Agranee Ayurved Kidney Cure Center

Agranee Ayurved Kidney Cure Center Dr p kumar treated those patients who has been suffering from CRF & ARF through ayurved & patients on dialysis process Dr.p. Kumar give 100 % result

07/04/2021
मल बद्धता (constipation): आयुर्वेदीय विचार व चिकित्सा ?रोगी जब आयुर्वेदिक चिकित्सक के पास मलबद्धता (constipation) की शिक...
17/06/2020

मल बद्धता (constipation): आयुर्वेदीय विचार व चिकित्सा ?
रोगी जब आयुर्वेदिक चिकित्सक के पास मलबद्धता (constipation) की शिकायत लेकर आता है तो 90% चिकित्सक रोगी को वतनलोमक या रेचन औषधि देते है। आप सभी इससे सहमत होंगे, परंतु क्या यह उचित चिकित्सा है ? ऐसे उपचार से शुरू में कुछ रोगियों में लाभ भी देखने को मिलता है, परंतु कुछ समय में रोगी फिर से वही परेशानी लेकर या तो आपके पास दोबारा आता है या फिर से allopathic laxative या फिर मार्केट में उपलब्ध विरेचक कल्प इत्यादि लेना शुरू कर देता है। क्या आपने कभी विचार किया है की छोटी सी दिखने वाली इस समस्या का उपचार इतना कठिन क्यों है, अथवा यह रोगी को सालो तक क्यों सत्ताती रहती है। आइए इस विषय में कुछ तथ्यो पर विचार करे।
मल, पाचन-तंत्र का सबसे आख़िरी उत्पाद होता है। मल की प्रकृति इस बात पर निर्भर करती है की किस प्रकार का आहार आप लेते है, किस समय पर लेते है तथा, किस मानसिक भाव से लेते है। आहार में क्या खाए क्या ना खाएँ इसकी जानकारी आयुर्वेद में विस्तार पूर्वक आयी है, इसलिए उसका अध्ययन करे और वैसे ही रोगी को भी निर्देश दे। दूसरा पड़ाव है की आहार काल को फ़िक्स करना। तीसरा की आहार कारते समय पूर्ण ध्यान आहार पर रहे ना की अन्य कही और। क्योंकि स्रोतस का निर्माण तथा उसकी सेहत उन्मे बहाने वाले द्रव्यों पर ही निर्भर होती है, वैसे ही इन नियमो का पालन कर आहार का पाचन ठीक होता है तथा मल ठीक बनता है । अब इस मल को बाहर निकालने के लिए जिस अपान वायु की ज़रूरत रहती है वह तभी ठीक रहेगी जब रोगी मल विसर्जन सुबह वात के काल (सुबह 2-6 बजे ) में करे। यही कारण है की सुबह जितने जल्दी उठा जाए उतना ही असानी से मल त्याग होता है।
अब मलबाधता किसे कहगे इसके सूक्ष्म विचार पर आएँ। मलबद्धता प्रायः तीन स्वरूपों में देखने को मिलती है। पहला मल का रूक्ष या सूखा होना, दूसरा मल का चिपचिपा होना तथा तीसरा आंत्र की गति सम्यक् ना होने के कारण हुई मल बद्धता। इन तीनो करणो को देख आप खुद यह विचार करे की एक कल्प, या एक ही तरह की चिकित्सा क्या सच में तीनो प्रकार की मल बद्धता को ठीक कर सकती है। जवाब है नहीं।
१) रूक्ष मलबद्धता का प्रमुख कारण आमाशय गत कलेदक कफ के स्नेह गुनो में कमी, तथा समान वायु के रूक्ष गुण में वृधि होता है। इन रोगियों में प्रमुख लक्षण गुठली की तरह मल या फिर बकरी के मल की तरह गाँठ युक्त मल होना देखने को मिलता है । ऐसे में रोगी को समान काल में गाय का घी व सेधव नामक देने या फिर इमली सिद्ध मोमफलि के तैल सेवन करने से( चिंचा -लवण तैल ) से लाभ मिलता है।

२) चिपचिपा या साम मलबद्धता में जिस प्रकार कच्चे आम से छील्का उतारना में दिक़्क़त आती है, वैसे ही यह मल विसर्जन रोगी से मेहनत करवाता है। इस तरह के रोगी में मल करने के बाद भी मल का आँतो में चिपके रहने के कारण दोबारा मल त्याग की इच्छा तो होती है परंतु मल त्याग नहीं हो पाता । यहाँ पाचक और वतनलोमक औषधीय अपेक्षित है। यहाँ लशुनादि वटी, लघू सूत शेखर रस, इत्यादि से मलबद्धता ठीक होती है।

