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06/07/2021
श्री कृष्ण के बारे में कूछ रोचक जानकारीया🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔹🔸🔸🔹🔸🔸कृष्ण को पूर्णावतार कहा गया है। कृष्ण के जीवन में वह सबकुछ है जिसकी...
05/07/2021

श्री कृष्ण के बारे में कूछ रोचक जानकारीया
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कृष्ण को पूर्णावतार कहा गया है। कृष्ण के जीवन में वह सबकुछ है जिसकी मानव को आवश्यकता होती है। कृष्ण गुरु हैं, तो शिष्य भी। आदर्श पति हैं तो प्रेमी भी। आदर्श मित्र हैं, तो शत्रु भी। वे आदर्श पुत्र हैं, तो पिता भी। युद्ध में कुशल हैं तो बुद्ध भी। कृष्ण के जीवन में हर वह रंग है, जो धरती पर पाए जाते हैं इसीलिए तो उन्हें पूर्णावतार कहा गया है। मूढ़ हैं वे लोग, जो उन्हें छोड़कर अन्य को भजते हैं… ‘भज गोविन्दं मुढ़मते।

आठ का अंक
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कृष्ण के जीवन में आठ अंक का अजब संयोग है। उनका जन्म आठवें मनु के काल में अष्टमी के दिन वसुदेव के आठवें पुत्र के रूप में जन्म हुआ था। उनकी आठ सखियां, आठ पत्नियां, आठमित्र और आठ शत्रु थे। इस तरह उनके जीवन में आठ अंक का बहुत संयोग है।

कृष्ण के नाम
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नंदलाल, गोपाल, बांके बिहारी, कन्हैया, केशव, श्याम, रणछोड़दास, द्वारिकाधीश और वासुदेव। बाकी बाद में भक्तों ने रखे जैसे ‍मुरलीधर, माधव, गिरधारी, घनश्याम, माखनचोर, मुरारी, मनोहर, हरि, रासबिहारी आदि।

कृष्ण के माता-पिता
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कृष्ण की माता का नाम देवकी और पिता का नाम वसुदेव था। उनको जिन्होंने पाला था उनका नाम यशोदा और धर्मपिता का नाम नंद था। बलराम की माता रोहिणी ने भी उन्हें माता के समान दुलार दिया। रोहिणी वसुदेव की प‍त्नी थीं।

कृष्ण के गुरु
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गुरु संदीपनि ने कृष्ण को वेद शास्त्रों सहित 14 विद्या और 64 कलाओं का ज्ञान दिया था। गुरु घोरंगिरस ने सांगोपांग ब्रह्म ‍ज्ञान की शिक्षा दी थी। माना यह भी जाता है कि श्रीकृष्ण अपने चचेरे भाई और जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ के प्रवचन सुना करते थे।

कृष्ण के भाई
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कृष्ण के भाइयों में नेमिनाथ, बलराम और गद थे। शौरपुरी (मथुरा) के यादववंशी राजा अंधकवृष्णी के ज्येष्ठ पुत्र समुद्रविजय के पुत्र थे नेमिनाथ। अंधकवृष्णी के सबसे छोटे पुत्र वसुदेव से उत्पन्न हुए भगवान श्रीकृष्ण। इस प्रकार नेमिनाथ और श्रीकृष्ण दोनों चचेरे भाई थे। इसके बाद बलराम और गद भी कृष्ण के भाई थे।

कृष्ण की बहनें
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कृष्ण की 3 बहनें थी :

1. एकानंगा (यह यशोदा की पुत्री थीं)।

2. सुभद्रा : वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी से बलराम और सुभद्र का जन्म हुआ। वसुदेव देवकी के साथ जिस समय कारागृह में बंदी थे, उस समय ये नंद के यहां रहती थीं। सुभद्रा का विवाह कृष्ण ने अपनी बुआ कुंती के पुत्र अर्जुन से किया था। जबकि बलराम दुर्योधन से करना चाहते थे।

3. द्रौपदी : पांडवों की पत्नी द्रौपदी हालांकि कृष्ण की बहन नहीं थी, लेकिन श्रीकृष्‍ण इसे अपनी मानस ‍भगिनी मानते थे।

4.देवकी के गर्भ से सती ने महामाया के रूप में इनके घर जन्म लिया, जो कंस के पटकने पर हाथ से छूट गई थी। कहते हैं, विन्ध्याचल में इसी देवी का निवास है। यह भी कृष्ण की बहन थीं।

कृष्ण की पत्नियां
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रुक्मिणी, जाम्बवंती, सत्यभामा, मित्रवंदा, सत्या, लक्ष्मणा, भद्रा और कालिंदी।

कृष्ण के पुत्र
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रुक्मणी से प्रद्युम्न, चारुदेष्ण, जम्बवंती से साम्ब, मित्रवंदा से वृक, सत्या से वीर, सत्यभामा से भानु, लक्ष्मणा से…, भद्रा से… और कालिंदी से…।

कृष्ण की पुत्रियां
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रुक्मणी से कृष्ण की एक पुत्री थीं जिसका नाम चारू था।

कृष्ण के पौत्र
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प्रद्युम्न से अनिरुद्ध। अनिरुद्ध का विवाह वाणासुर की पुत्री उषा के साथ हुआ था।

कृष्ण की 8 सखियां
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राधा, ललिता आदि सहित कृष्ण की 8 सखियां थीं। सखियों के नाम निम्न हैं-

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार इनके नाम इस तरह हैं- चन्द्रावली, श्यामा, शैव्या, पद्या, राधा, ललिता, विशाखा तथा भद्रा।

कुछ जगह ये नाम इस प्रकार हैं- चित्रा, सुदेवी, ललिता, विशाखा, चम्पकलता, तुंगविद्या, इन्दुलेखा, रग्डदेवी और सुदेवी।
इसके अलावा भौमासुर से मुक्त कराई गई सभी महिलाएं कृष्ण की सखियां थीं। कुछ जगह पर- ललिता, विशाखा, चम्पकलता, चित्रादेवी, तुङ्गविद्या, इन्दुलेखा, रंगदेवी और कृत्रिमा (मनेली)। इनमें से कुछ नामों में अंतर है।

कृष्ण के 8 मित्र
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श्रीदामा, सुदामा, सुबल, स्तोक कृष्ण, अर्जुन, वृषबन्धु, मन:सौख्य, सुभग, बली और प्राणभानु।
इनमें से आठ उनके साथ मित्र थे। ये नाम आदिपुराण में मिलते हैं। हालांकि इसके अलावा भी कृष्ण के हजारों मित्र थे जिसनें दुर्योधन का नाम भी लिया जाता है।

कृष्ण के शत्रु
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कंस, जरासंध, शिशुपाल, कालयवन, पौंड्रक। कंस तो मामा था। कंस का श्वसुर जरासंध था। शिशुपाल कृष्ण की बुआ का लड़का था। कालयवन यवन जाति का मलेच्छ जा था जो जरासंध का मित्र था। पौंड्रक काशी नरेश था जो खुद को विष्णु का अवतार मानता था।

कृष्ण के शिष्य
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कृष्ण ने किया जिनका वध : ताड़का, पूतना, चाणूड़, शकटासुर, कालिया, धेनुक, प्रलंब, अरिष्टासुर, बकासुर, तृणावर्त अघासुर, मुष्टिक, यमलार्जुन, द्विविद, केशी, व्योमासुर, कंस, प्रौंड्रक और नरकासुर आदि।

कृष्ण चिन्ह
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सुदर्शन चक्र, मोर मुकुट, बंसी, पितांभर वस्त्र, पांचजन्य शंख, गाय, कमल का फूल और माखन मिश्री।

कृष्ण लोक
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वैकुंठ, गोलोक, विष्णु लोक।
कृष्ण ग्रंथ : महाभारत और गीता

