Pt. anurag gaur

Pt. anurag gaur Mr. Anurag Gaur is a professional and experienced astrologer from Noida.

He is a businessman by profession but he has been fascinated by this ancient science of astrology since childhood.

18/02/2021
08/02/2021
08/02/2021
कुंडली में प्रथम भाव   जन्म कुंडली में प्रथम भाव यानि लग्न का विशेष महत्व है। हिन्दू ज्योतिष शास्त्र की उत्पत्ति ऋग्वेद ...
03/08/2020

कुंडली में प्रथम भाव

जन्म कुंडली में प्रथम भाव यानि लग्न का विशेष महत्व है। हिन्दू ज्योतिष शास्त्र की उत्पत्ति ऋग्वेद से हुई है, इसलिए इसे वैदिक ज्योतिष कहा गया है। भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जन्म कुंडली में कुल 12 भाव होते हैं और हर भाव की अपनी विशेषताएँ और महत्व होता है। इनमें प्रथम भाव को इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह मनुष्य के व्यक्तित्व, स्वभाव, आयु, यश, सुख और मान-सम्मान आदि बातों का बोध कराता है। प्रथम भाव को लग्न या तनु भाव भी कहा जाता है। हर व्यक्ति के जीवन का संपूर्ण दर्शन लग्न भाव पर निर्भर करता है।

लग्न का महत्व और विशेषताएँ

जब कोई भी व्यक्ति जन्म लेता है तो जन्म के समय पूर्वी क्षितिज पर जो राशि उदय होती है, वही व्यक्ति का लग्न बन जाता है। लग्न के निर्धारण के बाद ही कुंडली का निर्माण होता है। जिसमें ग्रहों की निश्चित भावों, राशि और की स्थिति का पता चलता है। इसलिए बिना लग्न के जन्म कुंडली की कल्पना नहीं की जा सकती है।

ज्योतिष में प्रथम भाव से क्या देखा जाता है?

प्रथम भाव का कारक सूर्य को कहा जाता है। इस भाव से व्यक्ति की शारीरिक संरचना, रुप, रंग, ज्ञान, स्वभाव, बाल्यावस्था और आयु आदि का विचार किया जाता है। प्रथम भाव के स्वामी को लग्नेश का कहा जाता है। लग्न भाव का स्वामी अगर क्रूर ग्रह भी हो तो, वह अच्छा फल देता है।

शारीरिक संरचना: प्रथम भाव से व्यक्ति की शारीरिक बनावट और कद-काठी के बारे में पता चलता है। यदि प्रथम भाव मैं कर्क वृश्चिक और मीन राशि होती है तो व्यक्ति मोटा होता है। वहीं अगर वही मकर और कुंभ वृषभ राशि होती है और राशियों का संबंध लग्न पर अधिक रहता है तो जातक दुबला होता है।

स्वभाव: किसी भी व्यक्ति के स्वभाव को समझने के लिए लग्न का बहुत महत्व है। लग्न मनुष्य के विचारों की शक्ति को दर्शाता है। यदि चतुर्थ भाव, चतुर्थ भाव का स्वामी, चंद्रमा, लग्न व लग्न भाव के स्वामी पर शुभ ग्रहों का प्रभाव होता है तो व्यक्ति दयालु और सरल स्वभाव वाला होता है। वहीं इसके विपरीत अशुभ ग्रहों के प्रभाव से व्यक्ति क्रूर प्रवृत्ति का होता है।

आयु और स्वास्थ्य: प्रथम भाव व्यक्ति की आयु और सेहत को दर्शाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार जब लग्न, लग्न भाव के स्वामी के साथ-साथ सूर्य, चंद्रमा, शनि और तृतीय व अष्टम भाव और इनके स्वामी मजबूत हों तो, व्यक्ति को दीर्घायु एवं उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। वहीं यदि इन घटकों पर क्रूर ग्रहों का प्रभाव हो या कमजोर हों, तो यह स्थिति व्यक्ति की अल्पायु को दर्शाती है।

बाल्यकाल: प्रथम भाव से व्यक्ति के बचपन का बोध भी होता है। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार यदि लग्न के साथ लग्न भाव के स्वामी और चंद्रमा पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव हो, तो व्यक्ति को बाल्यकाल में शारीरिक कष्ट उठाने पड़ते हैं। वहीं शुभ ग्रहों के प्रभाव से बाल्यावस्था अच्छे से व्यतीत होती है।

