29/01/2026
🌟 दुष्ट व्यक्ति अपना शत्रु स्वयं है
सुप्रबुद्ध कोढ़ी की कथा
स्थान : वेणुवन, राजगृह
राजगृह में सुप्रबुद्ध नामक एक कोढ़ी रहता था। उदान ग्रंथ में उसकी कथा का विस्तृत ढंग से जिक्र आता है।
एक दिन सुप्रबुद्ध धर्म सभा में एक किनारे बैठा हुआ धर्म प्रवचन सुन श्रोतापन्न को प्राप्त हो गया। उसका मन पुलकित हो उठा और वह शास्ता को अपनी सफलता के विषय में बताने के लिए चल पड़ा। देवराज इन्द्र ने इसे देखा तो सोचा कि सुप्रबुद्ध की परीक्षा लेनी चाहिए। अतः वह सुप्रबुद्ध के सम्मुख प्रकट हुआ तथा उससे कहा,
“सुप्रबुद्ध! तुम बहुत ही गरीब हो। अतः दया के पात्र हो। तुम सिर्फ इतना कह दो कि तुम्हें तथागत के त्रिरत्न – बुद्ध, धर्म एवं संघ में कोई श्रद्धा नहीं है। मैं तुम्हें धन से मालामाल कर दूँ।”
सुप्रबुद्ध इस बात से खुश नहीं हुआ, वरन् नाराज होते हुए कहा,
“अरे मूर्ख! निर्लज्ज! तुमने सोचा कैसे कि मैं दरिद्र, कृपण एवं दयापात्र हूँ? मेरे पास जब त्रिरत्न का धन उपलब्ध है, तब मैं कृपण कैसे हुआ? मैं तो बहुत ही सुखपूर्वक जीवन जी रहा हूँ। मेरे पास प्रचुर मात्रा में धन है क्योंकि जिसके पास श्रद्धा, शील, ही, पापशोधिता, श्रुत, त्याग एवं प्रज्ञा का धन है वह दरिद्र कैसे हुआ? उसका जीवन तो पूर्णतः सफल जीवन है। मेरे पास ये सातों आर्यधन हैं। जिनके पास ये सात धन उपलब्ध हों उन्हें बुद्ध या प्रत्येक बुद्ध भी दरिद्र नहीं कह सकते।”
यह उत्तर सुन देवराज वहाँ से चला गया तथा शास्ता के पास जाकर बताया कि किस प्रकार उसने सुप्रबुद्ध की परीक्षा ली थी और किस प्रकार सुप्रबुद्ध परीक्षा में खरा उतरा। तब तथागत ने इन्द्र को समझाया कि सुप्रबुद्ध जैसे उपासक की त्रिरत्न में श्रद्धा को डिगाना असंभव है।
बाद में सुप्रबुद्ध भी शास्ता के पास पहुँचा और उसने अपनी सफलता की चर्चा की। वहाँ से जब वह लौट रहा था तो रास्ते में एक तरुण गौ ने उसे टक्कर मार दी और उसकी मृत्यु हो गई।
भिक्षुओं ने शास्ता से सुप्रबुद्ध के मृत्यु का कारण पूछा। बुद्ध ने बताया कि वह गौ वास्तव में एक यक्षिणी थी जो अनेक जन्मों से चार पुरुषों को, जिनमें सुप्रबुद्ध भी एक था, टक्कर मारकर मृत्यु के घाट पहुँचा दिया करती थी। वास्तव में एक पूर्व जन्म में वह यक्षिणी एक वैश्य थी और एक बार ये चार युवक उसके साथ मौज-मस्ती करने जंगल गए। दिन भर उसके साथ मौज-मस्ती किया और फिर संध्या होने पर सोचा कि क्यों न इस वैश्य के सारे आभूषण छीन लिए जाएँ तथा उसकी हत्या कर दी जाए। वैश्य को जब वे मार रहे थे तब उसने भी प्रण लिया कि मैं भी अनेक जन्मों तक यक्षिणी का रूप लेकर इनके मृत्यु का कारण बनकर इनसे बदला लेती रहूँगी।
उसके अगले जन्म के विषय में पूछे जाने पर बुद्ध ने बताया कि उसका अगला जन्म तावत्तिंस दिव्य लोक में हुआ है। वह किस कर्म के कारण कोढ़ी हुआ, इसका स्पष्टीकरण करते हुए बुद्ध ने बताया कि एक पूर्व जन्म में तगरसिखी प्रत्येक बुद्ध को देखकर उन पर थूकते हुए उसने कहा था,
“यह कौन कोढ़ी जा रहा है?”
अपने इसी कर्म के कारण वह नरक में पैदा हुआ और इस जन्म में कोढ़ी हुआ।
गाथा:
चरन्ति बाला दुम्मेधा, अमितेनेव अत्तना।
करोन्ता पापकं कम्मं, यं होति कटुकफलं॥ 66 ॥
अर्थ:
दुष्ट बुद्धि वाले व्यक्ति स्वयं ही अपने शत्रु हैं।
वे अपने ही शत्रु बनकर घूमते रहते हैं और पापमय कर्म करते रहते हैं।
उन पापमय कर्मों का कड़ुआ फल मिलना सुनिश्चित है।