कृष्ण का कुल
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यदुकुल। कृष्ण के समय उनके कुल के कुल 18 कुल थे। अर्थात उनके कुल की कुल 18 शाखाएं थीं। यह अंधक-वृष्णियों का कुल था। वृष्णि होने के कारण ये वैष्णव कहलाए। अन्धक, वृष्णि, कुकर, दाशार्ह भोजक आदि यादवों की समस्त शाखाएं मथुरा में कुकरपुरी (घाटी ककोरन) नामक स्थान में यमुना के तट पर मथुरा के उग्रसेन महाराज के संरक्षण में निवास करती थीं।

शाप के चलते सिर्फ यदु‍ओं का नाश होने के बाद अर्जुन द्वारा श्रीकृष्ण के पौत्र वज्रनाभ को द्वारिका से मथुरा लाकर उन्हें मथुरा जनपद का शासक बनाया गया। इसी समय परीक्षित भी हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठाए गए। वज्र के नाम पर बाद में यह संपूर्ण क्षेत्र ब्रज कहलाने लगा। जरासंध के वंशज सृतजय ने वज्रनाभ वंशज शतसेन से 2781 वि.पू. में मथुरा का राज्य छीन लिया था। बाद में मागधों के राजाओं की गद्दी प्रद्योत, शिशुनाग वंशधरों पर होती हुई नंद ओर मौर्यवंश पर आई। मथुराकेमथुर नंदगाव, वृंदावन, गोवर्धन, बरसाना, मधुवन और द्वारिका।

कृष्ण पर्व
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श्री कृष्ण ने ही होली और अन्नकूट महोत्सव की शुरुआत की थी। जन्माष्टमी के दिन उनका जन्मदिन मनाया जाता है।

मथुरा मंडल के ये 41 स्थान कृष्ण से जुड़े हैं
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मधुवन, तालवन, कुमुदवन, शांतनु कुण्ड, सतोहा, बहुलावन, राधा-कृष्ण कुण्ड, गोवर्धन, काम्यक वन, संच्दर सरोवर, जतीपुरा, डीग का लक्ष्मण मंदिर, साक्षी गोपाल मंदिर, जल महल, कमोद वन, चरन पहाड़ी कुण्ड, काम्यवन, बरसाना, नंदगांव, जावट, कोकिलावन, कोसी, शेरगढ, चीर घाट, नौहझील, श्री भद्रवन, भांडीरवन, बेलवन, राया वन, गोपाल कुण्ड, कबीर कुण्ड, भोयी कुण्ड, ग्राम पडरारी के वनखंडी में शिव मंदिर, दाऊजी, महावन, ब्रह्मांड घाट, चिंताहरण महादेव, गोकुल, संकेत तीर्थ, लोहवन और वृन्दावन। इसके बाद द्वारिका, तिरुपति बालाजी, श्रीनाथद्वारा और खाटू श्याम प्रमुख कृष्ण स्थान है।

भक्तिकाल के कृष्ण भक्त:
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सूरदास, ध्रुवदास, रसखान, व्यासजी, स्वामी हरिदास, मीराबाई, गदाधर भट्ट, हितहरिवंश, गोविन्दस्वामी, छीतस्वामी, चतुर्भुजदास, कुंभनदास, परमानंद, कृष्णदास, श्रीभट्ट, सूरदास मदनमोहन, नंददास, चैतन्य महाप्रभु आदि।

कृष्णा जिनका नाम है
गोकुल जिनका धाम है
ऐसे श्री कृष्ण को मेरा
बारम्बार प्रणाम है।

*जय श्रीराधे

समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों का रहस्य !यह वह समय था जबकि देवता लोग धरती पर रहते थे। धरती पर वे हिमालय के उत्तर में...
16/06/2021

समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों का रहस्य !

यह वह समय था जबकि देवता लोग धरती पर रहते थे। धरती पर वे हिमालय के उत्तर में रहते थे। काम था धरती का निर्माण करना। धरती को रहने लायक बनाना और धरती पर मानव सहित अन्य आबादी का विस्तार करना।

देवताओं के साथ उनके ही भाई बंधु दैत्य भी रहते थे। तब यह धरती एक द्वीप की ही थी अर्थात धरती का एक ही हिस्सा जल से बाहर निकला हुआ था। यह भी बहुत छोटा-सा हिस्सा था। इसके बीचोबीच था मेरू पर्वत।

धरती के विस्तार और इस पर विविध प्रकार के जीवन निर्माण के लिए देवताओं के भी देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने लीला रची और उन्होंने देव तथा उनके भाई असुरों की शक्ति का उपयोग कर समुद्र मंथन कराया। समुद्र मंथन कराने के लिए पहले कारण निर्मित किया गया।

दुर्वासा ऋषि ने अपना अपमान होने के कारण देवराज इन्द्र को ‘श्री’ (लक्ष्मी) से हीन हो जाने का शाप दे दिया। भगवान विष्णु ने इंद्र को शाप मुक्ति के लिए असुरों के साथ 'समुद्र मंथन' के लिए कहा और दैत्यों को अमृत का लालच दिया। इस तरह हुआ समुद्र मंथन। यह समुद्र था क्षीर सागर जिसे आज हिन्द महासागर कहते हैं। जब देवताओं तथा असुरों ने समुद्र मंथन आरंभ किया, तब भगवान विष्णु ने कच्छप बनकर मंथन में भाग लिया। वे समुद्र के बीचोबीच में वे स्थिर रहे और उनके ऊपर रखा गया मदरांचल पर्वत। फिर वासुकी नाग को रस्सी बानाकर एक ओर से देवता और दूसरी ओर से दैत्यों ने समुद्र का मंथन करना शुरू कर दिया।

1. हलाहल (विष) : समुद्र का मंथन करने पर सबसे पहले पहले जल का हलाहल (कालकूट) विष निकला जिसकी ज्वाला बहुत तीव्र थी। हलाहल विष की ज्वाला से सभी देवता तथा दैत्य जलने लगे। इस पर सभी ने मिलकर भगवान शंकर की प्रार्थना की।

शंकर ने उस विष को हथेली पर रखकर पी लिया, किंतु उसे कंठ से नीचे नहीं उतरने दिया तथा उस विष के प्रभाव से शिव का कंठ नीला पड़ गया इसीलिए महादेवजी को 'नीलकंठ' कहा जाने लगा। हथेली से पीते समय कुछ विष धरती पर गिर गया था जिसका अंश आज भी हम सांप, बिच्छू और जहरीले कीड़ों में देखते हैं।

2. कामधेनु : विष के बाद मथे जाते हुए समुद्र के चारों ओर बड़े जोर की आवाज उत्पन्न हुई। देव और असुरों ने जब सिर उठाकर देखा तो पता चला कि यह साक्षात सुरभि कामधेनु गाय थी। इस गाय को काले, श्वेत, पीले, हरे तथा लाल रंग की सैकड़ों गौएं घेरे हुई थीं।

गाय को हिन्

माया और योगमाया में क्या अंतर है ।सबसे पहले यह समझ लीजिए कि माया और योगमाया यह दोनों भगवान की शक्ति है। जैसा की हम जानते...
13/06/2021

माया और योगमाया में क्या अंतर है ।

सबसे पहले यह समझ लीजिए कि माया और योगमाया यह दोनों भगवान की शक्ति है। जैसा की हम जानते हैं कि शक्ति और शक्तिमान से पृथक नहीं हो सकती। उदाहरण से समझिए आग और आग में जलाने की शक्ति। आग में जलाने की शक्ति होती है। तो आग को अलग कर दो और जलाने की शक्ति बची रहे ऐसा तो हो नहीं सकता। इसी प्रकार माया और योग माया दोनों भगवान की शक्ति है।

