Acharya Bhaskar Shukla

Acharya Bhaskar Shukla वैदिक ज्योतिष, वैदिक पूजन, रुद्राभिषेक, कुण्डली मिलान, वास्तु पूजन। Acharya BhaskarShukla
(2)

15/03/2026

खरमास में सूर्य के धनु या मीन राशि में स्थित रहने के कारण विवाह आदि मंगलकार्य शास्त्रों में वर्जित बताए गए हैं। कार्याकार्य विचार प्रस्तुत हैं —

धन्वादौ स्थितभास्करे खलु जगन्मध्ये प्रवृत्ते खरे
मासेऽस्मिन् श्रुतिशास्त्रवर्जितकथा कार्याणि न प्रारभेत्।
विवाहादिकमङ्गलं न विधिना कर्तव्यं मनीषीजनैः,
धर्मार्थं जपहोमदाननिरतिः श्रेयोऽधिकं मन्यते॥

भावार्थ:
जब सूर्य धनु आदि राशियों में रहते हैं तब खरमास होता है। इस समय शास्त्रों के अनुसार विवाह आदि शुभ कार्य नहीं करने चाहिए, बल्कि जप, दान और धर्म में मन लगाना श्रेष्ठ माना गया है।
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सूर्ये धन्वि गते खरे समभवन्मासे प्रबुद्धैर्जनैः
वर्ज्याः सर्वविधा विवाहसहिताः कार्याः शुभाःशास्त्रतः।
देवस्यार्चनदानहोमविधयः कार्याः सदा श्रद्धया,
तस्मात् साधुजनाः प्रयत्नमनिशं कुर्वन्तु धर्मे धृताः॥

भावार्थ:
जब सूर्य धनु राशि में होते हैं तब खरमास आता है। इस समय विद्वानों ने विवाह आदि शुभ कार्यों को वर्जित बताया है, परंतु देवपूजन, दान और होम करना अत्यंत पुण्यदायक है।
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खरमाससमागमे जगति यत्सूर्यः स्थितो धन्वगे
तस्मिन्नद्य न कर्तुमर्हति बुधो विवाहमङ्गल्यम्।
श्रुत्युक्तं जपदानहोमविधिभिः पुण्यं समाराधयेत्,
धर्मे चित्तमधिष्ठितं हि सततं श्रेयःप्रदं मानवम्॥

भावार्थ:
जब खरमास आता है और सूर्य धनु में स्थित होते हैं, तब बुद्धिमान मनुष्य विवाह आदि मंगल कार्य नहीं करते, बल्कि जप, दान और धर्म में लगे रहते हैं।
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धर्मज्ञैर्निगमैः पुराणवचनैः प्रोक्तं समस्तं खरे
मासेऽस्मिन्नखिलं विवाहमखिलं कार्यं न कर्तुं बुधैः।
यत्नेन प्रभुभक्तिसाधनपराः सन्तः सदा भाविनः,
दानध्यानजपादिकर्मनिरताः कुर्वन्ति पुण्यप्रदम्॥

भावार्थ:
वेद और पुराणों में कहा गया है कि खरमास में विवाह आदि कार्य नहीं करने चाहिए। इस समय भक्ति, ध्यान और दान करना श्रेष्ठ है।
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मासे ख्याते खरे रवेरधिगतौ धन्वादिराशिस्थितौ
लोकानां शुभकर्मसंचयविधिः शास्त्रैः किल निषिद्धकः।
भक्त्या विष्णुपदाम्बुजार्चनरता दानादिके सादरं,
यः कुर्याद् स भवेदिहैव मनुजो भाग्याधिकः पुण्यवान्॥

भावार्थ:
जब सूर्य धनु आदि राशियों में रहते हैं तब खरमास होता है और उस समय शुभ कार्य वर्जित होते हैं। परंतु विष्णु की पूजा और दान करने से मनुष्य को अधिक पुण्य मिलता है
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खरमाससमागमे श्रुतिवचो वर्ज्यं विवाहादिकं
लोकानां हितकारिणः मुनिवरा यत् प्राहुरेव प्रिये।
देवार्चा जपहोमदाननिरतः सन्तो भवन्ति सदा,
धर्मे नित्यनिविष्टचित्तविभवाः प्राप्नोति पुण्यं नरः॥

भावार्थ:
खरमास में विवाह आदि कार्यों का निषेध मुनियों ने लोकहित के लिए बताया है। इस समय जप, होम और देवपूजा करना श्रेष्ठ है।
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सूर्ये मीनगते खरे समभवन्मासे जगत्पावने
वर्ज्यं मङ्गलकार्यसञ्चयमिदं शास्त्रेषु निःसंशयम्।
विष्णोः पूजनमादरात् जपविधिं दानं च नित्यं नरः,
कृत्वा पुण्यफलप्रदं लभति वै सौभाग्यमत्युत्तमम्॥

