्निग्ध पदार्थ उसे संतुलित करते हैं।

वात के लिए सबसे श्रेष्ठ तेल
1. तिल का तेल (Sesame Oil)
वात शमन के लिए सर्वश्रेष्ठ

स्निग्ध (ऑयली) और गर्म तासीर
ठंडेपन को कम करता है

सेवन विधि:

1–2 चम्मच तिल का तेल
गुनगुने पानी के साथ

2. गाय का घी
वात और पित्त दोनों को संतुलित करता है

भोजन में 2–3 चम्मच प्रतिदिन
दाल, चावल या रोटी पर लगाकर सेवन करें

वात दोष में कौन-से स्वाद लाभकारी हैं?
आयुर्वेद में षड्रस (छह स्वाद) बताए गए हैं:
मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय

वात दोष को शांत करने के लिए
मधुर (मीठा), अम्ल (खट्टा) और लवण (नमकीन) स्वाद सबसे उपयोगी हैं।

मीठा स्वाद
घी, दूध, मक्खन
मुनक्का, खजूर, अंजीर
गुड़, मिश्री

खट्टा स्वाद
आंवला, अनार
नींबू, हल्दी का अचार

नमकीन स्वाद
हल्का, सुपाच्य और संतुलित मात्रा में

भोजन ताजा, गर्म और सुपाच्य होना चाहिए।

वात और पाचन अग्नि
वात दोष में विषम अग्नि होती है —
कभी तेज भूख
कभी बिल्कुल भूख नहीं
इसलिए भोजन भूख और पाचन क्षमता के अनुसार ही लें, जबरदस्ती न खाएं।

मिलेट्स: किसके लिए सही, किसके लिए नहीं?
आजकल मिलेट्स का चलन बहुत बढ़ गया है, लेकिन यह हर किसी के लिए सही नहीं हैं।

वात बढ़ने पर समस्या
मिलेट्स स्वभाव से रूखे होते हैं।
यदि पहले से वात बढ़ा हुआ है और आप ज्यादा मिलेट्स लेते हैं, तो वात और बिगड़ सकता है।

अपवाद
सर्दियों में बाजरा लिया जा सकता है
बाजरे की रोटी पर घी और गुड़ के साथ सेवन करें
रोज़ाना मिलेट्स न लें

सर्दियों में वात के लिए विशेष सलाह
हेमंत और शिशिर ऋतु में:

स्निग्ध और पौष्टिक आहार लें
ड्राय फ्रूट्स, लड्डू
गुनगुना पानी

यदि आपकी प्रकृति वात की है या वात बढ़ा हुआ है, तो:

स्निग्ध, गर्म और सुपाच्य भोजन लें
मीठा, खट्टा और नमकीन स्वाद बढ़ाएं
रूखा और ठंडा भोजन कम करें
पाचन क्षमता के अनुसार ही खाएं

Pitta Dosha - पित्त दोष बढ़ने के 5 लक्षण और उसे शांत करने की 5 प्रभावी चिकित्सा आपको कैसे पता चले कि आपके शरीर में पित्त...
19/01/2026

Pitta Dosha - पित्त दोष बढ़ने के 5 लक्षण और उसे शांत करने की 5 प्रभावी चिकित्सा
आपको कैसे पता चले कि आपके शरीर में पित्त दोष बढ़ा हुआ है , पित्त बढ़ने पर दिखाई देने वाले 5 प्रमुख लक्षण और पित्त को शांत करने के लिए 5 प्रभावी आयुर्वेदिक उपाय

पित्त दोष क्या है?
आयुर्वेद में पित्त के गुण बताए गए हैं —

“पित्तं सस्नेहं लघु विश्रं सरं द्रवं”

पित्त शरीर में स्वाभाविक रूप से बहुत आवश्यक है, क्योंकि:

पाचन क्रिया
मेटाबॉलिज्म
सेलुलर लेवल पर ऊर्जा निर्माण

ये सभी क्रियाएं पित्त के कारण ही सही ढंग से होती हैं।

लेकिन जब यही पित्त अपनी सीमा से अधिक बढ़ जाता है, तब यह विकृत होकर शरीर में कई तरह की तकलीफें पैदा करता है।