योग माया शक्ति क्या है ।

योग माया भगवान की अंतरंग शक्ति है। यह भगवान की अपनी शक्ति है। भगवान के जितने भी कार्य होते हैं वह योग माया से होते हैं। जैसे भगवान जो भी लीला करते हैं वह योग माया के द्वारा करते हैं। भगवान जो कुछ भी सोचते हैं वह योग माया तुरंत उस चीज को कर देती है। जैसे कि आपने सुना होगा कि कृष्ण जब जन्म लिए तो द्वारपा सो गए, द्वार अपने आप खुल गए, यमुना ने मार्ग दे दिया, यह सब योग माया से होता है।

योग माया की पहचान ।

जब भी भगवान की कोई चीज या कार्य असंभव हो और वह संभव हो रही है। तो आप समझ लीजिये की यह योग माया के द्वारा हुआ है। जैसे वेदों ने कहा कि भगवान स्वतंत्र हैं वह किसी के अधीन नहीं है। और वह यशोदा मैया के डंडे से डर जाते हैं और उनमें रस्सी से बंध जाते हैं। तो यह सर्वज्ञ भगवान सब कुछ जानने वाला भगवान, सर्वशक्तिमान भगवान, सबको मुक्त करने वाला और मैया के यशोदा के रस्सी से बंध जाते है, और माँ से मुक्त करने की विनती करते है, और वो भी अभिनय में नहीं!

वास्तव में, जैसे हम लोग माँ से डरते है, ऐसे ही। यह योग माया के कारण होता है। तो भगवान के जो लीलाएं हैं वह योगमाया से होती हैं। या ऐसा कह दो कि भगवान जो कुछ भी करते हैं, वह सब योग माया के कार्य होते हैं। और केवल भगवान नहीं जितने संत महात्मा हैं, जो सिद्ध हो चुके हैं, जिन महात्माओं ने भगवान की प्राप्ति कर ली है। वह भी योग माया की शक्ति से कार्य करते हैं।

योगमाया कैसे कार्य करती है ।

योग माया की शक्ति कुछ ऐसी है कि कार्य माया के करते हैं, लेकिन उनको माया नहीं लगती। जैसे क्रोध करना यह माया का विकार है दोष है। लेकिन महापुरुष और भगवान भी क्रोध करते हैं, पर वह माया का क्रोध नहीं होता वह योगमाया का क्रोध होता है। देखने में लगता है कि भगवान क्रोध कर रहे हैं चेहरे पर गुस्सा है महापुरुष को क्रोध कर रहे हैं चेहरे पर गुस्सा है। लेकिन वो योग माया से क्रोध करते है और हम लोग कहते हैं कि यह संत भी माया के आधीन है। लेकिन वास्तविकता यह है कि वह योग माया से कार्य कर रहे हैं अर्थात् चेहरे पर क्रोध है लेकिन अंदर कुछ क्रोध नहीं है यह योग माया का विलक्षण बात है।

गोपियों को शंका - कृष्ण अखंड ब्रह्मचारी कैसे ।

आप इस लेख में पहले पढ़ लीजिए। जिसमें गोपियों को शंका होती है कि श्री कृष्ण अखंड ब्रह्मचारी कैसे हैं और दुर्वासा जी ने अपने जीवन में दूब के अलावा कोई स्वाद नहीं लिया है? तो इस प्रश्न का उत्तर श्री कृष्ण देते हैं कि "यह कार्य योग माया से होते हैं, योग माया से माया के कार्य किए जाते हैं।

लेकिन वह भगवान और महापुरुष माया से परे रहते हैं।" दुर्वासा जी अनेक प्रकार के व्यंजन खाया हैं, यह माया का कार्य है, सबको दिख रहा है। लेकिन योग माया के कारण उनको यह माया का सामान का स्वाद उन्हें अनुभव नहीं होता। यही कार्य अर्जुन ने किया था, वह सब को मार रहा है दुनिया देख रही है कि हाँ! अर्जुन ने सबको मारा है। लेकिन वास्तव में अर्जुन ने किसी को नहीं मारा है। यह है योग माया के विलक्षणता।

माया क्या है?

माया भगवान की बहिरंग शक्ति है। माया भी भगवान की ही शक्ति है। लेकिन यह माया जो भगवान से विमुख जीव है या जो जीव भगवान को अपना नहीं मानते या अपना सब कुछ नहीं मानते या जिन जीवो को भगवत्प्राप्ति (भगवान की प्राप्ति) नहीं हुई है। उन पर यह माया हावी रहती है। जिन्होंने भगवान की प्राप्ति कर ली उनसे भगवान माया को हटा देते हैं और उन्हें योग माया की शक्ति दे देते हैं। जिससे वह महात्मा (संत, ऋषि मुनि) माया के कार्य करते हैं लेकिन माया से परे रहते हैं। माया के बारे में अधिक जानने के लिए पढ़े माया क्या है?

योग माया का स्वरूप ।

दुर्गा ,सीता ,काली ,राधा ,लक्ष्मी ,मंगला ,पार्वती का मूर्त रूप है योग माया। और इसी योगमाया से कृष्ण राधा का शरीर है राधा कृष्ण का। इसीलिए राधे श्याम हैं और सीता राम हैं। शंकर के घर भवानी है योगमाया। ये साधारण नारियां नहीं हैं दिव्या हैं। योगमाया के ही अभिनय स्वरूप प्रगट रूप में हैं। अतएव इन नारियों को नारी मत समझियेगा। ये चाहे तो स्त्री के रूप में रहे या पुरुष के रूप में। ये स्वेच्छा से किसी भी रूप को धारण कर सकती है।

तो योगमाया को स्त्री का रूप मत समझियेगा। योगमाया भगवान की शक्ति है, ये कोई भी स्वरूप में रह सकती है। योगमाया बिना किसी स्वरूप के भी भगवान और महापुरुष के साथ रहती है। जैसे नारद जी, तुलसीदास, इनके पास कोई स्त्री नहीं है, लेकिन योगमाया की शक्ति है।

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गुस्सा दूर करने के उपाय〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️इस पृथ्वी पर शायद ही कोई प्राणी होगा जिसे गुस्सा नहीं आता, जब भी कुछ हमारे मन मुताब...
13/06/2021

गुस्सा दूर करने के उपाय
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इस पृथ्वी पर शायद ही कोई प्राणी होगा जिसे गुस्सा नहीं आता, जब भी कुछ हमारे मन मुताबिक नहीं होता, तब जो प्रतिक्रिया हमारा मन करता है, वही गुस्सा कहलाता है। वास्तव में "जब हम गुस्सा करते हैं तब हम किसी दूसरे की गलती की सजा खुद अपने को देते हैं।" जब किसी दिन हम मानसिक रूप से परेशान होते हैं, जीवन में किसी चीज या स्थिति से असंतुष्ट होते है, किसी बात पर हमारे दिल ठेस लगती है, जब हम निराश-हताश हो जाते है तब हम मानसिक रूप से ज्यादा बेचैन हो जाते है उस दिन हमें गुस्सा अधिक आता है और छोटी-छोटी बातों पर अधिक तीखी और त्वरित प्रतिक्रिया देते हैं।

वास्तव में गुस्सा एक भयानक तूफ़ान जैसा है, जो जाने के बाद पीछे अपनी बर्बादी का निशान छो़ड जाता हैं। गुस्से में सबसे पहले दिमाग फिर जबान अपना आपा खोती है, वह वो सब कहती है, जो नहीं बिलकुल भी कहना चाहिए और रिश्तों में जबरदस्त क़डवाहट आ जाती है। और तब तो और भी मुश्किल होती है जब गुस्सा हमारे दिमाग में घर कर जाता है और हमारे अन्दर बदला लेने की सामने वाले को नुकसान पहुँचाने की भावना प्रबल हो जाती है ।