मान-सम्मान: प्रथम भाव मनुष्य के मान-सम्मान, सुख और यश को भी दर्शाता है। यदि लग्न, लग्न भाव का स्वामी, चंद्रमा, सूर्य, दशम भाव और इनके स्वामी बलवान अवस्था में हों, तो व्यक्ति को जीवन में मान-सम्मान प्राप्त होता है।

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अगस्त में होने वाले गोचर अगस्त का महीना ग्रहों के गोचर के लिए भी काफी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इस महीने चार ग्रह गोचर करने...
31/07/2020

अगस्त में होने वाले गोचर

अगस्त का महीना ग्रहों के गोचर के लिए भी काफी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इस महीने चार ग्रह गोचर करने वाले हैं। सूर्य, मंगल, शुक्र और बुध ग्रहों का गोचर अगस्त माह में होगा

शुक्र का गोचर

शुक्र का गोचर 1 अगस्त 2020 को 4:00 बजे कर 56 मिनट पर मिथुन राशि में होगा। शुक्र ग्रह 1 सितंबर की सुबह 1 बजे कर 50 मिनट तक इसी राशि में स्थित रहेंगे।

बुध का गोचर

बुध ग्रह का गोचर 2 अगस्त को 03:23 बजे कर्क राशि में होगा और 17 अगस्त 08:18 बजे तक ये इसी राशि में रहेंगे।

इस
बुध ग्रह का दूसरा गोचर 17 अगस्त 2020 को 8 बज कर 18 मिनट पर कर्क से सिंह राशि में होगा और इस राशि में बुध ग्रह 2 सितंबर 2020, 11 बज कर 52 मिनट तक स्थित रहेंगे।

इस
सूर्य का गोचर

सूर्य ग्रह का सिंह राशि में गोचर 16 अगस्त को 18:56 बजे होगा और सूर्य देव इस राशि में 16 सितंबर 2020, 18:52 मिनट तक रहेंगे।

इस
मंगल का गोचर

मंगल देव 16 अगस्त को मीन राशि से निकल कर मेष राशि में 20:37 बजे गोचर करेंगे। मेष राशि में ही 10 सितंबर से ये अपनी वक्री गति शुरु करेंगे और वक्री गति करते हुए 4 अक्टूबर, 9:55 बजे मंगल ग्रह मीन राशि में लौटें जायेंगे।

इस महीने की कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां

अगस्त के महीने में सिंह राशि में सूर्य, मेष राशि में मंगल, मिथुन राशि में शुक्र, कर्क राशि और सिंह राशि में बुध का गोचर होगा। इस प्रकार मुख्य रूप से केंद्र बिंदुओं में मेष राशि, मिथुन राशि, कर्क राशि और सिंह राशि रहेगी।

सूर्य अपनी राशि सिंह में होगा सबसे ज्यादा लाभ सिंह राशि के जातकों और सिंह लग्न के जातकों को होगा अगर वह किसी बीमारी से जूझ रहे हैं तो उस बीमारी से उनको जल्दी मुक्ति मिलेगी मेष लग्न के जातकों के लिए सूर्य पंचम भाव में गोचर करेगा छात्रों को शिक्षा में विशेष लाभ होगा

मंगल भी अपनी राशि मेष में होने से बलवान होगा मेष लग्न के जातकों और मेष राशि के जातकों को सबसे ज्यादा लाभ होगा जिससे लोगों में स्वास्थ्य को लेकर एक विशेष जागरूकता देखी जाएगी और सभी लोग अपनी सेहत के प्रति जिम्मेदारी दिखाएंगे। सिंह लग्न के जातकों के लिए मंगल का भ्रमण उनके भाग्य स्थान में होगा ऐसे व्यक्ति लंबी धार्मिक यात्रा पर जा सकते हैं साथ में जो जातक शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं वे उच्च शिक्षा ले सकते हैं

ज्योतिष परामर्श करने के लिए संपर्क करें अनुराग गौड़ मोबाइल नंबर-8650111223 परामर्श शुल्क -501

