Shivalik Yoga Studio

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सनातन धर्म में सङ्कल्प का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। कोई भी पूजा/जप/साधना से पहले सङ्कल्प लिया जाता है तभी वो कार्य सिद्ध...
02/11/2023

सनातन धर्म में सङ्कल्प का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। कोई भी पूजा/जप/साधना से पहले सङ्कल्प लिया जाता है तभी वो कार्य सिद्ध होता है। बिना सङ्कल्प के किया गया पूजा/जप/साधना अधूरा फल देती है ऐसा विद्वानों के मुख से सुना है।
सङ्कल्प संस्कृत में लेते है। परन्तु कुछ बन्धु संस्कृत नही बोल पाते या जानते नही उनके लिए मैं नीचे हिंदी में सङ्कल्प लिख रहा हूं। आप पूजा से पहले हिंदी में सङ्कल्प ले सकते है।

दाएं हाथ में अक्षत पुष्प और जल लेकर बोलें -

भगवान विष्णु को प्रणाम है, भगवान विष्णु को प्रणाम है, भगवान विष्णु को प्रणाम है,
यह ब्रह्मा जी के द्वितीय परार्ध का श्री स्वेतवाराह कल्प कल्प चल रहा है,
जिसके वैवस्वत मन्वंतर के अट्ठाइसवें कलयुग के प्रथम चरण में,
भू लोक में, जम्बूद्वीप में, भारतवर्ष के, भरत खंड में,
भारत देश के (अमुक) राज्य के,
(अमुक) अमुक नगर या जनपद के (अमुक ) ग्राम/मोहल्ले में स्थित
अपने घर में/(अमुक) मंदिर में बौद्धवतार के पिंगल नाम संवत्सर के, (अमुक) मास के, (अमुक) तिथि, (अमुक) वार को, प्रातः/मध्याह/सायं काल में मैं (अमुक) गोत्र में उत्पन्न (अमुक नाम) शर्मा/वर्मा/गुप्ता/दास अपने अमुक कार्य के लिए अमुक स्तुति/जप/सहस्त्रनाम/पूजा/कवच का अमुक संख्या में जप का संकल्प लेता हूं। ( उदहारण - अपने वर्तमान रोग से मुक्ति के लिए विष्णु जी के तीन नामों का १० हजार संख्या में जप का संकल्प लेता हूं। जिनको अपना गोत्र न पता हो वो कश्यप गोत्र का उच्चारण करें। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शुद्र वर्ण के व्यक्ति अपने नाम के पीछे क्रमश: शर्मा, वर्मा, गुप्त और दास लगावें। भगवान शिव के भक्त संकल्प के शुरू में भगवान शिव को प्रणाम है ऐसा बोलें।)

ये कहने के बाद हाथ में जो अक्षत पुष्प और जल लिया था वो जमीन पर छोड़ देवे।

अगर किसी बन्धु से ये भी नही बोला जा रहा हो तो उसके लिए विकल्प में छोटा सङ्कल्प -

मैं (अमुक नाम) शर्मा/वर्मा/गुप्ता/ दास (अमुक गोत्र) गोत्र में उत्पन्न विष्ण भक्त हूं, मेरे लिए तिथि भी श्री विष्णु हैं, वार भी श्री विष्णु हैं, नक्षत्र भी श्री विष्णु है और यह सारा संसार ही श्री विष्णुमय है।
उन्ही श्री विष्णु की प्रसन्नता और अपनी अमुक मनोकामना की पूर्ति के लिए अमुक व्रत/पूजा/जप करने का संकल्प लेता हूं।

(यहां अपने इष्ट के अनुसार भगवान शिव, माता दुर्गा, गणेश जी आदि का भी नाम ले सकते हैं)

साभार:E - समिधा

09/05/2023

नपुंसकता / ध्वजभग्न का उपचार

(ये लेख केवल जानकारी के लिए है, इनमे से कोई भी नुस्खा वैध्य की सलाह से ही प्रयोग में ले)

कई लोगों का मश्वरा मिलने के बाद यह लेख आप
सब की ख़िदमत में पेश कर रहा हूँ। इस में
नामर्दानगी को दूर करने के 122 तरीक़े
बताया गया है। उम्मिद है कि जिस
किसी को भी यह परेशानी होगी। इस से वह
फ़ायदा उठाऐंगे। तो आइये सब से पहले इस
को पूरा पढ लिया जाए।