कुछ ऐसे उपाय जिससे हम यथासंभव अपने गुस्से पर काबू कर सकते है ।

🔶दो पके मीठे सेब बिना छीले प्रातः खाली पेट चबा-चबाकर पन्द्रह दिन लगातार खाने से गुस्सा शान्त होता है। बर्तन फैंकने वाला, तोड़ फोड़ करने वाला और पत्नि और बच्चों पर हाथ उठाने वाला व्यक्ति भी अपने क्रोध से मुक्ति पा सकेगा। इसके सेवन से दिमाग की कमजोरी दूर होती है और स्मरण शक्ति भी बढ़ जाती है।

🔶प्रतिदिन प्रातः काल आंवले का एक पीस मुरब्बा खायें और शाम को एक चम्मच गुलकंद खाकर ऊपर से दुध पी लें। बहुत क्रोध आना शीघ्र ही बन्द होगा।

🔶गुस्सा आने पर दो तीन गिलास खूब ठंडा पानी धीरे धीरे घूँट घूँट लेकर पिएं । पानी हमारेशारीरिक तनाव को कम करके क्रोध शांत करने में मददगार होता है।

🔶गुस्सा बहुत आता हो तो धरती माता को रोज सुबह उठकर हाथ से पाँच बार छूकर प्रणाम करें और सबसे विशाल ह्रदय धरती माँ से अपने गुस्से पर काबू करने और सहनशील होने का वरदान मागें।

🔶पलाश के छोटे छोटे पत्तों की सब्जी खाने से गुस्सा, और पित्त जल्दी ही शांत होता है ।

🔶रविवार को अदरक, टमाटर और लाल रंग के कपड़े गुस्सा अधिक बढ़ाते हैं अत: इनका कम से कम प्रयोग करें ।

🔶जिनको गुस्सा बहुत आता हो, बात- बात में चिड जाते हो वे सोमवार का उपवास करें, या एक समय भोजन करें। रात कों चन्द्रमा कों अर्घ दें तथा अपने गुस्से पर विजय प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करें । इससे भी मन शान्त रहता है, गुस्से पर नियंत्रण रहता है।

🔶बहुत अधिक खट्टी, तीखी, मसालेदार चीजें खाने से आँखें जलती हैं, स्वभाव में चिड़चिड़ापन आता है, शीघ्र गुस्सा आता है, अकारण ही सीने और पेट में जलन होती है अत: इन चीजों का बिलकुल त्याग कर देना चाहिए ।

🔶जिन्हे ज्यादा गुस्सा आता हो उन्हें चाय, काफी, मदिरा से परहेज करना चाहिए ये शरीर को उत्तेजित करते है उसके स्थान पर छाछ, मीठा दूध या नींबू पानी का प्रयोग करना चाहिए ।

🔶यदि गुस्सा आने वाला हो तो 5-6 बार गहरी गहरी साँस लीजिए, कुछ पलों के लिए अपनी आँखे बंद करके ईश्वर का ध्यान करें उन्हें प्रणाम करें उनसे अपना कोई भी निवेदन करें। यह गुस्सा कम करने का सबसे बढ़िया तरीका है। इससे आप भड़कने से पहले ही निश्चित रूप से शांत हो जाएँगे।

🔶जिस स्त्री का पति हर समय बिना बात के ही गुस्सा करता रहता है तो वह स्त्री शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार, सोमवार, गुरुवार या शुक्रवार किसी भी दिन एक नए सफेद कपड़े में एक डली गुड़, चांदी एवं तांबे के दो सिक्के, एक मुट्ठी नमक व गेहूं को बांधकर अपने शयनकक्ष में कहीं ऐसी जगह छिपा कर रख दें जहाँ पति को पता न चले । इसके प्रभाव से भी पति का गुस्सा धीरे-धीरे कम होने लगेगा।

🔶समान्यता गुस्सा सामने वाले से ज्यादा उम्मीदें पालने से आता है । इसलिए कभी भी सामने वाले से बहुत ज्यादा उम्मीदें ना पालें जिससे आपकी बात ना मानने पर भी आपका दिल बिलकुल ना दुखे।

प्रेरक कथा- "झगडे का मूल"〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️यह कहानी संत के ज्ञान को दर्शाने वाली कथा है क्युकि हमेशा ही ये माना जाता है की स...
12/06/2021

प्रेरक कथा- "झगडे का मूल"
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यह कहानी संत के ज्ञान को दर्शाने वाली कथा है क्युकि हमेशा ही ये माना जाता है की संत, गुरु, साधू और मुनि महाराज के पास उन सभी सांसारिक... समस्याओ का तुरंत हल मिल जाता है जिसके बारे में आज लोग और गृहस्थी हमेशा से ही परेशान रहते है |

समाज में साधू,संत,गुरु और मुनि ही हर समस्या की एक मात्र चाबी माने जाते रहे है और यह सही भी है की इनके पास जाने मात्र से ही हमारे मन को शांति प्राप्त हो जाती है और फिर जब इनके दो सांत्वना भरे बोल या ज्ञान बढ़ाने वाले शब्द जब हमारे कान में जाते है तो जेसे अन्दर तक आत्मा को ठंडक पहुंचती हैl

इसलिए आज एक ऐसी ही कहानी लेकर आया हूँ जिससे आप गुरु की महिमा को समझ ही जायेंगे की क्यों और कैसे ये सभी विद्धवान जन तुरंत ही हरेक के मन की समस्या का समाधान कर देते है।

एक बार गोमल सेठ अपनी दुकान पर बेठे थे दोपहर का समय था इसलिए कोई ग्राहक भी नहीं था तो वो थोडा सुस्ताने लगे इतने में ही एक संत भिक्षुक भिक्षा लेने के लिए दुकान पर आ पहुचे।

और सेठ जी को आवाज लगाई कुछ देने के लिए...

सेठजी ने देखा कि इस समय कौन आया है ?

जब उठकर देखा तो एक संत याचना कर रहा था।

सेठ बड़ा ही दयालु था वह तुरंत उठा और दान देने के लिए कटोरी चावल बोरी में से निकाला और संत के पास आकर उनको चावल दे दिया।

संत ने सेठ जी को बहुत बहुत आशीर्वाद और दुवाए दी।

तब सेठजी ने संत से हाथ जोड़कर बड़े ही विनम्र भाव से कहा कि

हे गुरुजन आपको मेरा प्रणाम मैं आपसे अपने मन में उठी शंका का समाधान पूछना चाहता हूँ।

संत ने कहा की जरुर पूछो -

तब सेठ जी ने कहा की लोग आपस में लड़ते क्यों है ?

संत ने सेठजी के इतना पूछते ही शांत स्वभाव और वाणी में कहा की

सेठ मै तुम्हारे पास भिक्षा लेने के लिए आया हूँ तुम्हारे इस प्रकार के मूर्खता पूर्वक सवालो के जवाब देने नहीं आया हूँ।

संत के मुख से इतना सुनते ही सेठ जी को क्रोध आ गया और मन में सोचने लगे की यह कैसा घमंडी और असभ्य संत है ?
ये तो बड़ा ही कृतघ्न है एक तरफ मैंने इनको दान दिया और ये मेरे को ही इस प्रकार की बात बोल रहे है इनकी इतनी हिम्मत

और ये सोच कर सेठजी को बहुत ही गुस्सा आ गया और वो काफी देर तक उस संत को खरी खोटी सुनाते रहे
और जब अपने मन की पूरी भड़ास निकाल चुके
तब कुछ शांत हुए तब संत ने बड़े ही शांत और स्थिर भाव से कहा की

जैसे ही मैंने कुछ बोला आपको गुस्सा आ गया और आप गुस्से से भर गए और लगे जोर जोर से बोलने और चिल्लाने लगे।