भावार्थ:
जब सूर्य मीन राशि में रहते हैं तब भी खरमास होता है और उस समय मंगलकार्य वर्जित माने जाते हैं। विष्णु पूजा और दान करना अत्यंत फलदायी है।
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श्रुत्युक्तं मुनिभिः पुराणकथितं मासे खरे मानवैः
वर्ज्यं सर्वमिदं विवाहसहितं कार्यं शुभं शास्त्रतः।
विष्णोर्भक्तिरनन्यचेतसि सदा दानं जपं साधनं,
कुर्वन् मानवजीवने लभति वै पुण्यं महद्भाग्यदम्॥

भावार्थ:
वेद, पुराण और मुनियों के अनुसार खरमास में विवाह आदि शुभ कार्य नहीं करने चाहिए। इस समय भगवान की भक्ति और जप करना अत्यंत पुण्यदायक है।
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धन्वादौ रविणा गते खलु खरे मासे प्रवृत्ते सति
शास्त्राणां निगमानुसारमखिलं वर्ज्यं शुभं कर्म तत्।
भक्त्या केशवपूजनं जपविधिं दानं च नित्यं नरः,
कृत्वा पुण्यफलं लभेत् सुकृतवान् स्याद् धर्ममार्गस्थितः॥

भावार्थ:
जब सूर्य धनु आदि राशियों में होते हैं और खरमास प्रारंभ होता है, तब शास्त्रों के अनुसार शुभ कार्य नहीं किए जाते। इस समय केशव की पूजा और दान करना उत्तम है।
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खरमासविभागकाले जगति शास्त्रोक्तमार्गस्थिताः
वर्ज्यं मङ्गलकर्म सर्वमखिलं प्राहुर्मनीषीजनाः।
विष्णोर्भक्तिरनन्यभावसहितं दानं जपं साधनं,
कुर्वन्तः सततं लभन्ति मनुजा धर्मार्थकामोदयम्॥

भावार्थ:
खरमास में विद्वान लोग शास्त्रों के अनुसार सभी मंगल कार्यों को वर्जित बताते हैं। इस समय भगवान विष्णु की भक्ति, जप और दान करने से धर्म और पुण्य की प्राप्ति होती है
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आचार्य भास्कर शुक्ला
वृन्दावन

योगी आदित्यनाथ की कुण्डलीजन्मस्थान पञ्चुर ३०:११:२९ ; ७८:४१:०९ ॥(Panchur, Garhwāl, Uttarakhand, India)जन्मकाल २९ दिस⋅ १९७...
12/10/2025

योगी आदित्यनाथ की कुण्डली

जन्मस्थान पञ्चुर ३०:११:२९ ; ७८:४१:०९ ॥(Panchur, Garhwāl, Uttarakhand, India)
जन्मकाल २९ दिस⋅ १९७१,सायं १९:४७ ॥

पराशर ऋषि के अनुसार योगी आदित्यनाथ की कुण्डली में विंशोत्तरी की अपेक्षा अष्टोत्तरी दशा प्रभावी है । (अष्टोत्तरी दशा की दोनों शर्तें पूरी हों तो सामान्यतः विंशोत्तरी मत देखें;विंशोत्तरी में ग्रह तत्कालीन अष्टोत्तरी के ग्रह की तुलना में बहुत अधिक बली हो तभी विंशोत्तरी का प्रभाव रहेगा । परन्तु विंशोत्तरी के अशक्त ग्रहों का भी अल्प प्रभाव सभी जातकों को मिलता ही है । अष्टोत्तरी की दोनों शर्तें पूरी हों तो उसके अशक्त ग्रह भी अधिक प्रभावी होते हैं ।)। अष्टोत्तरी दशा का प्रयोग आधुनिक युग में लोग त्याग चुके हैं । यही कारण है कि विंशोत्तरी के आधार पर योगी आदित्यनाथ के जीवन की घटनायें मेल नहीं खाती तो कुछ लोगों ने मनमाना जन्मकाल प्रचारित कर दिया,परन्तु उससे भी घटनायें मेल नहीं खातीं ।