नपुंसकता
(IMPOTENCY)
परिचय:
जो व्यक्ति यौन संबन्ध नहीं बना पाता या जल्द
ही शिथिल हो जाता है, वह
नपुंसकता का रोगी होता है। इसका सम्बंध सीधे
जननेन्द्रिय से होता है। इस रोग में
रोगी अपनी यह परेशानी, किसी दूसरे
को नहीं बता पाता या सही उपचार नहीं करा पाता,
मगर जब वह पत्नी को संभोग के दौरान
पूरी सन्तुष्टि नहीं दे पाता,
तो रोगी की पत्नी को पता चल ही जाता है कि वह
नंपुसकता के शिकार हैं। इससे पति-पत्नी के बीच
में लड़ाई-झगड़े होते हैं और कई तरह के पारिवारिक
मन मुटाव हो जाते हैं। बात यहां तक भी बढ़
जाती है कि आखिरी में उन्हें अलग होना पड़ता है।
कुछ लोग शारीरिक रूप से नपुंसक नहीं होते, लेकिन
कुछ प्रचलित अंधविश्वासों के चक्कर में फसकर,
सेक्स के शिकार होकर मानसिक रूप से नपुंसक
हो जाते हैं। मानसिक नपुंसकता के
रोगी अपनी पत्नी के पास जाने से डर जाते हैं।
सहवास भी नहीं कर पाते और मानसिक
स्थिति बिगड़ जाती है।
कारण :
नपुंसकता के दो कारण होते हैं। शारीरिक और
मानसिक। चिन्ता और तनाव से ज्यादा घिरे रहने
से मानसिक रोग होता है। नपुंसकता शरीर
की कमजोरी के कारण होती है। ज्यादा मेहनत करने
वाले व्यक्ति को जब पौष्टिक आहार नहीं मिल
पाता, तो कमजोरी बढ़ती जाती है और
नपुंसकता पैदा हो सकती है। हस्तमैथुन,
ज्यादा काम-वासना में लगे रहने वाले नवयुवक
नपुंसक के शिकार होते हैं। ऐसे
नवयुवकों की सहवास की इच्छा कम हो जाती है।
लक्षण:
मैथुन के योग्य ना रहना, नपुंसकता का मुख्य
लक्षण है। थोड़े समय के लिए कामोत्तेजना होना,
या थोड़े समय के लिए ही लिंगोत्थान होना,
इसका दूसरा लक्षण है। मैथुन अथवा बहुमैथुन के
कारण उत्पन्न ध्वजभंग नपुंसकता में शिशन पतला,
टेढ़ा और छोटा भी हो जाता है। अधिक अमचूर
खाने से धातु दुर्बल होकर नपुंसकता आ जाती है।
1. हेल्थ टिप्स:
• नपुंसकता से परेशान रोगी को औषधियों खाने के
साथ कुछ और बातों का ध्यान रखना चाहिए। जैसे
सुबह शाम किसी पार्क में घूमना चाहिए, खुले मैदान
में, किसी नदी या झील के किनारे घूमना चाहिए।
सुबह सूर्य उगने से पहले घूमना ज्यादा लाभदायक
है। सुबह साफ पानी और हवा शरीर में पहुंचकर
शक्ति और स्फूर्ति पैदा करती है। इससे खून
भी साफ होता है।
• नपुंसकता के रोगी को अपने खाने (आहार) पर
ज्यादा ध्यान देना चाहिए। आहार में पौष्टिक
खाद्य पदार्थों घी, दूध, मक्खन के साथ सलाद
भी ज़रूर खाना चाहिए। फ़ल और फ़लों के रस के
सेवन से शारीरिक क्षमता बढ़ती है।
नपुंसकता की चिकित्सा के चलते रोगी को अश्लील
वातावरण और फिल्मों से दूर रहना चाहिए,
क्योंकि इसका मस्तिष्क पर हानिकारक प्रभाव
पड़ता है। इससे बुरे सपने भी आते हैं, जिसमें
वीर्यस्खलन होता है।
2. ईसबगोल :
• ईसबगोल की भूसी 5 ग्राम और मिश्री 5 ग्राम
दोनों को रोज सुबह के समय खायें और ऊपर से
दूध पी लें। इससे शीध्रपतन की विकृति खत्म
होती है।
• ईसबगोल की भूसी और बड़े गोखरू का चूर्ण
20-20 ग्राम तथा छोटी इलायची के
बीजों का चूर्ण 5 ग्राम इन सबका चूर्ण बनाकर
रोज 2 चम्मच गाय के दूध के साथ लें।
3. सफेद प्याज :
• सफेद प्याज़ का रस 8 मिलीलीटर, अदरक
का रस 6 मिलीलीटर और शहद 4 ग्राम, घी 3
ग्राम मिलाकर 6 हफ्ते खाने से नपुंसकता खत्म
हो जाती है।
• सफेद प्याज़ को कूटकर दो लीटर रस निकाल लें।
इसमें 1 किलो शुद्ध शहद मिलाकर धीमी आग पर
पकायें, जब सिर्फ शहद ही बच कर रह जाए,
तो आग से उतार लें और उसमें आधा किलो सफेद
मूसली का चूर्ण मिलाकर चीनी या शीशे के बर्तन
में भर दें। 10 से 20 ग्राम तक दवा सुबह-शाम
खाने से नामर्दी मिट जाती है।
4. जामुन :
जामुन की गुठली का चूर्ण रोज गर्म दूध के साथ
खाने से धातु (वीर्य) का खत्म होना बन्द
हो जाता है।
5. छुहारे :
• छुहारे को दूध में देर तक उबालकर खाने से और
उसी दूध को पीने से नपुंसकता खत्म होती है।
• रात को पानी में दो छुहारे और 5 ग्राम किशमिश
भिगो दें। सुबह को पानी से निकालकर दोनों मेवे
को दूध के साथ खायें।
6. बादाम :
• बादाम की गिरी, मिश्री, सौंठ और काली मिर्च
कूट-पीसकर चूर्ण बनाकर, कुछ हफ्ते खाने से और
ऊपर से दूध पीने से धातु (वीर्य) का खत्म
होना बन्द होता है।
• बादाम को गर्म पानी में रात में भींगने दें। सुबह
थोड़ी देर तक पकाकर पेय बनाकर 20 से 40
मिलीलीटर रोज़ पीऐं, इससे मूत्रजनेन्द्रिय संस्थान
के सारे रोग खत्म हो जाते हैं।
7. गाजर :
• रोज गाजर का रस 200 मिलीलीटर पीने से मैथुन
शक्ति (संभोग) बढ़ती है।
• गाजर का हलवा, रोज़ 100 ग्राम खाने से सेक्स
की क्षमता बढ़ती है।
8. कौंच :
• कौंच के बीज के चूर्ण में तालमखाना और
मिश्री का चूर्ण बराबर मात्रा में मिलाकर 3 - 3
ग्राम की मात्रा में खाने और दूध के साथ पीने से
नपुंसकता (नामर्दी) ख़त्म होती है।
• कौंच के बीजों की गिरी तथा राल ताल मखाने के
बीज। दोनों को 25 - 25 ग्राम की मात्रा में लेकर
पीसकर छान लें, फिर इसमें 50 ग्राम
मिस्री मिला लें। इसमें 2 चम्मच चूर्ण रोज़ दूध के
साथ खाने से लाभ होता है।
9. गिलोय : गिलोय, बड़ा गोखरू और
आंवला सभी बराबर मात्रा में लेकर कूट पीसकर
चूर्ण बना लें। 5 ग्राम चूर्ण रोज़ मिस्री और
घी के साथ खाने से प्रबल मैथुन शक्ति विकसित
होती है।
10. जायफल :
• जायफल का चूर्ण लगभग आधा ग्राम शाम
को पानी के साथ खाने से 6 हफ्ते में ही धातु
(वीर्य) की कमी और मैथुन में कमजोरी दूर होगी।
• जायफल का चूर्ण एक चौथाई चम्मच सुबह -
शाम शहद के साथ खाऐं और इसका तेल सरसों के
तेल के मिलाकर शिश्न (लिंग) पर मलें।
11. बेल :
• बेल के पत्तों का रस 20 मिली लीटर निकालकर,
उसमें सफेद जीरे का चूर्ण 5 ग्राम,
मिस्री का चूर्ण 10 ग्राम के साथ खाने और दूध
पीने से शरीर की कमजोरी ख़त्म होती है।
• बेल के पत्तों का रस लेकर, उसमें
थोड़ा सा शहद मिलाकर शिश्नि पर 40 दिन तक
लेप करने से नपुंसकता में लाभ होगा।
12. सफेद मूसली :
• सफेद मूसली और मिस्री, बराबर मिलाकर,
पीसकर चूर्ण बना कर रखें और चूर्ण बनाकर 5
ग्राम सुबह - शाम दूध के साथ खाने से शरीर
की शक्ति और खोई हुई मैथुन शक्ति, वापस मिल
जाती है।
• सफेद मूसली 250 ग्राम बारीक चूर्ण बना लें।
उसे 2 लीटर दूध में मिलाकर खोया बना लें। फिर
250 ग्राम घी में डालकर इस खोए को भून लें।
ठंडा हो जाने पर आधा किलो पीसकर शक्कर
(चीनी) मिलाकर पलेट या थाली में जमा लें। सुबह -
शाम 20 ग्राम खाने से काम शक्ति बढ़ती है।
• सफेद मूसली, सतावर, असगंध 50 - 50 ग्राम
कूट छान कर, 10 ग्राम दवा सोते समय 250
मिली लीटर, कम गर्म दूध में खांड़ के संग मिलाकर
लें।
• सफेद मूसली 20 ग्राम, ताल मखाने के बीज
200 ग्राम और गोखरू 200 ग्राम।
तीनों को पीसकर चूर्ण बनाकर रखें, फिर इसमें से
5 ग्राम चूर्ण दूध के साथ खायें।
• सफेद मूसली और मिस्री, बराबर मात्रा में कूट
पीसकर चूर्ण बनाकर 6 ग्राम की मात्रा में खाने
से नपुंसकता (नामर्दी) खत्म होती है।
13. चना:
भीगे चने सुबह - शाम चबाकर खाने से ऊपर से
बादाम की गिरी खाने से, मैथुन शक्ति बढ़ती है
और नंपुसकता ख़त्म होती है।
14. शतावर:
• शतावर को दूध में देर तक उबाल कर
मिस्री मिला लें और उस दूध को पीने से ही कुछ
महीनों में नपुंसकता (नामर्दी) ख़त्म हो जाती है।
• शतावर, असगंध, एला, कुलंजन और वंशलोचन
का चूर्ण बनाकर रखें। 3 ग्राम चूर्ण में 6 ग्राम
शक्कर को मिलाकर खाने से और फिर ऊपर से दूध
पीने से कुछ महीनों में नपुंसकता (नामर्दी) ख़त्म
होती है।
• शतावर और असगन्ध के 4 ग्राम चूर्ण को दूध
में उबाल कर पीने से नपुंसकता (नामर्दी) दूर
होती है।
• शतावर का चूर्ण 10 ग्राम से 20 ग्राम
को चीनी मिले दूध में, सुबह - शाम डालकर पीऐं,
इससे नपुंसकता दूर होती है। शरीर
की कमजोरी भी दूर होती है।
15. सेमल:
• सेमल के पेड़ की छाल के 20 मिली लीटर रस में
मिस्री मिलाकर, पीने से शरीर में वीर्य और मैथुन
शक्ति बढ़ती है।

