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⭐ मृत्यु के प्रहार से कहीं भी नहीं बचोगेसुप्रबुद्ध की कथास्थान : जेतवन, श्रावस्तीसुप्रबुद्ध, शास्ता की पत्नी, यशोधरा के ...
28/03/2026

⭐ मृत्यु के प्रहार से कहीं भी नहीं बचोगे
सुप्रबुद्ध की कथा

स्थान : जेतवन, श्रावस्ती

सुप्रबुद्ध, शास्ता की पत्नी, यशोधरा के पिता थे। वे मुख्यतः दो कारणों से तथागत से घृणा करते थे - एक कि उनकी बेटी यशोधरा को छोड़कर उन्होंने संन्यास ले लिया था और दूसरे उनका पुत्र देवदत्त, जो संन्यासी बन गया था, उसकी बुद्ध से नहीं बनती थी।

एक दिन बुद्ध भिक्षाटन पर जाने वाले थे। सुप्रबुद्ध को पता चल गया। अतः उसने उनका रास्ता रोकने की ठानी। उसने शराब पी ली और रास्ते को घेरकर खड़ा हो गया कि आज बुद्ध को नहीं जाने दूँगा। लोगों ने उसे बहुत समझाया पर उल्टा उसने उत्तर दिया, "जाकर कह दो कि वह पीछे चला जाए। वह मुझसे बड़ा नहीं है।" इस प्रकार तथागत उस मार्ग से भिक्षाटन के लिए नहीं जा सके। बाद में सुप्रबुद्ध ने अपने जासूस भेजे कि जाकर देखें कि बुद्ध की क्या प्रतिक्रिया है।

उधर भिक्षाटन से लौटने पर बुद्ध ने आनंद को सारी बातें बताई। उन्होंने आनंद को यह भी बताया कि चूँकि सुप्रबुद्ध ने निर्वाण प्राप्त बुद्ध के मार्ग को अवरुद्ध किया था, अतः सात दिनों में उसकी मृत्यु हो जाएगी। सुप्रबुद्ध के दूतों ने यह बात उसे जाकर बता दी। उसने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया। उल्टे तथागत के प्रति उल्टी-सीधी बातें कही कि उसे मद हो गया है कि वह जो कुछ कहता है वह सही हो जाता है। "मैं ऐसा प्रबंध करूँगा कि उसकी बात असत्य साबित होकर रहेगी," सुप्रबुद्ध ने कहा। उसने उस सीढ़ी को तुड़वा दिया जिससे उतरकर उसे मृत्यु-स्थल को जाना पड़ता। अपने सेवकों को सख्त आदेश दिए कि अगर गलती से वह उधर जाने लगे तो वे उसे पूरी शक्ति से पकड़ लें। ऐसा कहकर वह ऊपर के कमरे में जाकर रहने लगा।

शास्ता को सुप्रबुद्ध के उपयुक्त प्रबंध के विषय में बताया गया। उन्होंने यह सुनकर कहा, "बुद्धों का कथन असत्य नहीं हो सकता। सुप्रबुद्ध कुछ भी करे, वह महल में कहीं भी छिप जाए, आकाश में उड़ जाए, नाव पर बैठकर समुद्र विहार के लिए चला जाए, पर्वत की गुफाओं को अपना निवास-स्थल बना ले, उसे जो करना है कर ले, उसकी मृत्यु उसी तिथि पर और उसी स्थान पर सुनिश्चित है।" और हुआ भी वही।

सातवें दिन शास्ता भिक्षाटन को निकले; उधर सुप्रबुद्ध का अश्व चंचल हो दीवार पर पैरों से जोर-जोर से प्रहार करने लगा। सुप्रबुद्ध ने यह आवाज सुनी। पहले भी वह घोड़ा अपने मालिक को देखकर शांत हो जाता था। सुप्रबुद्ध को कुछ याद नहीं रहा और वह अपने घोड़े की ओर भागा। पहरे भी सुध-बुध खो बैठे। उन्होंने राजा को नहीं रोका, राजा दौड़ता हुआ सीधा उसी स्थान पर पहुँचा जहाँ सीढ़ियाँ बनी थीं और वहीं धरती पर जा गिरा। उसी स्थल पर उसकी प्राण-लीला समाप्त हो गई जिसका बुद्ध ने जिक्र किया था। धरती फटी और वह नरक में जा गिरा।

टिप्पणी: कोई व्यक्ति लाख चतुराई कर ले, किए गए कर्मों का लेख मिट नहीं सकता। मृत्यु के आगे किसी का जोर नहीं चलता। मृत्यु की तिथि, स्थान को न हम बदल सकते हैं और न आप। कौन, कब, कहाँ, कैसे उठ जाएगा कोई नहीं जानता। अगर हम ऐसे असमर्थ हैं तब फिर अभिमान किस बात का? "रस्सी की अकड़ किस बात की?" रस्सी जल जाती है पर उसकी ऐंठ नहीं जाती है वैसे ही हमारी ऐंठ खत्म क्यों नहीं होती?

सामान्य जन के लिए मृत्यु एक भयावह चीज होती है। उसके भय को समाप्त करने का एक ही रास्ता है। उस स्रोत को बंद कर दिया जाए जहाँ से बुरे कर्मों का सृजन होता है। अर्थात बुरे कर्मों के सृजन से बचकर ही हम मृत्यु के असर को कम कर सकते हैं और अंततः निर्वाण प्राप्त कर सकते हैं।

गाथा:
न अन्तलिख्खे न समुद्रमज्झे, न पब्बतानं विवरं पविस्स ।
न विज्जति सो जगतिप्पदेसो, यत्थठितं नप्पसहति मच्चु।।128।।
अर्थ:
इस लोक में कोई ऐसा स्थान नहीं है जहाँ छिपने से मनुष्य मृत्यु से बच सके। आकाश में या पाताल में, पर्वत में और कंदराओं में - वह कहीं से भी समय आने पर आदमी को ढूँढ निकालेगी।

⭐ पाप कर्म कर फल से नहीं बच पाओगेतीन भिक्षु समूहों की कथास्थान : जेतवन, श्रावस्तीएक बार एक भिक्षु समूह भिक्षाटन कर विहार...
25/03/2026

⭐ पाप कर्म कर फल से नहीं बच पाओगे
तीन भिक्षु समूहों की कथा

स्थान : जेतवन, श्रावस्ती
एक बार एक भिक्षु समूह भिक्षाटन कर विहार वापस लौट रहा था। रास्ते में एक जगह प्रचंड आग लगी हुई थी। भिक्षुओं के देखते-देखते एक कौआ उड़ता हुआ आया और उस ज्वाला में गिरकर मर गया। भिक्षुगण समझ नहीं पाए कि ऐसी दर्दनाक घटना क्यों हुई। उन्होंने शास्ता से इसका उत्तर पूछना चाहा।

