SiddhYog & Naturopathy

SiddhYog & Naturopathy yoga trainer , dietitian and social worker

हरियाणवी स्टार अन्नू कादयान जी के साथ अपने रेस्टोरेंट पर औपचारिक भेंट! Meet with Golden heart, Great person, A.K. jatti
21/11/2023

हरियाणवी स्टार अन्नू कादयान जी के साथ अपने रेस्टोरेंट पर औपचारिक भेंट! Meet with Golden heart, Great person, A.K. jatti

With little brother
24/04/2023

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25/02/2022
योग से सभी समस्याओं का समाधान है!              करो योग, रहो निरोग!
08/02/2022

योग से सभी समस्याओं का समाधान है!
करो योग, रहो निरोग!

14/09/2021

15 वर्ष तक के बच्चों को निशुल्क सुवर्णप्राशन पिलाते हुए
14/08/2021

15 वर्ष तक के बच्चों को निशुल्क सुवर्णप्राशन पिलाते हुए

15/07/2021

स्त्रियों में मैं #कीर्ति हूँ,,

भगवान श्री कृष्ण जब गीता के दसवें अध्याय में अपनी विभूतियों को बता रहे हैं,, तब पहली बार वे स्त्रियों के गुणों की चर्चा करते हुए नजर आते हैं,,

#कीर्ति:श्रीर्वाक्च नारीणां--गीता-१०--३५,,
हे अर्जुन अगर तू मुझे नारियों में ढूंढे तो मैं कीर्ति,, श्री,, और वाणी हूँ,,
भगवान कृष्ण ऐसे ही नहीं कुछ भी बोल देंगें,,कीर्ति बड़ा दुर्लभ गुण है स्त्री का,,
कोई स्त्री अगर पूर्णता को प्राप्त होना चाहे तो उसके अंदर यह गुण होना चाहिए,, या यूं कहें कि जिस स्त्री के अंदर कीर्ति है वही पूर्ण है,,,
कीर्ति का अर्थ है मातृत्व,, और माँ बन जाने से कीर्ति का कोई सम्बन्ध नही है,, ये बिल्कुल अलग और अद्भुत है,,

मानव जीवन में तीन मुख्य स्टेज हैं,, पहली है भोगी,, दूसरी है ब्रह्मचारी,, तीसरी है योगी,,
प्रथम भोगी वो जो अभी कामवासना या अन्य विषयों में डूबा हुआ है,,
ब्रह्मचारी वो जिसने वीर्य को उर्धगामी कर लिया है या रोक लिया है,,जिसका सिर्फ अपने ऊपर काबू है,, दूसरे अब भी उसे उस दृष्टि से देख सकते हैं,,जैसे पितामह #भीष्म,,वे खुद ब्रह्मचारी हैं,, लेकिन अम्बा उसे पति रूप में देखती और चाहती है,,

फिर एक तीसरी स्टेज है,,जिसके सानिध्य में आकर दूसरे व्यक्ति की भी वासना शांत हो जाए,, जैसे #महावीर स्वामी,, महावीर को देखकर किसी औरत के मन में काम का विचार नही आ सकता,,

ऐसे ही #कृष्ण औरतों में उस तीसरी स्टेज की बात कर रहे हैं,, एक साधारण औरतें हैं जो भोग, कामना, वासना, मोह में उलझी हुई हैं,
फिर योगिनी, साध्वी,, तपस्विनी बहने होती हैं जो खुद को इन बातों से ऊपर उठा लेती हैं,,लेकिन फिर भी दूसरे पुरुषों के मन में उनके लिए कामना हो सकती है,,

उसके बाद तीसरी स्टेज है,,जिसको श्री कृष्ण #कीर्ति कह रहे हैं,, इस तल पर पहुंचकर औरत में ऐसी #गरिमा,, ऐसा #तेज उत्पन्न होता है कि #कामातुर व्यक्ति भी जाकर उसकी छाती से लग जाए,, तो तत्क्षण उसका काम गायब हो जाएगा,, उसके विकार नष्ट हो जाएंगे,,

इसीलिए हमने #माँ को इतना महत्व दिया,,, हमने नारी के सबसे बड़े उत्कर्ष को जगदम्बा कहा,,, जगत जननी,, जगत माता कहा,,

ऋग्वेद में मंत्र है--दशास्याम पुत्रानाधेहि पतिमेकादशं कृधि ll मं--१०,,सूक्त-८५,,मंत्र--४५,
ऋषि कहते हैं कि तेरे दस पुत्र हों,, और अंततः तेरा पति तेरा ग्याहरवें पुत्र रूप में हो,, यानी पति भी पुत्र हो जाए,,

अभी तो हालत ऐसी है कि पुत्र पति हुए जा रहे हैं,, विदेशों में ऐसी घटनाएं हुई हैं जिनमें पुत्र पति हो गए हैं,,ये स्त्री का बड़े से बड़ा अपयश है,,

अपने देश में कुछ उदाहरण हैं--श्री #अरविंद ने पत्नी को माता माना है,, #रामकृष्ण परमहंस ने शारदा को माँ माना है,, पूज्य स्वामी #सोमानंद ने भी पत्नी को सालों तक माँ कहा है,, इन्ही सब को देखकर #गांधी ने भी पत्नी को माँ मानने का ड्रामा किया है,,

ये एकतरफा बात है,,, यहाँ पुरुषों के अंदर वो भाव है कि वे स्त्री को,, पत्नी को भी माँ की नजर से देख रहे हैं,,

लेकिन भगवान कृष्ण दूसरी बात कह रहे हैं,, वे कह रहे हैं स्त्री की वो दशा जब उसे सब के अंदर पुत्र नजर आए,, जब वह प्राणी मात्र की माता हो जाए,,वह #जगदम्बा हो जाए,, यही कीर्ति है,,

हे अर्जुन नारियों में मैं #कीर्ति हूँ,,। स्वामी सूर्य देव जी की वाॅल से.....