पित्त दोष बढ़ने के 5 प्रमुख लक्षण

1. शरीर में अत्यधिक गर्मी और जलन

अंदर से बहुत ज्यादा गर्मी महसूस होना
शरीर का तापमान बढ़ा हुआ लगना
त्वचा, आंखों, हथेलियों और तलवों में जलन
अत्यधिक पसीना और पसीने की दुर्गंध
त्वचा और बालों से जुड़ी समस्याएं
मुंहासे, फोड़े-फुंसी
एलर्जी, अर्टिकेरिया
धूप में जाने पर त्वचा का लाल हो जाना
बालों का जल्दी सफेद होना
हेयर फॉल और बालों का पतला होना

2. पाचन से जुड़ी समस्याएं

पित्त प्रकृति वालों में तीक्ष्ण अग्नि होती है।
बहुत ज्यादा भूख लगना
मसालेदार या तली हुई चीज खाने पर:
सीने में जलन
खट्टा पानी
जी मिचलाना
बार-बार प्यास लगना
मुंह सूखना
पानी पीने के बाद भी प्यास न बुझना
रक्त और हार्मोनल समस्याएं

3. महिलाओं में:

बहुत अधिक मासिक स्राव
पीरियड्स लंबे चलना
जल्दी-जल्दी पीरियड आना

4. रक्त पित्त विकार:

बवासीर से खून
नाक से खून आना (एपिस्टैक्सिस)
आयुर्वेद में बताया गया है कि पित्त और रक्त का आश्रय–आश्रयी संबंध होता है, इसलिए पित्त बढ़ने पर रक्त भी दुष्ट होता है।

5. मानसिक लक्षण

बहुत जल्दी गुस्सा आना
चिड़चिड़ापन
छोटी-छोटी बातों पर इरिटेशन
बेचैनी और असहजता

पित्त दोष को शांत करने के 5 प्रभावी उपाय
1. निदान परिवर्तन (कारणों से दूरी)
इन चीजों से परहेज करें:

बहुत मसालेदार भोजन
तली हुई चीजें
फर्मेंटेड फूड (इडली, डोसा, ढोकला)
जंक फूड
कोल्ड ड्रिंक्स
चाय-कॉफी का अधिक सेवन

भोजन समय पर करें, न भूखे रहें, न जबरदस्ती खाएं।
उपवास और रात को देर तक जागना अवॉइड करें।

2. तनाव कम करें
स्ट्रेस और एंग्जायटी पित्त को बहुत बढ़ाते हैं

प्राणायाम
ओंकार जप
ध्यान (Meditation)
पूरी नींद

कई बार अच्छी डाइट के बावजूद सिर्फ तनाव की वजह से पित्त बढ़ता है।

3. पित्त शमन करने वाले आहार
शुद्ध देसी गाय का घी (2–3 चम्मच रोज़)
घर का बना सफेद मक्खन + मिश्री
काली मुनक्का (8–10 रात को भिगोकर सुबह चबाकर खाएं)
आंवला मुरब्बा या कैंडी
गुलकंद

4. पित्त शमन करने वाले स्वाद
आयुर्वेद के 6 रस में से:

मधुर (मीठा)
तिक्त (कड़वा)
कषाय (कसैला)

ये तीन स्वाद पित्त को कम करते हैं।

पित्त बढ़ाने वाले स्वाद:

तीखा
बहुत खट्टा
अधिक नमकीन

5. सुरक्षित आयुर्वेदिक औषधियां
(घर पर ली जा सकने वाली)

मुलेठी चूर्ण

½–1 चम्मच
दिन में 1–2 बार
भोजन से पहले

शतावरी चूर्ण / कल्प

½–1 चम्मच
दिन में 2 बार
दूध के साथ या बिना दूध

यदि पित्त बहुत अधिक बढ़ा हो, तो नजदीकी आयुर्वेद चिकित्सक से सलाह अवश्य लें।

पंचकर्म चिकित्सा (गंभीर अवस्था में)
पित्त के लिए विरेचन चिकित्सा सर्वोत्तम मानी गई है