दूसरी त्रुटि लोग यह करते हैं कि केवल लग्नकुण्डली (प्रथम वर्ग) द्वारा ही सबकुछ जानना चाहते हैं,जबकि लग्नकुण्डली दैहिक सुखदुःख हेतु ही प्रभावी है । साधुओं की कुण्डली में दैहिक सुख सामान्यतः नहीं रहता अथवा रहने पर भी उसपर ध्यान नहीं देते । दैहिक सुखदुःख को सीमित अर्थ में न लें,लग्नकुण्डली में बारहों भावों के विषयों का दैहिक सुखदुःख से ही मुख्य सम्बन्ध रहता है — इसपर ध्यान देना चाहिये ।

योगी आदित्यनाथ की लग्नकुण्डली (प्रथम वर्ग) में काम का सप्तम भाव अत्यधिक अशुभ है । उसमें मृत्युभाव के स्वामी अष्टमेश राहु दोहरे अशुभ योग चतुर्थेश−आयेश शुक्र के साथ हैं और सप्तमेश शनि भी अष्टमेश होकर अत्यधिक अशुभ है । अतः रत्तीभर भी कामसुख नहीं है ।

ऐसे लोग विवाह की गलती करें तो पत्नी से सम्बन्ध नहीं रहता तथा पत्नी के हाथों हत्या हो जाती है;पत्नी के ग्रह बली हों तो उसपर किसी को सन्देह भी नहीं होता । कामभाव का फलादेश धर्मभाव के साथ ही देखना चाहिये । कामभाव प्रबल और धर्मभाव अशुभ हो तो लफंगई का योग रहता है जैसा कि अन्तिम सन्देश वाले की कुण्डली में था । किन्तु कामभाव अशुभ एवं धर्मभाव शुभ एवं प्रबल हो तो ब्रह्मचर्य सहित धार्मिकता का योग बनता है,जैसा कि योगी आदित्यनाथ की लग्नकुण्डली में है । इनके धर्मभाव में शुभ राजयोगकारक मङ्गल है । मङ्गल का शुक्र एवं शनि से मैत्री का सम्बन्ध है जिसका अर्थ यह है कि मङ्गल में जितने अच्छे लक्षण हैं केवल उनका ही लाभ कामभाव को मिलेगा । अर्थात् ब्रह्मचर्य ।

किन्तु नवांश वर्ग देखे बिना केवल जन्मकुण्डली के आधार पर ऐसा निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिये । योगी आदित्यनाथ की नवांश कुण्डली में आठ ग्रह राजयोगकारी हैं और नवम ग्रह शनि भी राजयोगकारक सूर्य में अस्त होने के कारण मुख्यतः शुभ ही है । इतनी प्रबल और शुभ नवांश कुण्डली मैंने आजतक नहीं देखी ।

जन्मकुण्डली में लग्नेश चन्द्र मूलत्रिकोणस्थ होकर आयभाव में अशुभ शत्रु शनि के साथ हैं । चन्द्रमा प्रबल तो हैं किन्तु अशुभ । चन्द्रमा का एकमात्र मित्र शुभ राजयोगकारक मङ्गल हैं,अतः पञ्चम,नवम तथा दशम पर चन्द्रमा का शुभ प्रभाव है,अन्य सभी भावों पर अशुभ प्रभाव है । सूर्य और बृहस्पति के कारण धन एवं धर्म के क्षेत्र में बहुत से शत्रु बनेंगे । चन्द्रमा की प्रबल महादशा में ही १९९१ से २००५ ई⋅ के बीच उत्थान का अवसर मिला । किन्तु मुख्यमन्त्री वाला योग लग्नकुण्डली के कारण नहीं है ।

नवांश का मुख्य क्षेत्र धर्म है जिसका प्रभाव जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ता है । नवांश के धर्मभाव में शुभ और उच्च के बृहस्पति हैं । लग्नकुण्डली और नवांश में सप्तम भाव में शुक्र एवं राहु का भाव−वर्गोत्तम योग है । नवांश में शुक्र प्रबल तो हैं किन्तु अशुभ । परन्तु शुक्र से भी अधिक प्रबल नवमेश चन्द्रमा सप्तम में बैठकर शुक्र की अशुभता पर अङ्कुश लगा रहे हैं । नवांश में शुक्र की महादशा भी शैशवावस्था में ही बीत गयी । अतः सप्तम में अशुभ और प्रबल शुक्र वासना के भटकाव का फल नहीं दे सकें और ब्रह्मचर्य खण्डित नहीं हुआ । अभी नवांश में बुध की महादशा २००६ से २०२३ ई⋅ तक है । बुध स्वगृही आयेश हैं किन्तु मृत्युभाव के भी स्वामी हैं । अतः आय के क्षेत्र में जो विरोध करेगा उसका तो राम नाम सत्य है!बुलडोजर−योग अभी चल रहा है । बुध पर मूलत्रिकोणस्थ दशमेश सूर्य की मैत्री का प्रभाव राजनीति में सहायक है । किन्तु सहायक होने पर भी बुध मुख्यमन्त्री बनने का योग नहीं दे रहे हैं ।

