05/08/2017
श्रावण मास में शिवत्व जगाती मेरी कविता ...
अंदर शिव हैं , बाहर शिव हैं , शिव संग , रास रचाएँगें !
सावन में , काँवरिया बन के , शिव के , रंग रंगाएँगें !!
झूमे धरती , झूमता गगन , बूँद - बूँद हर्षाएंगें !
शिव में ही आनंद बसा , सब आनंदित हो जाएँगें !!
जीवन के हर दुःख के विष को , शिव-शम्भु पी आएँगेँ !
त्याग के ,धागे से , जीवन के , घावों को , सी जाएँगें !!
शिव जो संग, काहे को डरना , शिव में ही, खो जाएँगें !
सत्य ही शिव है , शिव है सुंदर , शिव भक्ति को पाएँगें !!
अपनाकर सबके विष को शिव नीलकंठ हो जाएँगें !
शिवत्यागी की, महिमा को हम , मुक्तकंठ हो गाएँगें !!
शिव ही रूद्र हैं , शिव हैं पशुपति , शिवनारी बन जाएँगें !
कला में शिव , नटराज भी शिव , शिव त्रिपुरारी बन जाएँगें !!
आदि भी शिव औ अंत भी शिव , शिव चहुँ दिशा में पाएँगें !
शिव विनाश औ शिव जीवन , शिव जिजीविषा में गाएँगें !!
कैलाशी शिव मानसरोवर , बर्फ़ानी हो जाएँगें !
बारह ज्योतिर्लिंगों में शिव-निशानी को पाएँगें !!
सोमनाथ , सौराष्ट्र विराजे , मल्लिकार्जुन आँध्र बसे !
महाकालेश्वर , ओंकारेश्वर , उज्जैनी , इंदौर बसे !!
बद्रीनाथ , केदारनाथ हैं , भीमाशंकर , पूना बसे !
शक्ति पीठ में शिव शक्ति , हर भाग यहां हर गुना बसे !!
विश्वनाथ काशी में , नाशिक ,त्रयम्बकेश्वर आन बसे !
देवघर में वैद्यनाथ , नागेश्वर , द्वारिका आन बसे !!
रामनाथपुर रामेश्वरम है , महाराष्ट्र में घृष्णेश्वर !
ये बारह ये परम पीठ हैं , शिव देवों के देवेश्वर !!
दर्शन कर ज्योतिर्लिंगों के , शक्ति से , भर जाएँगें !
शिव को हासिल हम जीवन में , भक्ति से कर जाएँगें !!
त्याग , तपस्या , करुणा की ,हर सीमा से ,भर जाएँगें !
शिव हैं सहज , दयालु शिव हैं , शिव को खुश कर जाएँगें !!
नहीं विलासी , भोग कोई हम , शिव पे, आज़ चढ़ायेंगें !
जल , धतूरा औ बेल-पत्र से , शिव को खुश कर जाएँगेँ !!
सुख में सुमिरन , दुःख में सुमिरन , शिव-भक्ति में गाएँगें !
जीवन के, हर पल में संबल , शिवशक्ति में पाएँगें !!
तीजा नेत्र, खुले जब शिव का , संहारी बन जाएँगें !
दानवता को जला के शिव ये , उपकारी बन जाएँगें !!
जला के जीवन के विलास को राख यहाँ कर जाएँगें !
त्याग के राखों से, दिल का हर ताख यहां भर जाएँगें !!
साधारण जीवन में , सोच को, ऊँची हम रख आएँगेँ !
भाव में कोमल , हृदय सहिष्णु , मन तेजोबल पाएँगें !!
नंदी वाहन , हिमालय- उर , जट-गंगा भर लाएँगेँ !
शीतल चंद्र ,व विषधर-माला, छव-भभूत कर जाएँगें !!
सिद्धों के गुरु , तंत्र - गुरु वो , नट-राजा कहलाएँगेँ !
डमरू-ताल पे , लिए त्रिशूल कर , तांडव से भर जाएँगें !!
हर जीवात्म से प्रेम का रूपक , शिव के छव में पाएँगें !
अंधकार सा शाश्वत है शिव , जग के भव में पाएँगें !!
अंतर - दृष्टि से, शिव को हम, अपने अंदर पाएँगें !
'क्रांति',जपकर ,नमः शिवाया , सुख से भर-भर जाएँगें !!
_____________क्रांति