सीताराम दास जी महाराज जी की पोस्ट:◆अवश्य परिपालनीय आयुर्वेदिक नुस्खे◆दूध ना पचे तो ~ सोंफदही ना पचे तो ~ सोंठछाछ ना पचे ...
30/06/2021

सीताराम दास जी महाराज जी की पोस्ट:

◆अवश्य परिपालनीय आयुर्वेदिक नुस्खे◆
दूध ना पचे तो ~ सोंफ
दही ना पचे तो ~ सोंठ
छाछ ना पचे तो ~जीरा व काली मिर्च
अरबी व मूली ना पचे तो ~ अजवायन
कड़ी ना पचे तो ~ कड़ी पत्ता,
तैल, घी, ना पचे तो ~ कलौंजी...
पनीर ना पचे तो ~ भुना जीरा,
भोजन ना पचे तो ~ गर्म जल
केला ना पचे तो ~ इलायची
ख़रबूज़ा ना पचे तो ~ मिश्री का उपयोग करें...

1. योग, भोग और रोग ये तीन अवस्थाएं है।

2. लकवा - सोडियम की कमी के कारण होता है।

3. हाई वी पी में - स्नान व सोने से पूर्व एक गिलास जल का सेवन करें तथा स्नान करते समय थोड़ा सा नमक पानी मे डालकर स्नान करे।

4. लो बी पी - सेंधा नमक डालकर पानी पीयें।

5. कूबड़ निकलना- फास्फोरस की कमी।

6. कफ - फास्फोरस की कमी से कफ बिगड़ता है, फास्फोरस की पूर्ति हेतु आर्सेनिक की उपस्थिति जरुरी है।गुड व शहद खाएं

7. दमा, अस्थमा - सल्फर की कमी।

8. सिजेरियन आपरेशन - आयरन, कैल्शियम की कमी।

9. सभी क्षारीय वस्तुएं दिन डूबने के बाद खायें।

10. अम्लीय वस्तुएं व फल दिन डूबने से पहले खायें।

11. जम्भाई- शरीर में आक्सीजन की कमी।

12. जुकाम - जो प्रातः काल जूस पीते हैं वो उस में काला नमक व अदरक डालकर पियें।

13. ताम्बे का पानी - प्रातः खड़े होकर नंगे पाँव पानी ना पियें।

14. किडनी - भूलकर भी खड़े होकर गिलास का पानी ना पिये।

15. गिलास एक रेखीय होता है तथा इसका सर्फेसटेन्स अधिक होता है।गिलास अंग्रेजो ( पुर्तगाल) की सभ्यता से आयी है अतः लोटे का पानी पियें, लोटे का कम सर्फेसटेन्स होता है।

16. अस्थमा, मधुमेह, कैंसर से गहरे रंग की वनस्पतियाँ बचाती हैं।

17. वास्तु के अनुसार जिस घर में जितना खुला स्थान होगा उस घर के लोगों का दिमाग व हृदय भी उतना ही खुला होगा।

18. परम्परायें वहीँ विकसित होगीं जहाँ जलवायु के अनुसार व्यवस्थायें विकसित होगीं।

19. पथरी - अर्जुन की छाल से पथरी की समस्यायें ना के बराबर है।

20. RO का पानी कभी ना पियें यह गुणवत्ता को स्थिर नहीं रखता।कुएँ का पानी पियें।बारिस का पानी सबसे अच्छा, पानी की सफाई के लिए सहिजन की फली सबसे बेहतर है।

21. सोकर उठते समय हमेशा दायीं करवट से उठें या जिधर का स्वर चल रहा हो उधर करवट लेकर उठें।

22. पेट के बल सोने से हर्निया, प्रोस्टेट, एपेंडिक्स की समस्या आती है।

23. भोजन के लिए पूर्व दिशा, पढाई के लिए उत्तर दिशा बेहतर है।

24. HDL बढ़ने से मोटापा कम होगा LDL व VLDL कम होगा।

25. गैस की समस्या होने पर भोजन में अजवाइन मिलाना शुरू कर दें।

26. चीनी के अन्दर सल्फर होता जो कि पटाखों में प्रयोग होता है, यह शरीर में जाने के बाद बाहर नहीं निकलता है। चीनी खाने से पित्त बढ़ता है।

27. शुक्रोज हजम नहीं होता है फ्रेक्टोज हजम होता है और भगवान् की हर मीठी चीज में फ्रेक्टोज है।

28. वात के असर में नींद कम आती है।

29. कफ के प्रभाव में व्यक्ति प्रेम अधिक करता है।

30. कफ के असर में पढाई कम होती है।

31. पित्त के असर में पढाई अधिक होती है।

33. आँखों के रोग - कैट्रेक्टस, मोतियाविन्द, ग्लूकोमा, आँखों का लाल होना आदि ज्यादातर रोग कफ के कारण होता है।

34. शाम को वात -नाशक चीजें खानी चाहिए।

35. प्रातः 4 बजे जाग जाना चाहिए।

36. सोते समय रक्त दवाव सामान्य या सामान्य से कम होता है।

37. व्यायाम - वात रोगियों के लिए मालिश के बाद व्यायाम, पित्त वालों को व्यायाम के बाद मालिश करनी चाहिए।कफ के लोगों को स्नान के बाद मालिश करनी चाहिए।

38. भारत की जलवायु वात प्रकृति की है, दौड़ की बजाय सूर्य नमस्कार करना चाहिए।

39. जो माताएं घरेलू कार्य करती हैं उनके लिए व्यायाम जरुरी नहीं।

40. निद्रा से पित्त शांत होता है, मालिश से वायु शांति होती है, उल्टी से कफ शांत होता है तथा उपवास(लंघन) से बुखार शांत होता है।