३) तीसरे आँतो की कमजोरी (weak peristalsis) से होने वाली मलबद्धता। इस तरह की मलबद्धता का कारण लम्बे समय तक विरेचक औषधियों का सेवन करना होता है, जिससे की आँते निर्बल होकर अपना काम नहीं कर पाती। यह मलबद्धता सुबह खैनी/तंबाखु खाने वाले रोगियों में भी देखने को मिलती है। क्योंकि आँतो का निर्माण रक्त के मल से बताया गया है, इसलिए यहाँ पर रक्त पर काम करने वाले लोह कल्प जैसे तप्यादि लोहा, मंडूर इत्यादि का प्रयोग लाभकारी होता है।

यह आवश्यक है की आपके रोगी को किस तरह की मलबद्धता है, यह चिकित्सक को पता होनी चाहिए। इन तीन सम्प्राप्तियो को तथा आयुर्वेद में बताए आहार नीयमो को ध्यान में रख कर अगर चिकित्सा की जाए तो मलबद्धता का रोगी पूरी रूप से ठीक हो सकता है। इसलिए अब आपको चुनना है कि आप आयुर्वेद चिकित्सक के नाते अपने रोगी को युक्ति युक्त आयुर्वेदीय चिकित्सा देते है य फिर allopathy की तरह पेट साफ़ करने वाला काढ़ा, या टेबलेट।

18/10/2019

कोई भी हिन्दुस्तानी चाहे वो डाक्टर हो या
आम पब्लिक इस पोस्ट को जरुर पढ़ें :-

बहुत ज्ञान वर्धक लेख है, किसी विद्वान ने लिखा होगा, आपका पढ़ना बेहद जरुरी है।

क्या सचमुच आयुर्वेद दवाओं में स्टेरॉइड्स मिले होते हैं?

सर्वप्रथम हम आयुर्वेद को लेकर उत्पन्न भ्रांतियों के काल को 3 भागों में बाँटते हैं और उस पर चर्चा करते हैं:

1. मुग़ल काल।
2. ब्रिटिश काल।
3. मल्टीनेशनल कंपनियों का काल।

1. मुग़ल काल

मुग़लों के शासन काल में यूनानी हकीमों ने मुस्लिम रोगियों को आयुर्वेद से दूर कर यूनानी की तरफ लाने के लिए यह प्रचारित किया कि इसमें गौमूत्र मिला होता है, जबकि आयुर्वेद की 100 में से मात्र 2 या 3 दवाओं में ही गौमूत्र का प्रयोग किया जाता है तथा चूर्ण तो सभी उससे मुक्त होते हैं। इस भ्रांति का अब भी अधिकांश मुस्लिमों पर प्रभाव है तथा इसी कारण वे आयुर्वेद से दूरी बनाए हुए हैं।

2. ब्रिटिश काल

इस काल में अंग्रेज़ों ने कई भ्रांतियाँ हम भारतीयों में रोपीं। बहुतसी राजनैतिक थीं, लेकिन आयुर्वेद के बारे में एक भ्रांति बनाई गई कि ये दवाएँ बे-असर होती हैं तथा यदि असर भी करती हैं तो काफी समय के बाद। इन भ्रांतियों को फैलाकर वे त्वरित असरकारक अंग्रेज़ी दवाओं को भारत में स्थापित कर गए।

3. मल्टीनेशनल कम्पनियों का काल

जैसे-जैसे लोगों में शिक्षा का स्तर बढ़ा, आयुर्वेद को लेकर लोगों की विचारधारा बदली और बहुत बड़ी संख्या में लोग इससे जुड़ने लगे। इससे भारत की अर्थव्यवस्था में उछाल आया तथा अंग्रेज़ी दवाओं से लोग दूर होने लगे। ऐसे में मल्टीनेशनल कम्पनियों ने मीडिया के साथ मिलकर आयुर्वेद को बदनाम करना शुरू किया तथा वे भ्रम फैलाए जो कि इनकी कमज़ोरियाँ थीं जैसे ‘ये दवाएँ किडनी खराब करती हैं’ को इन्होंने आयुर्वेद के साथ भी जोड़ दिया। लोग तब भी आयुर्वेद से जुड़ते रहे तो फिर इन्होंने यह शगूफ़ा छोड़ा कि आयुर्वेद की दवाओं में एलोपैथिक दवाएँ मिली होती हैं, विशेषतः ‘स्टेरॉइड्स’।

