18/08/2022
सादर आभार - गुरुदेव पं. कौशल दत्त शर्मा 🙏
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत 19 अगस्त का श्रेयस्कर है।*
*मासि भाद्रपदेऽष्टम्यां कृष्णपक्षेऽर्द्धरात्रके।* *भाद्रकृष्णाष्टम्यां कृष्णस्य पूजनं व्रतं च...*
जो इस दिन भगवान श्री कृष्ण का पूजन और व्रत नहीं करते हैं वे अगले जन्मों में घने जंगल में भयंकर नागिन बनते हैं। कहा है...
*नरो वा यदि वा नारी कृष्णजन्माष्टमीव्रतम्।*
*न करोति तदा घोरा व्याली भवति कानने।।*
और भी कहा है...
*अकुर्वन्निरयं याति यावदिन्द्राश्चतुर्दश।*
और भी...
*न करोति नरो यस्तु भवति क्रूर राक्षसः*
अर्थात् ऐसे लोग चौदह इन्द्रों के शासन काल तक नरक भोगते हैं। और क्रूर राक्षस होते हैं अर्थात् व्रत पूजन न करने पर पाप और करने पर यथेष्ट प्राप्त होता है।
विशेष बात यह है कि यह व्रत नित्य है अतः इसमें संकल्पादि करने की आवश्यकता नहीं है।
सभी आस्थावान सनातनियों एवं धर्म निर्णय जगत् से जुड़े मनिषियों के लिए चिन्तनीय है कि व्रतोपवास में हम कौनसे निर्णय को प्राथमिकता दें।
1. स्मार्त वैष्णव या अन्य किसी निर्णय या मत को।
2. अष्टमी तिथि कौनसी ग्रहण करें- शुद्धा-विद्धा, पूर्वा-परा, कालकर्म व्यापिनी-उदयव्यापिनी या अन्य को।
3. पंचांग दृग् पक्षीय या सौर पक्षीय या अन्य को।
4. निर्णय अपने क्षेत्र के पंचांगो का माने या अन्य किसी प्रसिद्ध पंचांग का।
5. रोहिणी नक्षत्र को महत्व दें या कालकर्मव्यापिनी अष्टमी तिथि को महत्व दें। या अष्टमी की मध्यरात्रि को महत्व दें।
6. ऐसे ही किस धर्म ग्रंथ का निर्णय सर्वजनीन हैं आदि।
*ध्यान देने योग्य बात है कि स्मार्त वैष्णव निम्बार्कादि निर्णय केवल एकादशी और अष्टमी तिथि पर ही लागू होते हैं अन्य किसी तिथि व्रत या पर्व पर लागू नहीं है।*
सूर्य सिद्धांत ज्योतिष शास्त्र का परम वेद है। ग्रहणादि का मान दृग् पंचांग से और तिथ्यादि का मान सौर पंचांग से शास्त्रों में अभिहित हैं...
*सूर्य सिद्धांत शास्त्रेण समवेताग्रहास्तथा।*
*नित्य कर्मण्युपादेया न तु दृग्गणितागता:।*
विष्णु धर्मोत्तर में...
*यन्त्रवेधादिना ज्ञातं यद्बीजं गणकैस्तथा।*
*ग्रहणादि परीक्षेत न तिथ्यादि कदाचन।*
*अतः मैंने बार-बार कहा है कि सौर पक्षीय पंचांगों के अनुसार जन्माष्टमी व्रत और कृष्ण जयन्ती पूजन 19 अगस्त को ही उपयुक्त और शास्त्रीय हैं। क्योंकि सौर पंचांगों में अष्टमी को लेकर मतभिन्नता नहीं है।*
*हां दृग् पक्षीय पंचांगों में सप्तमी अष्टमी का भेद है। इस बार की विषम परिस्थितियों में धर्म ग्रंथों के कुछ वाक्य दृष्टव्य हैं।...*
*वर्जनीया प्रयत्नेन सप्तम्या संयुताष्टमी।*
*सऋक्षापि न कर्तव्या सप्तम्या संयुता यदि।।*
अपि च...
