Buddha The Super Scientist

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🌟 दुष्ट व्यक्ति अपना शत्रु स्वयं हैसुप्रबुद्ध कोढ़ी की कथास्थान : वेणुवन, राजगृहराजगृह में सुप्रबुद्ध नामक एक कोढ़ी रहता...
29/01/2026

🌟 दुष्ट व्यक्ति अपना शत्रु स्वयं है
सुप्रबुद्ध कोढ़ी की कथा

स्थान : वेणुवन, राजगृह

राजगृह में सुप्रबुद्ध नामक एक कोढ़ी रहता था। उदान ग्रंथ में उसकी कथा का विस्तृत ढंग से जिक्र आता है।

एक दिन सुप्रबुद्ध धर्म सभा में एक किनारे बैठा हुआ धर्म प्रवचन सुन श्रोतापन्न को प्राप्त हो गया। उसका मन पुलकित हो उठा और वह शास्ता को अपनी सफलता के विषय में बताने के लिए चल पड़ा। देवराज इन्द्र ने इसे देखा तो सोचा कि सुप्रबुद्ध की परीक्षा लेनी चाहिए। अतः वह सुप्रबुद्ध के सम्मुख प्रकट हुआ तथा उससे कहा,
“सुप्रबुद्ध! तुम बहुत ही गरीब हो। अतः दया के पात्र हो। तुम सिर्फ इतना कह दो कि तुम्हें तथागत के त्रिरत्न – बुद्ध, धर्म एवं संघ में कोई श्रद्धा नहीं है। मैं तुम्हें धन से मालामाल कर दूँ।”

सुप्रबुद्ध इस बात से खुश नहीं हुआ, वरन् नाराज होते हुए कहा,
“अरे मूर्ख! निर्लज्ज! तुमने सोचा कैसे कि मैं दरिद्र, कृपण एवं दयापात्र हूँ? मेरे पास जब त्रिरत्न का धन उपलब्ध है, तब मैं कृपण कैसे हुआ? मैं तो बहुत ही सुखपूर्वक जीवन जी रहा हूँ। मेरे पास प्रचुर मात्रा में धन है क्योंकि जिसके पास श्रद्धा, शील, ही, पापशोधिता, श्रुत, त्याग एवं प्रज्ञा का धन है वह दरिद्र कैसे हुआ? उसका जीवन तो पूर्णतः सफल जीवन है। मेरे पास ये सातों आर्यधन हैं। जिनके पास ये सात धन उपलब्ध हों उन्हें बुद्ध या प्रत्येक बुद्ध भी दरिद्र नहीं कह सकते।”

यह उत्तर सुन देवराज वहाँ से चला गया तथा शास्ता के पास जाकर बताया कि किस प्रकार उसने सुप्रबुद्ध की परीक्षा ली थी और किस प्रकार सुप्रबुद्ध परीक्षा में खरा उतरा। तब तथागत ने इन्द्र को समझाया कि सुप्रबुद्ध जैसे उपासक की त्रिरत्न में श्रद्धा को डिगाना असंभव है।

बाद में सुप्रबुद्ध भी शास्ता के पास पहुँचा और उसने अपनी सफलता की चर्चा की। वहाँ से जब वह लौट रहा था तो रास्ते में एक तरुण गौ ने उसे टक्कर मार दी और उसकी मृत्यु हो गई।

भिक्षुओं ने शास्ता से सुप्रबुद्ध के मृत्यु का कारण पूछा। बुद्ध ने बताया कि वह गौ वास्तव में एक यक्षिणी थी जो अनेक जन्मों से चार पुरुषों को, जिनमें सुप्रबुद्ध भी एक था, टक्कर मारकर मृत्यु के घाट पहुँचा दिया करती थी। वास्तव में एक पूर्व जन्म में वह यक्षिणी एक वैश्य थी और एक बार ये चार युवक उसके साथ मौज-मस्ती करने जंगल गए। दिन भर उसके साथ मौज-मस्ती किया और फिर संध्या होने पर सोचा कि क्यों न इस वैश्य के सारे आभूषण छीन लिए जाएँ तथा उसकी हत्या कर दी जाए। वैश्य को जब वे मार रहे थे तब उसने भी प्रण लिया कि मैं भी अनेक जन्मों तक यक्षिणी का रूप लेकर इनके मृत्यु का कारण बनकर इनसे बदला लेती रहूँगी।

उसके अगले जन्म के विषय में पूछे जाने पर बुद्ध ने बताया कि उसका अगला जन्म तावत्तिंस दिव्य लोक में हुआ है। वह किस कर्म के कारण कोढ़ी हुआ, इसका स्पष्टीकरण करते हुए बुद्ध ने बताया कि एक पूर्व जन्म में तगरसिखी प्रत्येक बुद्ध को देखकर उन पर थूकते हुए उसने कहा था,
“यह कौन कोढ़ी जा रहा है?”
अपने इसी कर्म के कारण वह नरक में पैदा हुआ और इस जन्म में कोढ़ी हुआ।

गाथा:
चरन्ति बाला दुम्मेधा, अमितेनेव अत्तना।
करोन्ता पापकं कम्मं, यं होति कटुकफलं॥ 66 ॥
अर्थ:
दुष्ट बुद्धि वाले व्यक्ति स्वयं ही अपने शत्रु हैं।
वे अपने ही शत्रु बनकर घूमते रहते हैं और पापमय कर्म करते रहते हैं।
उन पापमय कर्मों का कड़ुआ फल मिलना सुनिश्चित है।

🌟 ज्ञानी धर्म का सार तुरंत समझ जाता हैभद्रवर्गीय भिक्षुओं की कथास्थान : जेतवन, श्रावस्तीयह गाथा तथागत ने जेतवन प्रवास का...
28/01/2026

🌟 ज्ञानी धर्म का सार तुरंत समझ जाता है
भद्रवर्गीय भिक्षुओं की कथा

स्थान : जेतवन, श्रावस्ती

यह गाथा तथागत ने जेतवन प्रवास काल में तीस पावावासी भिक्षुओं के संदर्भ में कही थी। किसी समय पच्चिका देश के कुछ नवयुवक जंगल में मौज-मस्ती के लिए निकले। उनके साथ एक वेश्या भी थी। जब वे मौज-मस्ती में खोये हुए थे तब वह वेश्या उनके बहुमूल्य आभूषण आदि कीमती चीजें लेकर भाग गई। जब वे नौजवान होश में आये तो हक्के-बक्के रह गये। वे वेश्या को इधर-उधर बेचैन होकर खोजने लगे। उन्हें वेश्या तो मिली नहीं पर मार्ग में उनका बुद्ध से साक्षात्कार हो गया। उन्होंने बुद्ध से पूछा कि क्या आपने फलों-फलों औरत को देखा है जिसे हम लोग ढूँढ़ रहे हैं। वह उनके आभूषण लेकर भाग गई है।

तथागत ने उनसे उल्टा प्रश्न किया,
“तुम किसे ढूँढ़ रहे हो? क्या अधिक हितकर है – अपने आप को ढूँढ़ना या किसी पराई स्त्री को ढूँढ़ना?”