• 10 - 10 ग्राम सेमल के चूर्ण और
चीनी को 100 मिली लीटर पानी के साथ घोट कर
सुबह - शाम लेने से बाजीकरण यानी संभोग
शक्ति ठीक होती है और नपुंसकता भी दूर
हो जाती है।
16. बड़ी गोखरू:
• बड़ी गोखरू का फांट या घोल सुबह - शाम लेने
से काम शक्ति यानी संभोग की वृद्धि दूर होती है।
250 मिलीलीटर को खुराक के रूप में सुबह और
शाम सेवन करें।
• बड़ा गोखरू और काले तिल, इन दोनों को 14
ग्राम की मात्रा में कूट - पीस लें। फिर इस को 1
किलो गाय के दूध में पकाकर खोआ बना लें। यह
एक मात्रा है। इस खोयें को खाकर ऊपर से 250
मिली लीटर गाय के निकाले दूध के साथ पी लें।
40 दिन तक इसको खाने से नपुंसकता दूर
हो जाती है।
• 25 ग्राम बड़ी गोखरू के फल का चूर्ण, 250
मिली लीटर उबले पानी में डालकर रखें। इसमें से
थोड़ा - थोड़ा बार - बार पिलाने से
कामोत्तेजना बढ़ती है।
• बड़ी गोखरू के फल का चूर्ण 2 ग्राम
को चीनी और घी के साथ सेवन करें तथा ऊपर से
मिस्री मिले दूध का सेवन करने से
कामोत्तेजना बढ़ती है।
17. गोखरू :
• हस्तमैथुन की बुरी लत से पैदा हुई
नपुंसकता को दूर करने के लिए 1 - 1 चम्मच,
गोखरू के फ़ल का चूर्ण और काले तिल को मिलाकर
शहद के साथ दिन में 3 बार नियमित रूप से कुछ
हफ्तों तक सेवन करें। इससे नपुंसकता में लाभ
होता है।
• गोखरू, कौंच के बीज, सफेद मूसली, सफेद सेमर
की कोमल जड़, आंवला, गिलोय का सत और
मिस्री, बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। 10
ग्राम से लगभग 20 ग्राम तक चूर्ण दूध के साथ
खाने से नपुंसकता और वीर्य की कमजोरी दूर
होती है।
• गोखरू को 3 बार दूध में उबालकर तीनों बार
सुखाकर चूर्ण बनाकर खाने से नपुंसकता दूर
होती है।
• गोखरू का चूर्ण और तिल बराबर मिलाकर
बकरी के दूध में पकाकर शहद में मिला लें और
खायें। इससे अनेक प्रकार की नपुंसकता ख़त्म
होती है।
• देशी गोखरू 150 ग्राम पीसकर छान लें। इसे 5
- 5 ग्राम सुबह - शाम शहद में मिलाकर चाटने से
नपुंसकता (नामर्दी) में लाभ मिलता है।
• गोखरू, तालमखाना, शतावर, कौंच के
बीजों की गिरी, बड़ी खिरेंटी तथा गंगरेन इन
सबको 100 ग्राम की मात्रा में लेकर पीस लें। इस
चूर्ण को 6 ग्राम से 10 ग्राम तक की मात्रा में
रात के समय फांककर ऊपर से गरम दूध पियें। 60
दिनों तक रोज़ खाने से वीर्य बढ़ता है और
नपुंसकता दूर होती है।
18. विदारीकन्द :
• विदारीकन्द के चूर्ण को घी, दूध और गूलर के
रस के साथ खाने से प्रौढ़ पुरुष
भी नवयुवकों की तरह मैथुन शक्ति प्राप्त कर
सकता है।
• 5 ग्राम विदारीकन्द को पीसकर लुगदी बना लें।
इसे खाकर ऊपर से 5 ग्राम देशी घी और
मिस्री मिलाकर, दूध के साथ पियें। यह बल और
वीर्य को बढ़ाता है तथा इससे नपुंसकता दूर
होती है।
19. सूखे सिंघाड़े :
सूखे सिंघाड़े को कूट पीसकर घी और चीनी के साथ
हलवा बनाकर खाने से कुछ ही हफ्ते में
नपुंसकता ख़त्म हो जाती है।
20. तरबूज़:
तरबूज़ के बीजों की गिरी 6 ग्राम, मिस्री 6 ग्राम
मिलाकर, चबाकर खाने से और ऊपर से दूध पीने से
शरीर में शक्ति विकसित होने से
नपुंसकता (नामर्दी) ख़त्म होती है।
21. गेंदे के बीज:
गेंदे के बीज 4 ग्राम और मिस्री 4 ग्राम
को पीसकर कुछ दिनों तक खाने से वीर्य स्तंभन
शक्ति का विकास होता है।
22. कैथ:
कैथ के सूखे पत्तों का चूर्ण 6 ग्राम रोज़ खाकर
ऊपर से मिस्री मिलाकर, दूध पीने से धातु (वीर्य)
बढ़ता है।
23. उड़द :
• उड़द की दाल 40 ग्राम को पीसकर शहद और
घी में मिलाकर खाने से पुरुष कुछ दिनों में ही मैथुन
(संभोग) करने के लायक बन जाता है।
• उड़द की दाल के थोड़े से लड्डू बना लें। उसमें से
2 - 2 लड्डू खायें और ऊपर से दूध पी लें। इससे
नपुसकता दूर होती है।
24. इमली:
इमली के बीजों को भून लें, फिर उनके छिलके अलग
करके, उनका चूर्ण बनाकर रोज़ 3 ग्राम चूर्ण
मिस्री के साथ खाने से वीर्य शक्ति बढ़ने
लगती है और नपुंसकता दूर हो जाती है।
25. तुलसी :
• तुलसी की जड़ और ज़मीकन्द को पान में रखकर
खाने से शीघ्रपतन की विकृति खत्म होती है।
• धातु दुर्बलता में तुलसी के बीज 1 ग्राम दूध के
साथ सुबह - शाम सेवन करने से लाभ मिलता है।
• तुलसी के बीज या तुलसी की जड़ के चूर्ण में
पुराना गुड़ समान मात्रा में मिलाकर 3 - 3 ग्राम
की गोली बना लें। इसकी 1 - 1 गोली सुबह -
शाम गाय के ताजे दूध के साथ लेते रहें। इससे
नपुंसकता (नामर्दी) दूर होती है।
• तुलसी की मंजरी या जड़ के 1 से 3 ग्राम
बारीक चूर्ण में गुड़ मिलाकर ताजे दूध के साथ लेने
से नपुंसकता दूर होती है।
26. गंधक:
गंधक और शहद को पीसकर लेप बना लें। इस लेप
को शिश्न (लिंग) पर लेप करें। इससे वीर्य स्तंभन
शक्ति में वृद्धि होती है।
27. काली मूसली:
• काली मूसली का पाक बनाकर खाने से
नपुंसकता समाप्त हो जाती है।
• काली मूसली 10 ग्राम की मात्रा में लेकर दूध
के साथ खाने से लाभ होता है।
• काली मूसली की जड़ का चूर्ण 3 से 6 ग्राम
की मात्रा में सुबह शाम मिस्री मिले, हल्के गर्म
दूध के साथ खाने से नपुंसकता में कुछ हद तक
लाभ होता है।
28. काले तिल:
काले तिल, सोंठ, पीपल, मिर्च, भारंगी और गुड़
समान मात्रा में मिलाकर काढ़ा बनायें। इस काढ़े
को 21 दिनों तक पीने से शरीर की गर्मी बढ़ती है।
29. जावित्री: जावित्री डेढ़ ग्राम, जायफल 10
ग्राम, बड़ी इलायची 10 ग्राम और अफीम
आधा ग्राम को मिलाकर बारीक चूर्ण बना लें।
इसके 2 ग्राम चूर्ण को शहद में मिलाकर
सर्दियों में लगभग एक महीने तक खाने से
नपुंसकता मिट जाती है। याद रहे, अफ़ीम नशाआवर
है।
30. ग्वारपाठा:
ग्वारपाठे का गूदा और गेहूं का आटा बराबर
मात्रा में लेकर घी मिला लें। फिर इसके दुगुने वज़न
के बराबर शक्कर (चीनी) लेकर हलुआ बनाकर खाने
से 7 दिन में नपुंसकता दूर होती है।
31. गुलाबजल:
3 बोतल गुलाबजल में 10 ग्राम सोने
का बुरादा डालकर कूटकर मिला लें। जब सब
गुलाबजल उसमें समा जायें, तब निकालकर रख लें।
लगभग आधा ग्राम मलाई में मिलाकर खाने से
सहवास करने से जल्दी ही वीर्य पतन
नहीं होता है।
32. अगर का चोया:
अगर का चोया, पान में मिलाकर खाने से नामर्दी में
लाभ होता है।
33. घी :
सहवास से 1 घण्टा पहले शिश्न पर लगभग 1
ग्राम के चौथे भाग घी की मालिश करने से
नपुंसकता नहीं रहती है।
34. मालकांगनी :
मालकांगनी के तेल की 10 बूंदे नागबेल के पान पर
लगाकर खाने से नपुंसकता दूर हो जाती है।
नोट : औषधि खाने के साथ दूध और
घी का प्रयोग ज्यादा करें।
• मांलकांगनी के बीजों को खीर में मिलाकर खाने से
नपुंसकता मिट जाती है।
• मालकांगनी के दाने 50 ग्राम और 25 ग्राम
शक्कर (शुगर) को आधा किलो गाय के दूध में
डालकर आग पर चढ़ा दें। जब दूध का खोया बन
जाए, तब उतारकर मोटी - मोटी गोली बनाकर रख
लें और रोज़ 1 - 1 गोली सुबह - शाम गाय के
दूध के साथ खायें। इससे नपुंसकता दूर होती है।
35. बड़ी कटेरी :
बड़ी कटेरी की 25 ग्राम ताजी जड़ की छाल
को गाय के दूध में उबालकर पीने से नपुंसकता मिट
जाती है।
नोट : खटाई और बादीयुक्त समान ना खाऐं।
36. कलौंजी:
कलौंजी का तेल और जैतून का तेल मिलाकर पीने से
नामर्दी मिट जाती है।
37. जदवार : जदवार 2 ग्राम खाने से काम
शक्ति (संभोग) बढ़ती है।
38. जवासीद:
जवासीद की गोंद को अकरकरा के साथ पीसकर
तिल के तेल में मिलाकर लिंग पर लेप करने से
नपुंसकता (नामर्दी) दूर होती है।
39. धतूरा :
धतूरे के बीज, अकरकरा और लौंग बराबर मात्रा में
पीसकर चने के बराबर गोलियां बनाकर रोज सुबह
- शाम 1 - 1 गोली का सेवन करें।
40. बहेड़े :
बहेड़े का चूर्ण 6 ग्राम, 6 ग्राम गुड़ के साथ
मिलाकर रोज़ खाने से नपुंसकता (नामर्दी) दूर
हो जाती है।
41. महुआ :
महुए के 25 ग्राम फूलों को 250 मिली लीटर दूध
में उबालकर पीने से
कमजोरी की नपुंसकता (नामर्दी) मिट जाती है।
42. सेमर :
सेमर की छोटी जड़ों को छाया में सुखाकर पका दें।
पकाने के बाद इसकी जड़ों को खाने से
नपुसंकता (नामर्दी) दूर होती है।
43. सुहागा :
सुहागा, कूट और मैनसिल को बराबर मिलाकर चूर्ण
बनाकर चमेली के रस और तिल के तेल में पकाकर