25/07/2020

नाग पंचमी पर क्यों की जाती है नागों की पूजा

25 जुलाई, को नाग पंचमी का त्यौहार है।

जैसा की नाम से ही साफ़ है कि, नाग पंचमी का त्यौहार नागों को समर्पित होता है। यह खास त्यौहार हर साल श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाये जाने की परंपरा है। इस वर्ष देशभर में नाग पंचमी 25 जुलाई 2020, शनिवार के दिन मनाई जाएगी। मान्यता के अनुसार नाग पंचमी के दिन नागों की पूजा इत्यादि की जाती है।

नाग पंचमी शुभ मुहूर्त

नाग पंचमी 2020, 25 जुलाई

पूजा मुहूर्त – 05:38:42 से 08:22:11 तक ( 25 जुलाई 2020)

नाग पंचमी पूजन विधि

नाग पंचमी के दिन अपने घर के दरवाज़े के दोनों तरफ गोबर से सांप बनाएं।

इस सांप/नाग को दही, दूर्वा, गंध, कुशा, अक्षत, फूल, मोदक और मालपुआ आदि समर्पित करें।

इस दिन ब्राह्मणों को भोजन कराएं और व्रत करें, ऐसा करने से घर में साँपों का भय नहीं रहता है।

इसके अलावा इस दिन नागों को दूध से स्नान कराने, उनकी पूजा करने से भी सांप के डर से मुक्ति मिलती है।

ग्रह में राहु और केतु को सर्प के समान ही माना गया है आज के दिन हम भगवान शिव की पूजा करते हैं और शिवलिंग को पंचामृत से स्नान कराते हैं कुंडली के अंदर राहु और केतु के बुरे प्रभाव शांत होते हैं

नागों की पूजा में हल्दी का उपयोग अवश्य किया जाना चाहिए।
नाग पंचमी शनिवार के दिन है इसलिए जिन व्यक्ति की कुंडली में कालसर्प योग है उनको बहते हुए जल में चांदी के नाग नागिन का जोड़ा बहाना चाहिए

अनंत, वासुकि, शेष, पद्मनाभ, कंबल, कर्कोटक, अश्व, धृतराष्ट्र, शंखपाल, कालीय तथा तक्षक ये सभी नागों के नाम हैं, इस दिन ये सभी नाम हल्दी-चन्दन के लेप से दिवार पर लिखें।
शिवलिंग पर चांदी के नाग के जोड़े चढ़ाने चाहिए इसलिए जिन व्यक्ति की कुंडली के अंदर कालसर्प योग है कालसर्प योग शांत होता है

इस दिन की पूजा में इस मन्त्र का जाप अवश्य करें, ‘अनन्तं वासकिं शेषं पद्मकम्बलमेव च।तथा कर्कोटकं नागं नागमश्वतरं तथा।। धृतराष्ट्रंं शंखपालं कालाख्यं तक्षकं तथा। पिंगलञ्च महानागं प्रणमामि मुहुर्मुरिति।।’

विशेष तौर पर इस दिन भगवान शिव जी की पूजा करना चाहिए ओम नमः शिवाय मंत्र का जाप करना चाहिए

इसके अलावा इस दिन नैवेद्यार्थ भक्ति द्वारा गेहूं और दूध का पायस बनाकर भुना चना, धान का लावा, भुना हुआ जौ, नागों को दें। ज्योतिष परामर्श के लिए संपर्क करें अनुराग गौड़ परामर्श शुल्क ₹501 मोबाइल नंबर8650111223

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18/07/2020

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इस बार श्रावण मास की शिवरात्रि 19 जुलाई, 2020 रविवार के दिन मनायी जायेगी।
शिवरात्रि भगवान शिव को समर्पित त्यौहार है। इस दौरान भगवान शिव, माता पार्वती, नंदी, गणेश भगवान, कार्तिकेय भगवान की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।शिव पूजा और जलाभिषेक मुहूर्त

जलाभिषेक मुहूर्त: 19 जुलाई, सूर्योदय के पश्चात् 5:35:24 से दोपहर 2:45 तक

शिव पूजा के लिए आर्द्रा नक्षत्र और मिथुन लग्न विशेष रूप से शुभ माना गया है।

प्रातः 5 बजकर 40 मिनट से 8 बजकर 25 मिनट तक (सुबह 7:52 तक मिथुन लग्न विशेष शुभ)

