08/01/2026
डॉ. प्रवीण कुलकर्णी
निसर्गोपचार तज्ञ.
9226280158.
*शीर्षक: कंक्रीट के कारागार*
न नगर रहे, न डगर रही, बस मंजिलों के अंबार हैं,
लघु काष्ठ-पेटिका (माचिस) सदृश, ये कंक्रीट के कारागार हैं।
एक पर एक टिकी हुई, ये ईंटों की निर्जीव कतारें,
ढूँढ रही हैं खोया मानव, इस यांत्रिक युग की दीवारें।
कहाँ गया वह विस्तीर्ण आँगन, कहाँ गई वह मृदा की गंध?
जहाँ पवन सखा बन आती थी, अब सब द्वार यहाँ हैं बंद।
गगन विदीर्ण है खिड़की की उन लोह-शलाकाओं (ग्रिल) के पीछे,
पाँव थके हैं अब चलते-चलते, इस कृत्रिम फर्श के नीचे।
समीप हैं प्रासाद (महल) यहाँ, पर हृदय हुआ है अत्यंत दूर,
अपरिचित हैं पड़ोसी सब, निज निज विवशता में सब चूर।
संवाद हुआ अब मौन यहाँ, लुप्त हुई वह आत्मीयता,
सब बन गए मात्र एक संख्या, मर गई है कहीं मानवता।
लघु कक्षों में सिमटा जीवन, आभासी (डिजिटल) सपनों का संसार,
भूल गए हम धरा का वैभव, भूल गए हम स्नेह-सत्कार।
अग्नि-शलाका (माचिस) की डिब्बियों में, रूहें घुटकर रह गई हैं,
स्वयं की बनाई भीड़ में देखो, संवेदनाएं बह गई हैं।
आओ ढूँढें उस खोए मानव को, जो इन ढाचों में मौन खड़ा,
जिसका आत्म-बोध है सोया, जो अपनी ही माया में पड़ा।
मकान तो ऊंचे बन गए बहुत, पर घर अभी भी रिक्त हैं,
हम आधुनिकता के इस तम में, स्वयं से ही अनभिज्ञ हैं।