दुष्प्रचार फैलने के कारण

1. एलोपैथिक चिकित्सकों की आयुर्वेद को लेकर अज्ञानता

एलोपैथिक के चिकित्सकों को आयुर्वेद की जड़ी-बूटियों के बारे में कुछ ज्ञान नहीं होता। उन्हें केवल अदरक, हल्दी, दूध या शहद के बारे में ही दादी माँ के नुस्खे वाला ज्ञान होता है। उन्हें आयुर्वेद की दिव्यता का कदापि अनुमान नहीं है। यदि उन्हें हम विशल्यकर्णी के बारे में बताएँ कि कैसे यह युद्ध में सैनिकों के तीर निकालने में काम आती थी और एक ही दिन में घाव भर देती थी, तो उन्हें इस पर बिल्कुल यकीन नहीं होगा। उन्हंे दांत के कीड़ों को नष्ट करने के लिए उपयोग में ली जाने वाली जड़ी-बूटियों को हाथ के अगंूठे पर लेप कर नष्ट करने वाली औषधियों के बारे में रत्ती भर भी ज्ञान नहीं। उन्हें तो वायुगोला या नाभि टलने जैसी किसी बीमारी के बारे में कोई गुमान ही नहीं तो इसके लिए दी जाने वाली दवाओं और उनका चमत्कारी असर कहाँ पता होगा? उन्हें तो यह भी पता नहीं कि आयुर्वेद दवाओं से गाँठ अथवा गठान को बिना ऑपरेशन के केवल बाह्य प्रयोग द्वारा ठीक किया जा सकता है। उन्हें तो इस पर भी यकीन नहीं कि आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों से हृदय के 70 प्रतिशत तक ब्लॉकेज हटाए जा सकते हैं। तो क्या उन्हें इस बात पर विश्वास होगा कि आयुर्वेद जड़ी-बूटियों से सायनोवियल फ्ल्यूड को पुनः उत्पन्न किया जा सकता है? अस्थमा के रोगी को हरिद्रा, कनक आदि औषधियों से एलर्जी के प्रभाव से मुक्त किया जा सकता है। वह रसमाणिक्य, टंकण, गंधक रसायन के बारे में क्या जाने कि यह चर्म रोगों को किस प्रकार नष्ट कर देते हैं।

अंतिम 3 उदाहरणों का वर्णन मैंने इसलिए किया है कि इन तीनों रोगों (जोड़ों का दर्द, अस्थमा और चर्मरोग) में एलोपैथिक चिकित्सक स्टेरॉइड्स का बहुतायत से प्रयोग करते है। उन्हें ऐसा लगता है कि बिना स्टेरॉइड्स के इन रोगों में लाभ नहीं पाया जा सकता, लेकिन उन्हें कौन बताए की कनक, अर्क, वातगजाकुंश रस, रसराज रस, वृह्दवात चिंतामणि, कुमारी, स्टेरॉइड्स से भी ज़्यादा असरकारक हैं तथा बिना किसी दुष्प्रभाव के इन रोगों में लाभ पहुँचा सकते हैं।

2. स्टेरॉन रिंग टेस्ट

यह टेस्ट किसी पदार्थ में उपस्थित स्टेरॉइड ग्रुप की उपस्थिति का पता लगाने के लिए किया जाता है। इस टेस्ट के बारे में जानने से पूर्व हम यह जान लें कि स्टेरॉइड्स कितने प्रकार के होते है और किस-किस पदार्थ में पाये जाते हैं।

स्टेरॉइड्स 2 प्रकार के होते है

अ. प्राकृतिक
ब. कृत्रिम

अ. प्राकृतिक या नेचुरल या फाइटोस्टेरॉइड्स

प्राकृतिक स्टेरॉइड्स के बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं। यहाँ तक कि बड़े-बड़े चिकित्सकों को भी इसके बारे में पता नहीं है। आयुर्वेद चिकित्सक भी इस पर विचार नहीं करते। यही मुख्य कारण है इस भ्रांति के फैलने का कि लोगों को यह पता ही नहीं है कि सभी जड़ी-बूटियों में प्राकृतिक स्टेरॉइड्स या फाइटोस्टेरॉइड्स या हॉर्मोन उपस्थित होते हैं। यह हर पेड़-पौधे और घास में पाए जाते हैं। यहाँ तक कि तेल, घी एवं गुड़ में भी प्राकृतिक स्टेरॉइड्स पाये जाते हैं।