इस दिन की पूजा करने से, भगवान शिव पर जलाभिषेक या रुद्राभिषेक करने मात्र से जीवन में शांति आती है, और कितनी भी कठिन राहें हो वो आसान लगने लग जाती है। इसके अलावा शिवरात्रि का व्रत-पूजन करने से मनचाहा वर भी मिलता है और समस्त मनोकामनाएं भी अवश्य पूरी होती हैं।

सावन शिवरात्रि पूजन विधि

इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ कपड़े पहनें।

इसके बाद व्रत करना हो तो पूजा-व्रत का संकल्प लें।

इसके बाद घर के मंदिर में शिवलिंग पर पंचामृत चढ़ाएं। (दूध, दही, शहद, घी और गन्‍ने का रस या चीनी का मिश्रण से पंचामृत बनाएं)

इसके बाद ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जप करते हुए शिवलिंग पर बेलपत्र, फल, फूल इत्यादि अर्पित करें।

इसके अलावा आप इस दिन की पूजा में कुछ उपाय करके अपनी मनोकामनाएं भी पूरी कर सकते हैं। जैसे,

पाप को नाश करने के लिए इस दिन की पूजा के दौरान भगवान शिव को तिल का तेल चढ़ाएं। इससे आपके समस्त पाप अवश्य नष्ट हो जायेंगे।

ऐसे ही अगर किसी कन्या को मनचाहे वर की आस हो तो, इस दिन भगवान शिव को चने की दाल का भोग लगाने की सलाह दी जाती है।

इसके अलावा घर में सुख-शांति और समृद्धि चाहते हैं तो, भगवान शिव पर धतूरे का फूल या फल का भोग लगायें तो अच्छा रहता है।

इसके अलावा कोई कानूनी कार्यवाही जीतनी हो या अपने शत्रुओं पर जीत हासिल करनी हो तो, इस दिन भगवान शिव को भांग चढ़ाएं। आपकी मनोकामना अवश्य पूरी होगी।

इसके अलावा अगर आपका मन शांत नहीं रहता है या आप बुरे विचारों से घिरे रहते हैं, तो इस दिन पंचमुखी रुद्राक्ष की माला लेकर ऊं नम: शिवाय का जाप करे अगर किसी व्यक्ति को कोई बहुत लंबी बीमारी चली आ रही है इस दिन उसको महामृत्युंजय का जाप करना चाहिए ऐसा करने से रोग से मुक्ति मिलती है

श्रावण माह की शिवरात्रि के बारे में ऐसी मान्यता है कि इस दिन जो कोई भी इंसान व्रत रखता है और पूजन करता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस व्रत में फलाहार भोजन किया जाता है। इसके अलावा आप इस दिन सुबह और शाम दोनों समय स्नान कर के शिव पुराण, शिव पंचाक्षर, शिव स्तुति, शिव अष्टक, शिव चालीसा, शिव रुद्राष्टक और शिव श्लोक का पाठ करें, तो उसे अति-उत्तम और पुण्यदायी बताया गया है।
ज्योतिष परामर्श के लिए संपर्क करें- अनुराग गौड़ मोबइल no-8650111223 परामर्श शुल्क-501

13/02/2020

*भगवान शिव के "35" रहस्य!!!!!!!!*

भगवान शिव अर्थात पार्वती के पति शंकर जिन्हें महादेव, भोलेनाथ, आदिनाथ आदि कहा जाता है।

*🔱1. आदिनाथ शिव : -* सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें 'आदिदेव' भी कहा जाता है। 'आदि' का अर्थ प्रारंभ। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम 'आदिश' भी है।

*🔱2. शिव के अस्त्र-शस्त्र : -* शिव का धनुष पिनाक, चक्र भवरेंदु और सुदर्शन, अस्त्र पाशुपतास्त्र और शस्त्र त्रिशूल है। उक्त सभी का उन्होंने ही निर्माण किया था।

*🔱3. भगवान शिव का नाग : -* शिव के गले में जो नाग लिपटा रहता है उसका नाम वासुकि है। वासुकि के बड़े भाई का नाम शेषनाग है।

*🔱4. शिव की अर्द्धांगिनी : -* शिव की पहली पत्नी सती ने ही अगले जन्म में पार्वती के रूप में जन्म लिया और वही उमा, उर्मि, काली कही गई हैं।

