15/07/2021
स्त्रियों में मैं #कीर्ति हूँ,,
भगवान श्री कृष्ण जब गीता के दसवें अध्याय में अपनी विभूतियों को बता रहे हैं,, तब पहली बार वे स्त्रियों के गुणों की चर्चा करते हुए नजर आते हैं,,
#कीर्ति:श्रीर्वाक्च नारीणां--गीता-१०--३५,,
हे अर्जुन अगर तू मुझे नारियों में ढूंढे तो मैं कीर्ति,, श्री,, और वाणी हूँ,,
भगवान कृष्ण ऐसे ही नहीं कुछ भी बोल देंगें,,कीर्ति बड़ा दुर्लभ गुण है स्त्री का,,
कोई स्त्री अगर पूर्णता को प्राप्त होना चाहे तो उसके अंदर यह गुण होना चाहिए,, या यूं कहें कि जिस स्त्री के अंदर कीर्ति है वही पूर्ण है,,,
कीर्ति का अर्थ है मातृत्व,, और माँ बन जाने से कीर्ति का कोई सम्बन्ध नही है,, ये बिल्कुल अलग और अद्भुत है,,
मानव जीवन में तीन मुख्य स्टेज हैं,, पहली है भोगी,, दूसरी है ब्रह्मचारी,, तीसरी है योगी,,
प्रथम भोगी वो जो अभी कामवासना या अन्य विषयों में डूबा हुआ है,,
ब्रह्मचारी वो जिसने वीर्य को उर्धगामी कर लिया है या रोक लिया है,,जिसका सिर्फ अपने ऊपर काबू है,, दूसरे अब भी उसे उस दृष्टि से देख सकते हैं,,जैसे पितामह #भीष्म,,वे खुद ब्रह्मचारी हैं,, लेकिन अम्बा उसे पति रूप में देखती और चाहती है,,
फिर एक तीसरी स्टेज है,,जिसके सानिध्य में आकर दूसरे व्यक्ति की भी वासना शांत हो जाए,, जैसे #महावीर स्वामी,, महावीर को देखकर किसी औरत के मन में काम का विचार नही आ सकता,,
ऐसे ही #कृष्ण औरतों में उस तीसरी स्टेज की बात कर रहे हैं,, एक साधारण औरतें हैं जो भोग, कामना, वासना, मोह में उलझी हुई हैं,
फिर योगिनी, साध्वी,, तपस्विनी बहने होती हैं जो खुद को इन बातों से ऊपर उठा लेती हैं,,लेकिन फिर भी दूसरे पुरुषों के मन में उनके लिए कामना हो सकती है,,
उसके बाद तीसरी स्टेज है,,जिसको श्री कृष्ण #कीर्ति कह रहे हैं,, इस तल पर पहुंचकर औरत में ऐसी #गरिमा,, ऐसा #तेज उत्पन्न होता है कि #कामातुर व्यक्ति भी जाकर उसकी छाती से लग जाए,, तो तत्क्षण उसका काम गायब हो जाएगा,, उसके विकार नष्ट हो जाएंगे,,
इसीलिए हमने #माँ को इतना महत्व दिया,,, हमने नारी के सबसे बड़े उत्कर्ष को जगदम्बा कहा,,, जगत जननी,, जगत माता कहा,,
ऋग्वेद में मंत्र है--दशास्याम पुत्रानाधेहि पतिमेकादशं कृधि ll मं--१०,,सूक्त-८५,,मंत्र--४५,
ऋषि कहते हैं कि तेरे दस पुत्र हों,, और अंततः तेरा पति तेरा ग्याहरवें पुत्र रूप में हो,, यानी पति भी पुत्र हो जाए,,
अभी तो हालत ऐसी है कि पुत्र पति हुए जा रहे हैं,, विदेशों में ऐसी घटनाएं हुई हैं जिनमें पुत्र पति हो गए हैं,,ये स्त्री का बड़े से बड़ा अपयश है,,
अपने देश में कुछ उदाहरण हैं--श्री #अरविंद ने पत्नी को माता माना है,, #रामकृष्ण परमहंस ने शारदा को माँ माना है,, पूज्य स्वामी #सोमानंद ने भी पत्नी को सालों तक माँ कहा है,, इन्ही सब को देखकर #गांधी ने भी पत्नी को माँ मानने का ड्रामा किया है,,
ये एकतरफा बात है,,, यहाँ पुरुषों के अंदर वो भाव है कि वे स्त्री को,, पत्नी को भी माँ की नजर से देख रहे हैं,,
लेकिन भगवान कृष्ण दूसरी बात कह रहे हैं,, वे कह रहे हैं स्त्री की वो दशा जब उसे सब के अंदर पुत्र नजर आए,, जब वह प्राणी मात्र की माता हो जाए,,वह #जगदम्बा हो जाए,, यही कीर्ति है,,
हे अर्जुन नारियों में मैं #कीर्ति हूँ,,। स्वामी सूर्य देव जी की वाॅल से.....