विशेष रूप से शरद ऋतु (सितंबर–अक्टूबर) में

घर पर माइल्ड विरेचन:

20–30 ml एरण्ड तेल
सुबह खाली पेट
महीने में 1 बार (डॉक्टर की सलाह से)
पूर्ण पंचकर्म केवल चिकित्सक की देखरेख में ही करें।

बढ़े हुए पित्त दोष को शांत करने के 3 सरल, सुरक्षित और प्रभावी उपाय
उपाय 1: सफेद पेठे का रस (Ash Gourd Juice)

संस्कृत में सफेद पेठे को कुष्मांड कहा जाता है।

वाग्भट ऋषि कहते हैं:

“वल्ली फलानां प्रवरः कुष्माण्डः वात-पित्तजित्”
अर्थात बेल पर उगने वाले फलों में कुष्मांड वात और पित्त को शांत करने में श्रेष्ठ है।

गुणधर्म:
हल्का (लघु)
स्निग्ध
शीतल तासीर
मधुर रस
मेध्य (बुद्धि और मन को शांत करने वाला)

यह:

पित्त और वात दोनों को संतुलित करता है
दिमाग, नींद, हृदय, किडनी और ब्रेन के लिए लाभकारी है

सेवन विधि:
छिलका हटाकर छोटे टुकड़े करें
कद्दूकस या मिक्सर में पीसें
सूती कपड़े से छानकर रस निकालें

मात्रा:
60–120 ml (प्रकृति और समस्या के अनुसार)

विशेष रूप से ग्रीष्म और शरद ऋतु में अत्यंत लाभकारी
8–10 दिन लें, फिर थोड़ा गैप देकर दोबारा लिया जा सकता है

उपाय 2: सब्जा सीड्स (Sweet Basil Seeds)
संस्कृत नाम: खरपुष्पा / वन तुलसी
लैटिन नाम: Ocimum basilicum

ध्यान दें:
सब्जा सीड्स और चिया सीड्स अलग-अलग हैं
सब्जा सीड्स भारतीय मूल के हैं और हमारे शरीर के लिए अधिक अनुकूल हैं।

गुणधर्म:
स्निग्ध
शीतल तासीर
मधुर रस
वात-पित्त शमन

लाभ:
शरीर को ठंडक
एसिडिटी और जलन में राहत
एनर्जी बढ़ाता है
डाइजेशन, स्किन और हेयर हेल्थ में सुधार
स्ट्रेस कम करता है

सेवन विधि:
1–1.5 चम्मच सब्जा सीड्स
अच्छे से धोकर पानी में भिगो दें
20–30 मिनट में फूल जाते हैं
मिट्टी के बर्तन में भिगोना और भी लाभकारी

कैसे लें:
नींबू शरबत
कोकम शरबत
आंवला शरबत
नींबू शरबत में:

पानी
धागे वाली मिश्री
नींबू रस
सेंधा नमक
भुना जीरा
1 चम्मच फूले हुए सब्जा सीड्स
चाहें तो पुदीना

आपने सब्जा सीड्स किस रूप में लिए हैं?
कमेंट में जरूर बताइए।

उपाय 3: गोंद कतीरा
गोंद और गोंद कतीरा अलग होते हैं

गोंद: Acacia arabica (बबूल का गोंद)

गोंद कतीरा: Astragalus gummifer
गोंद कतीरा पानी में भिगोने पर कई गुना फूल जाता है और जेली जैसा बनता है।

भावप्रकाश निघंटु में गुण:
शीतल
दाह शमन
रक्त स्तंभक
मृदु सारक (माइल्ड लैक्सेटिव)

लाभ:
आंख, त्वचा, यूरिन की जलन कम करता है
अत्यधिक ब्लीडिंग में सहायक
पाइल्स, नाक से खून
पेट साफ करता है
लू, सनस्ट्रोक और डिहाइड्रेशन से बचाव

सेवन विधि:
1 छोटा चम्मच गोंद कतीरा
4–5 घंटे या रात भर पानी में भिगो दें
½–1 चम्मच किसी शरबत में मिलाकर लें