लिंग पर मलें। इससे लिंग का टेढ़ापन दूर होता है।
44. गोरखमुण्डी :
• गोरखमुण्डी 75 ग्राम कूट छानकर इसमें 75
ग्राम खांड़ मिला लें। 10 ग्राम दवा सोते समय
गर्म गर्म खांड़ मिले दूध के साथ लें।
• गोरखमुण्डी के फूलों के चूर्ण को नीम के रस के
साथ लेने से नपुंसकता (नामर्दी) में लाभ होता है।
45. कुलिंजन :
लगभग 2 ग्राम कुलिंजन के चूर्ण को 10 ग्राम
शहद में मिलाकर खाने से और ऊपर से गाय के
दूध में शहद को मिलाकर पीने से काम
शक्ति बढ़ती है।
46. असगन्ध :
10 ग्राम असगन्ध नागौरी के बारीक चूर्ण
को गाय के 500 मिली लीटर दूध में उबालें। जब
400 मिली लीटर दूध रह जाऐ, तब उसमें शहद
मिलाकर 40 दिन तक पिऐं। इससे काम
शक्ति बढ़ती है।
47. दालचीनी :
दालचीनी 75 ग्राम कूटकर छान लें। 5 ग्राम
को पानी में पीसकर सोते समय लिंग पर
सुपारी (लिंग का अगला हिस्से) को छोड़कर लेप करें
और 2 - 2 ग्राम को सुबह - शाम दूध के साथ
सेवन करने से नपुंसकता (नामर्दी) में आराम
मिलता है।
48. सीम्बल :
सीम्बल की जड़ 100 ग्राम कूट छानकर 5 - 5
ग्राम शहद में मिलाकर सुबह - शाम प्रयोग करने
से नपुंसकता (नामर्दी) में आराम मिलता है।
49. मल्ल सिंदूर :
मल्ल सिंदूर एक ग्राम का चौथा भाग, शहद और
अदरक के रस को सुबह - शाम लें। इससे
हस्तमैथुन से हुई नामर्दी दूर हो जाती है।
50. हल्दी :
हल्दी और कपूर 10 - 10 ग्राम पीस लें, फिर 5
ग्राम को खुराक के रूप में सुबह - शाम दूध के
साथ लेना चाहिए।
51. चनसूर :
चनसूर 10 ग्राम को दूध में उबालकर मिस्री के
साथ सुबह - शाम खाऐं। इससे संभोग
की शक्ति बढ़ जाती है।
52. कुलिजंन :
कुलिजंन को मुंह में रखकर चूसते रहने से भी काम
शक्ति में वृद्धि होती है।
53. उशवा :
जंगली उशवा के चूर्ण में 10 ग्राम
का काढ़ा बनाकर रोज़ 1 मात्रा पीते रहने से
नपुंसकता दूर होती है।
54. छोटी माई :
छोटी माई की दाल का चूर्ण 5 ग्राम से 10 ग्राम
का काढ़ा बनाकर तैयार कर रोज़ 2 बार सेवन
करने से लाभ होता है।
55. पटुओक (सन) :
पटुओक (सन) के बीज का तेल खाने कें काम में
आता है। जिससे शरीर हुष्ट पुष्ट होता है,
कामोत्तेजना बढ़ती है। इस तेल की मालिश से चोट
मोच का दर्द भी जल्दी ठीक होता है।
56. लहसुन :
• नपुंसकता और कामशक्ति में कमजोरी आने पर
60 ग्राम लहसुन की कली को घी में तलकर
रोजाना खाने से नपुंसकता समाप्त हो जाती है।
• लहसुन की एक पुतिया घी में भूनकर शहद मे
साथ खाने से कामोत्तेजना बढ़ती है।
• रोज़ लगभग 20 दिन तक 4 - 5 लहसुन
की कलियां दूध के साथ खाने से नपुंसकता में लाभ
होता है।
57. प्याज़ :
• प्याज़ के रस में घी और शहद मिला कर खाने से
नपुंसकता दूर होती है। प्याज़ का रस 10 से 20
मिली लीटर रोज सुबह - शाम लें।
• प्याज़ के हिस्से का चूर्ण 10 ग्राम से 20
ग्राम मिस्री मिले, दूध के साथ सुबह - शाम
प्रयोग करने से कामोत्तेजना की वृद्धि होती है।
58. जबाद कस्तूरी :
जबाद कस्तूरी शिश्न यानी लिंग पर लेप करने से
संभोग करने में ज्यादा आनन्द मिलता है। मगर
इससे गर्भधारण नहीं होता है।
59. अगर :
अगर का पुराना सेंट 1 से 2 बूंद को पान में
डालकर खाने से बाजीकरण होता है और
नपुंसकता दूर होती है।
60. छोटी इलायची :
बाजीकरण के लिए छोटी इलायची का चूर्ण लगभग
आधे से दो ग्राम तक सुबह - शाम खाऐं
या मिस्री मिले गर्म - गर्म दूध के साथ रोज़ रात
को सोने से पहले खाऐं।
61. केवटी मोथा :
केवटी मोथा के बीज 10 ग्राम पीसकर,
मिस्री मिले गर्म गाय के दूध के साथ रोज़ शाम
को पीने से नपुंसकता दूर हो जाती है।
62. फरहद :
सफेद फूल वाले फरहद की जड़ पीसकर 5 से 10
ग्राम को ठंडे दूध के साथ सुबह शाम पिलाने से
कामोत्तेजना बढ़ती है।
63. सहजना (मुनगा) :
सहजना के फूलों को दूध में उबाल कर रोज़ रात
को मिस्री मिलाकर पीने से नपुंसकता की बीमारी दूर
होकर लाभ होता है।
64. गुंजा (करजनी) : गुंजा (करजनी) की जड़ 2
ग्राम दूध में पकाकर भोजन से पहले रोज़ रात में
खाने से पूरा लाभ होता है। वीर्य सम्बन्धी समस्त
दोष दूर होते हैं।
65. केवांच (कपिकच्छू) :
केवांच (कपिकच्छू) के बीजों के बीच
का हिस्सा का चूर्ण 2 से 6 ग्राम रोज़ रात
को सोते समय मिस्री मिले गर्म दूध के साथ पीने
से लाभदायक होता है।
66. अतिबला :
अतिबला के बीज 4 से 8 ग्राम सुबह शाम
मिस्री मिले गर्म दूध के साथ खाने से नपुंसकता में
पूरा लाभ होता है।
67. पटेरा :
पटेरा (एरफा) के फूल 3 से 6 ग्राम को घोंटकर
पीसकर सुबह - शाम मिस्री मिले दूध के साथ
खाने से वीर्य बढ़ता है।
68. जमालगोटा :
जमालगोटा के तेल को लिंग के ऊपर लगाने से लाभ
मिलता है।
69. तालमखाना:
नपुंसकता को दूर करने के लियें तालमखाना के बीज
का चूर्ण, 2 से 4 ग्राम केवाचं के बीज के साथ
मिस्री मिले ताजे निकाले दूध के साथ सुबह - शाम
पीने से लाभ होता है।
70. भंगरैया :
भंगरैया के बीज मिस्री मिले गर्म दूध में डालकर
दूध सेवन करने से नपुंसकता दूर होती है।
71. मधुरसा :
मधुरसा की जड़ का रस 5 ग्राम से 10 ग्राम
सुबह - शाम शहद के साथ खाने से शरीर मज़बूत
बनाता है और कामोत्तेजना भी बढ़ती है।
72. विष्णुकान्ता :
विष्णुकान्ता का रस 20 से 40 मिली लीटर
या काढ़ा 40 से 80 मिली लीटर तक सुबह - शाम
खाने से पूयमेह, शुक्र मेह, दुर्बल्यता (कमजोरी)
आदि कष्ट दूर हो जाते है।
73. वनतुलसी :
वनतुलसी के बीज 3 से 7 ग्राम लेकर मिस्री मिले
गाय के दूध से लेने से लाभ होता है।
74. बड़ (बरगद) :
• बड़ (बरगद) का दूध 20 से 30 बूंद रोज़ सवेरे
बताशे या चीनी पर डालकर खाने से पुरुषत्व
शक्ति बढ़ती है।
• नपुंसकता दूर करने के लिए बताशे में दूध की 5 -
10 बूंदें सुबह - शाम रोज खाने से लाभ होता हैं।
• बरगद के पेड़ की कोंपले और गूलर के पेड़
की छाल 3 - 3 ग्राम और मिस्री 6 ग्राम इन
सबको पीसकर लुगदी सी बना लें और 3 बार मुंह
में रखकर खालें और ऊपर से 250 मिली लीटर दूध
पी लें। 40 दिन तक खाने से वीर्य बढ़ता है और
संभोग से ख़त्म शक्ति बढ़ती है।
75. सिरिस :
• सिरिस के फूलों का रस 20 से 40 मिली लीटर
की मात्रा में सुबह - शाम मिस्री मिले दूध के साथ
खाने से लाभ होगा और इससे शीघ्रपतन में
भी लाभ होगा।
• सिरिस के बीज का चूर्ण 1 से 2 ग्राम
को मिस्री मिले दूध के साथ सुबह - शाम लेने से
वीर्य गाढ़ा होता है।
• सिरिस की छाल का चूर्ण 3 से 6 ग्राम घी में
शक्कर मिलाकर गर्म दूध के साथ 2 बार खाऐं।
अगर फूलों का रस, बीज का चूर्ण और छाल
का चूर्ण एक साथ मिस्री मिले दूध के साथ
खाया जाए, तो शरीर की कमजोरी दूर हो जाती है।
• सिरस के थोड़े से बीज सुखाकर पीस लें। इसमें
3 ग्राम चूर्ण सुबह - शाम दूध के साथ खाने से
लाभ होता है।
76. मुनक्का :
नपुंसक व्यक्ति को मुनक्का खाने से वीर्य
की वृद्धि होती है।
77. ज्वार :
ज्वार को अपने खाने के रूप में लेने से नपुंसकता दूर
होती है।
78. कलम्बी :
कलम्बी का साग रोज खाने से वीर्य बढ़ता है।
79. चौपतिया साग :
चौपतिया साग नपुंसकों के लियें फायदेमन्द है।
क्योंकि इसमें वीर्य को बढ़ाने का गुण होता है।
80. भूईछत्ता :
भूईछत्ता को शक्कर (शुगर) मिले दूध में बराबर
रूप से उबाल कर खाने से काम शक्ति और
शारीरिक शक्ति दोनों बढ़ती है।
81. रोहू मछली :
रोहू मछली वीर्यवर्द्धक होता है। इसलियें
नपुंसकों के लियें अनुकूल खाद्य है।
हिलसा मछली भी रोहू की तरह वीर्य वर्धक
होती है।
82. अंबर :
नपुंसकता में अंबर आधा से एक ग्राम सुबह - शाम
मिस्री मिले दूध के साथ खाने से लाभ होता है।
83. उटंगन :
उटंगन के बीज, जो चपटे और रोमाच्छादित होते हैं,
पानी में भिगोनें पर काफी लुआबदार हो जाते हैं।
इनको शतावरी, कौंच बीच चूर्ण आदि के साथ
सुबह शाम मिस्री मिले गर्म - गर्म दूध के साथ
सेवन करने से काफी लाभ होता है।
84. बहमन सफेद-
बहमन सफेद या बहमन सुर्ख की जड़ का चूर्ण 3
से 6 ग्राम सुबह और शाम मिस्री को मिलाकर
गर्म - गर्म दूध से खाने से कामोद्दीपन होता है।
85. ब्रहमदण्डी :
ब्रहमदण्डी का रस 10 से 20 मिलीलीटर सुबह
शाम शहद के साथ सुबह - शाम खाने से पुरुषत्व
शक्ति बढ़ती है।