वर्तमान राजयोग मुख्यतः षष्ट्यंश वर्ग के कारण है जिसमें मार्च २०१६ से दो दशकों की शुक्र महादशा आरम्भ है । षष्ट्यंश वर्ग लग्न कुण्डली से भी ४१% अधिक प्रबल होता है परन्तु जन्मकाल शुद्ध चाहिये । षष्ट्यंश में शुक्र और राहु का लग्नवर्ग एवं नवांश से भाव−वर्गोत्तम योग है जो उच्च के तुल्य बल देता है । षष्ट्यंश में भी शुक्र स्वगृही है किन्तु नवांश की तरह अशुभ है । राहु उच्चस्थ हैं । बुध अष्टमेश और आयेश होकर वहीं अत्यधिक अशुभ हैं । षष्ट्यंश की विशेषता यह है कि राजनीति का दशमभाव पूरी षष्ट्यंश कुण्डली में एकमात्र ऐसा भाव है जिसपर किसी ग्रह की शत्रुदृष्टि नहीं है और दशमेश सूर्य भी पञ्चम में शुभ हैं । कामभाव अशुभ है किन्तु राजनीति का भाव अच्छा है ।

राजनीति में दशम वर्ग का भी महत्व रहता है । इनके दशम वर्ग का दशम भाव अत्यधिक प्रबल और शुभ है — उसमें उच्च के सूर्य हैं और दशमेश मङ्गल भी राजयोगकारी हैं । लग्न में उच्चस्थ बृहस्पति धर्मेश भी हैं और षष्ठेश होकर शत्रुनाशक योग बना रहे हैं । दशम वर्ग में महादशा शनि की है जो अशुभ हैं किन्तु अभी अन्तर्दशा बृहस्पति की है । दशम वर्ग का विंशोपक बल अल्प है जिस कारण उसमें केवल प्रबल ग्रहों का ही प्रभाव पड़ता है । प्रबल बृहस्पति वर्तमान प्रान्तीय चुनाव में सहायक हैं ।

षष्ट्यंश के शुक्र की महादशा मार्च २०१६ में आरम्भ हुई जिसमें मुख्यमन्त्री बनें । उस समय किसी को अनुमान भी नहीं था कि योगी आदित्यनाथ भारत के सबसे बड़े प्रान्त का मुख्यमन्त्री बन सकते हैं । भाजपा में भी बहुत से गुप्त विरोधी थे । समस्त विरोधों को ध्वस्त करने वाला प्रमुख योग है वर्गोत्तम जिसने षष्ट्यंश में स्वगृही शुक्र को अनेक उच्चत्व वाला प्रचण्ड राजयोग दिया । १,३,४,७,९,१०,१२,२७ और ६० वर्गों में शुक्र सप्तम भावस्थ हैं जो भाव−वर्गोत्तम है । राजनीति में सहायक सारे वर्ग इनमें सम्मिलित हैं,जैसे कि दशम,सप्तविंशांश २७ सहित प्रथम,नवांश एवं षष्ट्यंश । २,१६,२०,२४,३०,४० और ४५ वर्गों में भी शुक्र का भाव−वर्गोत्तम लग्न में है जिसका राजनीति पर प्रभाव नगण्य एवं परोक्ष है किन्तु शुक्र के कुल बल की वृद्धि में सहायक है । योगी आदित्यनाथ के प्रचण्ड राजयोग के पीछे मुख्य कारण यही वर्गोत्तम योग है जिसने षष्ट्यंश में शुक्र की महादशा को प्रबल राजयोग दिया जो जुलाई २०३६ तक है — इस दौरान योगी आदित्यनाथ का उत्थान होगा बशर्ते वे जीवित रहें,किन्तु नरेन्द्र मोदी के पश्चात भाजपा की कुण्डली में पार्टी के पतन का योग है ।