भिक्षुओं का दूसरा समूह नाव से यात्रा कर रहा था। नाव चलती-चलती समुद्र में कहीं अटक गई। अनेक प्रयास करने के बाद भी जब वह न चली तो यात्रियों ने सोचा कि निश्चय ही उनमें कोई अभागा था जिसके कारण नाव का चलना बंद हो गया था। लॉटरी निकाली गई। हर बार नाविक की पत्नी का नाम निकला। नाविक ने कहा कि इस स्त्री के गले में बालू की बोरी बाँधकर इसे समुद्र में फेंक दो। ऐसा ही किया गया और नाव चल पड़ी। भिक्षुगण समझ नहीं पाए कि उस औरत की मौत इस तरह क्यों हुई? उन्होंने बुद्ध से इसका उत्तर जानना चाहा।

भिक्षुओं का तीसरा समूह कहीं जा रहा था। रात्रि में उसे कहीं पर विश्राम करना पड़ा। वे सभी एक गुफा में जा सो गए। सुबह में देखा कि गुफा के द्वार पर एक विशाल चट्टान पड़ी हुई थी। उससे बाहर निकलने का मार्ग अवरुद्ध हो गया था। उन्हें उस गुफा में सात दिनों तक रहना पड़ा और तब वे उस गुफा से बाहर निकल पाए। उन्हें समझ में नहीं आया कि मृतकाल के किस कर्म के कारण उन्हें उस गुफा में सात दिनों तक नजरबंद रहना पड़ा। उन्होंने तथागत से शंका-समाधान चाहा।

बुद्ध ने अपनी अन्तर्दृष्टि से देखकर समझाया कि भूतकाल में एक किसान के पास एक आलसी बैल था। वह मन से काम नहीं करता था। एक दिन किसान को उस पर बहुत क्रोध आया और उसने पुआल में आग लगाकर उस बैल को जिंदा जला दिया। इस कारण उसे कौआ बनकर जन्म लेना पड़ा और इस जन्म में आग में गिरकर मरना पड़ा।

नाविक की पत्नी अपने पूर्व जन्म में एक महिला थी। वह जब भी अपने घर से निकलती, मुहल्ले का एक कुत्ता उसके साथ लग जाता था। लड़के उसको देखकर हँसते थे और उस महिला का मजाक उड़ाते थे। महिला उस कुत्ते से पिंड छुड़ाना चाहती थी पर वह किसी पूर्व जन्म में उसका पति था। अतः उस मोह के कारण उसका साथ नहीं छोड़ पा रहा था। उस महिला ने उस कुत्ते की हत्या करने की सोची। उसने उसे प्यार से पुचकारकर बुलाया, उसके गले में एक भारी पत्थर बाँधकर उसे पानी में फेंक दिया। कुत्ता डूबकर मर गया।

भिक्षुओं के तीसरे समूह ने एक बार खेल-खेल में एक छिपकली को एक बिल में बंद कर दिया। गलती से उसका दरवाजा खोलना भूल गए। सात दिनों के बाद जब याद आया तब उस बिल का दरवाजा खोला। छिपकली मृतप्राय हो गई थी। अपनी इस गलती के कारण इस जन्म में उन्हें भिक्षुओं के रूप में गुफा में कैद रहना पड़ा।

इन तीनों स्पष्टीकरण के बाद शिष्यों ने बुद्ध से पूछा कि पाप कर्म करके मनुष्य उसके फल से बच सकता है या नहीं? मनुष्य अगर गुफा में छुप जाए, धरती से भागकर समुद्र में या पर्वत पर चला जाए या आकाश में पक्षियों की तरह उड़ जाए तो क्या वह अपने को अपने पाप के फल से बचा लेगा? शास्ता ने भिक्षुओं को समझाया कि सृष्टि में कोई ऐसा स्थान नहीं है जहाँ छिपकर अपने पाप के फल से बचा जा सके।
जैसे हमारी छाया हमारा साथ नहीं छोड़ती, उसी प्रकार हमारे कर्म भी हमारा साथ नहीं छोड़ते।

गाथा :
न अन्तलिख्खे न समुद्रमज्जे, न पब्बतानं विवरं पविस्स ।
न विज्जति सो जगतिप्पदेसो, यत्रट्ठितो मुच्येय्य पापकम्मा ॥127॥
अर्थ :
समुद्र, आकाश, पर्वत, गुफा - इस लोक में कोई ऐसा स्थल नहीं है जहाँ छिपकर बैठने से अपने कर्मफल से बचा जा सके।

⭐ सभी सर्वत्र अपना ही कर्मफल पाते हैंमणिकार की कथास्थान : जेतवन, श्रावस्तीएक स्थविर एक मणिकार के यहाँ से अनेक वर्षों से ...
23/03/2026

⭐ सभी सर्वत्र अपना ही कर्मफल पाते हैं
मणिकार की कथा

स्थान : जेतवन, श्रावस्ती

एक स्थविर एक मणिकार के यहाँ से अनेक वर्षों से भिक्षाटन कर रहा था। एक दिन मणिकार घर में मांस काट रहा था। उसके हाथ में खून लगा हुआ था। तभी राजा प्रसेनजित के सिपाही एक मणि लेकर आए और तत्काल उसे पालिश करने के लिए कहा। मणिकार ने उसे हाथ में लिया तो मणि में खून लग गया। उसने मणि को मेज पर रखा और स्वयं हाथ धोने चला गया। इस बीच उसका एक पालतू क्रौंच पक्षी आया और उसने रक्तयुक्त मणि को देखकर समझा कि वह मांस है। अतः उसे निगल गया।

जब मणिकार बाहर आया और उसने मणि नहीं देखी तो उसने अपनी पत्नी और बेटे आदि से पूछा; सबों ने कहा कि उन्होंने मणि नहीं लिया है। भले से भी पूछा तो उन्होंने भी उत्तर दिया कि उन्होंने मणि नहीं उठाई थी। लेकिन इससे मणिकार संतुष्ट नहीं हुआ। उसने सोचा कि मेरे परिवार वालों ने मणि नहीं उठाया है और यहाँ अन्य कोई नहीं आया है। अतः उसने निष्कर्ष निकाला कि भिक्षु ने ही मणि लिया है।

उसने इस विषय पर पत्नी से मंत्रणा की। पत्नी ने कहा कि भिक्षु हमारे घर वर्षों से आते रहे हैं और उन्होंने सदा हमारा कुशल चाहा है। अतः राजदण्ड स्वीकार है पर भिक्षु पर संदेह करना अनुचित होगा। पर मणिकार नहीं माना और उसने भिक्षु को रस्सी से बाँध दिया और खूब पिटाई की जिससे उसके शरीर से खून निकलने लगा। खून को पीने वह पालतू क्रौंच पक्षी फिर आ गया। मणिकार क्रोध में था, उसने ऐसी लात मारी कि पक्षी वहीं मर गया।

भिक्षु यह सब देख रहा था। उसने मणिकार से प्रश्न किया कि क्या पक्षी मर गया। मणिकार क्रुद्ध तो था ही, उसने गुस्से में जोर से डाँटते हुए कहा, “हाँ मर गया है और तुम्हारी गति भी इसी प्रकार होगी।” जब भिक्षु को लगा कि पक्षी मर गया है तब उसने मणिकार को बताया कि इसी पक्षी ने मणि निगल लिया था।

