16/09/2022
दाढ़ी की शरई हैसियत
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दाढ़ी की शरई हैसियत के बारे मे क़ुरआन व हदीस की रोशनी मे हम मुफ़स्सिल जायज़ा पेश करते हैं और इस सिलसिले मे दर्ज ज़ील अमूर पर रोशनी डालेंगे।
पहला : दाढ़ी रखना वाजिब है या सुन्नत?
दूसरा : दाढ़ी मुढवाना हराम है या मकरूह?
तीसरा : दाढ़ी कुतरवाना जायज़ है या नही और यह कि दाढ़ी कितनी लंबी होनी चाहिए?
इसमें कोई शक़ नहीं कि दाढ़ी मर्दानगी और मर्दों की अलामत और मर्दों की ज़ीनत है और हर मज़हब (धर्म) में इसकी हैसियत मुस्लिम है। प्राचीन काल में, दाढ़ी को राजाओं और शासकों, विद्वानों और दार्शनिकों के लिए एक इम्तियाज़ निशान (विशिष्ट चिह्न) माना जाता था। दाढ़ी मुंडवाने का रिवाज (प्रथा) ईरान के उग्र शासकों द्वारा शुरू की गई और फ़िर इसके असरात (प्रभाव) फैलते गये। यूरोप और मग़रिब (पश्चिम) में, दाढ़ी को लंबे समय से इज़्ज़त और वक़ार की अलामत (प्रतीक) माना जाता रहा है। चिकित्सा की नज़र से भी दाढ़ी को मुढवाना (शेव करना) को नुक़सान दह क़रार दिया गया है।तमाम आसमानी मज़ाहिब मे दाढ़ी को बुनियादी अहमियत (प्राथमिक महत्व) हासिल रही है और क़ुरआन करीम से मालूम होता है कि पहले अंबिया (पैगंबर) भी दाढ़ी रखते थे।
चुनांचे, सूरह ताहा में हज़रत मूसा के बारे में आता है कि जब उन्होंने अपने भाई हज़रत हारून के बालों को ग़ुस्से में पकड़ लिया, तो उन्होंने कहा।
قَالَ یَبۡنَؤُمَّ لَا تَاۡخُذۡ بِلِحۡیَتِیۡ وَ لَا بِرَاۡسِیۡ
ऐ मेरी माँ के बेटे, मेरी दाढ़ी और मेरे सिर के बाल ना पकड़ो।
(सुरह ताहा : 94)
एक रिवायत मे आता है कि फ़रिश्ते अल्लाह तआला का ज़िक्र इन अल्फ़ाज़ों के साथ करते हैं:
سبحان الذي من زين الرجال باللحى والنساء بالقرون والذوائب
पाक है वह ज़ात जिसने मर्दों को दाढ़ी से ज़ीनत दी और औरतों (महिलाओं) को ज़ुल्फ़ो (बालों) से ज़ीनत अता फ़रमाई।।।
उसी तरह, जिन चीज़ों के बारे में अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया कि यह फ़ितरत मे से हैं उनमे दाढ़ी बढ़ाना भी शामिल है। फ़ितरत की इन चीज़ों में खतना, ज़ैर नाफ़ बालो की सफ़ाई, नाख़ून काटना, दाढ़ी बढ़ाना और मूंछ तराशना (काटना) शामिल है।
ख़ुद रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बारे में आता है कि
كان كثير شعر اللحية
आप की दाढ़ी मुबारक बहुत घनी थी।
(1) दाढ़ी वाजिब है या सुन्नत के बारे में थोड़ा-सा इख़्तिलाफ़ (असहमति) पाया जाता है, लेकिन इस अम्र में कोई असहमति नहीं है कि दाढ़ी छोड़ने के संबंध में एक सख़्त वईद आयी है जिन उलेमा ने दाड़ी रखने को वाजिब कहा है, उनके नज़दीक़ बुनियाद यह हदीस है जिसमें अल्लाह के रसूल, सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:
احفوا الشوارب واعفو االلحی ۔
मूंछें तराशो (ट्रिम करें) और दाढ़ी बढ़ाओ।
(बुखारी और मुस्लिम)
और अरबी में, लाहियाह (दाढ़ी) लफ़्ज़ ठोड़ी और दोनों रुख़सारो के बालो पर बोला जाता है।
बुख़ारी शरीफ़ की एक और हदीस में कहा गया है कि पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा, "मुश्रिकीन (बहुदेववादियों) की मुख़ालिफ़त करें और अपनी मूंछें तराशो और दाढ़ी बढ़ाओ।"
(सही बुख़ारी : 5892, 5893)
वजूब (दायित्व) पर दूसरी हदीस मुस्लिम शरीफ़ में हज़रत अब्दुल्ला बिन उमर से मरवी है कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया : "मूंछें अच्छी तरह तराशो और दाढ़ीयां बढ़ाओ।"
(सही मुस्लिम : 259)
हज़रत अब्दुल्ला बिन उमर से मरवी है कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मूंछें मुढवाने (तराशने) और दाढ़ी बढ़ाने (छोड़ने) का हुक्म देते।
(सुनन अबी दाऊद : 4199)
तीसरी यह रिवायत ब्यान की जाती है कि क़सरी से जो लोग अल्लाह के रसूल (ﷺ) के पास आए थे, उन्होंने दाढ़ी मुंडवा ली थी और लंबी मूंछें रखते थे। उन्हें देखकर, पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा:
ويلكما من امر كما بهذا ؟ قالا امرنا ربنا
कि तुम्हें यह शक्ल बनाने का किसने हुक्म दिया?