*🔱5. शिव के पुत्र : -* शिव के प्रमुख 6 पुत्र हैं- गणेश, कार्तिकेय, सुकेश, जलंधर, अयप्पा और भूमा। सभी के जन्म की कथा रोचक है।

*🔱6. शिव के शिष्य : -* शिव के 7 शिष्य हैं जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है। इन ऋषियों ने ही शिव के ज्ञान को संपूर्ण धरती पर प्रचारित किया जिसके चलते भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई। शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत की थी। शिव के शिष्य हैं- बृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज इसके अलावा 8वें गौरशिरस मुनि भी थे।

*🔱7. शिव के गण : -* शिव के गणों में भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय प्रमुख हैं। इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है।

*🔱8. शिव पंचायत : -* भगवान सूर्य, गणपति, देवी, रुद्र और विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं।

*🔱9. शिव के द्वारपाल : -* नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल।

*🔱10. शिव पार्षद : -* जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि शिव के पार्षद हैं।

*🔱11. सभी धर्मों का केंद्र शिव : -* शिव की वेशभूषा ऐसी है कि प्रत्येक धर्म के लोग उनमें अपने प्रतीक ढूंढ सकते हैं। मुशरिक, यजीदी, साबिईन, सुबी, इब्राहीमी धर्मों में शिव के होने की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। शिव के शिष्यों से एक ऐसी परंपरा की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर शैव, सिद्ध, नाथ, दिगंबर और सूफी संप्रदाय में वि‍भक्त हो गई।

*🔱12. बौद्ध साहित्य के मर्मज्ञ अंतरराष्ट्रीय : -* ख्यातिप्राप्त विद्वान प्रोफेसर उपासक का मानना है कि शंकर ने ही बुद्ध के रूप में जन्म लिया था। उन्होंने पालि ग्रंथों में वर्णित 27 बुद्धों का उल्लेख करते हुए बताया कि इनमें बुद्ध के 3 नाम अतिप्राचीन हैं- तणंकर, शणंकर और मेघंकर।

*🔱13. देवता और असुर दोनों के प्रिय शिव : -* भगवान शिव को देवों के साथ असुर, दानव, राक्षस, पिशाच, गंधर्व, यक्ष आदि सभी पूजते हैं। वे रावण को भी वरदान देते हैं और राम को भी। उन्होंने भस्मासुर, शुक्राचार्य आदि कई असुरों को वरदान दिया था। शिव, सभी आदिवासी, वनवासी जाति, वर्ण, धर्म और समाज के सर्वोच्च देवता हैं।

*🔱14. शिव चिह्न : -* वनवासी से लेकर सभी साधारण व्‍यक्ति जिस चिह्न की पूजा कर सकें, उस पत्‍थर के ढेले, बटिया को शिव का चिह्न माना जाता है। इसके अलावा रुद्राक्ष और त्रिशूल को भी शिव का चिह्न माना गया है। कुछ लोग डमरू और अर्द्ध चन्द्र को भी शिव का चिह्न मानते हैं, हालांकि ज्यादातर लोग शिवलिंग अर्थात शिव की ज्योति का पूजन करते हैं।

*🔱15. शिव की गुफा : -* शिव ने भस्मासुर से बचने के लिए एक पहाड़ी में अपने त्रिशूल से एक गुफा बनाई और वे फिर उसी गुफा में छिप गए। वह गुफा जम्मू से 150 किलोमीटर दूर त्रिकूटा की पहाड़ियों पर है। दूसरी ओर भगवान शिव ने जहां पार्वती को अमृत ज्ञान दिया था वह गुफा 'अमरनाथ गुफा' के नाम से प्रसिद्ध है।

*🔱16. शिव के पैरों के निशान : -* श्रीपद- श्रीलंका में रतन द्वीप पहाड़ की चोटी पर स्थित श्रीपद नामक मंदिर में शिव के पैरों के निशान हैं। ये पदचिह्न 5 फुट 7 इंच लंबे और 2 फुट 6 इंच चौड़े हैं। इस स्थान को सिवानोलीपदम कहते हैं। कुछ लोग इसे आदम पीक कहते हैं।