यदि आपके शरीर में पित्त दोष बढ़ा हुआ है, तो:
गर्मी और जलन के लक्षण दिखेंगे
पाचन और त्वचा की समस्याएं होंगी
गुस्सा और चिड़चिड़ापन बढ़ेगा
सही आहार, जीवनशैली और आयुर्वेदिक चिकित्सा से पित्त को संतुलित किया जा सकता है।

17/01/2026

सूक्ष्म व्यायाम (Sukshma Vyayama) योग का एक महत्वपूर्ण भाग है, जिसमें सरल, हल्के व छोटे-छोटे व्यायाम किए जाते हैं। यह व्यायाम शरीर के प्रत्येक जोड़ , मांसपेशियों को सक्रिय करता है। सूक्ष्म व्यायाम का अर्थ है – शरीर की छोटी-छोटी मांसपेशियों व जोड़ों पर केंद्रित हल्का लेकिन प्रभावशाली व्यायाम। यह शरीर के अंदर की ऊर्जा को सक्रिय करता है और प्राणशक्ति को संतुलित करता है।
स्वामी दिरेंद्र ब्रह्मचारी ने 20वीं सदी में सूक्ष्म व्यायामों को एक व्यवस्थित क्रम में प्रस्तुत किया।उन्होंने इसे “योगाभ्यास से पहले की तैयारी” के रूप में प्रचारित किया और “Yoga Sukshma Vyayama” नाम से पुस्तक भी लिखी।योगिक सूक्ष्म व्यायाम 48 योगिक व्यायामों का एक क्रम है जो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। ये व्यायाम श्वास नियंत्रण, शारीरिक मुद्रा और मांसपेशियों के समन्वय पर केंद्रित हैं, जिनमें विशिष्ट गतिविधियाँ विभिन्न मांसपेशी समूहों को लक्षित करती हैं और समग्र स्वास्थ्य को बढ़ावा देती हैं।

सूक्ष्म व्यायाम का उद्देश्य:-
• शरीर को योगासन और ध्यान के लिए तैयार करना।
• प्राणशक्ति (vital energy) का प्रवाह बढ़ाना।
• जोड़ों की जकड़न हटाना।
• मानसिक और शारीरिक एकाग्रता लाना।

सूक्ष्म व्यायाम के लाभ:-

• शरीर के सभी जोड़ सक्रिय होते हैं।
• रक्त संचार सुधरता है।
• तनाव, जकड़न और दर्द में राहत मिलती है।
• ऊर्जा स्तर बढ़ता है।
• आसन , प्राणायाम और ध्यान की तैयारी के लिए शरीर को तैयार करता है।
• बुजुर्ग, बच्चे और बीमार लोग भी कर सकते हैं।

सूक्ष्म व्यायाम आसन से पहले की तैयारी है । इसके मात्र अभ्यास से शरीर के पूरे जोड़ में लचीलापन आ जाता है और शरीर के प्रत्येक जोड़ पर बढ़िया प्रभाव पड़ता है और उसी के हिसाब से यह सूक्ष्म व्यायाम डिज़ाइन भी किया गया है । शरीर के ऊपरी भाग सिर से लेकर निचले भाग पंजों तक का व्यायाम इसमें सम्मलित है ।

योगिक सूक्ष्म व्यायाम बहुत ही प्रभावी योगाभ्यास है ।

योग करें स्वस्थ रहें ।

अष्टांग योग, योग का एक आठ अंगों वाला मार्ग है जिसे महर्षि पतंजलि ने अपने योग सूत्र में वर्णित किया है। यह मार्ग, नैतिक र...
16/01/2026