41. भारी वस्तुयें शरीर का रक्तदाब बढाती है, क्योंकि उनका गुरुत्व अधिक होता है।

42. दुनियां के महान वैज्ञानिक का स्कूली शिक्षा का सफ़र अच्छा नहीं रहा, चाहे वह 8 वीं फेल न्यूटन हों या 9 वीं फेल आइस्टीन हों,

43. माँस खाने वालों के शरीर से अम्ल-स्राव करने वाली ग्रंथियाँ प्रभावित होती हैं।

44. तेल हमेशा गाढ़ा खाना चाहिएं सिर्फ लकडी वाली घाणी का, दूध हमेशा पतला पीना चाहिए।

45.छिलके वाली दाल-सब्जियों से कोलेस्ट्रोल हमेशा घटता है।

46. कोलेस्ट्रोल की बढ़ी हुई स्थिति में इन्सुलिन खून में नहीं जा पाता है। ब्लड शुगर का सम्बन्ध ग्लूकोस के साथ नहीं अपितु कोलेस्ट्रोल के साथ है।

47.मिर्गी दौरे में अमोनिया या चूने की गंध सूँघानी चाहिए।

48.सिरदर्द में एक चुटकी नौसादर व अदरक का रस रोगी को सुंघायें।

49. भोजन के पहले मीठा खाने से बाद में खट्टा खाने से शुगर नहीं होता है।

50.भोजन के आधे घंटे पहले सलाद खाएं उसके बाद भोजन करें।

51. अवसाद में आयरन, कैल्शियम, फास्फोरस की कमी हो जाती है।फास्फोरस गुड और अमरुद में अधिक है

52. पीले केले में आयरन कम और कैल्शियम अधिक होता है। हरे केले में कैल्शियम थोडा कम लेकिन फास्फोरस ज्यादा होता है तथा लाल केले में कैल्शियम कम आयरन ज्यादा होता है। हर हरी चीज में भरपूर फास्फोरस होती है, वही हरी चीज पकने के बाद पीली हो जाती है जिसमे कैल्शियम अधिक होता है।

53. छोटे केले में बड़े केले से ज्यादा कैल्शियम होता है।

54.रसौली को गलाने वाली सारी दवाएँ चूने से बनती हैं।

55. हेपेटाइट्स A से E तक के लिए चूना बेहतर है।

56. एंटी टिटनेस के लिए हाईपेरियम 200 की दो-दो बूंद 10-10 मिनट पर तीन बार दे।

57. ऐसी चोट जिसमे खून जम गया हो उसके लिए नैट्रमसल्फ दो-दो बूंद 10-10 मिनट पर तीन बार दें।बच्चो को एक बूंद पानी में डालकर दें।

58. मोटे लोगों में कैल्शियम की कमी होती है अतः त्रिफला दें। त्रिकूट ( सोंठ+कालीमिर्च+ मघा पीपली ) भी दे सकते हैं।

59. अस्थमा में नारियल दें।नारियल फल होते हुए भी क्षारीय है। दालचीनी + गुड + नारियल दें।

60. चूना बालों को मजबूत करता है तथा आँखों की रोशनी बढाता है।

61. दूध का सर्फेसटेंसेज कम होने से त्वचा का कचरा बाहर निकाल देता है।

62. गाय की घी सबसे अधिक पित्तनाशक फिर कफ व वायुनाशक है।

63. जिस भोजन में सूर्य का प्रकाशसे हवा का स्पर्श ना हो उसे नहीं खाना चाहिए

64. गौ-मूत्र अर्क आँखों में ना डालें।

65. गाय के दूध में घी मिलाकर देने से कफ की संभावना कम होती है लेकिन चीनी मिलाकर देने से कफ बढ़ता है।

66.मासिक के दौरान वायु बढ़ जाता है, 3-4 दिन स्त्रियों को उल्टा सोना चाहिए इससे गर्भाशय फैलने का खतरा नहीं रहता है। दर्द की स्थति में गर्म पानी में देशी घी दो चम्मच डालकर पियें।

67.रात में आलू खाने से वजन बढ़ता है।

68.भोजन के बाद बज्रासन में बैठने से वात नियंत्रित होता है।

69.भोजन के बाद कंघी करें कंघी करते समय आपके बालों में कंघी के दांत चुभने चाहिए।बाल जल्द सफ़ेद नहीं होगा।

70.अजवाईन अपान वायु को बढ़ा देता है जिससे पेट की समस्यायें कम होती है

71.अगर पेट में मल बंध गया है तो अदरक का रस या सोंठ का प्रयोग करें

72. कब्ज होने की अवस्था में सुबह पानी पीकर कुछ देर एडियों के बल चलना चाहिए।

73. रास्ता चलने, श्रम कार्य के बाद थकने पर या धातु गर्म होने पर दायीं करवट लेटना चाहिए।

74. जो दिन मे दायीं करवट लेता है तथा रात्रि में बायीं करवट लेता है उसे थकान व शारीरिक पीड़ा कम होती है।

75. बिना कैल्शियम की उपस्थिति के कोई भी विटामिन व पोषक तत्व पूर्ण कार्य नहीं करते है।

76.स्वस्थ्य व्यक्ति सिर्फ 5 मिनट शौच में लगाता है।

77.भोजन करते समय डकार आपके भोजन को पूर्ण और हाजमे को संतुष्टि का संकेत है।

78.सुबह के नाश्ते में फल, दोपहर को दही व रात्रि को दूध का सेवन करना चाहिए।

79. रात्रि को कभी भी अधिक प्रोटीन वाली वस्तुयें नहीं खानी चाहिए।जैसे - दाल, पनीर, राजमा, लोबिया आदि।