रुद्र पद- तमिलनाडु के नागपट्टीनम जिले के थिरुवेंगडू क्षेत्र में श्रीस्वेदारण्येश्‍वर का मंदिर में शिव के पदचिह्न हैं जिसे 'रुद्र पदम' कहा जाता है। इसके अलावा थिरुवन्नामलाई में भी एक स्थान पर शिव के पदचिह्न हैं।

तेजपुर- असम के तेजपुर में ब्रह्मपुत्र नदी के पास स्थित रुद्रपद मंदिर में शिव के दाएं पैर का निशान है।

जागेश्वर- उत्तराखंड के अल्मोड़ा से 36 किलोमीटर दूर जागेश्वर मंदिर की पहाड़ी से लगभग साढ़े 4 किलोमीटर दूर जंगल में भीम के मंदिर के पास शिव के पदचिह्न हैं। पांडवों को दर्शन देने से बचने के लिए उन्होंने अपना एक पैर यहां और दूसरा कैलाश में रखा था।

रांची- झारखंड के रांची रेलवे स्टेशन से 7 किलोमीटर की दूरी पर 'रांची हिल' पर शिवजी के पैरों के निशान हैं। इस स्थान को 'पहाड़ी बाबा मंदिर' कहा जाता है।

*🔱17. शिव के अवतार : -* वीरभद्र, पिप्पलाद, नंदी, भैरव, महेश, अश्वत्थामा, शरभावतार, गृहपति, दुर्वासा, हनुमान, वृषभ, यतिनाथ, कृष्णदर्शन, अवधूत, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, किरात, सुनटनर्तक, ब्रह्मचारी, यक्ष, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, द्विज, नतेश्वर आदि हुए हैं। वेदों में रुद्रों का जिक्र है। रुद्र 11 बताए जाते हैं- कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, आपिर्बुध्य, शंभू, चण्ड तथा भव।

*🔱18. शिव का विरोधाभासिक परिवार : -* शिवपुत्र कार्तिकेय का वाहन मयूर है, जबकि शिव के गले में वासुकि नाग है। स्वभाव से मयूर और नाग आपस में दुश्मन हैं। इधर गणपति का वाहन चूहा है, जबकि सांप मूषकभक्षी जीव है। पार्वती का वाहन शेर है, लेकिन शिवजी का वाहन तो नंदी बैल है। इस विरोधाभास या वैचारिक भिन्नता के बावजूद परिवार में एकता है।

*🔱19.* ति‍ब्बत स्थित कैलाश पर्वत पर उनका निवास है। जहां पर शिव विराजमान हैं उस पर्वत के ठीक नीचे पाताल लोक है जो भगवान विष्णु का स्थान है। शिव के आसन के ऊपर वायुमंडल के पार क्रमश: स्वर्ग लोक और फिर ब्रह्माजी का स्थान है।

*🔱20.शिव भक्त : -* ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवी-देवताओं सहित भगवान राम और कृष्ण भी शिव भक्त है। हरिवंश पुराण के अनुसार, कैलास पर्वत पर कृष्ण ने शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी। भगवान राम ने रामेश्वरम में शिवलिंग स्थापित कर उनकी पूजा-अर्चना की थी।

*🔱21.शिव ध्यान : -* शिव की भक्ति हेतु शिव का ध्यान-पूजन किया जाता है। शिवलिंग को बिल्वपत्र चढ़ाकर शिवलिंग के समीप मंत्र जाप या ध्यान करने से मोक्ष का मार्ग पुष्ट होता है।

*🔱22.शिव मंत्र : -* दो ही शिव के मंत्र हैं पहला- ॐ नम: शिवाय। दूसरा महामृत्युंजय मंत्र- ॐ ह्रौं जू सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जू ह्रौं ॐ ॥ है।

*🔱23.शिव व्रत और त्योहार : -* सोमवार, प्रदोष और श्रावण मास में शिव व्रत रखे जाते हैं। शिवरात्रि और महाशिवरात्रि शिव का प्रमुख पर्व त्योहार है।