ब. कृत्रिम स्टेरॉइड्स

ये रसायन होते हैं। मुख्य रूप से बीटामेथासोन, डेक्सा मेथासोन आदि बहुतायत में प्रयोग किये जाते हैं। प्रत्येक एलोपैथिक चिकित्सक इन्हें कम या ज़्यादा मात्रा में संबंधित रोग से पीड़ित रोगी को देते हैं। कई ऐसी बीमारियों में जिनका कारण उन्हें पता नहीं होता उनमें भी स्टेरॉइड्स दिये जाते हैं जैसे- ऑटो इम्मयून डीसीसेस

अब हम फिर से स्टेरॉन रिंग टेस्ट पर आते हैं। यह टेस्ट यह बताता है कि दिये गए पदार्थ में स्टेरॉइड्स हैं या नहीं । यदि रिंग आ जाती है तो स्टेरॉइड्स उपस्थित हैं। यदि रिंग नहीं आती है तो स्टेरॉइड्स नहीं हैं।

अब यदि किसी पदार्थ में जड़ी-बूटी या गुड़ की चाशनी या तैल-घी जिसमें कि प्राकृतिक स्टेरॉइड उपस्थित होता है तो उसमें भी यह रिंग टेस्ट पॉज़िटिव आता है। ऐसे में रोगी, एलोपैथिक चिकित्सक और आयुर्वेद चिकित्सक अज्ञानतावश यह समझ लेते हैं कि इस दवाई में तो स्टेरॉइड्स हैं। अतः यदि हमें प्राकृतिक या फॉयटो स्टेरॉइड के बारे में पता होगा तो हम तुरंत जवाब देंगे कि यह टेस्ट तो प्राकृतिक एवं कृत्रिम दोनों में पॉज़िटिव आता है। आप या तो और कोई विशिष्ट जाँच करें या इसके दुष्प्रभाव से हमें पता चलेगा कि यह कृत्रिम स्टेरॅाइड है या प्राकृतिक।

3. उन रोगों में आयुर्वेद के अच्छे परिणाम होना जिनमें एलोपैथिक पद्धति में कृत्रिम स्टेरॉइड्स दिये जाते हैं-

आयुर्वेद में कई रोगों का अद्भुत उपचार उपलब्ध है, लेकिन 3 रोगों में इसका विशेष प्रभाव है:

1. जोड़ों के रोग।
2. अस्थमा।
3. चर्मरोग।

अब इन तीनों रोगों में आधुनिक चिकित्सक थोड़ा या ज़्यादा स्टेरॉइड्स का डोज़ मरीज को देते हैं। जब कोई रोगी उनके पास न जाकर आयुर्वेद चिकित्सक के पास आता है और उसे लाभ मिलता है तथा जब वह रोगी यह बात अपने परिचित एलोपैथिक चिकित्सक को बताता है तो उसके मुँह से तुरंत निकलता है कि- ‘उन दवाओं में स्टेरॉइड्स मिला होगा।’

आचार्य चक्रपाणि (11वीं शताब्दी) का बताया योग ‘एक वर्ष से अधिक पुराना गुड़ और सरसों का तेल 21 दिन में अस्थमा को नष्ट कर देता है।’ अगर आप इसका स्टेरॉन रिंग टेस्ट कराएंगे तो वह भी पॉज़िटिव आयेगा क्योंकि गुड़ एवं तेल दोनों में प्राकृतिक स्टेरॉइड पाये जाते है। अब बेचारे चक्रपाणि जी 1000 साल पहले किस दवाई की दुकान से कृत्रिम स्टेरॉइड्स खरीदने गए होंगे और दवाई में मिलाया होगा और यह परिणाम मिला? ऐसे में कितनी हास्यास्पद बात है न कि इतनी आम दवाई कृत्रिम स्टेरॉइड की तुलना में अधिक असर कर रही है। ऐसे आयुर्वेद में अनगिनत योग हैं जो कृत्रिम स्टेरॉइड्स से कई गुणा अधिक असरकारक हैं।
अंत में मेरा यह कहना है कि इस भ्रांति को मिटाने के लिये हम सबको प्रयास करना होगा। लोगों का आयुर्वेद से दूर होना उनके लिए काफी हानिकारक है, क्योंकि आयुर्वेद रोगों को समूल नष्ट करता है बिना किसी अन्य रोग को उत्पन्न करे। अतः सभी चिकित्सक एवं आयुर्वेद प्रेमी इस अध्याय से शिक्षा लें एवं इसे मानवता के हित में प्रचारित एवं प्रसारित कर