86. सालव मिस्री :
सालव मिस्री का कनद चूर्ण 3 से 6 ग्राम सुबह
- शाम खाने से नपुंसकता दूर होती है।
87. हरमल :
हरमल के बीज का चूर्ण 2 से 4 ग्राम
मिस्री को मिलाकर गर्म - गर्म दूध के साथ सुबह
- शाम लेने से लाभ होता है।
88. आम :
• आम की मंजरी 5 ग्राम की मात्रा में सुखाकर
दूध के साथ लेने से काम शक्ति बढ़ती है।
• 2 - 3 महीने आम का रस पीने से ताक़त
आती है। शरीर की कमजोरी दूर होती है और शरीर
मोटा होता है। इससे वात संस्थान (नर्वस
सिस्टम) भी ठीक हो जाता है।
89. अनार :
रोज़ मीठे अनार के 100 ग्राम दानों को दोपहर के
समय खाने से संभोग शक्ति बढ़ाती है।
90. पिप्पली :
पिप्पली, उड़द, लाल चावल, जौ, गेहूं। सब
को 100 - 100 ग्राम की मात्रा में लेकर
आटा पीसकर फिर इसको देशी घी में
पूरियां बनाकर, रोज़ 3 पूरियां 40 दिन तक खाऐं।
ऊपर से दूध पी लें। इससे नपुंसकता दूर
हो जाती है।
91. आंवला :
आंवलों का रस निकाल कर एक चम्मच आंवले के
चूर्ण में मिलाकर लें। उसमें थोड़ी सी शक्कर
(चीनी) और शहद मिलाकर घी के साथ सुबह -
शाम खाऐं।
92. अरण्ड :
अरण्ड के बीज 5 ग्राम, पुराना गुड़ 10 ग्राम,
तिल 5 ग्राम, बिनौले की गिरी 5 ग्राम, कूट 2
ग्राम, जायफल 2 ग्राम, जावित्री 2 ग्राम
तथा अकरकरा 2 ग्राम। इन सबको कूट - पीसकर
एक साफ कपड़े में रखकर, पोटली बना लें और इस
पोटली को बकरी के दूध में उबालें। दूध जब
अच्छी तरह पक जायें, तो इसे ठंड़ा करके 5 दिन
तक पियें तथा पोटली से शिश्नि की सिंकाई करें।
93. मुलेठी :
मुलेठी, विदारीकन्द, तज, लौग, गोखरू, गिलोय और
मूसली। सब चीजे 10 - 10 ग्राम की मात्रा में
लेकर पीसकर चूर्ण बना लें। इसमें से आधा चम्मच
चूर्ण रोज 40 दिन तक सेवन करें।
94. नागौरी असगंध :
नागौरी असगंध और विधारा। दोनों 250 - 250
ग्राम की मात्रा में लेकर इसे पीसकर चूर्ण
बना लें। इसमें से 2 चम्मच चूर्ण
देसी घी या शहद के साथ लें।
95. सालम मिस्री :
सालम मिस्री, तोदरी सफेद, कौंच के
बीजों की मींगी, ताल मखाना, सखाली के बीज,
सफेद व काली मूसली, शतावर तथा बहमन लाल।
इन सबका 10 - 10 ग्राम की मात्रा में लेकर कूट
पीस लें और चूर्ण बना लें। 2 चम्मच रोज़ दूध से
40 दिन तक बराबर खाने से पूरा लाभ होता है।
96. नारियल :
नारियल कामोत्तेजक है। वीर्य को गाढ़ा करता है।
97. चिलगोजे :
15 चिलगोजे रोज़ खाने से नपुंसकता दूर होती है।
98. शहद :
शहद और दूध को मिलाकर पीने से धातु (वीर्य)
की कमी दूर होती है। शरीर बलवान होता है।
99. गेहूं :
अंकुरित गेहूंओं को बिना पकायें ही खाऐं। स्वाद के
लिए गुड़ या किशमिश मिलाकर खा सकते हैं। इन
अंकुरित गेहूंओं में विटामिन ´ई` मिलता है। यह
नपुंसकता और बांझपन में लाभकारी है।
100. पिस्ता :
पिस्ता में विटामिन `ई´ बहुत होता है। विटामिन
`ई´ से वीर्य बढ़ता है।
101. सफेद कनेर :
सफेद कनेर की जड़ की छाल बारीक पीसकर
भटकटैया के रस में खरल करके 21 दिन
इन्द्री की सुपारी छोड़कर लेप करने से तेजी आ
जाती है।
102. आक :
किसी कपड़े को आक के दूध में चौबीस घंटे तक
भिगोकर रखा रहने दें, उसके बाद निकालकर
सुखा लें। फिर उस पर घी लपेट कर 2
बत्तियां बना लें और उसको लोहे की सलाई पर
रखे। नीचे एक कांसे की थाली रख दे और
बत्तियां जला दें, जो तेल नीचे थाली पर गिरेगा।
उसे लिंग पर सुपारी छोड़ कर पूरे पर मलते रहें।
आधा घंटे तक, उसके बाद एरण्ड का पत्ता लपेट
कर ऊपर से कच्चा धागा बांध दें। इससे हस्तमैथुन
का दोष दूर हो जाता है।
103. लौंग :
लौंग 8 ग्राम, जायफल 12 ग्राम, अफीम शुद्ध
16 ग्राम, कस्तूरी लगभग आधा ग्राम, इनको कूट
पीसकर शहद में मिलाकर आधे आधे ग्राम
की गोलियां बनाकर रख लें। 1 गोली बंगला पान में
रखकर खाने से स्तम्भन होता है। अगर स्तम्भन
ज्यादा हो जाऐ, तो खटाई खा ले। स्खलन
हो जायेगा।
104. चमेली :
चमेली के पत्तों का रस तिल के तेल की बराबर
की मात्रा में मिलाकर आग पर पकाएं। जब
पानी उड़ जाए और केवल तेल शेष रह जाए, तो इस
तेल की मालिश शिश्न पर सुबह - शाम प्रतिदिन
करना चाहिए। इससे नपुंसकता और शीघ्रपतन नष्ट
हो जाता है।
105. ढाक :
ढाक की जड़ का काढ़ा आधा कप की मात्रा दिन में
2 बार पीने से, बीज का तेल शिश्न पर मुण्ड
छोड़कर मालिश करते रहने से कुछ ही दिनों में लाभ
मिलता है।
106. हींग :
हींग को शहद के साथ पीसकर शिश्न या लिंग पर
लेप करने से वीर्य ज्यादा देर तक रुकता है और
संभोग करने में आंनद मिलता है।
107. मालकांगनी :
मालकांगनी के तेल को पान के पत्ते पर लगा कर
रात में शिशन (लिंग) पर लपेटकर सो जाऐं और 2
ग्राम बीजों को दूध की खीर के साथ सुबह - शाम
सेवन करने से लाभ मिलता है।
108. आक :
• छुआरों के अन्दर की गुठली निकाल कर उनमें
आक का दूध भर दे, फिर इनके ऊपर आटा लपेट
कर पकायें, ऊपर का आटा जल जाने पर
छुआरों को पीसकर मटर जैसी गोलियां बना लें,
रात्रि के समय 1 - 2 गोली खाकर तथा दूध पीने
से स्तम्भन होता है।
• आक की छाया सूखी जड़ के 20 ग्राम चूर्ण
को 500 मिली लीटर दूध में उबालकर दही जमाकर
घी तैयार करें, इसके सेवन से नामर्दी दूर होती है।
• आक का दूध असली मधु और गाय का घी,
समभाग 4 - 5 घंटे खरल कर शीशी में भरकर रख
लें, इन्द्री की सीवन और सुपारी को बचाकर
इसकी धीरे धीरे मालिश करें और ऊपर से खाने
का पान और एरण्ड का पत्ता बांध दें, इस प्रकार
सात दिन मालिश करें। फिर 15 दिन छोड़कर पुन:
मालिश करने से शिश्न के समस्त रोंगों में लाभ
होता है।
109. मुलहठी :
मुलहठी का पीसा हुआ चूर्ण 10 ग्राम, घी और
शहद में मिलाकर चाटने से और ऊपर से
मिस्री मिले गर्म गर्म दूध पीने से नपुंसकता में
लाभ होता है।
110. जटामांसी –
जटामांसी, सोठ, जायफल और लौंग। सबको समान
मात्रा में लेकर पीस लें। 1 - 1 चम्मच
की मात्रा में दिन में 3 बार खाऐं।
111. काकड़ासिंगी :
आधा चम्मच काकड़ासिंगी कोष का बारीक चूर्ण
एक कप दूध के साथ सुबह - शाम सेवन कराते
रहने से कुछ हफ्ते में नपुंसकता में पूरा लाभ
मिलेगा।
112. कलौंजी :
कलौंजी के तेल को शिश्न व कमर पर नियमित रूप
से सुबह - शाम कुछ हफ्तों तक मालिश करते रहने
से यह रोग दूर हो जायेगा।
113. कनेर –
सफेद कनेर की 10 ग्राम जड़ को पीसकर 20
ग्राम वनस्पति घी में पकायें। फिर ठंड़ा करके
जमने पर इसे शिश्न पर सुबह - शाम लगाने से
नपुंसकता में आराम मिलता है।
114. पान-
• रोगी के लिंग पर पान के पत्ते बांधने से और पान
के पत्ते पर मालकांगनी का तेल 10 बूंद लगाकर
दिन में 2 से 3 बार कुछ दिन खाने से
नपुंसकता दूर होती है। इस प्रयोग के दौरान दूध,
घी का अधिक मात्रा में सेवन जारी रखें।
• ध्वज भंग रोग में पान को चबाने से और रोगी के
लिंग पर बांधने से लाभ होता है।
115. कपूर –
घी में कपूर को घिसकर शिशन (पेनिस) के ऊपर
मालिश करें। प्रयोग रोज़ कुछ हफ्ते तक करें।
116. अजवाइन :
तीन ग्राम अजवायन को सफेद प्याज़ के रस 10
मिली लीटर में तीन बार 10 - 10 ग्राम शक्कर
मिलाकर सेवन करें। 21 दिन में पूर्ण लाभ होता है।
इस प्रयोग से नपुंसकता, शीघ्रपतन व शुक्राणु
अल्पता के रोग में भी लाभ होता है।
117. अकरकरा :
• अकरकरा का बारीक चूर्ण शहद में मिलाकर
शिश्न पर लेप करके रोजाना पान के पत्ते से लपेट
रखने से शैथिल्यता दूर होकर वीर्य बढेगा।
• अकरकरा 2 ग्राम, जंगली प्याज़ 10 ग्राम इन
दोनों को पीसकर लिंग पर मलने से इन्द्री कठोर
हो जाती है। 11 या 21 दिन तक यह प्रयोग
करना चाहिए।
118. सरसों का तेल-
नपुंसकता दूर करने के लिए कटुपर्णी की एक ग्राम
छाल तथा बरगद का दूध दोनों को गर्म कर चने के
बराबर गोलियां बनाकर चौदह दिन तक पानी के
साथ सुबह-शाम सेवन करने से नपुंसकता दूर
होती है।
119. कुचला –
• शोधित कुचला लगभग एक चौथाई से आधे ग्राम
सुबह - शाम मिस्री मिले गर्म गर्म दूध के साथ
पीने से हस्तमैथुन या ज्यादा मैथुन से हुई
नामर्दी दूर हो जाती है।
120 कुलंजन –
एक कप दूध मे एक चम्मच कुलंजन के चूर्ण
को मिलाकर सुबह शाम पिया जाए,
तो नपुंसकता दूर होती है।
121. तिल :
• तिल और गोखरू दूध में उबालकर