मणिकार ने उस पक्षी का पेट फाड़ा तो उसे मणि मिल गई। अब तो वह डर से काँपने लगा। वह भिक्षु के चरणों पर गिर गया और क्षमायाचना करने लगा। भिक्षु ने उसे बताया कि उसने उसे माफ कर दिया। इसमें उसका कोई दोष नहीं था, वह तो पूर्व जन्मों का फल था।

मणिकार ने भिक्षु से कहा कि अगर भिक्षु ने उसे माफ कर दिया हो तो वह पहले की तरह ही भोजन दान हेतु आया करे। भिक्षु ने मणिकार को समझाया कि ऐसा नहीं हो सकता। भिक्षु को किसी भी गृहस्थ के घर में प्रवेश नहीं करना चाहिए। उसके घर में प्रवेश का ही नतीजा था कि उसकी यह दुर्गति हुई। ऐसा कहते हुए भिक्षु के प्राण निकल गए।

बुद्ध के यहाँ जब धर्मचर्चा हुई तब चर्चा हुई कि किसने कहाँ जन्म लिया। मणिकार नरक में गया, अरहत भिक्षु परिनिर्वाण को प्राप्त हुआ, पत्नी देव लोक गई तथा पक्षी का मणिकार के पुत्र के रूप में जन्म हुआ।

टिप्पणी: भिक्षु ने पक्षी के मरने के बाद ही मणि का रहस्य क्यों बताया? अगर भिक्षु ने मणि का रहस्य पहले ही खोल दिया होता तो मणि को प्राप्त करने के लिए मणिकार उस पक्षी का पेट फाड़ देता और उसकी मृत्यु हो जाती। भिक्षु अरहत था। वह अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठ चुका था। उसने मणि का राज नहीं खोला तो क्या हुआ? मणिकार ने उसकी पिटाई की और वह मृत्यु को प्राप्त हो गया।

साधारण व्यक्ति और अरहत में क्या अन्तर है? साधारण व्यक्ति मात्र अपने लिए जीता है जैसा भिक्षु और मणिकार की कहानी से स्पष्ट है। अरहत “स्व” से ऊपर उठ गया होता है।

गाथा:
गभमेके उप्पज्जन्ति, निरयं पापकम्मिनो।
सग्गं सग्गतिनो यन्ति, परिनिब्बन्ति अनासवा॥126॥
अर्थ:
कर्मों के आधार पर पुनर्जन्म होता है। संसार के साधारण प्राणी पुनः माता के कोख में जन्म लेते हैं। पाप करने वाले नरक जाते हैं तथा पुण्य करने वाले स्वर्ग। धर्मसाधक क्षीणाशव स्थिति प्राप्त कर निर्वाण को प्राप्त करते हैं।

⭐ पाप न करें, यह आपका ही नुकसान करेगाकोक लुब्धक एवं भिक्षु की कथास्थान : जेतवन, श्रावस्तीकोक लुब्धक नामक एक शिकारी अपने ...
22/03/2026

⭐ पाप न करें, यह आपका ही नुकसान करेगा
कोक लुब्धक एवं भिक्षु की कथा

स्थान : जेतवन, श्रावस्ती

कोक लुब्धक नामक एक शिकारी अपने कुत्तों की मदद से शिकार किया करता था। एक दिन जब वह शिकार के लिए निकला तो रास्ते में उसे एक भिक्षु दिख गया। भिक्षु को देखते ही उसके मन में क्रोध पूर्ण विचार आया कि आज इस भिक्षु को देखा है, आज शिकार में कुछ नहीं मिलेगा। संयोग की बात हुई कि उस दिन सचमुच शिकारी को शिकार में कुछ नहीं मिला। संध्या बेला जब वह शिकार से वापस आ रहा था तो संयोगवश उसे पुनः वही भिक्षु दिख गया। अब तो उसके क्रोध का पारावार ही नहीं रहा। उसने सोचा कि सुबह-सुबह इस भिक्षु के दर्शन के कारण ही मुझे आज शिकार में कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ। ऐसा सोचकर उसने भिक्षु को मारने के लिए उसके पीछे अपने कुत्तों को छोड़ दिया। भय से ग्रस्त होकर भिक्षु पास के एक वृक्ष पर चढ़ने लगा, किन्तु शिकारी ने उसे नहीं छोड़ा। वह उसके पैर में तीर चुभाने लगा। भिक्षु को असहनीय पीड़ा होने लगी और अपने को बचाने के लिए वह इधर-उधर हिलने लगा। इस प्रक्रिया में उसका चीवर गिर गया और शिकारी उससे ढंक गया। कुत्तों ने समझा कि भिक्षु नीचे आ गिरा है। अतः वे उस पर टूट पड़े। भिक्षु को समझ में नहीं आया कि वह क्या करे। अतः उसने पेड़ की एक सूखी डाल को तोड़कर नीचे की ओर फेंक दिया। तब कुत्तों को समझ में आया कि उन्होंने अपने मालिक पर ही आक्रमण कर दिया था। भौंकते हुए वे जंगल की ओर भाग गए।

भिक्षु नीचे उतरा तो उसने देखा कि लुब्धक के प्राण-पखेरू उड़ गए थे। उसे बहुत दुःख हुआ कि उसके चीवर से ढंक जाने के कारण ही शिकारी की मृत्यु हुई थी। अपने को दोषी मानता हुआ वह बुद्ध के समक्ष प्रस्तुत हुआ तथा घटना क्रम बताया।

बुद्ध ने उसकी शंका का समाधान करते हुए बताया कि वह निर्दोष है। उसका शील भी भंग नहीं हुआ है। गलती शिकारी की थी। उसे वैसा नहीं करना चाहिए था। अपने दुष्कर्म के कारण ही वह मृत्यु को प्राप्त हुआ। बुद्ध ने यह भी स्पष्ट किया कि पूर्व जन्म में भी कोक ने निरपराधी को दुःख पहुँचाने की प्रक्रिया में स्वयं को आघात पहुँचाया था।

टिप्पणी : अगर हम आकाश की ओर थूकेंगे तो थूक आकाश का कुछ नहीं बिगाड़ेगा। हाँ, वह थूक उस आदमी पर ही वापस आकर गिरेगा। अगर हम कीचड़ में पत्थर फेंकेंगे तो कीचड़ हमारे ही वस्त्रों में लग जाएगा और उसे मलिन कर देगा।

गाथा :
यो अप्पदुट्ठस्स नरस्स दुस्सति, सुद्धस्स पोस्सस अनङ्गणस्स।
तमेव बालं पच्चेति पापं, सुक्खमो रजो पटिवातं खित्तो॥125॥
अर्थ :
जो मूर्ख निर्दोष एवं पवित्र व्यक्ति पर दोष लगाता है,
वह दोष उसी मूर्ख व्यक्ति को आकर नुकसान पहुँचा देता है
जैसे हवा के विपरीत दिशा में धूल फेंकने पर
वह धूल फेंकने वाले के ऊपर ही आकर गिर जाती है।