*अलाभे रोहिणी भस्य कार्याष्टम्यस्तगामिनी*
*तत्रोपवासं कृत्वैव तिथ्यन्ते पारणं भवेत्।।*
और भी
*उदये चाष्टमी किञ्चिन्नवमी सकला यदि।*
तत्वचिन्तामणि में महेश ठक्कुर के अनुसार नवमीयुता अष्टमी ही जयन्ति व्रत करणीय है।
*नवमीयुक्तायामेवाष्टम्यां जयन्ती व्रतम्।*
ये भी सत्य है कि इस दिन कृष्ण जन्माष्टमी और कृष्ण जयन्ती ये दो कर्म कर्तव्य हैं।
इस बार 18 व 19 अगस्त दोनों दिन रोहिणी नक्षत्र का अभाव है परन्तु 19 को देर रात में रोहिणी तो रोहिणी नक्षत्र आल्हा है ...
*दिवा वा यदि वा रात्रौ नास्ति चेद्रोहिणीकला।*
*रात्रि युक्ता प्रकुर्वीत विशेषेणेन्दु संयुतम्।।*
19 को निशीथ काल में तो रोहिणी नक्षत्र का स्पर्श है ही। जो नवमी तिथि में है। चन्द्रोदय भी वहीं है।
*मुहूर्तेनापि संयुक्ता सम्पूर्णा साष्टमी भवेत्।*
*किं पुनर्नवमी युक्ता कुलकोट्यास्तु मुक्तिदा।*
और भी
*औदयिकीमुहूर्तमात्राऽपि ग्राह्या।*
और भी
*वर्जनीया प्रयत्नेन सप्तमी सहिताष्टमी।*
*निशीथव्यापिन्यामिति केचित्।*
*प्रदोष व्यापिन्यामपि केचन् वदन्ति।*
*अष्टमी क्षये तु सप्तमीविद्धैव ग्राह्या एकादशीवत्।*
हेमाद्रि- चतुर्वर्गचिन्तामणि, समय प्रकाश- वीरमित्रोदय, समय मयूख आदि ग्रन्थों ने जन्माष्टमी को स्मार्त वैष्णव में विभाजन नहीं किया है। ऐसे और भी शास्त्रीय आदेश ग्रन्थ हैं जहां भेद नहीं है। ये भेद कालान्तर के हैं। पर हैं सर्वमान्य।
इस प्रसंग में परम पूज्य श्री करपात्री जी स्वामी एवं ओझा जी का *धर्मकृत्योपयोगी तिथ्यादिनिर्णय: कुम्भपर्वनिर्णयश्च* बहुत ही सार्थक है। और श्री कृष्णानंद जी उपाध्याय की *धर्मशिक्षा मित्र प्रश्नोत्तरी* भी सहायक है। ऐसी स्थिति में पुरा ग्रन्थों के साथ निर्णय सिन्धु धर्म सिन्धु जयसिंह कल्पद्रुम आदि का मूल मार्ग प्रशस्त करता है।
हेमाद्रि ने कहा है...
*वर्षे वर्षे तु कर्तव्या तुष्ट्यर्थं चक्रपाणि न:।।*
*ये न कुर्वन्ति जानन्त: कृष्ण जन्माष्टमी व्रतम्।*
*ते भवन्ति महाप्राज्ञ व्यालाः स्युस्ते हि कानने।।*
व्रत करने का माहात्म्य-
*जन्माष्टमी व्रतं ये वै प्रकुर्वन्ति नरोत्तमा:।*
*कारयन्ति च विप्रेन्द्र लक्ष्मीस्तेषां सदा स्थिरा।।*
*पुत्रसंतानमारोग्यं सौभाग्यमतुलं भवेत्।*
पुनश्च विनम्र अनुरोध है जन्माष्टमी व्रत 19 अगस्त का ही करना चाहिए जो 18 अगस्त से सर्वविध श्रेयस्कर है।
*करोतु न: शिव: शिवम्*