मोटे अनाज की बारीक जानकारीMillets: Super Foodमिलेट्स नाम तो सुना होगा। आजकल खूब चर्चा में है। साल 2023 को यूएन ने 'इंटरन...
28/04/2023

मोटे अनाज की बारीक जानकारी
Millets: Super Food

मिलेट्स नाम तो सुना होगा। आजकल खूब चर्चा में है। साल 2023 को यूएन ने 'इंटरनैशनल ईयर ऑफ मिलेट्स' घोषित किया है। आखिर ऐसा क्या है इस मिलेट्स यानी मोटे अनाज में जो इसे सुपरफूड की कैटिगरी में भी लाकर खड़ा करता है। पूरी जानकारी देश के बेहतरीन एक्सपर्ट्स से बात करके दे रहे हैं लोकेश के. भारती

7 खास बातें...
1. मिलेट्स शरीर में ट्राइग्लिसराइड्स (खून में मौजूद फैट) और सी-रिऐक्टिव प्रोटीन को कम करते हैं। इस वजह से यह हार्ट से जुड़ी समस्याओं को दूर करने में भी मददगार है।

2. इनमें फाइबर की मात्रा भरपूर होती है। इस वजह से शरीर को भोजन में से पानी ज़ज्ब करने के लिए ज्यादा वक्त मिल जाता है। इसलिए यह पेट से जुड़ी समस्याओं को दूर करने में भी सहायक है।

3. मिलेट्स से ग्लूटन या नॉन-ग्लूटन एलर्जी की समस्या भी नहीं है। दरअसल, गेहूं में मौजूद इस प्रोटीन या दूसरे तत्वों की वजह से एलर्जी की समस्या भी पैदा हो जाती है।

4. रागी में दूसरे मिलेट्स, चावल, गेहूं आदि की तुलना में बहुत ज्यादा कैल्शियम होता है। इसलिए इसे दूध का विकल्प भी कहा जाता है। वहीं बाजरे में आयरन की अधिकता होती है।

5. मिलेट्स की खासियत है कि यह फैटी लिवर की परेशानी को दूर करने में भी मददगार है। चूंकि यह पचने में वक्त लगाता है। इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम है, इसलिए खाने के बाद शरीर में शुगर का स्तर धीरे-धीरे बढ़ता है यानी डायबीटीक मरीजों के लिए भी बहुत उपयोगी है।

6. मिलेट्स अच्छे हैं, इसका मतलब यह कतई नहीं कि हम बाकी अनाज खाना छोड़ दें। हमें चावल, गेहूं, मक्का - सभी को अपनी थाली का हिस्सा बनाना चाहिए। अगर एक हफ्ते के 14 मील (एक दिन में 2 बार: लंच और डिनर) में से 4 से 5 मील में भी हमने मिलेट्स का सेवन किया तो हमारा काम चल सकता है। इसकी शुरुआत मल्टीग्रेन आटे के रूप में भी कर सकते हैं।

7. कुछ ऐसे लोग हो सकते हैं जिन्हें खाना पचाने में समस्या होती है। यह उनके पाचन तंत्र की खराबी से या फिर जेनेटिकल भी हो सकता है। ऐसे लोगों को सामान्य भोजन पचने में भी दूसरे लोगों की तुलना में दोगुना या उससे भी ज्यादा वक्त लग जाता है। ऐसे लोग मिलेट्स खाने से पहले किसी डायटिशन की सलाह लें।

सभी मिलेट्स पर लागू होती हैं कुछ बातें
मल्टीग्रेन या सिंगल आटा: मिलेट्स को आप आटे (सिंगल या मल्टीग्रेन) के रूप में या सीधे भूनकर भी खा सकते हैं। ये हर तरह से फायदेमंद रहते हैं। जब भी मल्टीग्रेन आटा तैयार करें तो कोशिश करें कि गेहूं, चना आदि के साथ एक ही मोटा अनाज मिलाएं। दरअसल, पेट को धीरे-धीरे मिलेट्स की आदत डलवाएंगे तो पाचन तंत्र पर न के बराबर स्ट्रेस पड़ेगा।

आटे को कैसे करें स्टोरः जिस डब्बे में आटा रखें, वह पूरी तरह बंद हो। अगर बारिश का मौसम है तो इसे 10 से 15 दिनों में खत्म करने की कोशिश करें। इससे ज्यादा समय तक रहने से ये वातावरण से नमी खींच लेते हैं। इससे आटा खराब हो सकता है। दरअसल, यह समस्या सभी तरह के आटे के साथ होती है।

कितने दिनों के लिए: अगर वातावरण में नमी कम है यानी 60 से 65 फीसदी की नमी तक ये 2 से 3 महीने तक चल जाते हैं, अगर सही तरह की पैकिंग हो। जब नमी का स्तर 80 फीसदी से ज्यादा हो जाए तो इसे 15 दिनों के अंदर खपत कर लेना चाहिए।

पानी में डुबोना जरूरी: अगर आप मिलेट्स को भून कर सीधे खाना चाहते हैं तो कई बातों का ध्यान रखना होगा। दरअसल, सारे मेजर मिलेट्स मोटे अनाज नेक्ड सीड होते हैं यानी चावल या गेहूं की तरह इसके ऊपर कोई छिलका नहीं होता जिसे हटाना हो। इनके बीज की स्किन कुछ ज्यादा मोटी होती है। इसे सीधे खाने से ये पचाने में परेशानी पैदा कर सकते हैं। इसलिए इन्हें 12 से 24 घंटों के लिए पानी (फिल्टर्ड वॉटर) में डुबोकर छोड़ दें। फिर सुखाकर रोस्ट कर लें। इसके बाद इनकी स्किन सॉफ्ट हो जाती है। दरअसल, जो भी फसलें शुष्क प्रदेशों में पैदा होती हैं, उन्हें गर्मी के कोप से बचाने के लिए कुदरत ने ही उनकी स्किन थोड़ी मोटी की है। इसके बाद इसे भून कर भी खा सकते हैं और आटे के रूप में भी।

मिलेट्स की सही गुणवत्ता की पहचान
FSSAI (फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया) ने मिलेट्स की पहचान के लिए कुछ गाइडलाइंस दी हैं:
- अगर किसी मिलेट से बदबू आ रही हो या फिर स्वाद कड़वा हो तो न खरीदें।
-अगर किसी मिलेट में मरे हुए या फिर जिंदा कीड़े दिखें तो खरीदने से बचें।
- पैक्ड मिलेट्स खरीदने की ही कोशिश करें।
- पैकिंग पर AGMARK का सिंबल हो।
-पैकिंग पर FSSAI का लाइसेंस नंबर भी होना चाहिए।
- खरीदने से पहले उसकी मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपायरी डेट जरूर चेक कर लें।