⭐ कुशल चित्त को पाप कर्म प्रभावित नहीं करतेकुक्कुटमित्र निषाद की कथास्थान : वेणुवन, राजगृहराजगृह में एक युवती अपने माता-...
21/03/2026

⭐ कुशल चित्त को पाप कर्म प्रभावित नहीं करते
कुक्कुटमित्र निषाद की कथा

स्थान : वेणुवन, राजगृह

राजगृह में एक युवती अपने माता-पिता के साथ रहती थी। एक दिन उसे एक शिकारी दिख गया और वह उसे अपना हृदय दे बैठी। वह चुपके से अपने घर से निकल गई, उस निषाद का अनुसरण किया, दोनों ने विवाह कर लिया और साथ-साथ रहने लगे। बाद में उन्हें सात पुत्र हुए। समय के अंतराल से उन्होंने उन पुत्रों का विवाह भी कर दिया।

एक दिन शास्ता ने अपने ज्ञान चक्षु से देखा कि वह व्याध अपने परिवार के साथ आध्यात्मिक कल्याण की मनःस्थिति प्राप्त करने के निकट है। अतः बुद्ध प्रातःकाल ही विहार से निकल गए और जंगल में वहाँ पहुँच गए जहाँ शिकारी ने जाल बिछा रखा था। वे जाल के पास ही एक झाड़ी में ध्यानमुद्रा में बैठ गए। थोड़ी देर के बाद शिकारी आया। अपने जाल में किसी शिकार को फँसा हुआ नहीं देखा। पास ही उसने कुछ पदचिह्न देखे और उनका अनुसरण करता हुआ वहाँ पहुँच गया जहाँ बुद्ध ध्यानस्थ थे। उन्हें देखकर उसने सोचा कि इन्होंने ही सम्भवतः जाल में फँसे मृग को स्वच्छन्द कर दिया है या उसे फँसने नहीं दिया है। ऐसा सोच वह क्रोध से बुद्ध के ऊपर तीर चलाने के लिए आतुर हुआ। पर जैसे ही वह धनुष से बाण खींचकर उसे छोड़ने जा रहा था, वह मूर्तिवत हो गया।

उधर घर आने में विलंब होता देख माता ने पुत्र को पिता को देखने के लिए भेजा। पिता को मूर्तिवत एवं शास्ता को वहीं ध्यानस्थ देखकर निषाद पुत्र ने भी क्रोध किया और सोचा कि तथागत के कारण ही उसके पिता को यह गति हुई होगी। ऐसा सोचकर उसने भी उन्हें दंड देने हेतु बाण ताना। पर वह भी पिता की तरह स्थिर हो गया। फिर एक-एक करके सभी पुत्र पिता को देखने आए और स्थिरप्रज्ञ हो गए। अंत में माता ने सोचा कि उसे जाकर देखना चाहिए। जैसे ही उसने अपने पति और पुत्रों को मूर्तिवत और वहीं पर शास्ता को ध्यानस्थ देखा, वह जोर से चिल्ला उठी, “रुको! रुको! मेरे पिता को मत मारो!” ऐसा सुनकर पति ने सोचा कि अरे ये तो मेरे श्वसुर हैं; इसी तरह पुत्रों ने भी सोचा कि ये तो मेरे नानाजी हैं; ऐसा होते ही उनके हृदय में करुणा और मैत्री की धारा प्रवाहित होने लगी। बुद्ध ने सोचा कि यही अवसर है जब उन्हें उपदेश ग्रहण होगा। निषाद सपरिवार तथागत के समक्ष उपस्थित हुआ तथा उनसे क्षमा माँगी। बुद्ध ने उन्हें धर्मोपदेश दिया और वे सभी श्रोतापन्न हो गए। निषाद की पत्नी पहले से ही श्रोतापन्न थी।

उधर भिक्षाटन कर बुद्ध जब विहार में पधारे तो उन्होंने आनंद को प्रातःकाल की घटना से अवगत कराया। फिर धर्मसभा में चर्चा चली कि शिकारी की पत्नी प्रतिदिन उसे शिकार के काम में सहयोग करती थी। धनुष, बाण, भाला, जाल आदि लाकर अपने पति को देती थी और इस प्रकार उसके हिंसक कार्यों में सहायक थी। प्रश्न उठा कि क्या श्रोतापन्न भी हिंसा करते हैं? इस प्रश्न का समाधान देते हुए बुद्ध ने समझाया कि श्रोतापन्न हिंसा नहीं करते हैं। वह मात्र अपने पति की आज्ञा का पालन करती थी। उसका चित्त अकुशल नहीं था कि वह जंगल में जाकर पशु-वध करे। शिकार के साधनों को देते समय उसके हृदय में उन पशु-पक्षियों के प्रति कोई हिंसा की भावना नहीं होती थी। उसके मन में यह भी नहीं होता था कि उसका पति इन साधनों की मदद से जंगल जाकर पशु-पक्षियों का वध करे।

जैसे हाथ में घाव न हो तो आदमी उस हाथ से अगर जहर उठा भी ले तो वह जहर कोई असर नहीं करता, उसी प्रकार कुशल चित्त को पाप कर्म प्रभावित नहीं करते। चूँकि उस महिला का चित्त कुशल था, उसमें अकुशल बातें नहीं उठती थीं, अतः धनुष-बाण एवं अन्य अस्त्र-शस्त्र देकर भी उस महिला ने अपने लिए बुरे कर्मों का सृजन नहीं किया।

टिप्पणी : बुद्ध ने मन की स्थिति पर सबसे अधिक जोर दिया है। मन की स्थिति कुशल है या अकुशल—इसी से निर्धारण होता है कि वह सत्कर्म का सृजन करेगा या बुरे कर्म का।

गाथा :
पाणिगहे चे वण्णो नारस्स, हरेय्य पाणिना विषं।
नाब्बणं विसमंवति, नत्थि पापं अकुबलतो।। 124।।
अर्थ :
यदि हाथ में घाव नहीं हो तो उस हाथ में विष लेने पर भी कोई असर नहीं पहुँचता; वह विष कोई असर नहीं डालता। इसी प्रकार पाप न करने की वृत्ति वाले जन को पाप नहीं लगता।

⭐ पापों को विष समान जान, त्याग देंमहाधनिक की कथास्थान : जेतवन, श्रावस्तीएक बार एक महाधनिक व्यापार करने हेतु 500 गाड़ियों...
20/03/2026

⭐ पापों को विष समान जान, त्याग दें
महाधनिक की कथा

स्थान : जेतवन, श्रावस्ती

एक बार एक महाधनिक व्यापार करने हेतु 500 गाड़ियों के काफिले के साथ यात्रा पर जाने वाला था। उसने भिक्षुओं से भी आग्रह किया कि वे साथ चलें। रास्ते में वह भोजनादि की व्यवस्था कर देगा जिससे उन्हें किसी प्रकार का कष्ट नहीं होगा। अतः पाँच सौ भिक्षु भी उसके साथ हो लिए। रास्ते में एक जंगल पड़ता था। जंगल में प्रवेश के पहले वह व्यापारी बैलों को विश्राम देने हेतु 2-3 दिन रुक गया। भिक्षुओं को वह भोजनादि देता रहा। उधर 500 चोरों का एक समूह भी वन में छिपकर व्यापारी की प्रतीक्षा कर रहा था कि वह आये और वे उसे लूट लें। जब विलंब होने लगा तब चोरों ने अपने एक सहायक को गाँव में पता लगाने के लिए भेजा कि विलंब क्यों हो रहा है और व्यापारी आगे की यात्रा कब प्रारंभ करेगा?

