10/07/2020
🌼धर्म पालन🌼
गुरु की अनुपस्थिति में शिष्य को अपने धर्म का अक्षरशः पालन करना है। अगर गुरु शारीरिक रूप से उपस्थित हैं तो वे तुम्हें यह बता सकते हैं, "तुम गलत दिशा में जा रहे हो, लौट आओ", लेकिन उनकी अनुपस्थिति में धर्म ही तुम्हें सही मार्ग पर बनाए रखता है, कोई व्यक्ति नहीं। इस धर्म में स्थापित होने के लिए जीवन में एक अनुशासन और एक दिनचर्या होनी चाहिए।
समाज में रहने वाले गृहस्थ शिष्यों की एक निश्चित दिनचर्या होनी चाहिए। उदहारण के लिए, सुबह उठते ही ग्यारह बार महामृत्युंजय मंत्र, ग्यारह बार गायत्री मंत्र और तीन बार दुर्गा जी के बत्तीस नामों का पाठ करना चाहिए। प्रत्येक शनिवार को महामृत्युंजय मंत्र का पाठ, प्रत्येक पूर्णिमा को सुन्दरकाण्ड का पाठ, सोने से पहले ध्यान का अभ्यास,आसन-प्राणायाम का अभ्यास, सेवा, स्वाध्याय और साधना--ये सारे अभ्यास हमारी दिनचर्या का अंग बन जाने चाहिए।
अगर हम इन अभ्यासों को अपने घरेलु जीवन का अंग बना सकें, तो आस-पास के लोग अवश्य प्रभावित होंगे। अगर परिवार के सभी लोग एक लक्ष्य और प्रयोजन को लेकर इसमें शामिल हो सकें, तो जो उर्जा हम अपने मंत्र-पाठ, भजन-कीर्तन और पूजा-अनुष्ठान द्वारा उत्पन्न करेंगे, वह हर एक के जीवन में शान्ति लाएगी, हर एक के जीवन में एक नयी प्रेरणा का संचार करेगी।
इसके लिए एक वातावरण तैयार करना होगा, एक अनुशासन को लाना होगा। अपने दैनिक जीवन में आध्यात्मिक अभ्यासों का समायोजन करना होगा। ऐसा नहीं कि घर में पूरी तरह सांसारिक जीवन बिताओ और आश्रम में आते ही गेरू वस्त्र पहनकर कहो, "अब मैं आपके आदेशानुसार सब कुछ करने के लिए तत्पर हूँ, मैं कर्म संन्यासी जो हूँ।" जीवन का सुनियोजन, दिनचर्या की फाइन-ट्यूनिंग अपने घरेलू वातावरण में भी करनी होगी। तब ही एक शिष्य गृहस्थ-आश्रम में रहते हुए भी अध्यात्म पथ पर गुरु के निर्देशानुसार आगे बढ़ सकता है। अगर वह ऐसा कर पाता है, तो जीवन की सभी कामनाओं, सभी अभावों को पूरा करते हुए सुख-शान्ति प्राप्त कर सकता है। इस तरह संसार में रहते हुए भी वह अपने शिष्यत्व को सिद्ध कर सकता है।
🌼परमहंस निरंजनानंद सरस्वती🌼
साभार:-- "शिष्य-धर्म"