योगी जी के षष्ट्यंश में अन्तर्दशा नीचस्थ चन्द्रमा की है जिसपर महादशाकारक शुक्र की पूर्ण शत्रुदृष्टि है । अतः शुक्र में जो कुछ भी अशुभत्व है वह मुख्यतः चन्द्रमा की अन्तर्दशा में ही मिलेगा — अप्रैल २०२१ से फरवरी २०२४ तक । वर्तमान में यही प्रमुख समस्या है । शुक्र और चन्द्रमा दोनों की शान्ति योगी जी को करनी चाहिये । परन्तु समस्या यह है चालू पद्धति वाले ज्योतिषी से वे राय लेंगे जो गलत ग्रहों की शान्ति करायेंगे,न तो सूर्यसिद्धान्त का उपयोग किया जायगा और न अष्टोत्तरी,वर्गोत्तम एवं षष्ट्यंश का जैसा कि पराशरी होराशास्त्र के अनुसार करना चाहिये ।

जन्मकाल में एक मिनट के अन्तर से षष्ट्यंश में अष्टोत्तरी की दशा में आठ मास का अन्तर आ रहा है । योगी आदित्यनाथ के जीवन की मुख्य घटनायें और लक्षणों का उपरोक्त जन्मकाल से मेल बैठता है,परन्तु सूक्ष्म जाँच की आवश्यकता है ताकि सेकण्ड तक की शुद्धि जन्मकाल में हो । तभी दशाओं की गणना अधिक शुद्धि से हो सकेगी । फिलहाल षष्ट्यंश दशाओं के काल में कुछ मासों की त्रुटि सम्भव है । जन्मकाल में दो मिनट की त्रुटि से षष्ट्यंश में एक राशि ही बदल जाती है । इस तरह के सूक्ष्म जाँच को “लग्नशुद्धि” कहते हैं । लग्नशुद्धि की पारम्परिक पद्धति में गर्भाधान-काल की आवश्यकता पड़ती है जिसका ज्ञान आजकल किसी को नहीं रहता । अतः जीवन की प्रमुख घटनाओं की जाँच द्वारा ही लग्नशुद्धि करनी चाहिये ।

(साभार आचार्य श्री विनय झा जी)

 #विवाह_हेतु_कुण्डली_मिलान_एवं_सही_मुहूर्त_की_गणना :वर कन्या के विवाह का मिलान सही नहीं होने पर कई बार बहुत कष्टकर स्थित...
06/10/2025