वास्तव में केवल विवेकहीनता ही सभी झगडे का मूल होता है यदि सभी लोग विवेकी हो जाये तो अपने गुस्से पर काबू रख सकेंगे या हर परिस्थिति में प्रसन्न रहना सीख जाये तो दुनिया में झगडे ही कभी न होंगे !!!
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गुरु रूप में विख्यात भगवान दत्तात्रेय अवतार की कथा ।एक समय जब वेद, वेद-प्रक्रिया तथा यज्ञ नष्ट हो गए थे, धर्म शिथिल हो ग...
12/06/2021

गुरु रूप में विख्यात भगवान दत्तात्रेय अवतार की कथा ।

एक समय जब वेद, वेद-प्रक्रिया तथा यज्ञ नष्ट हो गए थे, धर्म शिथिल हो गया था, चारों वर्णों में संकरता आ गई थी, अधर्म तीव्रता से बढ़ रहा था, चारों ओर असत्य का ही बोल बाला था और प्रजा क्षीण हो रहीं थी। ऐसे समय में भगवान विष्णु के अवतार दत्तात्रेय ने यज्ञ तथा क्रियाओं सहित वेदों का पुनरुद्धार किया और चारों वर्णों को पृथक-पृथक कर, उन्हें व्यवस्थित किया, वे परम बुद्धिमान और वर-दायक थे।

इन्होंने वेद तथा तंत्र मार्ग का विलय एक संप्रदाय निर्मित किया, वैसे ये हैं तो भगवान विष्णु के अवतार परन्तु गुरु, साधक, योगी और वैज्ञानिक अधिक माना जाता है। इन्होंने ब्रह्मा-विष्णु-महेश के विलय रूप में जन्म धारण किया, कारणवश इन्हें त्रिदेव-स्वरूप भी कहा जाता हैं।

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चंद्रमा, सूर्य, कपोत, अजगर, सिंधु, पतंग, भ्रमर, मधुमक्खी, गज, मृग, मीन, पिंगला, कुररपक्षी, बालक, कुमारी, सर्प, शरकृत, मकड़ी और भृंगी, ये दत्तात्रेय जी के २४ गुरु थे, प्रत्येक से इन्होंने कुछ न कुछ सिखा तथा उसे अपने गुरु दीक्षा के रूप में स्वीकार किया।

जैसे अजगर से इन्होंने सिखा की प्रारब्ध के अनुसार जितना मिल जाये उसी में संतुष्ट रहना चाहिये तथा एक जगह पर नहीं रहना चाहिये। ब्रह्मा जी के मानस पुत्र अत्रि इनके पिता थे तथा कपिल-देव की बहन देवी अनुसूया इनकी माता थी।

भगवान दत्तात्रेय के जन्म से सम्बंधित कथा।
एक बार तीनों महा-देवियों पार्वती, लक्ष्मी तथा सावित्री को अपने पतिव्रत धर्म पर बहुत अहंकार हो गया था।देवर्षि नारद को जब उन तीन महा-देवियों के अहंकार का ज्ञान हुआ, वे उनके अहंकार को तोड़ने के निमित्त बारी-बारी से तीनों देवियों के पास गए।

सर्वप्रथम देवर्षि नारद! पार्वती जी के पास गए तथा उनके सनमुख अत्रि-ऋषि की पत्नी अनुसूया द्वारा किये जा रहे पति-व्रत धर्म का गुणगान करने लगे। इसी प्रकार नारद जी!

लक्ष्मी जी के पास गए तथा उनके समक्ष भी देवी अनुसूया के सतीत्व की प्रशंसा करने लगे; विष्णु-लोक के पश्चात वे ब्रह्म-लोक गए वहां जाकर उन्होंने देवी सावित्री के समक्ष देवी अनुसूया के पति-भक्ति की घोर प्रशंसा की।

इस प्रकार तीनों महा-देवियों को देवी अनुसूया की प्रशंसा अच्छी नहीं लगी तथा वे उनसे द्वेष करने लगी। तीनों महा-देवियों ने अपने-अपने पति शिव, विष्णु तथा ब्रह्मा से देवी अनुसूया के पतिव्रता धर्म को भंग करने की हठ करने लगी।

अपनी-अपनी पत्नी के हठ अनुसार तीनों महा-देवों को हार माननी पड़ी तथा तीनों अपने-अपने लोकों से पृथ्वी पर आयें। तीनों महा-देव!

देवी अनुसूया की कुटिया के सामने भिक्षुक बनकर खड़े हो गए तथा देवी से भिक्षा देने हेतु निवेदन करने लगे।देवी अनुसूया जब तीनों को भिक्षा देने हेतु उनके सनमुख आयें, तीनों महा-देवों ने भिक्षा लेने से माना कर दिया, तथा उनके गृह में भोजन करने की इच्छा प्रकट की।

भिक्षुकों के निवेदन अनुसार देवी अतिथि सत्कार को अपना प्रधान धर्म मानते हुए, तीनों भिक्षुकों से स्नान करने हेतु कहा तथा पीछे से भोजन निर्मित करने में लग गई। तीनों भिक्षुकों के स्नान करने के पश्चात, जब देवी अनुसूया भोजन हेतु भोजन की थाली परोस कर लाई, तीनों ने भोजन करने से मना कर दिया तथा कहा!

जब तक आप हमें नग्न होकर भोजन नहीं परोसेंगी हम भोजन नहीं करेंगे। प्रथम यह सुनते ही देवी अनुसूया स्तब्ध रह गयी तथा क्रोध से भर गयी, परन्तु अपने पतिव्रता धर्म के बल से उन्होंने तीनों की वास्तविक मंशा जान ली तथा समझ गए कि! ये तीनों और कोई नहीं साक्षात ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं।

उन्होंने सोचा की क्यों न तीनों को बालकों के रूप में परिवर्तित कर दिया जाये, अबोध शिशु के सामने माता नग्न भी हो तो कुछ नहीं होता हैं, इस प्रकार तो वे नग्न होकर भी अपने बालक को भोजन करा सकती हैं।

इस प्रकार विचार कर देवी अनुसूया ने अपने पति अत्रि के चरणों के जल को तीनों महा-देवों के ऊपर छिड़क दिया तथा तक्षण ही तीनों शिशु रूप में परिवर्तित हो गए। इस प्रकार देवी अनुसूया ने तीनों को भर-पेट भोजन कराया तथा उन्हें अपने पास रखकर प्रेम तथा वात्सल्य से उन्हें पलने लगी।

धीरे-धीरे कई दिन बीत गए, कई दिन बीतने पर भी जब ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश अपने-अपने लोकों को वापस नहीं गए, उनकी पत्नी क्रमशः सावित्री, लक्ष्मी तथा पार्वती को अपने-अपने पति की चिंता सताने लगी।



उन तीनों महा-देवियों को देवर्षि नारद से यह ज्ञान हुआ की वे तीनों देवी अनुसूया के सतीत्व को परीक्षा लेने हेतु उनके घर में गए थे। यह सुनकर तीनों महा-देवी! अत्रि ऋषि के घर में आयें तथा अपने-अपने पति के सम्बन्ध में ज्ञात करने लगी।देवी अनुसूया ने पालने में सो रहे तीनों देवताओं की ओर इंगित करते हुए कहा कि!