80. शौच और भोजन के समय मुंह बंद रखें, भोजन के समय टी वी ना देखें।

81.मासिक चक्र के दौरान स्त्री को ठंडे पानी से स्नान, व आग से दूर रहना चाहिए।

82. जो बीमारी जितनी देर से आती है, वह उतनी देर से जाती भी है।

83. जो बीमारी अंदर से आती है, उसका समाधान भी अंदर से ही होना चाहिए।

84.एलोपैथी ने एक ही चीज दी है, दर्द से राहत।आज एलोपैथी की दवाओं के कारण ही लोगों की किडनी, लीवर, आतें, हृदय ख़राब हो रहे हैं।एलोपैथी एक बिमारी खत्म करती है तो दस बिमारी देकर भी जाती है।

85. खाने की वस्तु में कभी भी ऊपर से नमक नहीं डालना चाहिए, ब्लड-प्रेशर बढ़ता है।

86 .रंगों द्वारा चिकित्सा करने के लिए इंद्रधनुष को समझ लें, पहले जामुनी, फिर नीला ..... अंत में लाल रंग।

87 .छोटे बच्चों को सबसे अधिक सोना चाहिए, क्योंकि उनमें वह कफ प्रवृति होती है, स्त्री को भी पुरुष से अधिक विश्राम करना चाहिए

88. जो सूर्य निकलने के बाद उठते हैं, उन्हें पेट की भयंकर बीमारियां होती है, क्योंकि बड़ी आँत मल को चूसने लगती है।

89.बिना शरीर की गंदगी निकाले स्वास्थ्य शरीर की कल्पना निरर्थक है, मल-मूत्र से 5%, कार्बन डाई ऑक्साइड छोड़ने से 22 %, तथा पसीना निकलने लगभग 70 % शरीर से विजातीय तत्व निकलते हैं।

90. चिंता, क्रोध, ईर्ष्या करने से गलत हार्मोन्स का निर्माण होता है जिससे कब्ज, बबासीर, अजीर्ण, अपच, रक्तचाप, थायरायड की समस्या उतपन्न होती है।

91.गर्मियों में बेल, गुलकंद, तरबूजा, खरबूजा व सर्दियों में सफ़ेद मूसली, सोंठ का प्रयोग करें।

92. प्रसव के बाद माँ का पीला दूध बच्चे की प्रतिरोधक क्षमता को 10 गुना बढ़ा देता है। बच्चो को टीके लगाने की आवश्यकता नहीं होती है।

93. रात को सोते समय सर्दियों में देशी मधु लगाकर सोयें त्वचा में निखार आएगा।

94. दुनिया में कोई चीज व्यर्थ नहीं, हमें उपयोग करना आना चाहिए।

95.जो अपने दुखों को दूर करके दूसरों के भी दुःखों को दूर करता है, वही मोक्ष का अधिकारी है।

96.सोने से आधे घंटे पूर्व जल का सेवन करने से वायु नियंत्रित होती है, लकवा, हार्ट-अटैक का खतरा कम होता है।

97.स्नान से पूर्व और भोजन के बाद पेशाब जाने से रक्तचाप नियंत्रित होता है।

98 .तेज धूप में चलने के बाद, शारीरिक श्रम करने के बाद, शौच से आने के तुरंत बाद जल का सेवन निषिद्ध है।

99. त्रिफला अमृत है जिससे वात, पित्त, कफ तीनो शांत होते हैं, इसके अतिरिक्त भोजन के बाद पान व चूना।

100. इस विश्व की सबसे मँहगी दवा लार है ।

हर हर महादेव
सिद्ध योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा परिवार सोनीपत हरियाणा
9812022507,
8708544100

"धनुरासन" सिद्ध योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र साईं मंदिर वाली गली कबीरपुर सोनीपत,9812022507
22/05/2021

"धनुरासन" सिद्ध योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र साईं मंदिर वाली गली कबीरपुर सोनीपत,9812022507

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16/05/2021

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पहले हमने वात दोष के बारे में जानकारी दी थी आज पित दोष पर बताते हैं पित्त दोष, लक्षण और उपाय  की जानकारी सभी तक पहुंचाये...
18/01/2021

पहले हमने वात दोष के बारे में जानकारी दी थी आज पित दोष पर बताते हैं
पित्त दोष, लक्षण और उपाय की जानकारी सभी तक पहुंचायें
आप स्वस्थ हों देश स्वस्थ हो और साथ ही अपना व देश का करोड़ों तो बचायें
पित्त दोष क्या है : असंतुलित पित्त से होने वाले रोग, लक्षण और उपाय
क्या आपके शरीर से भी बहुत तेज दुर्गंध आती है? या आप बहुत जल्दी गुस्सा हो जाते हैं तो जान लें कि ये सारे लक्षण पित्त प्रकृति के हैं। ऐसे लोग जिनमें पित्त दोष ज्यादा पाया जाता है वे पित्त प्रकृति वाले माने जाते हैं। इस लेख में हम आपको पित्त प्रकृति के गुण, लक्षण और इसे संतुलित करने के उपायों के बारे में विस्तार से बता रहे हैं।

Pitta Dosha

Contents

1 पित्त दोष क्या है?
2 पित्त के प्रकार :
3 पित्त के गुण :
4 पित्त प्रकृति की विशेषताएं :
5 पित्त बढ़ने के कारण:
6 पित्त बढ़ जाने के लक्षण :
7 पित्त को शांत करने के उपाय :
7.1 विरेचन :
8 पित्त को संतुलित करने के लिए क्या खाएं :
9 पित्त प्रकृति वाले लोगों को क्या नहीं खाना चाहिए :
10 जीवनशैली में बदलाव :
11 पित्त की कमी के लक्षण और उपचार :
12 साम और निराम पित्त :
पित्त दोष क्या है?
पित्त दोष ‘अग्नि’ और ‘जल’ इन दो तत्वों से मिलकर बना है। यह हमारे शरीर में बनने वाले हार्मोन और एंजाइम को नियंत्रित करता है। शरीर की गर्मी जैसे कि शरीर का तापमान, पाचक अग्नि जैसी चीजें पित्त द्वारा ही नियंत्रित होती हैं। पित्त का संतुलित अवस्था में होना अच्छी सेहत के लिए बहुत ज़रूरी है। शरीर में पेट और छोटी आंत में पित्त प्रमुखता से पाया जाता है।

