30/01/2026
खेती को यूरिया-डीएपी के नशे से मुक्त करना आवश्यक है। यह केवल एक संवाद नहीं, वर्तमान कृषि की वास्तविक स्थिति है। कृषि की यह 'मेडिकल रिपोर्ट' समझने के लिए निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार करें:
1. "नशा" की प्रकृति: इसका तात्पर्य है बिना यूरिया-डीएपी के फसल का उत्पादन न होना। पहले एक बोरी पर्याप्त थी, अब तीन-चार बोरियों में भी वही स्थिति है, जो मानवीय नशे के समान है। 🍶
2. यूरिया और डीएपी का कार्य: ये खाद केवल पौधे को नाइट्रोजन और फास्फोरस प्रदान करते हैं, मिट्टी को नहीं। परिणामतः पौधा हृष्ट-पुष्ट दिखता है, किंतु मिट्टी पोषक तत्वों से वंचित रहती है। 🌾
3. मिट्टी पर प्रभाव: रासायनिक उर्वरकों के निरंतर उपयोग से कार्बन तत्व नष्ट होते हैं, केंचुए मर जाते हैं (जिससे मिट्टी सख्त होती है), और सूक्ष्मजीव समाप्त हो जाते हैं, जिससे पोषक तत्व अनुपलब्ध रहते हैं।
4. खुराक में वृद्धि का कारण: मिट्टी की शक्ति घटने के कारण हर वर्ष अधिक खाद की आवश्यकता होती है, जैसे बीमार शरीर को अधिक दवा की जरूरत होती है।
5. भविष्य की चेतावनी: यदि यही स्थिति रही, तो 5-10 वर्षों में मिट्टी पानी नहीं सोख पाएगी, जड़ें सांस नहीं ले पाएंगी, और फसलें केवल कृत्रिम पोषण पर जीवित रहेंगी, मानो 'आईसीयू' में वेंटिलेटर पर हों। ⚠️
6. पहचान के लक्षण: खेत में पानी का बह जाना, केंचुओं का अभाव, मिट्टी का पाउडर या पत्थर जैसा होना, अधिक खाद की आवश्यकता, तथा स्वाद में कमी और आकार में वृद्धि, ये सभी 'आईसीयू' की शुरुआत के संकेत हैं।
7. समाधान (इलाज):
* चरण 1: विषहरण (Detox): प्रत्येक सीजन में 20-30% यूरिया कम करें और उतना ही जैविक कार्बन बढ़ाएँ।
* परिणाम समयरेखा: 6 महीने में मिट्टी नरम होगी, 1 साल में केंचुए लौटेंगे, 2 साल में खाद की जरूरत कम होगी, और 3 साल में फसल स्वयं चलने लगेगी।
8. भ्रम का निवारण: "अधिक यूरिया = अधिक उत्पादन" यह एक भ्रम है। सत्य यह है कि "अधिक यूरिया = अधिक खर्च और वही उत्पादन।"
यूरिया और डीएपी मूलतः दवा थे, जिन्हें हमने दैनिक आदत बना दिया है। अब मिट्टी को 'पुनर्वास' की आवश्यकता है, अन्यथा कृषि वेंटिलेटर पर चली जाएगी। मैं रसायनों के विरुद्ध नहीं, अपितु उनके अत्यधिक प्रयोग के विरुद्ध हूँ। दवा सीमित मात्रा में जीवनदायिनी होती है, परंतु आदत बनने पर घातक सिद्ध होती है। कृषि आज भले ही 'आईसीयू' में न हो, परंतु 'आपातकालीन वार्ड' में अवश्य है। यदि अभी सुधरे नहीं, तो आने वाली पीढ़ी केवल बंजर ज़मीन देखेगी, फसल नहीं।