(तारीख़ इब्न जरीर 91/3-90)
उन्होंने जवाब दिया कि हमारे रब (यानी राजा क़सरी) ने यह हुक्म दिया है। तो इस मौक़े पर रसूल अल्लाह ﷺ ने कहा:
ولكن ربی امرنی باحفاء لحيتي وقص شاربی
लेकिन मेरे रब (पालनहार) ने मुझे दाढ़ी बढ़ाने और मूंछें काटने का हुक्म दिया है।
(तारीख़ इब्न जरीर (90-91/ 3)
बहरहाल यह वाजिब न भी हो तो लेकिन दाढ़ी वह सुन्नत मवक्किदाह है जिसका छोड़ना किसी शक्ल मे जायज़ नही।
क्या दाढ़ी मुंडवाना हराम है?
जहां तक दाढ़ी मुंडवाने की बात है तो तमाम इमाम और आइम्मा इस बात से मुत्तफ़िक़ हैं कि यह हराम है। बाज़ ने इसे मकरूह कहा है लेकिन इसके अक़वाल दलील के लिहाज़ से कमज़ोर है दर्ज ज़ील दलाइल दाढ़ी मुंडवाने की हुरमत पर शाहिद हैं :
(1) क़ुरआन हकीम में सूरह निसा की ये आयत, जिसमें शैतान के बारे मे ज़िक्र है और शैतान ने कहा था, "मैं तेरे बंदों मे से कुछ को अपने अपने पीछे लगाऊंगा, उनको गुमराह करूँगा और उन्हें वासना बनाऊँगा और मैं उन्हें तालीम दूँगा कि जानवरों के कान चीरेगें और मैं उनको कहूँगा कि वह अल्लाह कि बनाई हुई सूरतो को बिगाड़ेगे। अब इस मे فليغيرن خلق الله से बाज़ उलेमा ने यह इस्तदलाल किया कि इसमें दाढ़ी मुंडवाना भी शामिल है।
इमाम अल-ग़ज़ाली ने भी ज़ाहिरी सुरत को मर्द और औरत के दरमियान इम्तियाज़ क़रार दिया है। फ़रमाते हैं: "दाढ़ी मर्दों की पूरी ख़लक़त मे दाख़िल है ज़ाहिरी सुरत मे औरतो और मर्दों के दरमियान इम्तियाज़ है।"
और ख़लक़त (शक्ल) मे तब्दीली को शैतानी फ़आल क़रार दिया है ।
(2) रसूल अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: احفو االشوارب واعفو االلحى ولا تشبهو ا بالیھود ۔
(الطحاوی فی شرح معانی الآثار ۲ ص
( ۳۳۳
अपनी मूँछें काटो, अपनी दाढ़ी बढ़ाओ, और यहूदियों के साथ मुशबिहत अख़्तियार मत करो।
एक रिवायत में ईसाईयों और मजूसीयो का ज़िक्र है कि दाढ़ी रखकर उनकी मुख़्तलिफ़त करो।
इन अहादीस और अक़वाल से, दाढ़ी में कम से कम इतना तो निश्चित रूप से साबित होता है कि जो लोग सिर्फ़ फैशन के लिए और दूसरों की नक़ल के लिए अपनी दाढ़ी काटते हैं, वे हराम काम का इर्तक़ब करते हैं और इसकी हुरमत के बारे में कोई शुबाह नहीं है क्योंकि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ज़ाहिरी चीज़ों मे भी इस्लाम के दुश्मनों की भी मुख़ालिफ़त करने का हुक्म दिया है।
शैख़ उल इस्लाम इमाम इब्न तैमियाह का कहना है कि बाहरी चीज़ों में ग़ैरों की मुशाबहत का असर आंतरिक चीज़ों पर भी पड़ता है और अपना और अपने दीन का तसख़्ख़ुस (पहचान) ख़त्म हो जाती है और इस पर मुतादिद तजुर्बात शाहिद हैं। और फ़िर कुरआन व सुन्नत और उम्मत की आम सहमति से यह साबित है कि इस तरह के बाहरी मामलों में काफ़िरों की मुख़ालिफ़त (विरोध) ज़रूरी है क्योंकि वे बातिनी क़ुर्बत का ज़रिया (आंतरिक निकटता का स्रोत) बन जाते हैं या उनसे ज़रिया बनने का अंदेशा (डर) पैदा हो।
इसमें कोई शक नहीं कि जो लोग पैगंबर ﷺ की इस सुन्नत मुबारका को हक़ीर समझकर उसे तर्क करते हैं और इसके हराम होने मे भी कोई शुबाह नही। दाढ़ी तो एक अहम सुन्नत है एक आम सुन्नत को भी हक़ीर समझना या उससे मज़ाक़ करना ना सिर्फ़ हराम है बल्कि यह बाज़ औक़ात कुफ्र तक पहुँचा देता है।
उलेमा ने वज़ाहत के साथ लिखा - -