ऐसे लोग पेट से जुड़ी समस्याओं जैसे कि कब्ज़, अपच, एसिडिटी आदि से पीड़ित रहते हैं। पित्त दोष के असंतुलित होते ही पाचक अग्नि कमजोर पड़ने लगती है और खाया हुआ भोजन ठीक से पच नहीं पाता है। पित्त दोष के कारण उत्साह में कमी होने लगती है साथ ही ह्रदय और फेफड़ों में कफ इकठ्ठा होने लगता है। इस लेख में हम आपको पित्त दोष के लक्षण, प्रकृति, गुण और इसे संतुलित रखने के उपाय बता रहे हैं।

पित्त के प्रकार :
शरीर में इनके निवास स्थानों और अलग कामों के आधार पर पित्त को पांच भांगों में बांटा गया है.

पाचक पित्त
रज्जक पित्त
साधक पित्त
आलोचक पित्त
भ्राजक पित्त
केवल पित्त के प्रकोप से होने वाले रोगों की संख्या 40 मानी गई है।

पित्त के गुण :
चिकनाई, गर्मी, तरल, अम्ल और कड़वा पित्त के लक्षण हैं। पित्त पाचन और गर्मी पैदा करने वाला व कच्चे मांस जैसी बदबू वाला होता है। निराम दशा में पित्त रस कडवे स्वाद वाला पीले रंग का होता है। जबकि साम दशा में यह स्वाद में खट्टा और रंग में नीला होता है। किसी भी दोष में जो गुण पाए जाते हैं उनका शरीर पर अलग अलग प्रभाव पड़ता है और उसी से प्रकृति के लक्षणों और विशेषताओं का पता चलता है.

पित्त प्रकृति की विशेषताएं :
पित्त प्रकृति वाले लोगों में कुछ ख़ास तरह की विशेषताओं पाई जाती हैं जिनके आधार पर आसानी से उन्हें पहचाना जा सकता है। अगर शारीरिक विशेषताओं की बात करें तो मध्यम कद का शरीर, मांसपेशियों व हड्डियों में कोमलता, त्वचा का साफ़ रंग और उस पर तिल, मस्से होना पित्त प्रकृति के लक्षण हैं। इसके अलावा बालों का सफ़ेद होना, शरीर के अंगों जैसे कि नाख़ून, आंखें, पैर के तलवे हथेलियों का काला होना भी पित्त प्रकृति की विशेषताएं हैं।

पित्त प्रकृति वाले लोगों के स्वभाव में भी कई विशेषताए होती हैं। बहुत जल्दी गुस्सा हो जाना, याददाश्त कमजोर होना, कठिनाइयों से मुकाबला ना कर पाना व सेक्स की इच्छा में कमी इनके प्रमुख लक्षण हैं। ऐसे लोग बहुत नकारात्मक होते हैं और इनमें मानसिक रोग होने की संभावना ज्यादा रहती है।

पित्त बढ़ने के कारण:
जाड़ों के शुरूआती मौसम में और युवावस्था में पित्त के बढ़ने की संभावना ज्यादा रहती है। अगर आप पित्त प्रकृति के हैं तो आपके लिए यह जानना बहुत ज़रूरी है कि आखिर किन वजहों से पित्त बढ़ रहा है। आइये कुछ प्रमुख कारणों पर एक नजर डालते हैं।

चटपटे, नमकीन, मसालेदार और तीखे खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन
ज्यादा मेहनत करना, हमेशा मानसिक तनाव और गुस्से में रहना
अधिक मात्रा में शराब का सेवन
सही समय पर खाना ना खाने से या बिना भूख के ही भोजन करना
ज्यादा सेक्स करना
तिल का तेल,सरसों, दही, छाछ खट्टा सिरका आदि का अधिक सेवन
गोह, मछली, भेड़ व बकरी के मांस का अधिक सेवन
ऊपर बताए गए इन सभी कारणों की वजह से पित्त दोष बढ़ जाता है। पित्त प्रकृति वाले युवाओं को खासतौर पर अपना विशेष ध्यान रखना चाहिए और इन चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।

पित्त बढ़ जाने के लक्षण :
जब किसी व्यक्ति के शरीर में पित्त दोष बढ़ जाता है तो कई तरह के शारीरिक और मानसिक लक्षण नजर आने लगते हैं। पित्त दोष बढ़ने के कुछ प्रमुख लक्षण निम्न हैं।

बहुत अधिक थकावट, नींद में कमी
शरीर में तेज जलन, गर्मी लगना और ज्यादा पसीना आना
त्वचा का रंग पहले की तुलना में गाढ़ा हो जाना
अंगों से दुर्गंध आना
मुंह, गला आदि का पकना
ज्यादा गुस्सा आना
बेहोशी और चक्कर आना
मुंह का कड़वा और खट्टा स्वाद
ठंडी चीजें ज्यादा खाने का मन करना
त्वचा, मल-मूत्र, नाखूनों और आंखों का रंग पीला पड़ना
अगर आपमें ऊपर बताए गये लक्षणों में से दो या तीन लक्षण भी नजर आते हैं तो इसका मतलब है कि पित्त दोष बढ़ गया है। ऐसे में नजदीकी चिकित्सक के पास जाएं और अपना इलाज करवाएं।

पित्त को शांत करने के उपाय :
बढे हुए पित्त को संतुलित करने के लिए सबसे पहले तो उन कारणों से दूर रहिये जिनकी वजह से पित्त दोष बढ़ा हुआ है। खानपान और जीवनशैली में बदलाव के अलावा कुछ चिकित्सकीय प्रक्रियाओं की मदद से भी पित्त को दूर किया जाता है।

विरेचन :
बढे हुए पित्त को शांत करने के लिए विरेचन (पेट साफ़ करने वाली औषधि) सबसे अच्छा उपाय है। वास्तव में शुरुआत में पित्त आमाशय और ग्रहणी (Duodenum) में ही इकठ्ठा रहता है। ये पेट साफ़ करने वाली औषधियां इन अंगों में पहुंचकर वहां जमा पित्त को पूरी तरह से बाहर निकाल देती हैं।

पित्त को संतुलित करने के लिए क्या खाएं :
अपनी डाइट में बदलाव लाकर आसानी से बढे हुए पित्त को शांत किया जा सकता है. आइये जानते हैं कि पित्त के प्रकोप से बचने के लिए किन चीजों का सेवन अधिक करना चाहिए.