उस दूत ने गाँव में जाकर व्यापारी के सहायक से पूछना प्रारंभ कर दिया कि आगे की यात्रा कब होगी? सहायक ने उसे बता दिया कि आगे की यात्रा 2-3 दिनों बाद होगी। उसके प्रश्न करने पर कि वह ऐसा क्यों पूछ रहा था, चोर ने उस सहायक को सच्ची बात बता दी कि चोरों का एक समूह व्यापारी को लूटने के लिए वन में इंतजार कर रहा था। तब उस सहायक ने चोर से कहा कि चोरों को जाकर बता दो कि व्यापारी शीघ्र ही यात्रा पर निकलेगा।

इधर व्यापारी का सहायक दुविधा में पड़ सोचने लगा कि मैं चोरों का साथ दूँ या व्यापारी का। अंत में उसने निर्णय लिया कि व्यापारी तो भिक्षुओं को भोजन दान भी दे रहा है और इस प्रकार सत्कर्म में संलग्न है। अतः उसने अपने स्वामी का साथ दिया और सच-सच बात बता दी।

सच्चाई जानकर व्यापारी ने सोचा कि अब मुझे आगे जाने से क्या लाभ? अब मैं घर ही लौट जाता हूँ। चोरों को पता चल गया कि अब वह घर लौटने वाला है। अतः उस मार्ग पर लूटने की तैयारी करने लगे। इधर व्यापारी को पुनः उनकी योजना का पता चल गया। अतः व्यापारी ने भी वापस जाने का इरादा छोड़ दिया तथा भिक्षुओं से आग्रह किया कि वे अगर रुकना चाहें तो रुक जाएं; अन्यथा जाना चाहें तो चले जाएं। भिक्षुगण वहाँ से प्रस्थान कर गए। श्रावस्ती आकर शास्ता को प्रणाम कर वहाँ बैठ गए। उन्होंने तथागत को संपूर्ण कथा सुना दी।
बुद्ध ने उन्हें बताया कि जैसे महाधनी व्यापारी चोरों के भय से अपना मार्ग बदल देता है, जीवन जीने की चाह वाला व्यक्ति हलाहल विष त्याग देता है उसी प्रकार भिक्षु को भी पापकर्म का त्याग कर देना चाहिए।

टिप्पणी: महाधनी व्यापारी जब चोरों का सामना करने की स्थिति में नहीं रहता है तब वह खतरनाक रास्तों पर नहीं जाता क्योंकि उनमें उसे लूट लिए जाने का डर रहता है। जैसे जीवित रहने की चाह वाला व्यक्ति हलाहल विष से दूर रहता है, उसी प्रकार जीवन में कल्याण चाहने वाले व्यक्ति को संकटमय मार्ग तथा हलाहल विष की तरह पापों का भी त्याग कर देना चाहिए। अगली गाथा का संदेश भी हलाहल विष के माध्यम से ही दिया गया है।

गाथा:
वाणिजेव भय मग्गं, अप्पस्सतो महद्धनो।
विसं जीवितुकामोव, पापानि परिवज्जये।।123।।
अर्थ:
जिस प्रकार धनी व्यापारी, कम सेवकों का साथ होने पर, डरता हुआ मार्ग बदल देता है
उसी प्रकार समझदार व्यक्ति पापों को विष के समान समझकर त्याग देता है।

⭐ पुण्य करने में कृपणता न करेंविडालापदक श्रेष्ठी की कथास्थान : जेतवन, श्रावस्तीकिसी दिन जेतवन विहार में बुद्ध ने भिक्षुस...
19/03/2026

⭐ पुण्य करने में कृपणता न करें
विडालापदक श्रेष्ठी की कथा

स्थान : जेतवन, श्रावस्ती

किसी दिन जेतवन विहार में बुद्ध ने भिक्षुसंघ को प्रवचन दिया कि मनुष्य को चाहिए कि वह स्वयं भी दान दे तथा परिवार वालों को भी दान देने के लिए प्रेरित करे। ऐसा करके वह आने वाले जन्मों में स्वयं पुण्यफल प्राप्त करेगा और उसके परिवार वाले भी पुण्यफल प्राप्त करेंगे।

प्रवचन से प्रेरित होकर एक सद्पुरुष ने शास्ता को भिक्षुसंघ के साथ भोजन के लिए आमंत्रित किया। व्यवस्था हेतु गाँव में घोषणा की कि उसने सम्पूर्ण भिक्षुसंघ को भोजन हेतु निमंत्रित किया है। अतः हर व्यक्ति अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान दे।

दान लेने की प्रक्रिया में वह व्यक्ति एक दुकानदार के पास भी गया। उस दुकानदार ने सिर्फ तीन अंगुलियों से चावल, मूंग तथा उड़द उठाकर दान में दिए। घी और मधु भी अलग से दो-दो बूंद दे दिया। साथ ही यह भी कहा कि मैंने अपनी सामर्थ्य के अनुसार भिक्षुओं को भिक्षादान दिया है। उपासक ने भी दी गई दान की वस्तुओं को अलग रख दिया। इससे दुकानदार को संदेह हुआ कि निश्चित ही यह आयोजक मेरी निंदा करना चाहता है। अतः दान दी गई वस्तु को उसने अलग रख दिया है। वस्तुस्थिति जानने के लिए उसने अपने नौकर को उस आयोजक के पीछे लगा दिया।

नौकर ने आयोजक के घर जाकर देखा कि उसने दान में प्राप्त सभी वस्तुओं को एक में मिला दिया और भावना व्यक्त की कि श्रेणी को भी इसका फल मिले। दाता को इससे संतोष न हुआ और उसने अपने वस्त्र में एक चाकू छुपा लिया और दर्शकों की श्रेणी में जा बैठा कि अगर उसने मेरी थोड़ी सी भी निंदा की तो मैं उसे छुरी मार दूँगा।

शास्ता और भिक्षुसंघ को भोजन परोसने के बाद उपासक ने तथागत से निवेदन किया, “इस नगर के सभी निवासियों ने अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार दान दिया है। उन सभी नागरिकों को उनके दान का पुण्य प्रताप मिले।” ऐसा सुनकर उस कृपण श्रेणी ने सोचा कि उपासक मेरे विषय में निंदा की कोई बात नहीं कर रहा है। वरन् यह मेरे लिए भी पुण्य की याचना कर रहा है। इसके विपरीत मेरे हृदय में इसके प्रति प्रतिशोध की ज्वाला धधक रही है। अतः मैं अगर उससे क्षमा याचना नहीं करूँगा तो मुझे नरक में जाना पड़ेगा। ऐसा सोचकर वह उपासक के चरणों पर गिरकर माफी मांगने लगा।

