29/03/2026
युद्ध ....
दुनिया मे हर कोई युद्ध मे है , कुछ अंदर से तो कुछ बाहर से लड़ रहे हैं । ज्यादातर का युद्ध खुद के सुधार को कम , दूसरों के सुधार को ज्यादा आतुर है ।
बचपन के युद्ध भी कितने मासूम और अपनी तरह की विराटता से सुसज्जित थे, लगता था हमसे बड़ा कोई योद्धा हो नही सकता , दुनिया को बस हम ही पलट सकते हैं । और वो दुनिया थी मोहल्ले य़ा स्कूल के 4 दोस्त । बचपन के कुछ ही युद्ध याद हैं , ज्यादातर लड़ाइयां तो जेहन मे दर्ज ही नही हैं अब ।
मेरे बचपन का एक दोस्त था सूर्य प्रताप सिंह ( सूर्या ) । जब मैं कक्षा चौथी ( सरस्वती शिशु मंदिर बैढ़न) मे था तब वो मेरे साथ आया , उसके पापा पुलिस मे थे । वो थोड़ा तेजतार्रर था ( एक तो पढ़ने मे होशियार और दूसरा पापा पुलिस मे)।
मै अपने कक्षा का मानीटर था और अपने को सबसे होशियार समझता था। वो , मै और मनीष शर्मा ( एक और दोस्त जो साडा कालोनी से आता था, आजकल दुबई मे है ) हम तीनों दोस्त पढ़ने मे लगभग एक जैसे थे , पर अव्वल रहने के लिये मै प्रतिबद्ध था अंदर से भी बाहर से भी ।
मनीष के पापा ( जो कि सीनेटरी इन्सपेक्टर थे) उसको स्कूटर से छोडने आते, मै पैदल आता और सूर्या भी अक्सर पैदल आता य़ा उसके पापा सायकिल से छोड देते। उसका घर थाने के पास था , जो की स्कूल के काफी नजदीक था , मै बिलौंजी मे रहता था करीब 2km दूर । रीवा से जाने मे पहले साडा कालोनी, फिर बिलौंजी, फिर थाना फिर स्कूल पड़ता था ।
छठवीं (6th class ) मे मेरे 92% आने पर मेरे पापा ने मुझे Avon की साइकिल दिला दी थी , अब मै और सूर्या उस सायकल से बैढ़न के आसपास के 30km के एरिया मे मौका मिलते ही देशाटन पर निकल पड़ते । हम दोनो और हमारा परिवार इतने घुलमिल गये की वो और मै दोनो मे से किसी भी घर मे रुक जाते, खाते पीते और पढते। मै अपने घर से उसके घर जाता और वहां से उसको आगे डंडे पर बैठाता( करियर मे बस्ता रहता ) फिर हम साथ मे स्कूल जाते ।
एक बार हम दोनो मे युद्ध हो गया , बात इतनी विशाल थी की ठीक से याद नही किस बात पर , पर युध तो हुआ। युद्ध हम दोनो के बीच था , तो इसमें घर को सामिल नही किया जा सकता था; झापड पड़ने का खतरा था , उसकी तो मम्मी भी कभी कभी पीट देती थी , मेरे घर मे ए खतरा सिर्फ पिता जी से था।
तो हुआ ए की सुबह जब स्कूल जाने की बारी आई तो मै अपने सबसे करीबी दुश्मन से कैसे बात करूँ और कैसे उसको मै अपनी प्यारी सायकल प़र बैठाऊ , अभी कल ही तो युद्ध हुआ है और उसने कोई युद्धविराम की भी घोषणा नही की है, पर अगर घर वालों को पता चला तो मुझे ही सरेंडर करना पडेगा ।
खैर, मै उसके घर के सामने सायकल खड़ी किया , वो बिना कुछ बोले चुपचाप डंडे पर आकर बैठ गया , हम दोनो स्कूल आ गये, डंडे से उतरते ही फिर दुश्मन। ए शीतयुद्ध कई दिनो तक चला। अब आप मेरी हालत सोच ही सकते हैं की एक कट्टर दुश्मन को अपनी सायकल (जो मुझे आज की fortuner से कहीं ज्यादा प्यारी थी) मे बैठाकर मेरी छाती मे कितना ही दर्द हुआ होगा ।
कुछ दिनो मे ही घर बालों को शक हुआ क्युकी आजकल एक दुसरे के घर जाना कम हुआ, ताकी घर वालों के सामने कहीं बात ना करनी पड़ जाय तो इसे समझौता और हार माना जा सकता है, साथ मे क्रिकेट नही , साथ मे घुमना नही । तो सूर्या की मम्मी ने मुझसे पूँछा - का बात है दादू ?
मैं- का बात है , कुछ नहीं, कोई बात नही !! ( मै थोड़ा असहज हुआ)
मम्मी- (उनको भी मै मम्मी ही कहता था ) ता बोलत चालत काहे नाई आय ?
मैं- .........मै तो बोल रहा हुं
मम्मी- ठीक है पापा से संझा बताईथे
मै - नही नही , पापा से बताने की कोई जरूरत ही नही है , कोई बात ही नही है , चलो सूर्या ( मन मारके ) ।
मम्मी- कुछ खाबे
मैं- नही
मम्मी- ऐतवार का घरे अउब , अम्मा का बताई देहा ।
मैं- जी
हम दोनो के प्राण सूख गये , रविवार डेड लाइन थी , किसी भी कीमत पर रविवार के पहले समझौते पर हस्ताक्षर जरूरी थे वरना मोहल्ले भर के सामने इज्ज़त का साम्राज्य ढहने का खतरा था ।
सूर्या - चलो यार आज स्कूल के बाद क्रिकेट खेलेंगे और आज सायकल मै चलाऊंगा।
मम्मी- आँखे उपर की , एक बार मेरी तरफ , एक बार सूर्या की तरफ देखा ,
युद्ध विराम !!
सूर्या आजकल रायपुर मे है , हम दोनो कभी कभी मिलते हैं , परिवार के साथ , प्रेम को आविरल धारा आज भी हमारी रगों मे बहती है ...
काश की सभी युद्धों का अंत ऐसा ही हो ...