घी का सेवन सबसे ज्यादा ज़रुरी है।
गोभी, खीरा, गाजर, आलू, शिमला मिर्च और हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन करें।
सभी तरह की दालों का सेवन करें।
एलोवेरा जूस, अंकुरित अनाज, सलाद और दलिया का सेवन करें।
और पित्त मे चीकू खाने से फायदा होता है

पित्त प्रकृति वाले लोगों को क्या नहीं खाना चाहिए :
खाने-पीने की कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिनके सेवन से पित्त दोष और बढ़ता है। इसलिए पित्त प्रकृति वाले लोगों को इन चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।

मूली, काली मिर्च और कच्चे टमाटर खाने से परहेज करें।
तिल के तेल, सरसों के तेल से परहेज करें।
काजू, मूंगफली, पिस्ता, अखरोट और बिना छिले हुए बादाम से परहेज करें।
संतरे के जूस, टमाटर के जूस, कॉफ़ी और शराब से परहेज करें।
जीवनशैली में बदलाव :
सिर्फ खानपान ही नहीं बल्कि पित्त दोष को कम करने के लिए जीवनशैली में भी कुछ बदलाव लाने ज़रूरी हैं। जैसे कि

ठंडे तेलों से शरीर की मसाज करें।
तैराकी करें।
रोजाना कुछ देर छायें में टहलें, धूप में टहलने से बचें।
ठंडे पानी से नियमित स्नान करें।
पित्त की कमी के लक्षण और उपचार :
पित्त में बढ़ोतरी होने पर समस्याएँ होना आम बात है लेकिन क्या आपको पता है कि पित्त की कमी से भी कई शारीरिक समस्याएं हो सकती हैं? शरीर में पित्त की कमी होने से शरीर के तापमान में कमी, मुंह की चमक में कमी और ठंड लगने जैसी समस्याएं होती हैं। कमी होने पर पित्त के जो स्वाभाविक गुण हैं वे भी अपना काम ठीक से नहीं करते हैं। ऐसी अवस्था में पित्त बढ़ाने वाले आहारों का सेवन करना चाहिए। इसके अलावा ऐसे खाद्य पदार्थों और औषधियों का सेवन करना चाहिए जिनमें अग्नि तत्व अधिक हो।

साम और निराम पित्त :
हम जो भी खाना खाते हैं उसका कुछ भाग ठीक से पच नहीं पता है और वह हिस्सा मल के रुप में बाहर निकलने की बजाय शरीर में ही पड़ा रहता है। भोजन के इस अधपके अंश को आयुर्वेद में “आम रस’ या ‘आम दोष’ कहा गया है।

जब पित्त, आम दोष से मिल जाता है तो उसे साम पित्त कहते हैं। साम पित्त दुर्गन्धयुक्त खट्टा, स्थिर, भारी और हरे या काले रंग का होता है। साम पित्त होने पर खट्टी डकारें आती हैं और इससे छाती व गले में जलन होती है। इससे आराम पाने के लिए कड़वे स्वाद वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करें।

जब पित्त, आम दोष से नहीं मिलता है तो उसे निराम पित्त कहते हैं। निराम पित्त बहुत ही गर्म, तीखा, कडवे स्वाद वाला, लाल पीले रंग का होता है। यह पाचन शक्ति को बढ़ाता है। इससे आराम पाने के लिए मीठे और कसैले पदार्थों का सेवन करें।

पित्त प्रकृति के लोगों को पित्त को बढ़ने से रोकने के लिए ऊपर बताए गए नियमों का पालन करना चाहिए। यदि समस्या ठीक ना हो रही हो या गंभीर हो तो किसी आयुर्वेदिक या प्राकृतिक चिकित्सक से संपर्क करें।
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वात दोष , लक्षण और उपाय की जानकारी सभी तक पहुंचायेंआप स्वस्थ हों देश स्वस्थ हो और साथ ही अपना व देश का करोड़ों रुपये बचाय...
04/01/2021

वात दोष , लक्षण और उपाय की जानकारी सभी तक पहुंचायें
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वात दोष क्या है : असंतुलित वात से होने वाले रोग, लक्षण और उपाय
आपने अपने आस पास ऐसे कई लोगों को देखा होगा जो ज़रूरत से ज्यादा बोलते हैं, हमेशा वे बहुत तेजी में रहते हैं या फिर बहुत जल्दी कोई निर्णय ले लेते हैं। इसी तरह कुछ लोग बैठे हुए भी पैर हिलाते रहते हैं। दरअसल ये सारे लक्षण वात प्रकृति वाले लोगों के हैं। अधिकांश वात प्रकृति वाले लोग आपको ऐसे ही करते नजर आयेंगे। आयुर्वेद में गुणों और लक्षणों के आधार पर प्रकृति का निर्धारण किया गया है। आप अपनी आदतों या लक्षणों को देखकर अपनी प्रकृति का अंदाज़ा लगा सकते हैं। इस लेख में हम आपको वात प्रकृति के गुण, लक्षण और इसे संतुलित रखने के उपाय के बारे में विस्तार से बता रहे हैं।