*🔱24.शिव प्रचारक : -* भगवान शंकर की परंपरा को उनके शिष्यों बृहस्पति, विशालाक्ष (शिव), शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज, अगस्त्य मुनि, गौरशिरस मुनि, नंदी, कार्तिकेय, भैरवनाथ आदि ने आगे बढ़ाया। इसके अलावा वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, बाण, रावण, जय और विजय ने भी शैवपंथ का प्रचार किया। इस परंपरा में सबसे बड़ा नाम आदिगुरु भगवान दत्तात्रेय का आता है। दत्तात्रेय के बाद आदि शंकराचार्य, मत्स्येन्द्रनाथ और गुरु गुरुगोरखनाथ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।

*🔱25.शिव महिमा : -* शिव ने कालकूट नामक विष पिया था जो अमृत मंथन के दौरान निकला था। शिव ने भस्मासुर जैसे कई असुरों को वरदान दिया था। शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था। शिव ने गणेश और राजा दक्ष के सिर को जोड़ दिया था। ब्रह्मा द्वारा छल किए जाने पर शिव ने ब्रह्मा का पांचवां सिर काट दिया था।

*🔱26.शैव परम्परा : -* दसनामी, शाक्त, सिद्ध, दिगंबर, नाथ, लिंगायत, तमिल शैव, कालमुख शैव, कश्मीरी शैव, वीरशैव, नाग, लकुलीश, पाशुपत, कापालिक, कालदमन और महेश्वर सभी शैव परंपरा से हैं। चंद्रवंशी, सूर्यवंशी, अग्निवंशी और नागवंशी भी शिव की परंपरा से ही माने जाते हैं। भारत की असुर, रक्ष और आदिवासी जाति के आराध्य देव शिव ही हैं। शैव धर्म भारत के आदिवासियों का धर्म है।

*🔱27.शिव के प्रमुख नाम : -* शिव के वैसे तो अनेक नाम हैं जिनमें 108 नामों का उल्लेख पुराणों में मिलता है लेकिन यहां प्रचलित नाम जानें- महेश, नीलकंठ, महादेव, महाकाल, शंकर, पशुपतिनाथ, गंगाधर, नटराज, त्रिनेत्र, भोलेनाथ, आदिदेव, आदिनाथ, त्रियंबक, त्रिलोकेश, जटाशंकर, जगदीश, प्रलयंकर, विश्वनाथ, विश्वेश्वर, हर, शिवशंभु, भूतनाथ और रुद्र।

*🔱28.अमरनाथ के अमृत वचन : -* शिव ने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु अमरनाथ की गुफा में जो ज्ञान दिया उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। 'विज्ञान भैरव तंत्र' एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।

*🔱29.शिव ग्रंथ : -* वेद और उपनिषद सहित विज्ञान भैरव तंत्र, शिव पुराण और शिव संहिता में शिव की संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है।

*🔱30.शिवलिंग : -* वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है, उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है। वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है। बिंदु शक्ति है और नाद शिव। बिंदु अर्थात ऊर्जा और नाद अर्थात ध्वनि। यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है। इसी कारण प्रतीक स्वरूप शिवलिंग की पूजा-अर्चना है।

*🔱31.बारह ज्योतिर्लिंग : -* सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ॐकारेश्वर, वैद्यनाथ, भीमशंकर, रामेश्वर, नागेश्वर, विश्वनाथजी, त्र्यम्बकेश्वर, केदारनाथ, घृष्णेश्वर। ज्योतिर्लिंग उत्पत्ति के संबंध में अनेकों मान्यताएं प्रचलित है। ज्योतिर्लिंग यानी 'व्यापक ब्रह्मात्मलिंग' जिसका अर्थ है 'व्यापक प्रकाश'। जो शिवलिंग के बारह खंड हैं। शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है।

दूसरी मान्यता अनुसार शिव पुराण के अनुसार प्राचीनकाल में आकाश से ज्‍योति पिंड पृथ्‍वी पर गिरे और उनसे थोड़ी देर के लिए प्रकाश फैल गया। इस तरह के अनेकों उल्का पिंड आकाश से धरती पर गिरे थे। भारत में गिरे अनेकों पिंडों में से प्रमुख बारह पिंड को ही ज्‍योतिर्लिंग में शामिल किया गया।