इस घटना को देखकर बुद्ध ने दानदाता से जानकारी प्राप्त की और फिर उन दोनों एवं भिक्षुसंघ को सम्बोधित करते हुए कहा, “पुण्य करने में मनुष्य को कृपणता नहीं करनी चाहिए। यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि यह तो छोटा पुण्य है। इसे करने से क्या लाभ? छोटे-छोटे पुण्य ही विशाल पुण्यपुंज में परिवर्तित हो जाते हैं। जैसे वर्षा के एक बूंद का महत्व नहीं दिखता है पर वर्षा की बूंदें जब लगातार घड़े में पड़ती हैं तो घड़ा भर जाता है। अतः किसी भी पुण्य को ‘थोड़ा’ या ‘अधिक’ से मापना उचित नहीं है। थोड़ा-थोड़ा करके ही सही, मनुष्य को लगातार पुण्य-लाभ करते रहना चाहिए।”

टिप्पणी : संसार में क्या हमने कभी किसी को एक बार में ही करोड़पति या अरबपति बनते हुए देखा सुना है? जो व्यक्ति आज करोड़पति है उसने कभी न कभी भूतकाल में एक रुपये से बचत की प्रक्रिया प्रारंभ की होगी। एक-एक रुपया मिलकर करोड़ बनता है। अतः पुण्य, दूसरों की भलाई, का काम अगर छोटे-छोटे भी हो तो उससे चित्त नहीं हटाना चाहिए और उसे तत्काल सम्पन्न कर देना चाहिए।

गाथा :
मावमञ्ञेथ पुण्णस्स, न मं तं आगमिस्सति।
उदबिन्दुनिपातेन, उदकुम्भोपि पूरति।
धीरो पूरति पुण्णस्स, थोके थोकेपि आचिनं ॥122॥
अर्थ :
बुद्धिमान व्यक्ति को अपने अल्प पुण्य को उपेक्षा की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए कि इससे क्या फल मिलेगा? जैसे बूंद-बूंद से ही घड़ा भर जाता है वैसे ही समझदार व्यक्ति अल्प-अल्प पुण्य करके अपार पुण्यराशि का संचय कर लेता है।

⭐ पाप जमा होते-होते विशाल पुंज हो जाता हैअसंयत भिक्षु की कथास्थान : जेतवन, श्रावस्तीबौद्ध विहार में एक भिक्षु छोटी-छोटी ...
18/03/2026

⭐ पाप जमा होते-होते विशाल पुंज हो जाता है
असंयत भिक्षु की कथा

स्थान : जेतवन, श्रावस्ती

बौद्ध विहार में एक भिक्षु छोटी-छोटी गलतियों पर ध्यान नहीं देता था। उदाहरण के लिए वह लकड़ी के बने मंचपीठ या अन्य सामग्री का इस्तेमाल करता था और उसे फिर सही स्थान पर नहीं रखता था। इस कारण वे वस्तुएँ धूप तथा वर्षा में बाहर ही पड़ी रहती थीं तथा उन्हें दीमक खा जाते थे। अन्य भिक्षुओं ने उसकी लापरवाही देखकर उसे समझाने की कोशिश की पर वह समझने को तैयार नहीं था। अंततः बात शास्ता तक गई। शास्ता ने उस नवयुवक भिक्षु से पूछा कि वह ऐसा क्यों कर रहा था। प्रत्युत्तर में युवक ने बताया कि उसका उद्देश्य सामान को बर्बाद करना नहीं था। अगर मंचपीठ खुले में छोड़ दिया जाता था तो आखिर उसी दिन, उसी समय तो वह खराब नहीं हो जाता था और यह एक साधारण सी बात थी।

बुद्ध ने भिक्षुओं को समझाया कि जीवन में छोटी-छोटी चीजों पर भी प्रमाद नहीं करना चाहिए। छोटी-छोटी चीजें ही मिलकर बड़ी हो जाती हैं। समझदार व्यक्ति को छोटी-छोटी गलतियों की भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। उदाहरण के लिए अगर हम एक घड़े को बारिश में बाहर रख दें तो वह तुरंत पानी की बूंदों से नहीं भर जाता। पर वही घड़ा अगर बाहर छोड़ दिया जाए तो कुछ समय बाद वह वर्षा की बूंदों से पूरी तरह भरकर लबालब हो जाता है।

मूर्ख व्यक्ति प्रमाद करते समय समझता है कि उसने जल के एक बूंद के समान प्रमाद किया है। वह प्रमाद एक बूंद के समान हो सकता है, पर लगातार किया गया प्रमाद अंततः बूंद भरे घड़े के समान हो जाता है। वह मूर्ख अपने लिए पापसमूह एकत्र कर लेता है। पाप के रूप में किया गया एक छोटा सा कार्य अंततः एक विशाल राशि में परिणत हो जाता है।

टिप्पणी : कोई भी बड़ा अपराधी एक दिन में पैदा नहीं होता। एक चोर को किसी कचहरी में चोरी की सजा सुनाई जा रही थी तब उसने जज से कहा कि उसके साथ-साथ उसके माता-पिता को भी सजा मिलनी चाहिए। जज द्वारा कारण पूछे जाने पर उसने बताया कि बचपन में जब उसने पहली बार पेंसिल चोरी की थी तो उसके माता-पिता ने उसे नहीं रोका था और इस प्रकार वह एक के बाद एक बड़ा अपराध करता गया।

पर्वत क्या है ? एक-एक राई के असंख्य कणों के समूह के अतिरिक्त क्या है ? अगर वे एक-एक कण न होते तो पर्वत कैसे होता ? उसी प्रकार बड़े पाप का समूह कैसे बन पाएगा अगर दिन-प्रतिदिन पाप नहीं किया जाएगा ?