Contents

1 वात
2 वात दोष क्या है
3 वात के प्रकार
4 वात के गुण
5 वात प्रकृति की विशेषताएं
6 वात बढ़ने के कारण
7 वात बढ़ जाने के लक्षण
8 वात को संतुलित करने के उपाय
9 वात को संतुलित करने के लिए क्या खाएं
10 वात प्रकृति वाले लोगों को क्या नहीं खाना चाहिए
11 जीवनशैली में बदलाव
12 वात में कमी के लक्षण और उपचार
12.1 वात में कमी के लक्षण :
12.2 उपचार :
13 साम और निराम वात
Vata Dosha

वात दोष क्या है
वात दोष “वायु” और “आकाश” इन दो तत्वों से मिलकर बना है। वात या वायु दोष को तीनों दोषों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना गया है। हमारे शरीर में गति से जुड़ी कोई भी प्रक्रिया वात के कारण ही संभव है। चरक संहिता में वायु को ही पाचक अग्नि बढ़ाने वाला, सभी इन्द्रियों का प्रेरक और उत्साह का केंद्र माना गया है। वात का मुख्य स्थान पेट और आंत में है।

वात में योगवाहिता या जोड़ने का एक ख़ास गुण होता है। इसका मतलब है कि यह अन्य दोषों के साथ मिलकर उनके गुणों को भी धारण कर लेता है। जैसे कि जब यह पित्त दोष के साथ मिलता है तो इसमें दाह, गर्मी वाले गुण आ जाते हैं और जब कफ के साथ मिलता है तो इसमें शीतलता और गीलेपन जैसे गुण आ जाते हैं।

वात के प्रकार
शरीर में इनके निवास स्थानों और अलग कामों के आधार पर वात को पांच भांगों में बांटा गया है।

प्राण
उदान
समान
व्यान
अपान
आयुर्वेद के अनुसार सिर्फ वात के प्रकोप से होने वाले रोगों की संख्या ही 80 के करीब है।

वात के गुण
रूखापन, शीतलता, लघु, सूक्ष्म, चंचलता, चिपचिपाहट से रहित और खुरदुरापन वात के गुण हैं। रूखापन वात का स्वाभाविक गुण है। जब वात संतुलित अवस्था में रहता है तो आप इसके गुणों को महसूस नहीं कर सकते हैं। लेकिन वात के बढ़ने या असंतुलित होते ही आपको इन गुणों के लक्षण नजर आने लगेंगे।

वात प्रकृति की विशेषताएं
आयुर्वेद की दृष्टि से किसी भी व्यक्ति के स्वास्थ्य और रोगों के इलाज में उसकी प्रकृति का विशेष योगदान रहता है। इसी प्रकृति के आधार पर ही रोगी को उसके अनुकूल खानपान और औषधि की सलाह दी जाती है।

वात दोष के गुणों के आधार पर ही वात प्रकृति के लक्षण नजर आते हैं. जैस कि रूखापन गुण होने के कारण भारी आवाज, नींद में कमी, दुबलापन और त्वचा में रूखापन जैसे लक्षण होते हैं. शीतलता गुण के कारण ठंडी चीजों को सहन ना कर पाना, जाड़ों में होने वाले रोगों की चपेट में जल्दी आना, शरीर कांपना जैसे लक्षण होते हैं. शरीर में हल्कापन, तेज चलने में लड़खड़ाने जैसे लक्षण लघुता गुण के कारण होते हैं.

इसी तरह सिर के बालों, नाखूनों, दांत, मुंह और हाथों पैरों में रूखापन भी वात प्रकृति वाले लोगों के लक्षण हैं. स्वभाव की बात की जाए तो वात प्रकृति वाले लोग बहुत जल्दी कोई निर्णय लेते हैं. बहुत जल्दी गुस्सा होना या चिढ़ जाना और बातों को जल्दी समझकर फिर भूल जाना भी पित्त प्रकृति वाले लोगों के स्वभाव में होता है.

वात बढ़ने के कारण
जब आयुर्वेदिक चिकित्सक आपको बताते हैं कि आपका वात बढ़ा हुआ है तो आप समझ नहीं पाते कि आखिर ऐसा क्यों हुआ है? दरअसल हमारे खानपान, स्वभाव और आदतों की वजह से वात बिगड़ जाता है। वात के बढ़ने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं।

मल-मूत्र या छींक को रोककर रखना
खाए हुए भोजन के पचने से पहले ही कुछ और खा लेना और अधिक मात्रा में खाना
रात को देर तक जागना, तेज बोलना
अपनी क्षमता से ज्यादा मेहनत करना
सफ़र के दौरान गाड़ी में तेज झटके लगना
तीखी और कडवी चीजों का अधिक सेवन
बहुत ज्यादा ड्राई फ्रूट्स खाना
हमेशा चिंता में या मानसिक परेशानी में रहना
ज्यादा सेक्स करना
ज्यादा ठंडी चीजें खाना
व्रत रखना
ऊपर बताए गये इन सभी कारणों की वजह से वात दोष बढ़ जाता है। बरसात के मौसम में और बूढ़े लोगों में तो इन कारणों के बिना भी वात बढ़ जाता है।

वात बढ़ जाने के लक्षण
वात बढ़ जाने पर शरीर में तमाम तरह के लक्षण नजर आते हैं। आइये उनमें से कुछ प्रमुख लक्षणों पर एक नजर डालते हैं।

अंगों में रूखापन और जकड़न
सुई के चुभने जैसा दर्द
हड्डियों के जोड़ों में ढीलापन
हड्डियों का खिसकना और टूटना
अंगों में कमजोरी महसूस होना एवं अंगों में कंपकपी
अंगों का ठंडा और सुन्न होना
कब्ज़
नाख़ून, दांतों और त्वचा का फीका पड़ना
मुंह का स्वाद कडवा होना
अगर आपमें ऊपर बताए गये लक्षणों में से 2-3 या उससे ज्यादा लक्षण नजर आते हैं तो यह दर्शाता है कि आपके शरीर में वात दोष बढ़ गया है। ऐसे में नजदीकी चिकित्सक के पास जाएं और अपना इलाज करवाएं।