अष्टांग योग, योग का एक आठ अंगों वाला मार्ग है जिसे महर्षि पतंजलि ने अपने योग सूत्र में वर्णित किया है। यह मार्ग, नैतिक रूप से अनुशासित और उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने के लिए एक विस्तृत मार्गदर्शन प्रदान करता है, जिसमें आसन (योग मुद्राएं) केवल एक अंग है.
अष्टांग योग के आठ अंग हैं:
1. यम:
यह आत्म-संयम और नैतिक सिद्धांतों को संदर्भित करता है, जैसे अहिंसा (किसी को चोट न पहुंचाना), सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य (संयम), और अपरिग्रह (अनावश्यक संग्रह न करना).
2. नियम:
यह व्यक्तिगत अनुशासन और पालन को दर्शाता है, जिसमें शौच (शुद्धता), संतोष (संतुष्टि), तप (कठोरता), स्वाध्याय (आत्म-अध्ययन), और ईश्वर प्रणिधान (ईश्वर के प्रति समर्पण) शामिल हैं.
3. आसन:
यह शारीरिक आसन या मुद्राएँ हैं जो शरीर को स्थिर और लचीला बनाने में मदद करती हैं, और ध्यान के लिए तैयार करती हैं.
4. प्राणायाम:
यह श्वास नियंत्रण की कला है, जो शरीर और मन को शांत करने और ऊर्जा को बढ़ाने में मदद करती है.
5. प्रत्याहार:
यह इंद्रियों को बाहरी वस्तुओं से हटाकर आंतरिक चेतना पर ध्यान केंद्रित करने की प्रक्रिया है.
6. धारणा:
यह एक बिंदु पर मन को एकाग्र करने की कला है, जैसे कि किसी वस्तु या विचार पर ध्यान केंद्रित करना.
7. ध्यान:
यह एकाग्रता की निरंतरता है, जहां मन बिना किसी रुकावट के एक ही वस्तु या विचार पर टिका रहता है.
8. समाधि:
यह ध्यान का चरम चरण है, जहां व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत चेतना को सार्वभौमिक चेतना के साथ एकीकृत करता है, और आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करता है.
अष्टांग योग का अभ्यास, शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कल्याण को बढ़ावा देने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण प्रदान करता है.

ढाक गोंद (पलाश गोंद, कमरकस) पलाश के पेड़ से निकलने वाला एक प्राकृतिक लाल गोंद है, जो विशेषकर महिलाओं के लिए बहुत फायदेमं...
16/01/2026

ढाक गोंद
(पलाश गोंद, कमरकस) पलाश के पेड़ से निकलने वाला एक प्राकृतिक लाल गोंद है, जो विशेषकर महिलाओं के लिए बहुत फायदेमंद माना जाता है, खासकर डिलीवरी के बाद शरीर को ताकत देने, पीठ दर्द (कमर दर्द) कम करने, हड्डियां मजबूत करने, और त्वचा व बालों को स्वस्थ रखने के लिए इसका उपयोग लड्डू या पंजीरी में किया जाता है, यह कमजोरी दूर करता है और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है।

ढाक गोंद / कमरकस क्या है?
यह 'Butea Monosperma' नामक पेड़ (पलाश या ढाक) से प्राप्त होता है, और गहरे लाल रंग का होता है, इसलिए इसे 'लालड़ी गोंद' भी कहते हैं।
इसे 'कमरकस' इसलिए कहते हैं क्योंकि यह कमर और पीठ की मांसपेशियों को मजबूती देता है और दर्द से राहत दिलाता है।

मुख्य फायदे (Benefits):
महिलाओं के लिए: डिलीवरी के बाद शरीर को अंदर से मजबूत और सुडौल बनाने में मदद करता है।
कमजोरी और दर्द: शरीर की कमजोरी, पीठ दर्द, जोड़ों और घुटनों के दर्द में राहत देता है।
त्वचा और बाल: त्वचा को जवां, चमकदार बनाता है और बालों के स्वास्थ्य को बढ़ावा देता है।

पोषक तत्व: एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है और शरीर को पोषण देता है।

पाचन: पाचन संबंधी समस्याओं और दस्त (डायरिया) में भी सहायक हो सकता है।
उपयोग (Usage):
इसे अक्सर घी, आटे और चीनी के साथ मिलाकर लड्डू (कमरकस के लड्डू) बनाए जाते हैं और सर्दियों में खाया जाता है।
कमर के दर्द में इसे जरूर प्रयोग करे

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110075

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