#विवाह_हेतु_कुण्डली_मिलान_एवं_सही_मुहूर्त_की_गणना :
वर कन्या के विवाह का मिलान सही नहीं होने पर कई बार बहुत कष्टकर स्थितियां उत्पन्न होते देखी गयी है, एक मामले में वर ने शादी के कुछ दिन बाद ही आत्महत्या कर लिया, दूसरे मामले में कन्या शादी के सात माह बाद जहर खाकर जान दे दी, इस प्रकार की बहुत सारी घटनाएं सामने आती रहती हैं, अतः शादी निश्चित करते समय कम्प्युटर साफ्ट वेयर से गुण मिलान तक सीमित न रहें, क्योंकि आज कम्प्यूटर का जमाना है जिसे देखो अपने अपने कम्प्यूटर में कोई न कोई सोफ़्टवेयर ज्योतिष वाला डालकर बैठा है, जैसे ही किसी भी वर कन्या की विवाह वाली बात की जाती है सीधे वर और कन्या की जन्म तारीख समय आदि बायोडाटा के साथ कुण्डली बना ली जाती है और उससे सीधे गुण मिलान कर विवाह के लिये उपयुक्तता देखा जाता है, गुण चक्र नाड़ी दोष और भकूट दोष आसानी से कम्पयूटर का साफ़्टवेयर निकाल कर दे देता है, मंगल चाहे वक्री हो अस्त हो कम डिग्री का हो फिर भी उसमें मंगली दोष बताते देर नही लगती है, #चन्द्रमा चाहे बाल हो वृद्ध हो अस्त हो नीच का हो, उसे नजरअंदाज कर कुण्डली मिलान कर दिया जाता है, कन्या का गुरु बल चाहे बहुत ही कमजोर हो, वर का सूर्य बल चाहे बिलकुल ही नही मिलता हो, लेकिन कम्प्यूटर के अनुसार गुण चक्र बताने मे कतई देर नही लगती है, और फ़टाफ़ट फ़ैसला भी हो जाता है, चाहे दोनो का चन्द्र बल बहुत ही अच्छा हो नहीं देखा जाता ! इस प्रकार से कितने मामलों में अर्थ के अनर्थ हो जाते हैं जिसका दुष्प्ररिणाम बाद में सामने आता है ! जिन लोगों को वास्तव मे सही ज्योतिषीय गणना करने की जानकारी नही है वह आसानी से वर-कन्या के गुण दोष बताने लगते है और जब उनसे कोई बात पूँछी जाती है तब वह अपने ज्ञान को सर्वोच्च बताते हुए, अपने अनाप सनाप वाचाली नीति को बताने लगते हैं !
#विवाह हेतु कुण्डली मिलान करते समय अष्टकूट के गुण का मिलान तो करना ही चाहिए साथ ही वर कन्या के #चन्द्रबल, सूर्यबल, गुरुबल, वैधव्य योग, तलाक योग, निःसंतान योग, #नपुंसक योग, सैय्या सुख पीड़ित योग, सप्तम भाव, सप्तमेश, लग्न व लग्नेश की मजबूत कमजोर स्थिति पर भी अवश्य ध्यान देना चाहिए ! मांगलिक दोष का #सावधानी पूर्वक विचार कर लेना चाहिए ! गण दोष, भकूट दोष, नाड़ी दोष, ग्रहमैत्री अवश्य देखना चाहिए ! यह सब बातें अनुकूल होने पर #विवाह हेतु स्वीकृति देनी चाहिए ! इसके बाद बात आती है विवाह के शुभ मुहूर्त व तिथि की उसपर हम आगे विचार करेंगे !
#विवाह_के_शुभ_नक्षत्र :— मूल, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, हस्त, उत्तराफ़ाल्गुनी, उत्तराषाढा, उत्तराभाद्रपद, स्वाती, मघा व रोहिणी इन नक्षत्रो मे और ज्येष्ठ, माघ, फ़ाल्गुन, बैशाख, मार्गशीर्ष एवं आषाढ इन महीनो मे विवाह करना शुभ होता है ! विवाह का सामान्य दिन पंचांग मे लिखा रहता है अत: पांचांग से दिन निकालकर उसको लेकर उस दिन वर कन्या के लिये यह विचार करना चाहिए कि उस दिन कन्या के लिये गुरुबल वर के लिये सूर्य बल दोनो के लिये चन्द्रबल उपयुक्त है या नहीं यह अवश्य देख लेना चाहिये।
#गुरुबल_विचार :-
गुरु, कन्या की राशि से नवम एकादश द्वितीय और सप्तम राशि मे शुभ होता है ! दशम, तृतीय, छठा और प्रथम राशि मे दान देने से शुभ हो सकता है परन्तु चौथीे आठवीं व बारहवीं राशि मे अशुभ होता है !
#सूर्यबल_विचार :- सूर्य वर की राशि से तीसरा, छठा, दसवां, ग्यारहवाँ शुभ होता है, दूसरा, पांचवाँ, सातवाँ और नौवाँ दान देने से शुभ हो सकता है ! परन्तु चौथा आठवां और बारहवां सूर्य हर हालत में अशुभ होता है !
#चन्द्रबल_विचार :-
चन्द्रमा वर और कन्या की राशि से तीसरा, छठा, सातवां, दसवाँ, ग्यारहवां शुभ होता है ! पहला, दूसरा, पांचवां, नौवां दान से शुभ हो सकता है, और चौथा, आठवां व बारहवां अशुभ होता है !
#विवाह_में_त्यागने_वाली_लगनें :
दिन मे तुला, वृश्चिक और रात्रि में मकर लग्न बधिर रहती है, दिन मे सिंह, मेष, वृष और रात्रि में कन्या, मिथुन, कर्क लग्न अन्धी रहती हैं, दिन मे कुंभ और रात्रि मे मीन दोनो लगने पंगु हैं, सिंह, मेष, वृष, मकर, कुम्भ, मीन यह लगन सुबह और शाम के समय कुबड़ी होती हैं !
#त्यागने_वाली_लगनों_का_फ़ल :
यदि विवाह बधिर लगन मे होता है तब वर कन्या चाहे कुबेर के खजाने से लदे हुये जाये लेकिन दरिद्र हो जायेंगे, दिन की अन्धी लगनो मे विवाह किया जाता है तब कन्या को वर से अलगाव व दूरी मिलनी ही है, रात्रि की अन्धी लगन में विवाह होता है तब संतति होने में बाधा उत्पन्न होती है, यदि किसी तरह उपाय से संतान होती भी है तब जिन्दा नही रहती, लगन पंगु होती है तब धन नाश और परिवार की मर्यादा का नाश होने लगता है !
ुद्धि :
लगन से बारहवे शनि दसवे मंगल तीसरे शुक्र लग्न मे चन्द्रमा और क्रूर ग्रह अच्छे नही होते है ! लगनेश और सौम्य ग्रह आठवें भाव मे अच्छे नही होते हैं ! सातवे भाव मे कोई भी ग्रह शुभ नही होता है !
#ग्रहों_का_बल :
पहले चौथे पांचवे नवें और दसवे स्थान मे गुरु सब दोषों को नष्ट करने वाला होता है ! सूर्य ग्यारहवे स्थान पर होने पर तथा चन्द्रमा वर्गोत्तम लग्न मे स्थिति होने पर नवमांश दोष को नष्ट कर देता है ! बुध, लगन से चौथे, पांचवे, नौवें और दसवें स्थान मे हो तब अक्सर खराब से खराब दोष को भी शुभ कर देता है ! लग्न का स्वामी और नवमांश का स्वामी एक ही भाव राशि में स्थित हों तब भी अक्सर दोष शांति माना जाता है !

