16/03/2026
गर्भावस्था में मधुमेह (Gestational Diabetes Mellitus - GDM) एक ऐसी स्थिति है जिसमें गर्भावस्था के दौरान महिलाओं में ब्लड शुगर का स्तर बढ़ जाता है, जबकि पहले उन्हें डायबिटीज नहीं था। यह आमतौर पर गर्भावस्था के 24–28 सप्ताह के आसपास दिखाई देता है और ज्यादातर डिलीवरी के बाद ठीक हो जाता है। लेकिन अगर इसका समय पर पता न चले या नियंत्रण न हो, तो माँ और बच्चे दोनों के लिए खतरा बढ़ सकता है।
गर्भावधि मधुमेह के लक्षण और संकेत
ज्यादातर महिलाओं में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते – वे पूरी तरह सामान्य महसूस करती हैं और केवल स्क्रीनिंग टेस्ट से पता चलता है। अगर लक्षण दिखें, तो ये हो सकते हैं:
अक्सर कोई लक्षण नहीं – कई महिलाएं सामान्य महसूस करती हैं और केवल जांच से पता चलता है।
अधिक प्यास लगना – सामान्य से ज्यादा प्यास लगना।
बार-बार पेशाब आना – सामान्य से ज्यादा बार पेशाब जाना (हालांकि गर्भावस्था में भी यह होता है)।
धुंधली नजर आना – आंखों की रोशनी अस्थायी रूप से धुंधली होना।
बहुत थकान महसूस होना – सामान्य गर्भावस्था की थकान से ज्यादा।
बार-बार संक्रमण – जैसे यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन या वैजाइनल यीस्ट इन्फेक्शन।
यूरिन में शुगर या असामान्य टेस्ट रिजल्ट – प्रेग्नेंसी चेकअप में पता चलता है (कभी-कभी सामान्य गर्भावस्था में भी थोड़ी ग्लाइकोसुरिया हो सकती है)।
बच्चा सामान्य से बड़ा होना – अल्ट्रासाउंड में पता चलता है, माँ को हमेशा महसूस नहीं होता।
कारण
गर्भावस्था में प्लेसेंटा हार्मोन बनाता है जो बच्चे के विकास में मदद करते हैं, लेकिन ये हार्मोन माँ के शरीर में इंसुलिन के काम को कम कर देते हैं (इंसुलिन रेजिस्टेंस)। शरीर ज्यादा इंसुलिन बनाता है, लेकिन अगर पर्याप्त न बने तो ब्लड शुगर बढ़ जाता है।
जोखिम कारक (Risk Factors)
आपके जोखिम ज्यादा हैं अगर:
गर्भावस्था से पहले वजन ज्यादा या मोटापा हो।
परिवार में डायबिटीज का इतिहास हो (खासकर टाइप 2)।
पहले गर्भावस्था में गर्भावधि मधुमेह रहा हो।
पहले 4.5 किलो से ज्यादा वजन का बच्चा जन्मा हो।
उम्र 25–35 साल से ज्यादा हो।
PCOS (पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम) हो।
भारतीय, एशियाई, अफ्रीकी या कुछ अन्य जातीय समूहों से संबंधित हों (भारत में यह काफी आम है, 10–16% महिलाओं में हो सकता है)।
भारत में अधिकांश डॉक्टर 24–28 सप्ताह में ग्लूकोज चैलेंज टेस्ट (GCT) या OGTT करवाते हैं, क्योंकि लक्षण कम होते हैं।
प्रबंधन और उपचार
अच्छी खबर यह है कि गर्भावधि मधुमेह को अच्छे से कंट्रोल किया जा सकता है, और ज्यादातर महिलाओं का प्रेग्नेंसी और बच्चा स्वस्थ रहता है।
स्वस्थ आहार – कार्बोहाइड्रेट को कंट्रोल करें, सब्जियां, फल, प्रोटीन (दाल, अंडा, पनीर), साबुत अनाज लें। छोटे-छोटे भोजन लें, ज्यादा मीठा, सफेद चावल/मैदा से बचें। डाइटिशियन से प्लान बनवाएं।
व्यायाम – रोज 30 मिनट वॉक या हल्का व्यायाम (डॉक्टर की सलाह से) – इंसुलिन संवेदनशीलता बढ़ाता है।
ब्लड शुगर मॉनिटरिंग – घर पर ग्लूकोमीटर से चेक करें।
दवा अगर जरूरी हो – ज्यादातर मामलों में डाइट और एक्सरसाइज से कंट्रोल हो जाता है। जरूरत पड़ने पर इंसुलिन इंजेक्शन (सबसे सुरक्षित) या कभी मेटफॉर्मिन।
अच्छा कंट्रोल करने से बच्चे में बड़ा होने (मैक्रोसोमिया), समय से पहले जन्म, कम ब्लड शुगर या प्री-एक्लेम्प्सिया जैसी समस्याएं कम होती हैं।
डिलीवरी के बाद
जन्म के बाद ब्लड शुगर सामान्य हो जाता है, लेकिन 6–12 हफ्ते बाद फॉलो-अप टेस्ट जरूरी है। लगभग 50% महिलाओं में बाद में टाइप 2 डायबिटीज हो सकता है। स्वस्थ वजन, डाइट और व्यायाम से इसे रोका जा सकता है।
अगर आप गर्भवती हैं या प्लान कर रही हैं, तो डॉक्टर से स्क्रीनिंग और सलाह जरूर लें। समय पर पता चलने से सब कुछ आसान हो जाता है।
मेडिकल डिस्क्लेमर: यह जानकारी केवल सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी प्रकार की जांच, उपचार या दवा के लिए योग्य चिकित्सक से सलाह लेना आवश्यक है।