उन्होंने सोच-समझकर उत्तर दिया,
“अच्छा तो यही होगा कि हम दूसरों को ढूँढ़ने की बजाय स्वयं अपने-आप को ढूँढ़ें।”

शास्ता ने तब उन्हें पास बुलाकर धर्म की बात बताई। ध्यानपूर्वक धर्म की बात सुनकर उनकी आँखों के ऊपर पड़ा पर्दा उठ गया। उनके अन्तःनेत्र खुल गये। वे सभी स्रोतापन्न हो गये।

आगे चलकर शास्ता कभी जेतवन विहार में जीवन के आवागमन की अनन्त शृंखला पर प्रवचन दे रहे थे। अनात्मग (अनादि) सूत्र की धर्मदेशना सुनकर वे सभी उपासक अर्हत प्राप्त कर गए। मात्र एक धर्मदेशना श्रवण के प्रभाव से अर्हत्व प्राप्ति पर भिक्षुओं को घोर आश्चर्य हुआ। उन्होंने यह प्रश्न धर्म सभा में चर्चा के लिए उठाया,
“अरे! कितने आश्चर्य की बात है कि इन भिक्षुओं ने एक ही बैठक में तत्काल अर्हत्व प्राप्त कर लिया।”

शास्ता ने इस प्रश्न को सुना और फिर गहराई में जाकर समझाया कि इन तीस परस्पर मित्र भिक्षुओं ने, तुण्डिलजातक के अनुसार महातुण्डिल से धर्मदेशना सुनकर तुरंत धर्मज्ञान से पंचशील अपना लिया था। इसलिए कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि आज जब अवसर मिला तो उन्होंने तत्काल ही अर्हत्व प्राप्त कर लिया।

गाथा :
मुहुत्तमपि चे विञ्ञू, पण्डितं परिसुपासति।
खिप्पं धम्मं विजानाति, जिव्हा सूपरसें यथा ॥165॥
अर्थ :
यदि समझदार व्यक्ति किसी पंडित के साथ क्षण भर भी रहे तो वह ज्ञान को तत्काल उसी प्रकार जान जाता है जैसे जिव्हा सूप के स्वाद को तुरंत जान जाती है।

🌟 सत्पुरुषों के साथ से लाभ उठाने के लिए परिश्रम करना पड़ेगाथेर उदायी की कथास्थान : जेतवन, श्रावस्तीयह गाथा तथागत ने जेतव...
27/01/2026

🌟 सत्पुरुषों के साथ से लाभ उठाने के लिए परिश्रम करना पड़ेगा
थेर उदायी की कथा

स्थान : जेतवन, श्रावस्ती

यह गाथा तथागत ने जेतवन प्रवास काल में थेर उदायी के संदर्भ में कही थी।

उदायी स्थविर धर्मसभा की समाप्ति पर, महास्थविरों के चले जाने के बाद धर्मसभा में जाकर धर्मासन पर बैठ जाता था। आगन्तुक भिक्षुओं ने उसे कई बार ऐसा करते देखा। उसे देखकर उन्होंने सोचा, “यह स्थविर यहाँ विहार में अनेक वर्षों से रहता है, विचरता है और शास्त्रों के संग समय बिताता है, यह निश्चय ही कोई बहुत बड़ा ज्ञानी होगा।” अतः उन्होंने अपनी शंका समाधान हेतु उससे स्कन्ध आदि से संबंधित कुछ प्रश्न पूछ दिए। उदायी को तो कुछ आता था नहीं, तो फिर वह बेचारा उत्तर क्या देता ? वह धर्म से सम्बन्धित विषय स्कन्ध और आयतन आदि पर कोई प्रकाश नहीं डाल पाया। आगन्तुक भिक्षुओं को बहुत आश्चर्य हुआ कि ऐसा कैसे हो सकता है कि एक ही विहार में तथागत के साथ अनेक वर्षों से साथ रहते हुए भी उदायी धर्म का क, ख, ग भी नहीं जान पाया। वे अपनी उत्सुकता रोक न सके। वे शास्ता के पास गए और पूरी बात बताई। तब शास्ता ने यह गाथा कही।

टिप्पणी:
बुद्ध ने यहाँ सूप और चमच का उदाहरण दिया है जो बड़ा ही सटीक है।

दूसरा उदाहरण है चंदन के वृक्ष से लिपटे हुए साँप का। साँप सदैव चंदन के वृक्ष से लिपटा रहता है। चंदन में सुगंध होता है पर वर्षों तक लिपटे रहने के बाद भी साँप अपना विष संजोकर रखने का स्वभाव नहीं त्यागता है।

गाथा:
यावजीवं पि चे बालो, पण्डितं परिसुपासति।
न सो धम्मं विजानाति, दबी सूपस्स यथा॥ 164 ॥
अर्थ:
मूर्ख जीवन पर्यन्त भी अगर पण्डित पुरुष के
साथ रहे तो भी वह धर्म के विषय में कुछ भी
नहीं जान पायेगा जैसे सूप के अंदर पड़ा हुआ
चमच सूप के स्वाद को जरा भी नहीं जान
पाता।

🌟 वस्तुतः मूर्ख कौन है ?दो जेबकतरों की कथास्थान : जेतवन, श्रावस्तीयह धर्मगाथा शास्ता ने जेतवन में दो गिरहकटों के संदर्भ ...
26/01/2026

🌟 वस्तुतः मूर्ख कौन है ?
दो जेबकतरों की कथा

स्थान : जेतवन, श्रावस्ती

यह धर्मगाथा शास्ता ने जेतवन में दो गिरहकटों के संदर्भ में कही थी।
एक बार दो मित्र जेतवन में धर्मप्रवचन सुनने सामान्य नागरिकों के समूह में बैठ गए।
उनमें से एक ने बहुत ही ध्यान से धर्म-श्रवण किया और स्रोतापन्न हो गया।

दूसरा किसी को खोजने में ही व्यस्त रहा जिसकी जेब काट सके।
उसने किसी के वस्त्र से पाँच माषा सोना काट लिया।
उसे बेचकर उसने अपने घर में उस दिन अच्छे-अच्छे पकवान बनाए।