तीनों देवियाँ अपने-अपने पति को पहचान कर वहां से ले जाये। परन्तु तीनों महा-देवियों में से कोई भी अपने पति को नहीं पहचान पाई, इस पर तीनों देवियों को अपनी भूल पर पछतावा होने लगा तथा तीनों देवी अनुसूया से क्षमा याचना करने लगी।देवी अनुसूया ने अपने पति-व्रत धर्म के प्रभाव से तीनों-देवों को पूर्ववत रूपी कर दिया, इस पर तीनों महा-देवियाँ बहुत प्रसन्न हुई तथा उनके कोई वर मांगने हेतु कहा।

देवी अनुसूया ने वर रूप में तीनों देवों के एकत्र हो उनके पुत्र रूप में जन्म लेने का वर मंगा, इस पर तीनों देवों तथा देवियों ने तथास्तु कहकर वहां से प्रस्थान किया और अपने-अपने लोकों में चले गए।

कालांतर में यही तीनों महा-देवों ने ही देवी अनुसूया के गर्भ से जन्म धारण किया तथा जिनका नाम दत्तात्रेय पड़ा। ब्रह्मा के अंश से चंद्रमा, शंकर के अंश से दुर्वासा तथा विष्णु के अंश से दत्तात्रेय का जन्म हुआ।

अवधूत भेष धारी भगवान दत्तात्रेय। भगवान दत्तात्रेय तीन मस्तक युक्त हैं, इनकी ६ भुजाएँ हैं तथा अवधूत भेष धारी हैं, इन्होंने अवधूत चर्या धारण कर रखा हैं; इनके साथ गाय तथा कुत्ते दिखाई देते हैं।

प्रातः काल भगवान दत्तात्रेय ब्रह्मा जी के रूप में, मध्याह्न के समय भगवान विष्णु के स्वरूप में तथा सायंकाल शिव जी के स्वरूप में अपने रूप को धारण किये रहते हैं। इस अवतार में उन्होंने अलर्क एवं प्रह्लाद आदि को ब्रह्म ज्ञान का उपदेश दिया।

300 वर्ष आयु के श्री  #तैलंग स्वामी.....वाराणसी गलियों में एक दिगम्बर योगी घूमता रहता है गृहस्थ लोग उसके नग्न वेश पर आपत...
12/06/2021

300 वर्ष आयु के श्री #तैलंग स्वामी.....

वाराणसी गलियों में एक दिगम्बर योगी घूमता रहता है गृहस्थ लोग उसके नग्न वेश पर आपत्ति करते हैं फिर भी पुलिस उसे पकड़ती नहीं वाराणसी पुलिस की इस तरह की तीव्र आलोचनाएं हो रही थीं आखिर वारंट निकालकर उस नंगे घूमने वाले साधू को जेल में बंद करने का आदेश दिया गया।

पुलिस के आठ-दस जवानों ने पता लगाया, मालूम हुआ वह योगी इस समय मणिकर्णिका घाट पर बैठा हुआ है। जेष्ठ की चिलचिलाती दोपहरी जब कि घर से बाहर निकलना भी कठिन होता है एक योगी को मणिकर्णिका घाट के एक जलते तवे की भाँति गर्म पत्थर पर बैठे देख पुलिस पहले तो सकपकायी पर आखिर पकड़ना तो था ही वे आगे बढ़े। योगी पुलिस वालों को देखकर ऐसे मुस्करा रहा था मानों वह उनकी सारी चाल समझ रहा हो। साथ ही वह कुछ इस प्रकार निश्चिन्त बैठे हुये थे मानों वह वाराणसी के ब्रह्मा हों किसी से भी उन्हें भय न हो। मामूली कानूनी अधिकार पाकर पुलिस का दरोगा जब किसी से नहीं डरता तो अनेक सिद्धियों सामर्थ्यों का स्वामी योगी भला किसी से भय क्यों खाने लगा तो भी उन्हें बालकों जैसी क्रीड़ा का आनन्द लेने का मन तो करता ही है यों कहिए आनंद की प्राप्ति जीवन का लक्ष्य है बाल सुलभ सरलता और क्रीड़ा द्वारा ऐसे ही आनंद के लिए “श्री तैलंग स्वामी” नामक योगी भी इच्छुक रहे हों तो क्या आश्चर्य ?

पुलिस मुश्किल से दो गज पर थी कि तैलंग स्वामी उठ खड़े हुए ओर वहाँ से गंगा जी की तरफ भागे। पुलिस वालों ने पीछा किया। स्वामी जी गंगा में कूद गये पुलिस के जवान बेचारे वर्दी भीगने के डर से कूदे तो नहीं हाँ चारों तरफ से घेरा डाल दिया कभी तो निकलेगा साधु का बच्चा- लेकिन एक घंटा, दो घंटा, तीन घंटा-सूर्य भगवान् सिर के ऊपर थे अब अस्ताचलगामी हो चले किन्तु स्वामी जी प्रकट न हुए कहते हैं उन्होंने जल के अंदर ही समाधि ले ली। उसके लिये उन्होंने एक बहुत बड़ी शिला पानी के अंदर फेंक रखी थी और यह जन श्रुति थी कि तैलंग स्वामी पानी में डुबकी लगा जाने के बाद उसी शिला पर घंटों समाधि लगायें जल के भीतर ही बैठे रहते हैं।

उनको किसी ने कुछ खाते नहीं देखा तथापि उनकी आयु 300 वर्ष की बताई जाती है। वाराणसी में घर-घर में तैलंग स्वामी की अद्भुत कहानियां आज भी प्रचलित हैं। निराहार रहने पर भी प्रतिवर्ष उनका वजन एक पौण्ड बढ़ जाता था। 300 पौंड वजन था उनका जिस समय पुलिस उन्हें पकड़ने गई इतना स्थूल शरीर होने पर भी पुलिस उन्हें पकड़ न सकी। आखिर जब रात हो चली तो सिपाहियों ने सोचा डूब गया इसीलिये वे दूसरा प्रबन्ध करने के लिए थाने लौट गये इस बीच अन्य लोग बराबर तमाशा देखते रहे पर तैलंग स्वामी पानी के बाहर नहीं निकले।

प्रातः काल पुलिस फिर वहाँ पहुँची। स्वामी जी इस तरह मुस्करा रहे थे मानों उनके जीवन में सिवाय मुस्कान और आनंद के और कुछ हो ही नहीं, शक्ति तो आखिर शक्ति ही है संसार में उसी का ही तो आनंद है। योग द्वारा सम्पादित शक्तियों का स्वामी जी रसास्वादन कर रहे हैं तो आश्चर्य क्या। इस बार भी जैसे ही पुलिस पास पहुँची स्वामी फिर गंगा जी की ओर भागे और उस पार जा रही नाव के मल्ला को पुकारते हुए पानी में कूद पड़े। लोगों को आशा थी कि स्वामी जी कल की तरह आज भी पानी के अंदर छुपेंगे और जिस प्रकार मेढ़क मिट्टी के अंदर और उत्तराखण्ड के रीछ बर्फ के नीचे दबे बिना श्वाँस के पड़े रहते हैं उसी प्रकार स्वामी जी भी पानी के अंदर समाधि ले लेंगे किन्तु यह क्या जिस प्रकार से वायुयान दोनों पंखों की मदद से इतने सारे भार को हवा में संतुलित कर तैरता चला जाता है उसी प्रकार तैलंग स्वामी पानी में इस प्रकार दौड़ते हुए भागे मानों वह जमीन पर दौड़ रहे हों । नाव उस पार नहीं पहुँच पाई स्वामी जी पहुँच गये। पुलिस खड़ी देखती रह गई।

स्वामी जी ने सोचा होगा कि पुलिस बहुत परेशान हो गई तब तो वह एक दिन पुनः मणिकर्णिका घाट पर प्रकट हुए और अपने आपको पुलिस के हवाले कर दिया। हनुमान जी ने मेघनाथ के सारे अस्त्र काट डाले किन्तु जब उसने ब्रह्म-पाश फेंका तो वे प्रसन्नता पूर्वक बँध गये। लगता है श्री तैलंग स्वामी भी सामाजिक नियमोपनियमों की
अवहेलना नहीं करना चाहते थे पर यह प्रदर्शित करना आवश्यक भी था कि योग और अध्यात्म की शक्ति भौतिक शक्तियों से बहुत चढ़-बढ़ कर है तभी तो वे दो बार पुलिस को छकाने के बाद इस प्रकार चुपचाप ऐसे बैठे रहे मानों उनको कुछ पता ही न हो। हथकड़ी डालकर पुलिस तैलंग स्वामी को पकड़ ले गई और हवालात में बंद कर दिया। इन्सपेक्टर रात गहरी नींद सोया क्योंकि उसे स्वामी जी गिरफ्तारी मार्के की सफलता लग रही थी।