वात को संतुलित करने के उपाय
वात को शांत या संतुलित करने के लिए आपको अपने खानपान और जीवनशैली में बदलाव लाने होंगे। आपको उन कारणों को दूर करना होगा जिनकी वजह से वात बढ़ रहा है। वात प्रकृति वाले लोगों को खानपान का विशेष ध्यान रखना चाहिए क्योंकि गलत खानपान से तुरंत वात बढ़ जाता है. खानपान में किये गए बदलाव जल्दी असर दिखाते हैं।

वात को संतुलित करने के लिए क्या खाएं
घी, तेल और फैट वाली चीजों का सेवन करें।
गेंहूं, तिल, अदरक, लहसुन और गुड़ से बनी चीजों का सेवन करें।
नमकीन छाछ, मक्खन, ताजा पनीर, उबला हुआ गाय के दूध का सेवन करें।
घी में तले हुए सूखे मेवे खाएं या फिर बादाम,कद्दू के बीज, तिल के बीज, सूरजमुखी के बीजों को पानी में भिगोकर खाएं।
खीरा, गाजर, चुकंदर, पालक, शकरकंद आदि सब्जियों का नियमित सेवन करें।
मूंग दाल, राजमा, सोया दूध का सेवन करें।
वात प्रकृति वाले लोगों को क्या नहीं खाना चाहिए
अगर आप वात प्रकृति के हैं तो निम्नलिखित चीजों के सेवन से परहेज करें।

साबुत अनाज जैसे कि बाजरा, जौ, मक्का, ब्राउन राइस आदि के सेवन से परहेज करें।
किसी भी तरह की गोभी जैसे कि पत्तागोभी, फूलगोभी, ब्रोकली आदि से परहेज करें।
जाड़ों के दिनों में ठंडे पेय पदार्थों जैसे कि कोल्ड कॉफ़ी, ब्लैक टी, ग्रीन टी, फलों के जूस आदि ना पियें।
नाशपाती, कच्चे केले आदि का सेवन ना करें।
जीवनशैली में बदलाव
जिन लोगों का वात अक्सर असंतुलित रहता है उन्हें अपने जीवनशैली में ये बदलाव लाने चाहिए।

एक निश्चित दिनचर्या बनाएं और उसका पालन करें।
रोजाना कुछ देर धूप में टहलें और आराम भी करें।
किसी शांत जगह पर जाकर रोजाना ध्यान करें।
गर्म पानी से और वात को कम करने वाली औषधियों के काढ़े से नहायें। औषधियों से तैयार काढ़े को टब में डालें और उसमें कुछ देर तक बैठे रहें।
वात को कम करने का सबसे अच्छा व प्रभावी तरीका है #मालिस
गुनगुने तेल से नियमित मसाज करें, मसाज के लिए तिल का तेल, बादाम का तेल और जैतून के तेल का इस्तेमाल करें। तुरंत लाभ मिलता है
मजबूती प्रदान करने वाले व्यायामों को रोजाना की दिनचर्या में ज़रूर शामिल करें।
वात में कमी के लक्षण और उपचार
वात में बढ़ोतरी होने की ही तरह वात में कमी होना भी एक समस्या है और इसकी वजह से भी कई तरह की समस्याएं होने लगती हैं। आइये पहले वात में कमी के प्रमुख लक्षणों के बारे में जानते हैं।

वात में कमी के लक्षण :
बोलने में दिक्कत
अंगों में ढीलापन
सोचने समझने की क्षमता और याददाश्त में कमी
वात के स्वाभाविक कार्यों में कमी
पाचन में कमजोरी
जी मिचलाना
उपचार :
वात की कमी होने पर वात को बढ़ाने वाले आहार का सेवन करना चाहिए। कडवे, तीखे, हल्के एवं ठंडे पेय पदार्थों का सेवन करें। इनके सेवन से वात जल्दी बढ़ता है। इसके अलावा वात बढ़ने पर जिन चीजों के सेवन की मनाही होती है उन्हें खाने से वात की कमी को दूर किया जा सकता है।

साम और निराम वात
हम जो भी खाना खाते हैं उसका कुछ भाग ठीक से पाच नहीं पता है और वह हिस्सा मल के रुप में बाहर निकलने की बजाय शरीर में ही पड़ा रहता है। भोजन के इस अधपके अंश को आयुर्वेद में “आम रस’ या ‘आम दोष’ कहा गया है।

जब वात शरीर में आम रस के साथ मिल जाता है तो उसे साम वात कहते हैं। साम वात होने पर निम्नलिखित लक्षण नजर आते हैं।

मल-मूत्र और गैस बाहर निकालने में दिक्कत
पाचन शक्ति में कमी
हमेशा सुस्ती या आलस महसूस होना
आंत में गुडगुडाहट की आवाज
कमर दर्द
यदि साम वात का इलाज ठीक समय पर नहीं किया गया तो आगे चलकर यह पूरे शरीर में फ़ैल जाता है और कई बीमारियों होने लगती हैं।

जब वात, आम रस युक्त नहीं होता है तो यह निराम वात कहलाता है। निराम वात के प्रमुख लक्षण त्वचा में रूखापन, मुंह जीभ का सूखना आदि है. इसके लिए तैलीय खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन करें।

अगर आप वात प्रकृति के हैं और अक्सर वात के असंतुलित होने से परेशान रहते हैं तो ऊपर बताए गए नियमों का पालन करें। यदि समस्या ठीक ना हो रही हो या गंभीर हो तो किसी आयुर्वेदिक या प्राकृतिक चिकित्सक से संपर्क करें।
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