धर्मश्रोता के घर में पैसे की कमी थी।
अतः उसके घर में साधारण भोजन भी नहीं बन पाया।
चोर अपनी कमाई पर बहुत प्रसन्न था तथा उसने अपने धर्मश्रोता मित्र को,
उसकी पत्नी के सम्मुख लज्जित करते हुए कहा,
“तू तो अपने को बहुत बड़ा विद्वान समझता है।
पर कहाँ गई तुम्हारी विद्या ?
तुम तो अपने लिए भोजन का भी प्रबंध नहीं कर पाए।”
दूसरे मित्र ने उसकी बातें ध्यानपूर्वक सुनी तथा मन ही मन सोचा कि
मेरा मित्र निश्चित ही मूर्खतावश इस प्रकार की बातें कर रहा है।
उसने काम तो गलत किया है
पर बातें ऐसी कर रहा है जैसे उसने कोई सत्कर्म किया हो।
धर्मश्रोता बाद में बौद्ध विहार गया और शास्ता को पूरी कहानी सुनाई।
बुद्ध ने शिष्यों को समझाया कि
इंसान जैसा है, उसे स्वयं को वैसा ही स्वीकार करना चाहिए।
यही सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता है।

टिप्पणी :

बाजार में तरह-तरह के दर्पण बिकते हैं।
सामान्य सतह वाला दर्पण वह है जिसमें तस्वीर हू-ब-हू
ज्यों-की-त्यों दिखाई देती है।
दूसरे दर्पणों में आकृति विकृत दिखाई देती है।
मनुष्य जैसा है, वैसा देख नहीं पाता।
जीवन के दर्पण में, हम जैसे हैं,
अगर ठीक उसी प्रकार अपने को देखते हैं, तब तो ठीक है।
लेकिन अगर हम जैसे नहीं हैं,
अपने आप को वैसा मानकर चलते हैं
तो फिर जीवन में समस्या उठ खड़ी होती है।

जैसे बेईमान व्यक्ति अगर स्वीकार कर ले कि वह बेईमान है
तो फिर संभावना है कि वह बेईमानी से अपने को मुक्त कर ले
पर अगर बेईमान होकर वह ईमानदार होने का स्वांग भरता है
तो फिर भगवान ही उसका मालिक है।

गाथा :
यो बालो मञ्ञति बाल्यं, पण्डितो वापि तेन सो।
बालो च पण्डितमानी, स वे बालो ति उच्यति।। 63 ।।
अर्थ :
अगर मूर्ख, मूर्ख होते हुए यह मानता है कि वह मूर्ख है
तो वह पण्डित के ही समान है।
इसके विपरीत जो है तो मूर्ख
पर समझता है अपने को विद्वान,
वह वास्तव में मूर्ख है।

🌟 मूर्ख का साथ छोड़ देंमहाकस्सप थेर की कथास्थान : वेणुवन, राजगृहएक समय महाकस्सप थेर पिप्पलीगुहा में रह रहे थे। उनके दो श...
25/01/2026

🌟 मूर्ख का साथ छोड़ दें
महाकस्सप थेर की कथा

स्थान : वेणुवन, राजगृह

एक समय महाकस्सप थेर पिप्पलीगुहा में रह रहे थे। उनके दो शिष्य उनकी सेवा किया करते थे। महाकस्सप थेर बहुत ही पहुँचे हुए ज्ञानी भिक्षु थे।

उनके शिष्यों में एक गुरु की पूरी तन्मयता से सेवा करता था। दूसरा आलसी था, वह स्वयं सेवा क्या करे, आज्ञाकारी शिष्य द्वारा किए गए कार्य को ही अपना कार्य कह दिया करता था। जैसे, अगर पहला शिष्य थेर के मुँह धोने के लिए दन्तधावन, पानी आदि रख देता था तो दूसरा शिष्य स्थविर के पास जाकर कहता कि दन्तधावन आदि रख दिए गए हैं, चलकर दाँत साफ कर लीजिए। आज्ञाकारी शिष्य को जब यह पता चला तो उसे अच्छा नहीं लगा। उसने कुछ ऐसा किया कि स्थविर को पता चल गया कि दूसरा शिष्य आलसी था। इससे आलसी भिक्षु नाराज हो गया। महाकस्सप ने उस कर्तव्यविहीन भिक्षु को भिक्षुओं के आचरण के विषय में समझाने की चेष्टा की तो वह जल भुन उठा। उसके अन्दर प्रतिशोध की ज्वाला धधकने लगी।

आलसी भिक्षु एक दिन भिक्षाटन हेतु गाँव में गया। उसने वहाँ उपासकों को बताया कि महाकस्सप बीमार हैं और ऐसा कहकर उसने उनसे स्वादिष्ट भोजन ले लिया और स्वयं ही मार्ग में खा गया। महाकस्सप ने उसको डाँटकर समझाने की कोशिश की पर वह पुनः नाराज हो गया।

दूसरे दिन महाकस्सप आज्ञाकारी शिष्य के साथ भिक्षाटन के लिए निकले। उधर दूसरा शिष्य क्रोध से पागल हो रहा था। उसने आव देखा, न ताव। विहार की वस्तुओं को इधर-उधर फेंक दिया और विहार में आग लगा दिया।

शास्ता को उक्त घटना की जानकारी मिली। उन्होंने भिक्षुओं को समझाया कि महाकस्सप को ऐसे मूर्ख का साथ छोड़ देना चाहिए। उन्होंने कपि जातक की कथा सुनाई कि यह दुष्ट भिक्षु पूर्व जन्म में भी इस प्रकार के कर्म किया करता था। एक पूर्व जन्म में यह दुष्ट भिक्षु एक बन्दर था तथा महाकस्सप एक पक्षी थे। उस समय भी चिड़िया से उपदेश सुनकर वानर रूप में वह क्रुद्ध हुआ था तथा उसने चिड़िया का घोंसला उजाड़ दिया था और भाग गया था। ऐसे दुष्ट व्यक्ति का संग त्याग देना चाहिए।
तब उन्होंने उक्त गाथा कही।

टिप्पणी:
अगर गलती से मूर्ख से मित्रता हो भी जाए तो उस परिस्थिति में यथाशीघ्र, अति सावधानी से उसके संग से निकल आना चाहिए क्योंकि मूर्ख की मित्रता महँगी और कष्टदायी होती है, उससे बैर भी महँगा पड़ता है।

उदाहरण के लिए कुत्ते से न तो बैर अच्छा है और न प्रीति। कहा गया है —
“काटे, चाटे स्वान को, दोनों भाँति विपरीत”
अर्थात कुत्ते से मित्रता भली नहीं है, क्योंकि तब वह हमें चाटने लगेगा। उससे बैर भी उचित नहीं है क्योंकि तब वह हमें काट लेगा।

गाथा:
चरं चे नाधिगच्छेय्य, सेय्यं सदिसमत्तनो ।
एकचरियं दळ्हं करिया, नत्थि बाले सहायत ॥61॥
अर्थ:
अगर सम्मार्ग पर चलते समय मनुष्य को अपने
समान या अपने से श्रेष्ठ सहयात्री न मिले तो
उसे दृढ़ता के साथ अकेला ही चलना चाहिए।
परन्तु किसी भी मूल्य पर उसे मूर्ख का साथ
नहीं पकड़ना चाहिए, मूर्ख से मित्रता नहीं
करनी चाहिए।