प्रस्तुत घटना “मिस्ट्रीज आँ इंडिया इट्स योगीज” नामक लुई-द-कार्टा लिखित पुस्तक से अधिकृत की जा रही है। कार्टा नामक फ्राँसीसी पर्यटक ने भारत में ऐसी विलक्षण बातों की सारे देश में घूम-घूम कर खोज की। प्रसिद्ध योगी स्वामी योगानंद ने भी उक्त घटना का वर्णन अपनी पुस्तक “आटो बाई ग्राफी आँ योगी” के 31 वे परिच्छेद में किया है।

प्रातः काल ठंडी हवा बह रही थी थाने जी हवालात की तरफ की तरफ आगे बढ़े तो पसीने में डूब गया- जब उन्होंने योगी तैलंग को हवालात की छत पर मजे से टहलते और वायु सेवन करते देखा। हवालात के दरवाजे बंद थे, ताला भी लग रखा थी। फिर यह योगी छत पर कैसे पहुँच गया ? अवश्य ही संतरी की बदमाशी होगी। उन बेचारे संतरियों ने बहुतेरा कहा कि हवालात का दरवाजा एक क्षण को खुला नहीं फिर पता नहीं साधु महोदय छत पर कैसे पहुँच गये। वे इसे योग की महिमा मान रहे थे पर इन्सपेक्टर उसके लिए बिलकुल तैयार नहीं था आखिर योगी को फिर हवालात में बंद किया गया। रात दरवाजे में लगे ताले को सील किया गया चारों तरफ पहरा लगा और ताली लेकर थानेदार थाने में ही सोया। सवेरे बड़ी जल्दी कैदी की हालत देखने उठे तो फिर शरीर में काटो तो खून नहीं। सील बेद ताला बाकायदा बंद। सन्तरी पहरा भी दे रहे उस पर भी तैलंग स्वामी छत पर बैठे प्राणायाम का अभ्यास कर रहे। थानेदार की आँखें खुली की खुली रह गईं उसने तैलंग स्वामी को आखिर छोड़ ही दिया।

श्री तैलंग स्वामी के बारे में कहा जाता है कि जिस प्रकार जलते हुये तेज कड़ाहे में खौल रहे तेल में पानी के छींटे डाले जाएं तो तेल की ऊष्मा बनाकर पलक मारते दूर उड़ा देती है। उसी प्रकार विष खाते समय एक बार आँखें जैसी झपकती पर न जाने कैसी आग उनके भीतर थी कि विष का प्रभाव कुछ ही देर में पता नहीं चलता कहाँ चला गया। एक बार एक आदमी को शैतानी सूझी चूने के पानी को लेजाकर स्वामी जी के सम्मुख रख दिया और कहा महात्मन् ! आपके लिए बढ़िया दूध लाया हूँ स्वामी जी उठाकर पी गये उस चूने के पानी को, और अभी कुछ ही क्षण हुये थे कि कराहने और चिल्लाने लगा वह आदमी जिसने चूने का पानी पिलाया था। स्वामी जी के पैरों में गिरा, क्षमा याचना की तब कहीं पेट की जलन समाप्त हुई। उन्होंने कहा भाई मेरा कसूर नहीं है यह तो न्यूटन का नियम है कि हर क्रिया की एक प्रतिक्रिया अवश्य है। उसकी दिशा उलटी और ठीक क्रिया की ताकत कितनी होती है।

मनुष्य शरीर एक यंत्र, प्राण उसकी ऊर्जा, ईंधन आवा शक्ति, मन इंजन और ड्राइवर चाहे जिस प्रकार के अद्भुत कार्य लिए जा सकते हैं इस शरीर से भौतिक विज्ञान से भी अद्भुत पर यह सब शक्तियाँ और सामर्थ्य योग विद्या, योग साधना में सन्निहित हैं जिन्हें अधिकारी पात्र ही पाते और आनन्द लाभ प्राप्त करते हैं।

🙏🙏

स्वामी निगमानंद परमहंस : सिविल इंजीनियर से सिद्ध सन्यासी बनने की अद्भुत कहानीस्वामी निगमानंद की जीवनी :भारत सदा से कई मह...
12/06/2021

स्वामी निगमानंद परमहंस : सिविल इंजीनियर से सिद्ध सन्यासी बनने की अद्भुत कहानी

स्वामी निगमानंद की जीवनी :

भारत सदा से कई महान ऋषि-मुनि, महात्माओं का देश रहा है. इस भूमि को स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी योगानंद परमहंस, रमण महर्षि जैसे कईयों परमसिद्ध सन्यासियों ने पवित्र किया है. स्वामी निगमानंद सरस्वती भी ऐसे ही एक प्रसिद्ध संत थे. एक सामान्य गृहस्थ से सिद्ध योगी बनने की उनकी कहानी अनोखी है.

सन्यास लेने से पूर्व स्वामी निगमानंद का असली नाम नलिनीकांत था. उनका जन्म सन 1879 कुतबपुर, नादिया जिला (वर्तमान बांग्लादेश) में एक सम्पन्न ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम भुबन मोहन भट्टाचार्य और माता का नाम योगेन्द्रमोहिनी था. बचपन से ही बहुत निडर, बुद्धिमान, नेतृत्व क्षमता वाले नलिनीकांत अपनी माँ के बहुत करीब थे.

स्वामी श्री निगमानंद परमहंस जी

विधि का विधान, नलिनीकांत जब थोडा बड़े हुए तो अचानक एक बीमारी की वजह से उनकी माँ का देहांत हो गया. माँ की मृत्यु से नलिनीकांत बड़े क्षुब्ध हुए. उनका भगवान में भरोसा कमजोर पड़ गया और वो विज्ञान के नजरिये से दुनिया को देखने लगे.

माँ की मृत्यु से घर में एक खालीपन हो गया और साथ ही घर की व्यवस्था में बाधा भी होने लगी. इसके उपाय के लिए घर के बड़े लड़के यानि नलिनीकांत के विवाह की योजना बनाई जाने लगी. इसीलिए 17 वर्ष की कम उम्र में उनका विवाह 13 वर्ष की एक कन्या सुधांशुबाला से आकर दिया गया. सुधांशुबाला एक बड़ी सुंदर और बुद्धिमान लड़की थी. उसने बड़ी समझदारी से स्थिति सम्भाली. नलिनीकांत भी अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करने लगे थे.

नलिनीकांत ढाका स्कूल ऑफ़ सर्वे में पढाई करने चले गये और शिक्षा प्राप्त करने के बाद सरकारी नौकरी करने लगे. अपनी स्वतंत्र सोच और स्पष्टवादिता के कारण उन्हें कई बार नौकरी बदलनी भी पड़ी.

उस रात की रहस्यमयी घटना :

जब वो नारायणपुर एस्टेट में सुपरवाईजर के पद पर कार्यरत थे, तो एक रात अजीब घटना घटी. उस दिन नलिनीकांत देर रात तक काम कर रहे थे. करीब 10 बजे होंगे. अचानक उन्होंने अपने कमरे की मेज पर अपनी पत्नी सुधांशुबाला को खड़े देखा. सुधांशुबाला चुपचाप, शांत थी. उसका रूप-रंग सामान्य से अधिक निखरा हुआ था और हल्का सा तेज उसके चारों तरफ था.