*🔱32.शिव का दर्शन : -* शिव के जीवन और दर्शन को जो लोग यथार्थ दृष्टि से देखते हैं वे सही बुद्धि वाले और यथार्थ को पकड़ने वाले शिवभक्त हैं, क्योंकि शिव का दर्शन कहता है कि यथार्थ में जियो, वर्तमान में जियो, अपनी चित्तवृत्तियों से लड़ो मत, उन्हें अजनबी बनकर देखो और कल्पना का भी यथार्थ के लिए उपयोग करो। आइंस्टीन से पूर्व शिव ने ही कहा था कि कल्पना ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

*🔱33.शिव और शंकर : -* शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है। लोग कहते हैं- शिव, शंकर, भोलेनाथ। इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं। असल में, दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं। शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है। अत: शिव और शंकर दो अलग अलग सत्ताएं है। हालांकि शंकर को भी शिवरूप माना गया है। माना जाता है कि महेष (नंदी) और महाकाल भगवान शंकर के द्वारपाल हैं। रुद्र देवता शंकर की पंचायत के सदस्य हैं।

*🔱34. देवों के देव महादेव :* देवताओं की दैत्यों से प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। ऐसे में जब भी देवताओं पर घोर संकट आता था तो वे सभी देवाधिदेव महादेव के पास जाते थे। दैत्यों, राक्षसों सहित देवताओं ने भी शिव को कई बार चुनौती दी, लेकिन वे सभी परास्त होकर शिव के समक्ष झुक गए इसीलिए शिव हैं देवों के देव महादेव। वे दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं। वे राम को भी वरदान देते हैं और रावण को भी।

*🔱35. शिव हर काल में : -* भगवान शिव ने हर काल में लोगों को दर्शन दिए हैं। राम के समय भी शिव थे। महाभारत काल में भी शिव थे और विक्रमादित्य के काल में भी शिव के दर्शन होने का उल्लेख मिलता है। भविष्य पुराण अनुसार राजा हर्षवर्धन को भी भगवान शिव ने दर्शन दिये थे।।

।।ॐ नमः शिवाय, हर हर महादेव जी।। ज्योतिष परामर्श के लिए संपर्क करें शुल्क -501

*तुलसी के पौधे से जुड़े वास्तु उपाय*🌷वास्तुअनुसार तुलसी के गमले में अन्य पौधा नहीं लगाना चाहिए ऐसा करने से धनहानि हो सकती...
28/12/2019

*तुलसी के पौधे से जुड़े वास्तु उपाय*

🌷वास्तुअनुसार तुलसी के गमले में अन्य पौधा नहीं लगाना चाहिए ऐसा करने से धनहानि हो सकती है.

🌷मुख्यद्वार के पास तुलसी का पौधा रखने से वास्तु दोष दूर होते हैं और नकारात्मक ऊर्जा घर में प्रवेश नहीं कर पाती.

🌷 घर में कोई वास्तु दोष है तो छत पर गमले में तुलसी का पौधा लगाएं। इस उपाय से घर के कई वास्तु दोष दूर हो सकते हैं।

🌷घर के आंगन में या छत पर तुलसी को रोज सुबह-शाम जल चढ़ाएं।

🌷तुलसी के पौधे को हमेशा घर की उत्तर या पूर्व दिशा में लगाना चाहिए इससे धन लाभ होने के साथ-साथ आपके घर में सुख और समृद्धि बनी रहती है।

🌷तुलसी के पौधे को हमेशा कच्ची मिट्टी में लगाएं। अगर आपके घर में कच्ची जमीन नहीं है तो आप गमले में कच्ची मिट्टी भरकर तुलसी का पौधा लगा सकते हैं।

🌷कभी भी तुलसी के पौधे को दक्षिण दिशा में नहीं लगाना चाहिए। दक्षिण दिशा में तुलसी का पौधा लगाने से आपके घर में क्लेश और धन हानि हो सकती है।

🌷वास्तुअनुसार घर में सुख शांति बनाए रखने के लिए तुलसी के पौधे को किचन या ड्राइंग रूम में लगाएं।

🌷वास्तु के अनुसार तुलसी के पौधे के पत्ते को एकादशी, रविवार और मंगलवार को नहीं तोडना चाहिए।

🌷अगर आपके घर में वास्तु शास्त्र संबंधी कोई दोष है यानि की हमेशा आपके घर में कोई न कोई परेशानी बनी रहती है तो दक्षिण- पूर्व दिशा में तुलसी का पौधा अवश्य लगाए

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