🌟 किसकी यात्रा लंबी हो जाती है ?दरिद्र दुग्गत की कथास्थान : जेतवन, श्रावस्तीएक दिन राजा प्रसेनजित नगर भ्रमण कर रहे थे तब...
24/01/2026

🌟 किसकी यात्रा लंबी हो जाती है ?
दरिद्र दुग्गत की कथा

स्थान : जेतवन, श्रावस्ती

एक दिन राजा प्रसेनजित नगर भ्रमण कर रहे थे तब उनकी दृष्टि एक अति सुन्दर स्त्री पर पड़ी। उनके हृदय में काम-वासना का तूफान उठ खड़ा हुआ। उन्होंने पता लगाया तो पता चला कि वह एक गरीब व्यक्ति दुग्गत की पत्नी थी। राजा उस स्त्री को किसी भी प्रकार प्राप्त करने के लिए पागल हो रहा था।

अतः उसने दुग्गत को बुलाकर उसके नहीं चाहने पर भी उसे जबरदस्ती अपने यहाँ नौकरी पर रख लिया। पर वह दुग्गत के काम में कोई ऐसा दोष नहीं ढूँढ पाया जिसके आधार पर उसे मृत्यु दंड देकर उस स्त्री को हथिया सके।

एक दिन राजा ने सोचा कि इसे कोई ऐसा कार्य दिया जाए जो संपादित नहीं हो पाएगा। उसका अभिप्राय मात्र इतना था कि इस बहाने वह दुग्गत को प्राण दंड दे देगा और उसकी पत्नी को अपना लेगा। उसने संध्या बेला में स्नान से पूर्व ही कुमुद कमल के फूल और अरुणावती लाने का आदेश दिया। अगर वह शाम के स्नान से पूर्व ये फूल लेकर नहीं आयेगा तो फिर उसे मृत्यु-दंड मिलेगा।

दुग्गत राह में खाने के लिए थोड़ा-सा भोजन पोटली में बाँधकर कुमुद कमल के फूल और अरुणावती लाने के लिए चल पड़ा। रास्ते में उसने भोजन के थोड़े से अंश को एक राहगीर को खिलाया और बचे हुए चावल के कुछ दाने नदी में फेंक दिया। फिर वह जोर से बोल उठा, “हे नदी के रखवालो! आप देखो कि किस प्रकार राजा प्रसेनजित मुझे असंभव कार्य सौंपकर मार डालना चाहता है। उसने मुझे ऐसे फूल लाने का आदेश दिया है जिसे शाम तक लाना असंभव है। मैंने भूखे राहगीर को भोजन कराया है तथा मछलियों और जीव-जंतुओं के खाने के लिए चावल के दाने दिए हैं। अतः आप कृपा करके मेरे लिए कुमुद कमल का फूल और अरुणावती मंगाने की व्यवस्था कर दीजिए।”

यक्षों के राजा के राजा ने उसकी प्रार्थना सुनी तो उसे दुग्गत पर दया आ गई। उसने दुग्गत को कुमुद कमल का फूल और अरुणावती लाकर दे दिया।

उधर राजा प्रसेनजित अपना धैर्य खोता जा रहा था। उसने संध्या होने से पूर्व ही नगर-द्वार बंद करा दिया ताकि दुग्गत नगर में प्रवेश न कर पाए। दुग्गत जब लौटा तब द्वार बंद था। उसने द्वारपाल से द्वार खोलने का आग्रह किया पर उसे द्वारपाल ने बताया कि दरवाजे की चाबी राजा के पास है।
अतः उसने अरुणावती को महल की दीवार पर रख दिया और कुमुद कमल के फूल को जमीन में गाड़ दिया और जोर से बोला, “हे नगर वासियों! तुम मेरे साक्षी बनो। मैंने राजा द्वारा दिए गए असंभव कार्य को कर दिखाया है पर राजा मुझे जान से मार देना चाहता है।” ऐसा कहकर वह जेतवन विहार की ओर चला गया और संपूर्ण रात भिक्षुओं के पास भयभीत होकर सोता रहा।

उधर राजा प्रसेनजित की हालत बहुत खराब थी। उसे पूरी रात बुरे-बुरे सपने आते रहे, भयानक आवाजें आती रहीं। अगले दिन उसने अपने दुर्दश स्वप्नों का जिक्र रानी मल्लिका से किया और उसकी सलाह पर बुद्ध के पास गया। वहाँ पहुँच कर राजा ने शास्ता को प्रणाम किया और उन्हें बताया, “कल की रात इतनी लंबी थी मानो समाप्त ही नहीं हो रही थी।” तभी दुग्गत ने स्वर मिलाते हुए कहा, “भंते! मुझे भी कल एक योजन की यात्रा बहुत लंबी लग रही थी।”

बुद्ध ने दोनों की मनोदशा देखी तथा उन्हें समझाते हुए कहा, “रात्रि के स्वप्न में वे भयानक आवाजें उन चार लोगों की थीं जिन्होंने ‘कस्सप बुद्ध’ के समय पराई स्त्रियों के साथ संबंध रखा था। पराई स्त्रियों के साथ गमन करने के कारण वे अब तक नरक में लोहे कुंड में सजा भुगत रहे हैं।”

राजा सब कुछ समझ गया, उसे अपनी गलती का एहसास हो गया।
तब शास्ता ने धर्म प्रवचन करते हुए यह गाथा कही।

गाथा :
दीघा जागरतो रत्ति, दीघं सन्तस्स योजनं ।
दीघो बालानं संसारो, सद्धम्मं अविजानतं ॥60॥
अर्थ :
जागने वाले के लिए रात एक न कटने वाली
रात हो जाती है। थके हुए आदमी के लिए
एक योजन का मार्ग भी बहुत लम्बा हो जाता
है। उसी प्रकार सद्धर्म न जानने वालों के
लिए संसार का चक्र लम्बा हो जाता है।

🌟 किस बात की आसक्ति ?आनन्द श्रेष्ठी की कथास्थान : जेतवन, श्रावस्तीश्रावस्ती में एक करोड़पति सेठ रहता था। उसका नाम आनन्द ...
23/01/2026

🌟 किस बात की आसक्ति ?
आनन्द श्रेष्ठी की कथा

स्थान : जेतवन, श्रावस्ती

श्रावस्ती में एक करोड़पति सेठ रहता था। उसका नाम आनन्द श्रेष्ठी था। वह स्वयं तो बहुत बड़ा कंजूस था ही, अपने पुत्र मूलसिरि को भी शिक्षा दिया करता था कि दान-दक्षिणा कदापि नहीं देनी चाहिए। उससे धन नष्ट हो जाता है। वह पुत्र को सलाह देता, “धन का स्वाभाविक नाश हो जाता है। अतः इस पर ध्यान रखना चाहिए। खुशामदी लोग दीमक की तरह धन को खा जाते हैं। अतः उनसे बचकर रहना चाहिए। घर में शराबी लोगों के एकत्र होने पर सतर्क हो जाना चाहिए और इस प्रकार धन का संचय करते हुए घर चलाना चाहिए।” आनन्द श्रेष्ठी ने पाँच बड़े-बड़े घड़ों में चालीस करोड़ मूल्य की सोने की मुद्राएँ छिपा रखी थीं जिसकी जानकारी उसके पुत्र को भी नहीं थी।