الا سنھائة والا ستهزاء على الشريعة كفر
(شرح عقائد)
कि शरियत के काम को हक़ीर (तुच्छ) समझना या उसका मज़ाक उड़ाना कुफ़्र है।
मुल्ला अली क़ारी तर्क सुन्नत के बारे मे एक हदीस की वज़ाहत करते करते हुए लिखते हैं कि जो शख़्स अल्लाह के रसूल की सुन्नत को छोड़ता है, वह काफ़िर और मलऊन (शापित) है, और जो सुस्ती और काहिली से तर्क कर देता है वह आसी व नाफ़रमान है।
अल्लामा इब्न हम्माम "फतह अल-क़ादिर" में कहते हैं कि जो कोई भी शरीयत के किसी काम को कुफ्रिया अल्फाज़ से मज़ाक करे तो वह कुफ़्र की तरह है।
हमारे यहाँ यह बीमारी है कि लोग लोग सुन्नत ए नबवी ﷺ दाढ़ी के तरह तरह के नाम ले कर मज़ाक़ करते हैं और इसे हक़ीर इस हद तक समझा जाता है कि कुछ जाहिल (अज्ञानी) औरते अपने ख़ाविंद को दाढ़ी मुंडवाने के लिए मजबूर कर देती हैं और बाज़ बेदीन घराने (अधर्मी परिवार) शादी में दाढ़ी मुंडवाने के लिए शर्तें लगाते हैं।
ऐसे लोगों को रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के यह इर्शादात अपने सामने रखकर अपने अंजाम की ख़ैर माननी चाहिए कि रसूल अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की शक्ल व सूरत को ना सिर्फ़ क़बूल किया, बल्कि उनका मज़ाक भी उड़ाया। उनका ठिकाना आख़िर कहां होगा यह कोई मामूली बात नहीं है। کبرت کلمۃ تخرج من افواھم यह बहुत बड़ी बात है जो उनके मुंह से निकलती है, इसलिए इस अंदाज़ से इस सुन्नत को तर्क करने के हराम होने मे कोई शुबाह नही।
दाढ़ी की हद :-
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दाढ़ी के मुढवाने के नाजायज़ होने पर तो कोई इख़्तिलाफ़ नही हाँ अलबत्ता दाड़ी की हद पर इख़्तिलाफ़ है यह कितनी लंबी होनी चाहिए।
दाढ़ी कटवाने के जवाज़ मे तिर्मिज़ी की यह हदीस पेश की जाती है
ان النبی ﷺ یا خذ من لحته من عرضحا و طولها ۔ ( ترمذی مترجم ج ۲ ابواب الاستئذان و الادب باب ماجاء في الاخذ من الحية ص۲۴۹)
के नबी ﷺ अपनी रेश मुबारक की अर्ज़ से भी और तौल से भी कुछ तरशवा देते थे।
इस हदीस की सेहत मे कलाम होने के बावजूद आइम्मा दीन की तसरीहात से यह मालूम होता है कि वह दाढ़ी एक मुश्त से कम रखने को जायज़ नही समझते थे। हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर के बारे में आता है कि वह एक बालिश्त से ज़्यादा बाल तरशवा देते थे।
जब की दाढ़ी बढ़ाने वाली अहादीस के रावी भी ख़ुद हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर हैं।
तमाम रिवायत और अक़वाल व अफ़आल का तजज़िया करते हुए हम यह कह सकते हैं कि शरियत का प्रतिवादी (اض مدعا) तो यह है कि दाढ़ी रखी जाये, हरगिज़ मुढवाई ना जाये और अफ़ज़ल व बेहतर यही है मुकम्मल दाढ़ी हो और ज़्यादा से कम ना कि जाये हाँ अगर दाढ़ी का बे-ढंगापन दूर करने के लिए कुछ बाल तौल व अर्ज़ से कम कर लिये जाये तो इसमे बज़ाहिरी कोई शरई
इस तरह एक मुश्त से कम कराने से परहेज़ किया जाये लेकिन एक मुश्त से कम पर लफ़्ज़ दाढ़ी का इत्तलाक़ होगा और इस दाढ़ी को भी हम नाजायज़ नही कह सकते और यह दाढ़ी भी मुढवाने से तो बेहतर है। ख़ास कर जब कोई शख़्स सुन्नत नबवी समझ कर रखे तो उस पर ऐतराज़ नही करना चाहिए लेकिन उसे दाढ़ी बढ़ाने की तलक़ीन करनी चाहिए। हाँ अगर कोई थोड़ी सी दाढ़ी महज़ फ़ैशन के तौर पर रखता है तो उससे हमे कोई ग़र्ज़ नही।