Known about your kidney
22/08/2018

Known about your kidney

09/08/2018

Know about our kidney

Bhai is desh ko integrated medical system chachiye hi patients k liye jo best ho wo de
08/12/2017

Bhai is desh ko integrated medical system chachiye hi patients k liye jo best ho wo de

04/10/2017

(CRF) refers to an irreversible deterioration in renal function, which develops over a period of years. This initially manifests only as a biochemical abnormality. CRF is considered when glomerular filtration rate (GFR) falls below 30 ml/min. The conventional approach of management includes dialysis and renal transplantation, which are not affordable by Indian population mainly due to economic reasons. Therefore, exploration of a safe and alternative therapy is needed, which proves to be helpful in reducing the requirement of dialysis and in postponing the renal transplantation

03/10/2017

रक्त मधु(Diabetes) से मुक्ति हेतू बिल्कुल नये अनुसंधानित निष्कर्ष।

मधुमेह एवं रक्त मधु में मुख्य अन्तर :-

1.मधुमेह के रोगी का पेशाब मीठा होता है परन्तु रक्त मधु / डायबिटीज के रोगी का अम्लीय (Acidic)।

2. मधुमेह के रोगी का मूँह मीठा मीठा महकता है परन्तु रक्त मधु / डायबिटीज के रोगी का अम्लीय (Acidic)।

3. मधुमेह एक त्रिदोषज विशेष तौर पर वातज श्रेणी का असाध्य रोग है परन्तु रक्त मधु / डायबिटीज मुख्यतः शरीर में क्षरीयता - अम्लीयता के असंतुलन से उत्पन्न एक महारोग है।

4. मधुमेही के पेशाब पर मक्खियों व चीटियों के झुंड लगते हैं क्योंकि उसमें मिठास होती है, किन्तु रक्त मधु / डायबिटीज रोगी के पेशाब पर नहीं, क्योंकि इसमें अम्लीयता होती है।

5.अब तक हमनें डायबिटीज/ रक्त मधु को मधुमेह मानकर ईलाज किया किन्तु ये रोग और बढता ही गया।
लाखों से करोड़ों और अब अरबों में रोगियों की संख्या पहुंच गई है।
इसलिए इतने सूक्ष्म एवं गहन अध्ययन की आवश्यकता हुई और निष्कर्ष रुप में यह रोग मधुमेह नहीं रक्त मधु निकला।

6. आयुर्वेद में प्रमेह प्रकरण में वातज प्रमेहान्तर्गत असाध्य मधुमेह (क्षौद्रमेह) का वर्णन किया गया है जिसमें रोगी का पेशाब मधु के समान मीठा और गाढ़ा होता है, वह मधुमेह असाध्य रोग होता है और किसी भी ईलाज से ठीक नहीं होता।
परन्तु डायबिटीज / रक्त मधु में पेशाब गाढ़ा व मधु के समान नहीं होता है बल्कि पीलापन लिए हुए अम्लीय-सा (6.65 से 4.25) होता है।

7. आयुर्वेद के मधुमेह का प्राथमिक रूप प्रमेह (कफ़न, पितज, या वातज) होता है परन्तु डायबिटीज / रक्त मधु का प्राथमिक रूप यकृत विकारों से शुरू होता है।
Diabetes अर्थात रक्त मधु एक (शरीरगत अम्लीयता और क्षारीयता के असंतुलन से उत्पन्न वैसम्यता जनित रोग है, जिसमें रोगी के लीवर, पैंक्रियाज, रक्त आदि का pH उनके आदर्श pH से कम हो जाता है अर्थात अम्लीयता बढ़ जाती है।

इसलिए उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखकर जब ईलाज होगा तभी भारत डायबिटीज / रक्त मधु मुक्त हो सकेगा।

आयुर्वेद में मधुमेह होने के जो कारण बताये गये हैं, वे डायबिटीज / रक्त मधु की उत्पत्ति के कारणों से पुरी तरह मेल नहीं खाते।

इसीलिए मुझे डायबिटीज की उत्पत्ति / मूल कारणों को बताने के लिए pH theory of Diabetes Mellitus को लिखना पड़ा। शेष अगली बार Dr.P.KUMAR

Address

Khairabad
Sitapur
261131

Telephone

+919450374264

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Agranee Ayurved Kidney Cure Center posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share

Share on Facebook Share on Twitter Share on LinkedIn
Share on Pinterest Share on Reddit Share via Email
Share on WhatsApp Share on Instagram Share on Telegram