मृत्यु पर किसका वश चलता है? बिना बुलाए, बिना बताए, अनचाहे मेहमान की तरह कभी भी आ धमकती है। आनन्द श्रेष्ठी के साथ भी यही हुआ। एक दिन मृत्यु आई और वह दुनिया से चल बसा। पर मरते समय भी उसकी अपने धन में आसक्ति बनी रही।

श्रेष्ठी जीवन पर्यन्त कंजूस था। उसने कभी भी भलाई का काम नहीं किया था। कर्म के देवता के लेखा-जोखा में कोई गलती नहीं होती। उसका जन्म श्रावस्ती के पास ही भिखारियों के एक गाँव में हुआ। जैसे ही वह अपनी माँ की कोख में प्रविष्ट हुआ, भिखारियों के जैसे बुरे दिन आ गए। उनकी आमदनी घट गई, लोगों ने भिक्षा देना कम कर दिया। अतः उन्होंने आपस में विचार-विमर्श कर पता कर लिया कि महिला के गर्भधारण के बाद से ही उनके बुरे दिन आ गए हैं। अतः उन्होंने उस स्त्री को गाँव से बाहर निकाल दिया।

पुत्र-जन्म हुआ। वह बहुत ही कुरूप और भयावह था। बड़ा हुआ। एक दिन वह जब मूलसिरि के घर के सामने से गुजर रहा था तो उसे देखकर घर के बच्चे जोर-जोर से रोने लगे। मूलसिरि ने अपने लोगों से भिखारी को पिटवा दिया।

बुद्ध आनन्द के साथ वहाँ से गुजर रहे थे। उन्होंने इस घटना को देखा और आनन्द से कहकर मूलसिरि को बुलवा लिया। उन्होंने उसे बताया कि वह भिखारी पूर्वजन्म में उसका पिता था। मूलसिरि को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ। तब उन्होंने जवान भिखारी को बुलाया और उससे पूछा, “बताओ कि पूर्व जन्म में जब तुम मूलसिरि के पिता थे तब तुमने धन कहाँ गाड़ रखा था?” जवान भिखारी ने स्थान बता दिया। जमीन खोदने पर वह धन मिल गया।

इस घटना के बाद मूलसिरि बुद्ध का भक्त बन गया। बुद्ध ने शिष्यों को समझाया कि हम सदैव गलतफहमी में रहते हैं कि हम सदा के लिए जीवित रहेंगे। अतः हमारी सांसारिक चीजों में आसक्ति हो जाती है जबकि सच्चाई यह है कि जीवन तो पानी के बुलबुले की तरह है। वह जल्दी ही फूट जाएगा।

गाथा:
पुत्रा मत्ति धनं मत्ति, इति बालो विहञ्ञति।
अत्ता हि अत्तनो नथि, कुतो पुत्रा कुतो धनं॥162॥
अर्थ:
‘यह पुत्र मेरा है’, ‘यह धन मेरा है’ – ऐसा
सोचकर मूर्ख व्यक्ति का जीवन दुखमय हो
जाता है। अरे! जब मनुष्य स्वयं अपने आप
का नहीं है तो कहाँ से उसका पुत्र और कहाँ
से उसका धन होगा?

🌟 पाप को भी पकने में समय लगेगाअहिप्रेत की कथास्थान : वेणुवन, राजगृहएक दिन थेर महामोग्गलान लक्ष्मण थेर के साथ राजगृह में ...
22/01/2026

🌟 पाप को भी पकने में समय लगेगा
अहिप्रेत की कथा

स्थान : वेणुवन, राजगृह

एक दिन थेर महामोग्गलान लक्ष्मण थेर के साथ राजगृह में भिक्षाचार्य कर रहे थे। चलते-चलते मोग्गलान मुस्कुरा दिए। लक्ष्मण थेर ने उनसे इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि विहार वापस पहुँचकर शास्ता के सामने बताएंगे।

भिक्षाटन समाप्त कर दोनों बौद्ध विहार पहुँचे। तब मोग्गलान ने बताया कि उन्होंने एक ऐसा प्रेत देखा था जिसका सिर मनुष्यों की तरह था पर शरीर सर्प का था। तब शाक्य मुनि ने बताया, “मैंने भी इस प्रेत को सम्बोधि प्राप्ति के दिन देखा था। लेकिन मैंने इसका उल्लेख किसी से नहीं किया कि कहीं लोग मेरी कही बात पर विश्वास नहीं करेंगे तो उनका अहित हो जाएगा। मेरे नहीं कहने के पीछे लोगों के प्रति मेरी कृपा छिपी हुई थी।”

भिक्षुओं ने जानना चाहा कि उसकी ऐसी गति क्यों हुई तो बुद्ध ने वर्णन किया:
प्राचीन काल में वाराणसी में नदी के किनारे किसी प्रत्येकबुद्ध की कुटिया बनी हुई थी। वे वहीं रहते थे और वहीं से नगर में भिक्षाटन हेतु जाते थे। नागरिक भी वहाँ आते थे और प्रत्येक बुद्ध की सेवा करते थे। उस आने-जाने वाली पगडंडी पर जमीन के मालिक ने जुताई कर दी। आने-जाने वाले लोग उस जमीन को रौंद देते थे। किसान उनको आने-जाने के लिए मना करता था पर उन्हें रोक नहीं पाता था। अंत में उसने सोचा, “अगर यहाँ पर यह पर्णकुटी न होती तो मेरा खेत बरबाद न होता।” ऐसा सोचकर उसने एक दिन उस झोपड़ी को जला डाला। प्रत्येक बुद्ध उस स्थान को छोड़ कहीं और चले गए।

जब जनता को पता चला कि प्रत्येक बुद्ध वह स्थान छोड़कर कहीं और चले गए हैं तब किसान वहीं खड़ा था। उसने कहा, “यह पर्णशाला मैंने जला डाली।” क्रुद्ध भीड़ ने कहा, “इस पापी के कारण अब हमें प्रत्येक बुद्ध के दर्शन नहीं हो पाएंगे।” ऐसा कहकर उमड़ी भीड़ ने उस किसान को पीट-पीटकर मार डाला। मरने के बाद वह नरक में गया और अपने प्रारब्ध के कारण गिद्धकूट पर्वत पर अहिप्रेत बनकर उत्पन्न हुआ।