गाथा :
मापमञ्ञेथ पापस्स, न मं तं आगमिस्सति ।
उदबिन्दुनिपातेन, उदकुम्भो पि पूरति ।
बालो पूरति पापस्स, थोके थोकेन आचिनं ॥121॥
अर्थ :
यह पाप छोटा है इससे क्या नुकसान होगा।
यह सोचकर समझदार आदमी को छोटे पाप की अवहेलना नहीं करनी चाहिए। जैसे जल की एक-एक बूंद गिरने से घड़ा भर जाता है उसी प्रकार छोटे-छोटे पाप भी मिलकर एक दिन विशाल पाप समूह बन जाता है।

⭐ पाप पक जाने पर दुःख देने लगता हैअनाथपिण्डिक की कथास्थान : जेतवन, श्रावस्तीबुद्ध के अनन्य भक्त अनाथपिण्डिक ने 54 करोड़ ...
17/03/2026

⭐ पाप पक जाने पर दुःख देने लगता है
अनाथपिण्डिक की कथा

स्थान : जेतवन, श्रावस्ती

बुद्ध के अनन्य भक्त अनाथपिण्डिक ने 54 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं से जेतवन विहार का निर्माण कर बुद्ध को समर्पित कर दिया था। वह दिन भर में तीन बार बौद्ध विहार जाया करता था। वह जब भी विहार जाता अपने साथ भिक्षुओं के लिए कुछ न कुछ सामान अवश्य ले जाता।

समय का क्रम चलता रहता है। सभी समय एक जैसा नहीं रहता। अनाथपिण्डिक के साथ भी यही हुआ। अब उसके पास उतना धन नहीं रहा। एक बार बुद्ध ने उससे पूछा कि तुम्हारा दान कैसा चल रहा है। इस पर अनाथपिण्डिक ने उत्तर दिया कि आर्थिक तंगी के कारण अब वह साधारण किस्म की खाद्य सामग्री का ही दान कर पा रहा है। बुद्ध ने उसे हतोत्साहित होने से रोका तथा समझाया कि अगर हृदय में श्रद्धा और पवित्रता हो तो बुद्ध को दिया जाने वाला भोजन-दान कभी साधारण नहीं हो सकता।

एक बार जब बुद्ध और उनके शिष्य अनाथपिण्डिक के निवास पर प्रविष्ट हुए तो गृह-देवी ने उन्हें रोकने की कोशिश की, पर वह सफल नहीं हुई। अतः रात्रि बेला में वह श्रेणी के समक्ष उपस्थित हुई, अपना परिचय दिया और उसे समझाने लगी कि बुद्ध और उनके शिष्यों के ऊपर व्यर्थ में पैसे बरबाद करने से कोई लाभ नहीं है। इससे तो अच्छा है कि आप अपनी बुद्धि व्यापार में लगाएँ जिससे आपका और आपके परिवार का भी भला हो। अनाथपिण्डिक तथागत का अनन्य भक्त था। अतः उसने उस गृह-देवी को स्पष्ट किया कि तुम्हारे जैसे हजारों देवी-देवता मिलकर भी मुझे बुद्ध के मार्ग से व्युत नहीं कर सकते। उस देवी ने चूँकि श्रेणी को ठेस पहुँचाई थी अतः उसने उसे घर से निकाल दिया। उस देवी को अपने बच्चों के साथ घर छोड़ना पड़ा और अब वह घर से बेघर हो गई।

वह नगर देवता के पास गई पर उसने मदद करने से मना कर दिया। घूमते-घूमते इन्द्र के पास गई और अपना दुःखड़ा रोया। शक ने भी बताया कि उसने भयंकर अपराध किया था। किसी में साहस नहीं था कि वह श्रेठी के पास जाकर क्षमा याचना करे। पर शक ने एक विधि बताई जिससे वह अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त कर सकती थी। "तुम श्रेठी के नौकर का रूप धारण करो और अपनी शक्तियों का उपयोग करो। महाजन के कर्जदारों ने 18 करोड़ रुपये ले रखे हैं। उन्हें उनसे वापस लेकर श्रेठी के कोष में रख दो।" देवी ने वैसा ही किया। "18 करोड़ रुपये नदी में बह गए हैं और कहीं पड़े हुए हैं। साथ ही अन्य 18 करोड़ रुपये फलों जगह धरती में गड़े हुए हैं। उन्हें भी लाकर श्रेठी के कोष में रख दो।" देवी ने वैसा ही किया और फिर श्रेठी के समक्ष प्रकट हो अपनी गलती के लिए क्षमा प्रार्थना की। साथ ही यह भी बताया कि श्रेठी के कोष में 54 करोड़ रुपये की मुद्रा रख दी थी। अनाथपिण्डिक ने सोचा कि इस देवी ने अपनी गलती पर प्रायश्चित किया है तथा 54 करोड़ रुपये भी कोष में रख दिए हैं। इसके विषय में शास्ता से राय लेनी चाहिए। यह सोचकर वह उस देवी को साथ लेकर बुद्ध के समक्ष उपस्थित हुआ। वहाँ पहुँचकर देवी से सभी कुछ स्पष्ट करने के लिए कहा। देवी शास्ता के चरणों पर गिर पड़ी और उनके विषय में अपशब्द कहने के लिए उनसे तथा श्रेठी से क्षमा-प्रार्थना करने लगी।

तब तथागत ने दोनों को समझाते हुए बताया कि किस प्रकार भले-बुरे कर्मों का फल मिलता है। कभी-कभी बुरे कर्म का फल तुरन्त नहीं मिलता। इसलिए बुरा कर्म करने वाला यह स्वीकार करने को तैयार नहीं होता कि वह बुरे कर्म कर रहा है। लेकिन जैसे ही वह बुरा कर्म परिपक्व हो जाता है तथा फल देने लगता है, उस मनुष्य को महसूस होता है कि बुरे कर्म का फल बुरा होता है। इसी प्रकार अच्छे कर्मों का फल भी तुरन्त दृष्टिगत नहीं होता। इस कारण कर्ता को अच्छे और बुरे कर्मों में भेद पता नहीं चलता और वह अच्छे कर्म करने के प्रति प्रोत्साहित नहीं होता। लेकिन जैसे ही अच्छे कर्मों का फल मिलने लगता है, उसे प्रसन्नता की अनुभूति होने लगती है।

टिप्पणी: अनाथपिण्डिक एक महान दानी था। वह "अनाथों को भोजन कराने वाला" के रूप जाना जाता था। अतः उसका नाम "अनाथपिण्डिक" पड़ गया था।

गाथा (119)
पापोपि पसरति भद्रं, याव पापं न पच्चति।
यदा च पच्चति पापं, अथो पापो पापानि पसरति।।119।।
अर्थ:
पाप कर्म करने वाले को पाप कर्मों में तबतक बुराई नहीं दिखती जबतक उसे उसका परिणाम नहीं मिलने लगता है। जैसे ही पाप का परिणाम मिलने लगता है पाप के फल को भोगने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
गाथा (120)
भद्रोपि पसरति पापं, याव भद्रं न पच्चति।
यदा च पच्चति भद्रं, अथ भद्रानि पसरति।।120।।
अर्थ:
शुभकर्म करने वाले को वे कर्म तब तक शुभ नहीं लगते जब तक उसे उनका फल नहीं दिखता। जब वह उनका फल देखता है तब उसे लगता है कि वह शुभ कर्म कर रहा था और तब उसे आनन्द की अनुभूति होती है।

⭐ पुण्य का संचय हितकारी होता हैलाजदेव पुत्री की कथास्थान : जेतवन, श्रावस्तीएक बार राजगृह के पिप्पलिगुहा में सात दिनों की...
16/03/2026