आचार्य भास्कर शुक्ला

01/04/2025

🌷🏵️जय मां 🏵️🌹
नवरात्र व्रत पारण निर्णय 👉
सभी व्रतों का पारण प्रातः काल में होता है प्रातः काल सूर्योदय से 3 मुहुर्त(6घटी =2 घंटा 24मिनट) बताया गया है।
प्रातः काल प्रमाण - सूर्य्योदयावधित्रिमुहूर्त्तकालः । यथा --“ प्रातःकालो मुहूर्त्तांस्त्रीन् सङ्गवस्तावदेव तु ॥ “ इति तिथ्यादितत्त्वम् ॥

✅अतः इसी समय में अर्थात् अपने स्थानीय सूर्योदय से 2घंटे 24 मिनट के अंदर व्रत पारण शास्त्रोचित है।देख रहा हूं सभी मनमाने ढंग से समय बता रहे हैं जो उचित नहीं है। 🙏
शाक्ति की उपासना करें गे लेकिन श्रीमद् देवी भागवत के वचन नहीं मानें गे । जिसमें नवरात्र व्रत का वर्णन है। क्या मूर्खतापूर्ण बात।

श्रीमद्देवीभागवत के अनुसार नवरात्र के व्रत पारण का निर्णय के अनुसार दशमी में ही पारण करना चाहिए।
✅"सर्वेषामुपवासानां प्रातरेव हि पारणम्।इति वचनात्"

✅तिथ्यन्तेचोत्सवान्ते च व्रती कुर्याद्पारणम्।
यामद्वर्ध्वगामिन्यां प्रातरेव हि पारणम्।।

✅हेमाद्रि मत एवं श्रीमद्देवीभागवत का अनुसरण किया गया है।
"ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चात पारणं दशमी दिने।
कर्तव्यं शक्तितोदानं देयंभक्तिपरैर्नृपै:।।"
( श्रीमद्देवीभागवत 5।34।31)

✅कन्या पूजन कब करें -
"उत्सवस्तत्र कर्तव्यों नानावादित्र संयुतै: ।
कन्यकानां पूजन्च विधिपूर्वकम् ।।
एवं सम्पूजनं कृत्वा होमं मंत्र विधानत:।
अष्टम्यां वा नवम्यां वा कारयेद्विधि पूर्वकम्।।"
( श्रीमद्देवीभागवत)
अष्टमी या नवमी को विधिपूर्वक कन्या पूजन करके मंत्रों द्वारा हवन करना चाहिए। और ब्राह्मणों को भोजन कराकर दशमी में पारण करें।
✅दशमी में ही सोमवार 7अप्रैल 2025 को प्रातः काल पूजा करके पारणा करना उचित है।
💐🌷🪷🌹🏵️🙏🌷🌹💐🏵️🌹🪷🌷💐🏵️

बैठेंगे किसी दिन शुकून से और कुछ यूं बातों से पहचान करवाने का प्रयास करेंगे की आप चाहते तो बहुत हो लेकीन राजी होना हमारा...
15/11/2024

बैठेंगे किसी दिन शुकून से और कुछ यूं बातों से पहचान करवाने का प्रयास करेंगे की आप चाहते तो बहुत हो लेकीन राजी होना हमारा भी जरूर होना चाहिए।।🙏❤️

Trimbakeshwar Mahadev ke darshan
09/05/2024

Trimbakeshwar Mahadev ke darshan

शुक्र राशि परिवर्तन 31March 2024             प्रातः काल 6बजकर 50मिनट पर               #कुण्डली_के_बारह_भाव_में_शुक्र_का_...
29/03/2024

शुक्र राशि परिवर्तन 31March 2024
प्रातः काल 6बजकर 50मिनट पर
#कुण्डली_के_बारह_भाव_में_शुक्र_का_प्रभाव :

#प्रथम_भाव_में_शुक्र_का_प्रभावः

लग्न में शुक्र की स्थिति से जातक प्रायः उत्तम कोटि के कपड़े पहनना पसंद करता है एवं रहन-सहन में नजाकता नफासत पसंद होता है ! जातक अपने सौंदर्य का विशेष ध्यान रखता है एवं सौंदर्य प्रसाधनों का शौकीन होता है ! स्त्रियों की जन्म पत्रिका में लग्नस्थ् शुक्र के प्रभाव से वह अति सुन्दर होती हैं !
वहीं शत्रु राशि में स्थित होने पर शौक श्रंगार करने व तड़क भड़क वाले कपड़े पहनने का कोई शौक नहीं होता है ! पत्नी फिर भी खूबसूरत मिलती है, परन्तु विचारों में भिन्नता हो सकती है !