गाथा :
न हि पापं कंतं कम्मं, सज्जु खीरं व मुच्चति।
डहन्तं बालमञ्चेति, भस्मच्छन्नो व पावको ॥71॥
अर्थ :
जैसे ताज़ा दूध तुरंत नहीं जम जाता है, उसी प्रकार कृत पाप कर्म शीघ्र अपना फल नहीं लाता है। राख से ढँकी आग की तरह जलाता हुआ वह मूर्ख का पीछा करता है।

🌟 मार किसे नहीं जान सकता?गोधिक थेर के परिनिर्वाण की कथास्थान : वेणुवन, राजगृहएक समय की बात है। मगध के इसिगिल पर्वत पर थे...
21/01/2026

🌟 मार किसे नहीं जान सकता?
गोधिक थेर के परिनिर्वाण की कथा

स्थान : वेणुवन, राजगृह

एक समय की बात है। मगध के इसिगिल पर्वत पर थेर गोधिक विपश्यना साधना कर रहे थे। वे साधना की एक सीढ़ी चढ़े और बीमार पड़ गए। पर उन्होंने अपनी साधना नहीं छोड़ी। उन्होंने कठोर परिश्रम जारी रखा और फिर बीमार पड़ गए। यह सिलसिला चलता रहा। जब भी वे साधना की अगली सीढ़ी तक पहुँचते, कमजोर होकर बीमार पड़ जाते। एक बार तो वे छः महीनों तक बीमार रहे। लेकिन वे भी दृढ़ निश्चयी थे।

उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी। उन्होंने निर्णय लिया कि इस बार कुछ भी हो जाए वे अपनी साधना पूरी करके ही रहेंगे, अरहंत प्राप्त करके ही छोड़ेंगे, भले ही इसके लिए उन्हें मृत्यु का ही वरण क्यों न करना पड़े। इसलिए बिना किसी विश्राम के वे अपनी साधना में लगे रहे। इतना करने पर भी वे समाधि के निकट नहीं पहुँच सके। अतः उन्होंने निर्णय लिया कि अपनी गर्दन काट लेंगे। उन्होंने ऐसा ही किया। लेकिन मृत्यु के समय उन्होंने अरहंत प्राप्त कर लिया। तथागत ने अपनी अन्तर्दृष्टि से यह सारा दृश्य देखा और भिक्षुओं के साथ इसिगिल पर्वत पर पहुँचे।

‘मार’ को भी इस घटना की जानकारी हुई। वह भी वहाँ जा पहुँचा जहाँ बुद्ध भिक्षुगण के साथ विराजमान थे। उसने बुद्ध से प्रश्न किया कि गोधिक थेर का पुनर्जन्म कहाँ हुआ है। तब शाक्य-मुनि ने कहा, “मार! गोधिक ने कहाँ पुनर्जन्म ग्रहण किया है यह जानकर तुम्हारा कोई लाभ नहीं होगा। तुम जानकर क्या करोगे? पूर्णतः आसवमुक्त गोधिक ने अरहंत प्राप्त कर लिया है। तुम अपनी पूरी शक्ति से भी पता नहीं लगा सकते कि ऐसे अरहंत मरणोपरांत कहाँ जाते हैं।”

वेणुवन में धर्म चर्चा करते समय बुद्ध ने बताया कि मार शीलवान, उद्यमी तथा उत्साही व्यक्तियों का पीछा नहीं कर सकता।

गाथा:
तेसं संपस्सीलानं, अप्पमादविहारिनं।
सम्मदञ्ञा विमुत्तानं, मारो मग्गं न विंदति॥57॥
अर्थ:
शीलवान, आलस्य से मुक्त, ज्ञान द्वारा मुक्त व्यक्तियों के मार्ग को ‘मार’ नहीं जान सकता।

⭐ बुद्ध श्रावक कैसे शोभता है ?गहदत्त की कथास्थान : जेतवन, श्रावस्तीश्रावस्ती में श्रीगुप्त तथा गहदत्त नाम के दो मित्र रह...
21/01/2026

⭐ बुद्ध श्रावक कैसे शोभता है ?
गहदत्त की कथा

स्थान : जेतवन, श्रावस्ती

श्रावस्ती में श्रीगुप्त तथा गहदत्त नाम के दो मित्र रहते थे। श्रीगुप्त शास्ता का शिष्य था और गहदत्त निर्ग्रन्थों (जैनों) का। गहदत्त को निर्ग्रन्थ साधु सदा समझाते, "अपने मित्र श्रीगुप्त से क्यों नहीं पूछते कि वह श्रमण गौतम के पास क्यों जाता है ? वहाँ उसे कुछ नहीं मिलेगा। अगर वह हमारे यहाँ आकर धर्म श्रवण करे तो उसका बहुत कल्याण होगा।" गहदत्त जब भी अपने मित्र श्रीगुप्त से मिलता तो यही प्रश्न किया करता।
श्रीगुप्त बहुत दिनों तक अपने मित्र की बात सुनता रहा और चुप रहा पर अन्त में उसने स्थिर होकर अपने मित्र से पूछा, "मित्र ! तुम सुबह-शाम यही प्रश्न करते हो कि मैं श्रमण गौतम के पास क्यों जाता हूँ और तुम्हारे गुरु का प्रवचन सुनने क्यों नहीं आता। लेकिन मुझे यह तो बताओ कि तुम्हारे गुरु क्या जानते हैं।" गहदत्त ने उत्तर दिया, "मित्र ! यह पूछो कि मेरे गुरु क्या नहीं जानते। मेरे गुरु के लिए अज्ञात नाम की कोई चीज नहीं है। वे भूत, वर्तमान एवं भविष्य सभी कुछ जानते हैं। उन्हें यह भी मालूम है कि 'यह होगा' और 'यह नहीं होगा'।"

"अगर ऐसी बात है तो तुमने आजतक अपने गुरुओं के विषय में क्यों नहीं बताया ? अब मैंने उनका महत्व समझ लिया है। कल ही मेरी ओर से उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित करो।" गहदत्त अपने गुरुओं के पास गया और सादर प्रणाम कर उन्हें बताया कि श्रीगुप्त ने उन सभी को अगले दिन भोजन के लिए आमंत्रित किया है। गुरुओं ने पूछा, "क्या उसने स्वयं कहा है ?"