चावल, गेहूं और मिलेट्स को पचाने में लगने वाला वक्त
चावल: 40 से 60 मिनट
गेहूंः 60 से 90 मिनट
मिलेट्सः 180 से 350 मिनट
मिलेट्स को पचने में ज्यादा वक्त लगता है। इसका यह गुण शुगर को कंट्रोल में रखता है।

कितनी तरह के मिलेट्स
1. मेजर मिलेट्स: रागी, बाजरा और ज्वार शामिल हैं। इनके बीज का आकार माइनर मिलेट्स से बड़ा होता है। ये ऐसे मिलेट्स हैं जो देश के कई हिस्सों में मिलते हैं। ये मिलेट्स दूसरे देशों में भी उगाए जाते हैं: मसलन अफ्रीकी देश और यूरोप के कुछ देश।
2. माइनर मिलेट्स: इसमें कुटकी, कोदो, कंगनी, सांवा, चेना आदि शामिल हैं। इनके बीज का आकार छोटा होता है। ये कुछ खास क्षेत्रों में ही उगाए जाते हैं यानी रीजनल प्रोडक्शन होता है।

खास मिलेट्स: कैसे खाएं, कब खाएं, कितना खाएं

रागी (Finger Millet)................
इसे बिहार, यूपी जैसे राज्यों में मडुआ भी कहा जाता है। वैसे तो सभी मेजर मिलेट्स अच्छे हैं, लेकिन रागी की बात ही कुछ और है। यह अमूमन मई के आखिर से जून तक बोया जाता है। यह अमूमन 65 से 70 दिनों में तैयार हो जाती है। इसे मैदान के कम वर्षा वाले क्षेत्रों और पहाड़ों पर भी उगा सकते हैं।

सबसे ज्यादा उपज किन राज्यों में: वैसे सभी राज्यों की रागी अच्छी होती है, फिर भी कर्नाटक इस मामले में नंबर-1 है। इसके साथ ही उत्तराखंड की रागी भी अच्छी होती है।

मल्टीग्रेन में प्रतिशत: रागी को अगर मल्टीग्रेन आटे के रूप में खाना है तो इसे 20 से 30 फीसदी तक मिला सकते हैं।

कॉम्बिनेशन 10 किलो में: 4 से 5 किलो गेहूं + 2 से 3 किलो भुनी हुई रागी + 2 किलो चना या मूंग + 1 किलो मक्का

कितना खाएं: अगर मल्टीग्रेन आटे के रूप में खा रहे हैं तो एक मील में 3 से 4 रोटी और अगर सिंगल आटे के रूप में तो एक से 2 रोटी।

किन तरीकों से खा सकते हैं: रागी के लड्डू, रागी के केक, बिस्कुट, डोसा, उपमा, इडली, हलवा, रागी आलू पराठे, खीर आदि बना सकते हैं।

किस मौसम में बेहतर है खाना: बाकी मिलेट्स की तुलना में रागी को हर मौसम में खा सकते हैं और अच्छी तरह पचा भी सकते हैं।

किन सब्जियों के साथ मस्त कॉम्बिनेशन: बाजरा या ज्वार की तुलना में यह कम गर्म है। इसलिए इसे सभी तरह की सब्जियों के साथ खा सकते हैं।

साथ में कौन-सी दाल बेहतर: इसके साथ मूंग या मसूर की दाल बेहतर है। वैसे किसी भी दाल के साथ खाने में समस्या नहीं है।

ये भी हो साथ तो मौज ही मौज: एक गिलास छाछ या एक गिलास लस्सी के साथ अगर मोटे अनाज का आनंद लिया जाए तो क्या कहने। अगर मोटे अनाज की वजह से पेट की गर्मी थोड़ी बढ़ भी जाएगी तो ये उसे बैलंस कर देंगे।

बाजरा (Pearl Millet)..........
सभी मोटे अनाज में ज्यादा मशहूर। ज्यादा क्षेत्र में उगने वाला। आयरन पाने का बहुत अच्छा जरिया। इसकी बुआई उत्तर भारत में मार्च से अप्रैल और दक्षिण भारत में अक्टूबर से नवंबर के बीच होती है। इसकी फसल 3 से साढे तीन महीने में तैयार हो जाती है।

किन राज्यों में सबसे ज्यादा पैदावार: राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा, यूपी, बिहार, कर्नाटक आदि। वैसे सभी राज्यों में अच्छी क्वॉलिटी का बाजारा होता है, फिर भी राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा और यूपी का बाजरा बढ़िया माना जाता है।

मल्टीग्रेन में प्रतिशत: बाजरे को 10 से 15 फीसदी तक मिला सकते हैं।

कॉम्बिनेशन 10 किलो में: 5 से 6 किलो गेहूं + 1 से डेढ़ किलो भुना हुआ बाजरा + 2 से ढाई किलो चना या मूंग + आधा से 1 किलो मक्का।

कितना खाएं: अगर मल्टीग्रेन आटा के रूप में खा रहे हैं तो एक मील में 2 से 3 रोटी अगर सिंगल आटे के रूप में तो आधी से एक रोटी।

किन तरीकों से खा सकते: बाजरे की खिचड़ी मूंग दाल वाली, डोसा, इडली, उत्तपम, पालक-बाजरे की रोटी, स्नैक्स आदि।

किस मौसम में बेहतर है खाना: बाजरे की तासीर रागी और ज्वार की तुलना में ज्यादा गर्म होती है। इसलिए ज्यादा गर्मी यानी मई से अगस्त तक कम खाएं। फिर भी मल्टीग्रेन के रूप में खा सकते हैं। हां, सिंगल आटे के रूप में खाने से बचना चाहिए।

किन सब्जियों के साथ मस्त कॉम्बिनेशन: चूंकि बाजरे की तासीर गर्म होती है, इसलिए गर्म तासीर वाली सब्जियों के साथ खाने से बचें। मसलन: शलजम, लहसुन आदि। बाकी सभी सब्जियों के साथ खाएं।

साथ में कौन-सी दाल बेहतर: बाजरे के साथ कोशिश करें कि मूंग या फिर मसूर ही खाएं। अरहर के साथ खाने से बचें।

ये भी हो साथ तो मौज ही मौज: बाजरे की रोटी के साथ लस्सी और छाछ जरूर पिएं।

ज्वार (Sorghum)......................
यह प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फाइबर का अच्छा जरिया है। इसकी बुवाई अप्रैल से मई के बीच होती है। जो लोग नॉनवेज नहीं खाते, उनके लिए प्रोटीन का यह एक अच्छा जरिया हो सकता है।

किन राज्य में सबसे ज्यादा पैदावार: महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि। वैसे तो सभी राज्यों के ज्वार अच्छे हैं, फिर भी महाराष्ट्र का ज्वार बेहतर माना जाता है।

मल्टीग्रेन में प्रतिशत: इसे 15 से 20 फीसदी तक मिला सकते हैं।

कॉम्बिनेशन 10 किलो में: 5 से 6 किलो गेहूं + डेढ से 2 किलो किलो भुनी हुई ज्वार + 2 से ढाई किलो चना या मूंग + आधा से एक किलो मक्का।

कितना खाएं: मल्टीग्रेन के रूप में 3 से 4 रोटी, सिंगल आटे के रूप में एक रोटी। अगर सर्दियों में खा रहे हैं तो डेढ से 2 रोटी खाने में कोई परेशानी नहीं है।

किन तरीकों से खा सकते: गोभी ज्वार मुठिया, स्नैक्स, उपमा, खिचड़ी आदि।

किस मौसम में बेहतर है खाना: ज्वार को भी साल भर खा सकते हैं। यह बाजरे से कम गर्म है। फिर भी बहुत ज्यादा गर्मी हो तो खाने से बचें।

किन सब्जियों के साथ मस्त कॉम्बिनेशन: इसे भी हर तरह की सब्जी के साथ खा सकते हैं।

साथ में कौन-सी दाल बेहतर: इसे हर दाल के साथ खा सकते हैं पर मूंग, मसूर, कुलथी ज्यादा बेहतर।

ये भी हों साथ तो मौज ही मौज: इसे भी लस्सी या छाछ आदि के साथ खाएं तो बेहतर है। लस्सी और छाछ स्वाद के साथ अच्छा पाचक भी बन जाता है।

नोट: मल्टीग्रेन तैयार करने का तरीका और उनमें मिलाने वाले अनाज अलग-अलग हो सकते हैं। चाहें तो इसके लिए किसी डायटिशन की मदद भी ले सकते हैं। ऊपर कई तरह की रेसपी के नाम दिए गए हैं। इन्हें बनाने का तरीका सीखने के लिए यू-टयूब पर इनके नाम से सर्च करें, कई सारे विडियोज मिल जाएंगे।

'आयुर्वेद में भी मिलेट्स के गुण बताए गए हैं'
- सर्बानंद सोनोवाल, केंद्रीय आयुष मंत्री
पिछले कुछ बरसों में आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति पर लोगों का भरोसा पहले से ज्यादा मज़बूत हुआ है। आयुर्वेद का मिलेट्स के बारे में क्या कहना है और आजकल इसकी चर्चा बढ़ने की वजह क्या है? ऐसे सवालों के जवाब हमने जाने केंद्रीय आयुष मंत्री सर्बानंद सोनोवाल से:

Q. क्या आयुर्वेद में भी मिलेट्स की उपयोगिया के बारे में बताया गया है?
A. आयुर्वेद में मिलेट्स यानी मोटे अनाज को 'तृणधान्ये' कहा गया है यानी जो जल्दी तैयार होते हैं। आयुर्वेद में इन फसलों के गुणों के बारे में विस्तार से बताया गया है। डायबीटीज जैसी कई लाइफस्टाइल की बीमारी को काबू रखने में भी उपयोगिता है।

Q. ज्वार, बाजरा और रागी जैसे मिलेट्स को बढ़ावा देने के लिए आयुष मंत्रालय क्या कर रहा है?
A. हम इस पर काफी काम कर रहे हैं। आयुर्वेद के अनुसार इनकी रेसपी को मशहूर करने की कोशिश हो रही है ताकि लोग हर दिन की डाइट में इन्हें शामिल कर सकें।

Q. क्या मिलेट्स अपने देश की जरूरतों को पूरी करने में सक्षम हैं?
A. ये फसलें कम समय में ही पककर तैयार हो जाती हैं। साथ ही इनमें पानी की जरूरत भी ज्यादा नहीं होती। इन्हें एक साल में कई बार उगा सकते हैं।

Q. मिलेट्स तो पहले भी थे। फिर आजकल चर्चा की वजह क्या है?
A. पूरी दुनिया पिछले कुछ दशकों में लाइफस्टाइल से जुड़ी समस्या से दो-चार हो रही है। ये बीमारियां ज्यादातर हमारे गलत खानपान की वजह से हो रही हैं। हम जंक फूड (नूडल्स, पिज्जा, बर्गर आदि) का बहुत ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। इनमें फाइबर की मात्रा बहुत ही कम होती है। वहीं मिलेट्स में अच्छे फाइबर की अधिकता होती है। इससे लाइफस्टाइल की परेशानी को कम करने में काफी मदद मिलेगी।

'मिलेट्स को थाली का हिस्सा बनाना जरूरी '
-डॉ. एस. के. मल्होत्रा, पूर्व कृषि आयुक्त, भारत सरकार

सरकार की ओर से मिलेट्स पर यूएन में अपनी बात रखने वाले डॉ. एस. के. मल्होत्रा ही थे। इनके प्रयासों से ही 2023 को यूएन (यूनाइटेड नेशंस) ने 'इंटरनैशनल मिलेट्स ईयर' घोषित किया। ऐसी उम्मीद है कि अगले साल से हर साल किसी खास तारीख को मिलेट्स डे भी मनाया जाएगा। डॉ. मल्होत्रा ने बताया कि भारत सरकार की ओर से दुनियाभर में जागरूकता लाने के लिए इसकी कोशिश 2018 से ही शुरू कर दी गई थी। साल 2018 को भारत ने 'मिलेट्स ऑफ द ईयर' के रूप में मनाया था। इसी साल भारत ने यूनाइटेड नेशंस के फोरम FAO (फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन) के एग्रीकल्चर विभाग में जब इन मिलेट्स की खासियतों को बताया तो वे भी प्रभावित हुए। इन्हें न्यूट्री-सीरियल्स (Nutri-Cereals) नाम दिया। FAO ने यह बताया कि हमने इन पर काफी रिसर्च की है। दरअसल, न्यूट्री-सीरियल्स का मतलब है कि ऐसे अनाज जिनमें पोषक तत्वों की भरमार हो।

5000 वर्षों से खा रहे हैं हम
आज जिस मोटे अनाज की चर्चा हो रही है, वह भारत के लिए नया बिलकुल नहीं है। ज्वार के सबूत तो भारत में हड़प्पा सभ्यता के अवशेषों में भी मिले हैं। अपने देश में 3000 से 5000 साल पहले से इन मिलेट्स के खाए जाने के सबूत मौजूद हैं। चूंकि ये हमारे लिए, हमारे पाचन तंत्र के लिए, हमारी रगों में बहते खून के लिए, हमारे एंजाइम्स और हार्मोंस के लिए, हमारी जीभ के लिए, सीधे कहें तो हमारे DNA के लिए नए नहीं हैं। हमारा शरीर इन्हें अच्छी तरह पहचानता है। पहले मिलेट्स को कदन्न यानी गरीबों का अन्न कहते थे। दरअसल, गरीब और आदिवासियों में ही इन मिलेट्स की खपत ज्यादा थी, लेकिन अब इसे अमीर भी बड़े चाव से खाते हैं। आज़ादी से पहले तक देश की थाली में मिलेट्स की मौजूदगी जहां 35 से 40 फीसदी थी, वहीं आज महज 6 फीसदी के करीब रह गई है। 60 के दशक में में आए ग्रीन रिवॉल्यूशन यानी हरित क्रांति ने चावल, गेहूं और मक्का के उत्पादन को बढ़ाने पर जोर दिया। इन फसलों की सरकारी खरीद भी काफी बढ़ गई थी। किसान इन फसलों का ही उत्पादन ज्यादा करने लगे। इन वजहों से मिलेट्स की खेती कम होती चली गई।

इन वजहों से चलाया जा रहा है मिलेट्स का नया अभियान
1. अनाज का संकट: दुनियाभर दुनियाभर में बढ़ती जनसंख्या, झगड़े, सूखा, बाढ़ आदि की वजह से खाद्यान्न की कमी अब आम बात हो गई है। भारत इसमें मौका देख रहा है। भारत में मोटे अनाज का प्रोडक्शन बड़े पैमाने पर हो सकता है। चूंकि इसमें सिंचाई की बहुत ज्यादा जरूरत नहीं होती। इसलिए यह खाद्य संकट का एक हल हो सकता है।

2. पोषक तत्वों की कमी को दूर करने में: चाहे मेजर मिलेट्स हों या फिर माइनर मिलेट, ये चावल या गेहूं से किसी भी मायने में कम नहीं हैं। इनमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, कैल्शियम और आयरन से लेकर तमाम तरह के पोषक तत्व मिलते हैं। सीधे कहें तो एक हेल्दी थाली बनाने में ये अहम भूमिका निभा सकते हैं। चूंकि इसमें कीड़े भी कम लगते हैं, इसलिए पेस्टिसाइड भी बहुत कम डाला जाता। साथ ही इसके लिए रासायनिक खाद आदि का इस्तेमाल भी कम करना पड़ता है। इस लिहाज से भी बेहतर है।

3. सेहत के लिहाज से भी बेहतर: चूंकि इनमें ग्लूटन नहीं होता यानी ऐसे लोग जिन्हें ग्लूटन पचाना मुश्किल होता है, उनके लिए मिलेट्स बेहतर हैं। दरअसल, ग्लूटन गेहूं और जौ में मौजूद ऐसा प्रोटीन है जिसे पचाना कुछ लोगों के लिए मुश्किल होता है। इस वजह से सिलियक नाम की बीमारी हो जाती है। इस बीमारी में पेट में बहुत छोटे-छोटे पोर्स होते हैं। इन वजहों से शख्स को लगातार गैस, अपच, सिर दर्द आदि की परेशानी होती है। दूसरी तरफ मिलेट्स धीरे-धीरे पचते हैं। इसलिए इन्हें खाने के बाद शरीर में शुगर का स्तर अचानक नहीं बढ़ता। जबकि चावल और रोटी शरीर में पहुंचने के बाद शुगर लेवल बढ़ जाता है। मिलेट्स खाने के बाद लंबे समय तक पेट भरे रहने का आभास होता है। इसलिए मिलेट्स को शुगर के मरीज और जिन्हें अपना मोटापा कम करना हो, वे भी खा सकते हैं।

4. ग्लोबल वॉर्मिंग से लड़ाई में मददगार: चूंकि इन फसलों की बुआई, सिंचाई से लेकर पकने तक में ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती, इसलिए ये पानी की खपत भी कम करते हैं। वहीं, भारत जैसे देश के लिए यह ज्यादा मुफीद इसलिए हो जाता है क्योंकि देश के कुल 140 मिलियन हेक्टेयर खेती लायक भूमि में से करीब 51 फीसदी यानी 72 मिलियन हेक्टेयर भूमि सीधे मॉनसून यानी वर्षा पर निर्भर है। कई बार मॉनसून समय पर रहता है तो कई बार नहीं। कई बार कई क्षेत्र सूखे रह जाते हैं। ऐसे में उन जगहों पर बाजरा, रागी और ज्वार की खेती की जा सकती है।
मिलेट्स हैं स्मार्ट अनाज: चूंकि ये शुष्क वातावरण में भी उग जाते हैं और मनमाफिक बारिश हो जाए तो बढ़िया फसल होती है, लेकिन उगते दोनों परिस्थितियों में हैं यानी मौसम के हिसाब से खुद को ढाल लेते हैं। इसलिए इन्हें स्मार्ट अनाज भी कहते हैं।
किसानों को फायदा: इनकी मांग काफी बढ़ रही है। किसानों की आर्थिक सेहत भी इससे सुधर रही है। इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मिलेट्स को 'श्रीअन्न' कहा। सच तो यह है कि ये मिलेट्स कई तरह की समस्याओं का समाधान हैं।

एक्सपर्ट पैनल
डॉ. एस. के. सरीन, डायरेक्टर, ILBS
ईशी खोसला, सीनियर डायटिशन
परमीत कौर, चीफ डाइटिशन, AIIMS
नीलांजना सिंह, सीनियर डायटिशन


#रागी
#बाजरा
#ज्वार

संडे नवभारत टाइम्स में प्रकाशित, 23.04.2023

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