⭐ पुण्य का संचय हितकारी होता है
लाजदेव पुत्री की कथा

स्थान : जेतवन, श्रावस्ती

एक बार राजगृह के पिप्पलिगुहा में सात दिनों की साधना के बाद उठने पर महाकाश्यप ने दिव्य चक्षु द्वारा एक स्त्री को खेत में चिड़ियों (लाज) भगाते हुए देखा। उसके अंदर विद्यमान श्रद्धा को देख वे भिक्षाटन हेतु उसके पास गए। उस स्त्री ने भिक्षु को भोजनदान देते समय, हृदय से प्रसन्न होकर, प्रार्थना की कि भविष्य धर्म में भी मेरी आस्था हो। स्थविर ने उसकी मनोकामना पूर्ण कर आशीर्वाद दिया। प्रसन्नचित्त, धर्मानन्द में जब वह वापस जा रही थी तो मार्ग में एक सर्प ने उसे डस लिया। वह मर गई और उसने आश्चर्यजनक दिव्य लोक में जन्म लिया। वहाँ उसे अत्यधिक ऐश्वर्य प्राप्त हुआ जिसे पाकर उसने सोचा कि यह महाकाश्यप के आशीर्वाद से ही प्राप्त हुआ है।

अतः मुझे स्थविर की सेवा करनी चाहिए ताकि इस पुण्यप्राप्ति को चिरस्थायी बना लूँ। ऐसा सोचकर उसने प्रातःकाल ही झाड़ू लेकर महास्थविर के निवास स्थान की सफाई कर दी; साथ ही हाथ धोने के लिए जल तथा पीने के जल की भी व्यवस्था कर दी। जब स्थविर ने इसे देखा तो सोचा कि किसी सामणेर ने यह कार्य किया होगा। दूसरे दिन भी आवास की सफाई हुई और उन्होंने फिर वही अनुमान लगाया। तीसरे दिन स्थविर ने झाड़ू लगाने की आवाज सुनी तो आवाज देते हुए पूछा कि कौन झाड़ू लगा रहा है। लाजदेवती ने उत्तर दिया, “मैं आपकी शिष्या लाजदेवती हूँ।” “पर मेरी तो इस नाम की कोई शिष्या नहीं है,” स्थविर ने कहा। तब लाजो ने अपने विषय में बताया कि किस प्रकार उसने स्थविर को दान दिया था, सर्प दंश से उसकी मृत्यु हुई तथा स्वर्गलोक में उसने जन्म लिया। इसे सुन, स्थविर ने लाजो को चले जाने के लिए कहा। लाजो बहुत दुखी हुई और आग्रह करती रही पर स्थविर न माने। उन्होंने उसे समझाया कि एक देवपुत्री के लिए महाकाश्यप के यहाँ आकर उनकी निजी सेवा करना उचित नहीं है। लोगों को पता चलेगा और इस पर तरह-तरह की चर्चा होगी। वह रोती हुई बहुत समय तक खड़ी रही।

बुद्ध गंधकुटी में विराजमान थे। लाजो को सांत्वना देने हेतु उसके समक्ष प्रकट हुए तथा समझाया कि महाकाश्यप का उद्देश्य तुम्हें चोट पहुँचाना नहीं है। उसका उद्देश्य इन्द्रियसंयम है। वह किसी को कुछ भी बोलने का अवसर नहीं देना चाहता। दूसरी ओर तुम्हारा उद्देश्य पुण्य प्राप्त करना है क्योंकि तुम जानती हो कि पुण्य कर्म लोक और परलोक दोनों में ही लाभदायी होता है।

टिप्पणी: किसी कार्य को बार-बार करने से उसकी आदत पड़ जाती है और वह हमारे व्यक्तित्व का अंग बन जाता है। गाथा 117 में बुद्ध ने सीख दी है कि अगर अनजाने में कहीं कोई पाप हो जाए तो इंसान को उससे सबक लेना चाहिए, सावधान हो जाना चाहिए तथा उसकी पुनरावृत्ति नहीं करनी चाहिए। प्रथम अध्याय “युग्मवर्ग” की गाथा की तरह बुद्ध यहाँ समझाते हैं कि अगर पुण्य करने का अवसर मिले तो उसकी बार-बार पुनरावृत्ति करनी चाहिए। इस लोक तथा परलोक दोनों में ज्ञानीजन पुण्य की महिमा जानते हैं। अतः पुण्य करने का कोई भी अवसर गंवाना नहीं चाहते, जैसे लाजो स्थविर की सेवा का अवसर गंवाना नहीं चाहती थी।

अगर हम निरंतर सद्कर्म करने की आदत डालें तो निश्चय ही हमारा समाज सुधर जाएगा। कहावत भी है – “करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान, रस्सी आवत जात ते, सिल पर पड़त निशान” अर्थात अभ्यास से ही सब कुछ होता है। अगर हम अच्छी आदतों के बीज बोएंगे, अच्छे संस्कारों का सृजन करेंगे तो निश्चयतः एक न एक दिन अच्छे और मधुर फल प्राप्त करेंगे। दूसरी ओर अगर बुरी आदतों का बीज बोएंगे, बुरे संस्कारों का सृजन करेंगे तो निश्चयतः एक न एक दिन बुरे और कड़वे फल प्राप्त करेंगे।

फल कैसा प्राप्त करना है – मीठा या कड़वा; यह पूर्णतः हमारे ऊपर निर्भर करता है। अगर हमने अच्छे या बुरे बीज बोए और उससे तुरंत अच्छे या बुरे फल प्राप्त नहीं हुए तो यह नहीं समझना चाहिए कि हमें अच्छे या बुरे फल प्राप्त नहीं होंगे। अच्छे या बुरे फल, प्राप्त होंगे जरूर, आज हो, कल हो, या हो परसों।

चीन में एक बाँस का पेड़ होता है। जब उसका बीज धरती में बोया जाता है तो पाँच वर्षों तक कोई भी अंकुर बाहर नहीं निकलता मगर पाँचवें वर्ष अचानक वह बाँस-वृक्ष 10-15 फीट की ऊँचाई तक बढ़ जाता है।

इससे हम किस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं? क्या वह बीज 5 वर्षों तक मरा हुआ था? नहीं, वह पूर्णतः जीवित था। इसी प्रकार यदि हमारे कर्म तत्काल फल नहीं लाते तो यह कदापि नहीं समझना चाहिए कि वे कभी भी फल नहीं लाएँगे। अपना बोया हुआ हम स्वयं काटेंगे – आज, कल या परसों और काटना हमें ही पड़ेगा। कोई भी कुछ नहीं कर सकता। अतः यह पूर्णतः हमारे हाथ में है कि हम किस प्रकार के भविष्य का सृजन करें।

गाथा:

पुण्ञंचे पुरिसो करिय, करियाथेने पुनप्पुनं।
तम्मि छन्दं करियाथ, सुखो पुण्ञस्स उच्चयो॥118॥

अर्थ:

यदि मनुष्य पुण्य करता है तो उसे पुण्य को बार-बार करना चाहिए। उसे पुण्यकर्म में संलग्न रहना चाहिए क्योंकि पुण्यकर्म का संचय सुखदायी होता है।

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