"हाँ श्रीमान।" तब तो बहुत ही अच्छा हुआ। हम प्रसन्न और सन्तुष्ट हुए। हमारी चाह पूरी हो जाएगी। अगर वह हमारा शिष्य हो जाएगा तो फिर उसकी सारी सम्पत्ति हमारी हो जाएगी।

श्रीगुप्त का भवन बहुत विशाल था। उसने एक लम्बा और चौड़ा नाला खुदवाया और उसे कूड़े-कचड़े से भर दिया। उसके ऊपर सावधानी से चादर बिछा आसन लगा दिया। बड़े-बड़े बर्तनों को केले के पत्तों तथा चादर से ढक दिया। देखने से लगता था कि इन बर्तनों में चावल और कढ़ी रखी हुई है और उसे केले के पत्तों तथा चादर से ढक दिया गया था। निर्ग्रन्थ आए और जैसे ही वे सभी अपने-अपने आसन पर बैठने लगे, आसन खिसक गए और वे सभी उस खाई में गिर गए। श्रीगुप्त बोल उठा, "आप तो भूत, भविष्य और वर्तमान के ज्ञाता हो। आप तो दूसरों के विचारों को जानते, समझते हो। आपकी ऐसी दुर्गति कैसे हो गई ?" इस प्रकार निर्ग्रन्थों की पोल खुल गई।

गहदत्त इस घटना से बहुत ही क्रुद्ध हुआ। उसने श्रीगुप्त से बदला लेने का निश्चय किया। उसने भी बुद्ध और भिक्षुसंघ को आमंत्रण दिया। श्रीगुप्त ने इस बीच बुद्ध को पूरी घटना सुना दी और यह भी बता दिया कि संभव है गहदत्त ने बदला लेने की भावना से निमंत्रण दिया हो। शास्ता ने अपने अन्तर्ज्ञान से देखा कि ये दोनों मित्र स्रोतापन्न स्थिति प्राप्त करने के लिए परिपक्व हैं। अतः उन्होंने निमंत्रण स्वीकार कर लिया।

गहदत्त ने भी वही सब किया जिसे श्रीगुप्त ने किया था। उसने भी एक लम्बी और चौड़ी खाई खुदवाई और उसमें जलते अंगारे डलवा दिए तथा खाई पर चटाई बिछा दी और उसके ऊपर आसन लगवा दिया। बड़े-बड़े खाली कढ़ाहों को केले के पत्तों और कपड़ों से इस प्रकार ढक दिया ताकि आभास होने लगे कि ये चावल और कढ़ी से भरे हुए हैं। निमंत्रण के दिन शाक्य-मुनि अपने शिष्यों के साथ गहदत्त के घर पहुँचे। बुद्ध ने जब चटाई पर पैर रखा तो वह अपनी जगह पर ज्यों का त्यों रहा, नीचे की ओर न तो खिसका और न गिरा। वे चटाई पर कदम रखकर आगे की ओर बढ़ते चले गए और जलते अंगारे सुन्दर फूलों में बदलने लगे। चारों तरफ मनोहर और सुगन्धित फूल खिल उठे। उत्पन्न-स्थल का नजारा देखते ही बनता था। गहदत्त फटी-फटी आँखों के साथ देखता ही रह गया। उसने शास्ता को साष्टांग प्रणाम किया। भोजन में भी सभी चीजें पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो गई।

भोजन समाप्त हुआ। भोजनोपान्त शास्ता ने धर्म प्रवचन किया। उन्होंने समझाया, "लोग अज्ञानी होने के कारण मेरे शिष्यों के गुणों और उनकी शक्ति को नहीं जानते हैं। ऐसे ही अज्ञानी लोगों को इस संसार में 'अन्धा' कहा जाता है। इसके विपरीत प्रज्ञावान, ज्ञानी पुरुषों को दृष्टि वाला कहा जाता है।"

यह कहकर शास्ता ने ये दो गाथाएँ कहीं।

गाथा:
यथा संकारधानेसिं, उज्झितसिं महापथे।
पदुमं तत्र जायेत, सुचिगन्धं मनोरमं ॥58॥
अर्थ:
जैसे कूड़ा-कर्कट फेंके गए राजमार्ग पर सुगन्धित
तथा मनभावक कमल का फूल खिल उठे .......

गाथा:
एवं संकारभूतेसु, अन्धभूते पुथुज्जने।
अतिरोचति पज्ञाय, सम्मासम्बुद्धसावको ॥59॥
अर्थ:...... वैसे ही कूड़ा कर्कट के समान अन्धे अज्ञानी लोगों में
सम्मासम्बुद्ध का श्रावक अपनी प्रज्ञा से प्रकाशित होता है।

🌟 शीलवानों की सुगन्ध देवलोक तक जाती हैमहाकस्सप थेर के पिंडपात की कथास्थान : वेणुवन, राजगृहएक दिन थेर महाकस्सप निरोध समाध...
20/01/2026

🌟 शीलवानों की सुगन्ध देवलोक तक जाती है
महाकस्सप थेर के पिंडपात की कथा

स्थान : वेणुवन, राजगृह

एक दिन थेर महाकस्सप निरोध समाधि से उठे। उनके मन में आया कि आज किसी गरीब से भिक्षा ग्रहण करूंगा ताकि उसे इसका पुण्यफल मिल सके। उधर देवताओं के राजा इन्द्र को पता चल गया कि महाकस्सप भिक्षाटन करने जा रहे हैं। उसने भी महसूस किया कि बुद्ध काल में उसने अभी तक किसी भिक्षु को भिक्षादान नहीं किया है। अतः उसने सोचा कि वह स्थविर को भोजनदान देकर पुण्य कमाएगा। अतः शक्र और उसकी पत्नी सुजाता ने एक गरीब जुलाहे का रूप लिया और गरीबों के मुहल्ले में आकर रहने लगे।

महाकस्सप भिक्षाटन करते हुए शक्र की झोपड़ी के सामने पहुँचे। शक्र और सुजाता ने उन्हें सादर प्रणाम कर उनसे भिक्षापात्र ले लिया और चावल-कढ़ी आदि खाद्य सामग्री डालकर उन्हें दे दी। कढ़ी बहुत ही सुगंधित थी। खाद्य-पदार्थों की सुगन्ध पूरे राजगृह में फैल गई। महाकस्सप को लग गया कि यह दानकर्ता कोई साधारण व्यक्ति नहीं है। फिर उन्होंने अपनी अन्तर्दृष्टि से जान लिया कि यह देवताओं का राजा इन्द्र है। शक्र ने इस बात को स्वीकार किया कि वह देवताओं का राजा शक्र है। उसने यह भी स्पष्ट किया कि उसे आज तक सुअवसर नहीं मिला था कि वह बुद्ध-काल में किसी भिक्षु को भिक्षा दे सके। उसने कहा, “मैं दान करके पुण्य कमाना चाहता था, मेरी पुण्य कमाने की इच्छा थी। अतः मैंने ऐसा किया।” फिर महाकस्सप को अपनी पूरी श्रद्धा के साथ प्रणाम कर इन्द्र और सुजाता अन्तर्धान हो गए।

तथागत विहार में विराजमान थे। उन्होंने यह सब देखा और भिक्षुओं को इस बारे में बताया। भिक्षुगण को आश्चर्य हुआ कि इन्द्र को किस प्रकार पता चल गया कि महाकस्सप अभी-अभी निरोध समाधि से उठे हैं, भिक्षाटन करने जा रहे हैं और यही अवसर उसके लिए सर्वोत्तम है जब वह भिक्षादान दे सकता है। तब शाक्य-मुनि ने भिक्षुओं को सम्बोधित किया, “भिक्षुओ! इन्द्र ने मेरे पुत्र महाकस्सप के शील की गन्ध से जानकर भोजन-दान दिया है। तगर और चन्दन से आने वाली गन्ध थोड़ी होती है पर शीलवान पुरुषों के शील की गन्ध देवलोक में भी जाती है।”

