28/03/2026
⭐ मृत्यु के प्रहार से कहीं भी नहीं बचोगे
सुप्रबुद्ध की कथा
स्थान : जेतवन, श्रावस्ती
सुप्रबुद्ध, शास्ता की पत्नी, यशोधरा के पिता थे। वे मुख्यतः दो कारणों से तथागत से घृणा करते थे - एक कि उनकी बेटी यशोधरा को छोड़कर उन्होंने संन्यास ले लिया था और दूसरे उनका पुत्र देवदत्त, जो संन्यासी बन गया था, उसकी बुद्ध से नहीं बनती थी।
एक दिन बुद्ध भिक्षाटन पर जाने वाले थे। सुप्रबुद्ध को पता चल गया। अतः उसने उनका रास्ता रोकने की ठानी। उसने शराब पी ली और रास्ते को घेरकर खड़ा हो गया कि आज बुद्ध को नहीं जाने दूँगा। लोगों ने उसे बहुत समझाया पर उल्टा उसने उत्तर दिया, "जाकर कह दो कि वह पीछे चला जाए। वह मुझसे बड़ा नहीं है।" इस प्रकार तथागत उस मार्ग से भिक्षाटन के लिए नहीं जा सके। बाद में सुप्रबुद्ध ने अपने जासूस भेजे कि जाकर देखें कि बुद्ध की क्या प्रतिक्रिया है।
उधर भिक्षाटन से लौटने पर बुद्ध ने आनंद को सारी बातें बताई। उन्होंने आनंद को यह भी बताया कि चूँकि सुप्रबुद्ध ने निर्वाण प्राप्त बुद्ध के मार्ग को अवरुद्ध किया था, अतः सात दिनों में उसकी मृत्यु हो जाएगी। सुप्रबुद्ध के दूतों ने यह बात उसे जाकर बता दी। उसने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया। उल्टे तथागत के प्रति उल्टी-सीधी बातें कही कि उसे मद हो गया है कि वह जो कुछ कहता है वह सही हो जाता है। "मैं ऐसा प्रबंध करूँगा कि उसकी बात असत्य साबित होकर रहेगी," सुप्रबुद्ध ने कहा। उसने उस सीढ़ी को तुड़वा दिया जिससे उतरकर उसे मृत्यु-स्थल को जाना पड़ता। अपने सेवकों को सख्त आदेश दिए कि अगर गलती से वह उधर जाने लगे तो वे उसे पूरी शक्ति से पकड़ लें। ऐसा कहकर वह ऊपर के कमरे में जाकर रहने लगा।
शास्ता को सुप्रबुद्ध के उपयुक्त प्रबंध के विषय में बताया गया। उन्होंने यह सुनकर कहा, "बुद्धों का कथन असत्य नहीं हो सकता। सुप्रबुद्ध कुछ भी करे, वह महल में कहीं भी छिप जाए, आकाश में उड़ जाए, नाव पर बैठकर समुद्र विहार के लिए चला जाए, पर्वत की गुफाओं को अपना निवास-स्थल बना ले, उसे जो करना है कर ले, उसकी मृत्यु उसी तिथि पर और उसी स्थान पर सुनिश्चित है।" और हुआ भी वही।
सातवें दिन शास्ता भिक्षाटन को निकले; उधर सुप्रबुद्ध का अश्व चंचल हो दीवार पर पैरों से जोर-जोर से प्रहार करने लगा। सुप्रबुद्ध ने यह आवाज सुनी। पहले भी वह घोड़ा अपने मालिक को देखकर शांत हो जाता था। सुप्रबुद्ध को कुछ याद नहीं रहा और वह अपने घोड़े की ओर भागा। पहरे भी सुध-बुध खो बैठे। उन्होंने राजा को नहीं रोका, राजा दौड़ता हुआ सीधा उसी स्थान पर पहुँचा जहाँ सीढ़ियाँ बनी थीं और वहीं धरती पर जा गिरा। उसी स्थल पर उसकी प्राण-लीला समाप्त हो गई जिसका बुद्ध ने जिक्र किया था। धरती फटी और वह नरक में जा गिरा।
टिप्पणी: कोई व्यक्ति लाख चतुराई कर ले, किए गए कर्मों का लेख मिट नहीं सकता। मृत्यु के आगे किसी का जोर नहीं चलता। मृत्यु की तिथि, स्थान को न हम बदल सकते हैं और न आप। कौन, कब, कहाँ, कैसे उठ जाएगा कोई नहीं जानता। अगर हम ऐसे असमर्थ हैं तब फिर अभिमान किस बात का? "रस्सी की अकड़ किस बात की?" रस्सी जल जाती है पर उसकी ऐंठ नहीं जाती है वैसे ही हमारी ऐंठ खत्म क्यों नहीं होती?
सामान्य जन के लिए मृत्यु एक भयावह चीज होती है। उसके भय को समाप्त करने का एक ही रास्ता है। उस स्रोत को बंद कर दिया जाए जहाँ से बुरे कर्मों का सृजन होता है। अर्थात बुरे कर्मों के सृजन से बचकर ही हम मृत्यु के असर को कम कर सकते हैं और अंततः निर्वाण प्राप्त कर सकते हैं।
गाथा:
न अन्तलिख्खे न समुद्रमज्झे, न पब्बतानं विवरं पविस्स ।
न विज्जति सो जगतिप्पदेसो, यत्थठितं नप्पसहति मच्चु।।128।।
अर्थ:
इस लोक में कोई ऐसा स्थान नहीं है जहाँ छिपने से मनुष्य मृत्यु से बच सके। आकाश में या पाताल में, पर्वत में और कंदराओं में - वह कहीं से भी समय आने पर आदमी को ढूँढ निकालेगी।