नलिनीकांत यह देख डरकर चीख पड़े. उस स्थान से उनका गाँव कुतबपुर काफी दूरी पर था. इतनी रात को अचानक सुधांशुबाला उनके कमरे में कैसे हो सकती थी. अचानक ही सुधांशुबाला की छवि अदृश्य हो गयी.

नलिनीकांत ये सब देखकर घबरा गये और तुरंत अपने गाँव चल दिए. गाँव में अपने घर पहुँचने पर उन्हें पता चला कि करीब 1 घंटा पहले प्रसव के दौरान सुधांशुबाला की मृत्यु हो चुकी थी. नलिनीकांत यह सब देख हतप्रभ रह गये और सोच में पड़ गये कि जो उन्होंने देखा था, वह क्या था.

एक और आश्चर्य की बात यह कि इस घटना के बाद भी कई बार सुधांशुबाला की छवि नलिनीकांत को दिखाई दी. नलिनीकांत एक विचारशील पुरुष थे. वो समझ गये कि जो वह देख रहे हैं वो भ्रम नहीं है और उसका कोई कारण अवश्य होगा. उन्हें लगना लगा कि अवश्य ही मृत्यु के बाद भी कोई जीवन है.

नलिनीकांत अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करते थे, अतः उन्होंने निश्चय किया कि वो अपनी पत्नी को फिर से पाकर रहेंगे. अपनी इस इच्छा की वजह से वो रामकृष्ण मिशन, थियोसोफिकल सोसाइटी जैसी कई संस्थाओं में गये, कइयो लोगों से मिले. जन्म-मृत्यु के रहस्य, मृत्यु के बाद जीवन में उनकी गहरी जिज्ञासा बढ़ती गयी.

एक दिन उनकी मुलाकात सिद्ध स्वामी पूर्णानंद से हुई. स्वामी पूर्णानंद ने उन्हें बताया – हर स्त्री महामाया या जगतमाता का एक अंश होती है. तुम उस जगदमाता के अंश के पीछे भागते हुए, स्वयं सम्पूर्ण जगतमाता की उपेक्षा कर रहे हो. यह बुद्धिमानी नहीं है. अगर तुम्हे महामाया स्वरुप जगतमाता का अनुग्रह प्राप्त हो जाये, तभी तुम्हे तुम्हारी पत्नी मिल सकती है.

स्वामी पूर्णानंद ने नलिनीकांत से कहा कि वो किसी सद्गुरु की खोज करे, जो उसका मार्गदर्शन करे. नलिनीकांत को बात समझ में आ गयी. वापस आकर वो भगवान की प्रार्थना में लगे गये कि उन्हें कोई सच्चा गुरु मिल जाये.

एक दिन रात में सोते समय नलिनीकांत को स्वप्न में एक दिव्य तेजोमय साधू दिखा. तभी उनकी आँख खुल गयी. जागने पर उन्होंने देखा स्वप्न में दिखाई देने वाले साधू उसके बिस्तर के बगल खड़े हैं. उस दिव्य साधू ने नलिनीकांत को एक पत्ता दिया, जिसपर एक मंत्र लिखा हुआ था. वह पत्ता देकर वह साधू अंतर्ध्यान हो गये.

महान तांत्रिक बमाक्षेपा से भेंट :

आश्चर्यचकित नलिनीकांत के समझ नहीं आया कि पत्ते पर लिखे इस मंत्र का वह क्या करें. उस मंत्र को लेकर वह कई विद्वान, ज्ञानी संत लोगों के पास गये, लेकिन कोई उस मंत्र का अर्थ या उपयोग नहीं बता सका. इसी बीच एक रात्रि उन्हें स्वप्न में निर्देश मिला कि वो यह मन्त्र लेकर उस समय के महानतम तांत्रिक बामाक्षेपा के पास जाएँ जो बीरभूम, पश्चिम बंगाल स्थित तारापीठ में रहते थे.

तांत्रिक बामाक्षेपा जी
तांत्रिक बामाक्षेपा यह देखकर अति प्रसन्न हुए कि नलिनीकांत को स्वप्न में मिला मंत्र उनकी आराध्य देवी तारा का अनोखा बीज मंत्र था. बामाक्षेपा ने नलिनीकांत को अपना शिष्य बनाना स्वीकार किया और वह उन्हें तांत्रिक साधना की दीक्षा देने लगे.

माँ तारा के दर्शन और सुधान्शुबाला से मुलाकात :

एक महीने के छोटे से अंतराल में ही नलिनीकांत ने आध्यत्मिक सफलता के रहस्यों पर तांत्रिक सिद्धि प्राप्त आकर ली. उनकी सिद्धि की सफलतास्वरुप स्वयं माँ तारासुधान्शुबाला के रूप में उनके समक्ष प्रकट हुई और उन्हें आशीर्वाद दिया कि जब भी वो चाहेंगे माँ तारा उन्हें उसी रूप में दिखाई देंगी.

लेकिन नलिनीकांत संतुष्ट नहीं हुए क्योंकि वह सुधान्शुबाला की इस छवि को छू नहीं सकते थे. और उन्होंने यह भी देखा कि एक चमकदार तेज उनके स्वयं के शरीर से निकलता है और सुधान्शुबाला का रूप बनकर प्रकट होता है. नलिनीकांत सोच में पड़ गये – अगर महाशक्ति माँ तारा मेरे शरीर से निकल रहीं है तो मैं कौन हूँ ?

यह रहस्य जानने के लिए उन्होंने अपने गुरु बामाक्षेपा से प्रश्न किया. गुरु बामाक्षेपा ने उनसे कहा कि वो किसी वेदान्तिक गुरु से अद्वैत का ज्ञान प्राप्त करे तभी इसका उत्तर मिलेगा. नलिनीकांत पुष्कर, राजस्थान जाकर श्रीमद स्वामी सच्चिदानंद सरस्वती के शिष्य बन गये. पहली बार मिलते ही नलिनीकांत पहचान गये कि उन्हें स्वप्न में तारा बीज मन्त्रदेने वाले साधू यही थे.

स्वामी सच्चिदानंद सरस्वती ने नलिनीकांत को अद्वैत का ज्ञान दिया और उन्हें सन्यास धर्म में दीक्षित किया. स्वामी सच्चिदानंद सरस्वती ने नलिनीकांत का नाम ‘निगमानंद’ रखा क्योंकि वो सरलतापूर्वक वैदिक ज्ञान समझने में सफल रहे थे.

निगमानंद ने ब्रह्मसूत्र, उपनिषदों का अध्ययन किया. उन्होंने हठयोग साधना करके अपने मन, शरीर को मजबूत बनाया. इसके बाद पतंजलि योग की निर्विकल्प समाधि का दिव्य अनुभव किया. स्वामी निगमानंद ने योग और तन्त्र की कई सिद्धियाँ भी प्राप्त की थी.

भक्ति मार्ग पर बढ़ते हुए स्वामी निगमानंद समझ गये कि यह सम्पूर्ण जगत भगवान का ही रूप है. उन्होंने प्रसिद्ध सारस्वत मठ की स्थापना भी की. सन 1907 में इलाहाबाद के कुम्भ मेले में कई महान साधू, संत, ऋषियों ने स्वामी निगमानंद को ‘परमहंस’ की उपाधि दी. स्वामी निगमानंद ने अपने जीवन के अंतिम 14 वर्ष पुरी, उड़ीसा में बिताये. सन 1935 में श्री निगमानंद जी ने कलकत्ता में महासमाधि ले ली. स्वामी निगमानंद ने विभिन्न आध्यात्मिक विषयों पर कई पुस्तकें लिखी थी. स्वामी निगमानंद परमहंस की मुख्य शिक्षा थी –प्रत्येक मनुष्य परमशक्ति में निहित है और उसी का समरूप है

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