तब उन्होंने यह गाथा कही।

गाथा :
अप्पमत्तो अयं गन्धो, खायं तगरचन्दनं।
यो च सीलवतं गन्धो, वाति देवेसु उत्तमो।।56।।
अर्थ :
तगर और चन्दन की गन्ध तो थोड़ी-सी ही फैलती है।
शीलवानों की सुगन्ध देवलोक तक फैल जाती है।

🌟 सद्पुरुष सभी दिशाओं में सुगन्ध फैलाता हैआनन्द थेर के प्रश्न की कथास्थान : जेतवन, श्रावस्तीएक बार आनन्द थेर श्रावस्ती म...
20/01/2026

🌟 सद्पुरुष सभी दिशाओं में सुगन्ध फैलाता है
आनन्द थेर के प्रश्न की कथा

स्थान : जेतवन, श्रावस्ती

एक बार आनन्द थेर श्रावस्ती में सायंकाल ध्यान विपश्यना कर रहे थे। उनका ध्यान फूलों की ओर गया। और वे सुगन्ध के विषय में चिन्तन करने लगे,
“इन फूलों की सुगन्ध कितनी अच्छी है? किन्तु ये उसी दिशा में जा रहे हैं जिस दिशा में हवा का रुख है। फूलों की सुगन्ध को तो चारों ओर फैलना चाहिए। ऐसा क्यों है कि उनकी सुगन्ध सभी दिशाओं में न फैलकर सिर्फ हवा की दिशा में ही फैल रही है।”
शास्त्र ने तीन प्रकार के उत्तम गन्ध की चर्चा की है :-
मूलगन्ध
सारगन्ध एवं
पुष्पगन्ध
“क्या कोई ऐसी सुगन्ध हो सकती है जो हवा के विपरीत दिशा में भी फैले?”
ऐसा सोचते हुए आनन्द शास्ता के पास गए, प्रणाम किया और उनसे अपने मन की बात कही –
“भन्ते! क्या कोई ऐसी सुगन्ध भी है जो अनुकूल–प्रतिकूल दोनों दिशाओं में जाती हो।”

शाक्य–मुनि–मुनि ने आनन्द को स्पष्ट करते हुए कहा,
“आनन्द! इन तीनों गन्धों से परे भी एक गन्ध है जिसे शीलगन्ध कहते हैं। जो व्यक्ति बुद्ध, धर्म एवं संघ के त्रिरत्न की शरण में जाता है और शिक्षा को जीवन में उतारता है, हिंसा (प्राणातिपात) से दूर रहता है, चोरी (अदत्तादान) नहीं करता, कामभोगों में गलत (व्यभिचार, मिथ्याचार) नहीं करता, असत्य भाषण (मृषावाद) नहीं बोलता, सुरा, मद्यपान एवं नशीली वस्तुओं का सेवन नहीं करता, शीलवान की तरह जीवन जीता है और जीवन में शुभ कर्म करने वाला
(कल्याणधर्मकर्ता) है, दुर्गुण एवं निम्न विचारों से मुक्त चित्त से गृहस्थ धर्म का पालन करता है, मुक्तहस्त दान देता है, सभी इन्द्रियों पर संयम रखता है, त्याग को जीवन में उचित महत्व देता है, योग में निष्ठावान होकर उसमें स्थित रहता है, वह व्यक्ति एक अच्छा मनुष्य बन जाता है।

निश्चय ही लोग ऐसे व्यक्ति की प्रशंसा करते हैं। ऐसे व्यक्ति की देवतागण भी सभी दिशाओं में प्रशंसा करते हैं। ऐसे व्यक्ति के गुणों की सुगन्ध चारों तरफ फैलती है, लोग उसका सम्मान करते हैं तथा सर्वत्र उसकी प्रशंसा करते हैं। निश्चय ही शीलगन्ध एक ऐसी गन्ध है जो हवा की दिशा में, हवा के विपरीत दिशा में और हवा की दिशा और विपरीत दोनों दिशाओं में चलती है। गुणों की सुगन्ध सभी दिशाओं में जाती है।
टिप्पणी :
त्रायस्त्रिंश दिव्य लोक में पारिजातक वृक्ष की लम्बाई–चौड़ाई सौ योजन मानी जाती है। उसके फूलों की सुन्दरता पचास योजन तक दिखती है और सुगन्ध सौ योजन तक। लेकिन वह हवा के अनुकूल ही जा सकती है, विपरीत दिशा में तो आठ अंगुल भी जाना सम्भव नहीं है। ऐसे सर्वश्रेष्ठ फूल की गन्ध का भी हवा के प्रतिकूल जाना सम्भव नहीं है। वृक्षों में श्रेष्ठ चन्दन की गन्ध, टागर की गन्ध तथा जूही (मल्लिका) के फूलों की गन्ध भी वायु के अनुकूल ही जा सकती है, प्रतिकूल नहीं।

परन्तु बुद्ध, प्रत्येक बुद्ध एवं बुद्ध श्रावकों के गुणगानों की प्रशंसा की गन्ध हवा के प्रतिकूल जाने में भी सक्षम है। ऐसा कैसे? क्योंकि अच्छा आदमी अपने शीलों की गन्ध सभी दिशाओं में फैलाता हुआ चलता है। इसलिए ऐसा नहीं कहा जा सकता कि ‘उसकी सुगन्ध हवा के विपरीत दिशा में नहीं जा सकती।’

इस प्रकार हम पाते हैं कि शीलवान व्यक्तियों की शीलगन्ध की कोई समानता नहीं कर सकता। यह अनूठी और अद्वितीय है। इसके समान कोई गन्ध है ही नहीं।

गाथा :
न पुष्पगन्धो पटिवातमेति, न चन्दनं तगरमल्लिका वा।
सतं च गन्धो पटिवातमेति, सब्बा दिसा सप्पुरिसो पवायति।।54।।
अर्थ :
फूलों, चन्दन, तगर या जूही किसी की भी गन्ध उल्टी हवा की दिशा में नहीं जाती किन्तु सज्जनों की सुगन्ध हवा की विपरीत दिशा में भी जाती है।
सद्पुरुष सभी दिशाओं में सुगन्ध फैलाता है।
गाथा :
चन्दनं तगरं वापि, उप्पलं अथ वस्सिकी।
एतेसं गन्धजातानं, सीलगन्धो अनुत्तरो।।55।।
अर्थ :
चन्दन या तगर, कमल या जूही – इन सभी गन्धों की तुलना में शील (सदाचार) की सुगन्ध श्रेष्ठ होती है।

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