#द्वितीय_भाव_में_शुक्र_का_प्रभावः

स्वभावः
द्वितीय स्थान में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक मिष्ठान प्रिय, यशस्वी, सुखी, कलाप्रिय एवं भाग्यशाली होता है ! वह कर्त्तव्य में चतुर और अच्छा वक्ता भी होता है !

पूर्ण दृष्टिः
द्वितीय शुक्र की पूर्ण दृष्टि अष्टम भाव पर पड़ती है जिससे जातक सामान्य या गुप्त रोगी हो सकता है ! जातक कफ व वात रोगों से भी प्रभावित होता है ! शुक्र की अष्टम स्थान पर दृष्टि से जातक पर्यटनशील एवं विदेशवासी होता है !

मित्र/शत्रु राशिः
शुक्र के स्व, उच्च या मित्र राशियों में होने से जातक उत्तम सुख प्राप्त करता है ! मित्र राशियों में होने से जातक को धन, यश, लोकप्रियता व बड़े कुटुम्ब की प्राप्ति होती है ! शत्रु व नीच राशि में शुक्र के होने पर शुभ फल में न्यूनता आती है ! शत्रु राशि का शुक्र होने पर जातक का धन संचय नहीं होता ! जातक को पैतृक सम्पत्ति की प्राप्ति में भी अनेक बाधाएँ आती हैं ! जातक के पारिवारिक सुख में भी न्यूनता आती है !

भाव विशेषः
द्वितीयस्थ शुक्र के प्रभाव से जातक धन का अर्जन व बचत करता है ! जातक मित्रों के लिए हितैषी होता है ! शुक्र के प्रभाव से जातक पारिवारिक व्यवसाय को आगे बढ़ाता है ! कला के क्षेत्र में जातक प्रसिद्धि प्राप्त करता है ! प्रतिकूल प्रभाव से कुमित्रों की संगति के कारण बर्बाद हो सकता है ! जातक में धैर्य नही होता, जिससे वह बिना सोचे समझे निर्णय ल लेेता है एवं अनेक कष्ट उठाता है !

#तृतीय_भाव_में_शुक्र_का_प्रभावः

स्वभावः
तृतीय स्थान में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक मनोरंजन प्रिय, सुखी, धनी, यात्रा प्रिय, विद्वान और कला प्रिय होता है ! जातक मिलनसार और विपरीत लिंग के व्यक्ति के प्रति सहज रूप से आकर्षित होता है ! जातक को बहनों का विशेष सहयोग मिलता है !

पूर्ण दृष्टिः
तृतीय भाव में स्थित शुक्र की पूर्ण दृष्टि नवम स्थान पर होती है जो जातक के लिए शुभ फलदायक होती है ! नवम स्थान पर शुक्र की दृष्टि से जातक सरपंच, ग्रामाधिपति व अपने कुल व समाज में उच्च पद व प्रतिष्ठान प्राप्त करता है ! जातक की धर्म के प्रति अत्यंत आस्था होती है ! जातक की कीर्ति दूर-दूर फैलती है ! रंगमंच, होटल व्यवसाय व मनोरंजन के क्षेत्र में जातक को विशेष सफलता प्राप्त होती है !

मित्र/शत्रु राशिः
मित्र, स्व व उच्च राशि में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक का व्यक्तित्व आकर्षक होता है व उसे भाई-बहनों का सहयोग प्राप्त होता है ! वह पराक्रमी एवं अपने पुरूषार्थ से सफलता प्राप्त करता है ! स्वराशि में जातक लम्बी यात्राएं अपने आनंद के लिए करता है ! शत्रु व नीच राशि में शुक्र के प्रभाव से विपरीत फल प्राप्त होता है ! जातक को भाईयों व बहनों से सहयोग नहीं मिलता ! उसमें साहस की कमी रहती है !

भाव विशेषः
तृतीय भाव भाई-बहन व पराक्रम से सम्बंध रखता है इसलिए तृतीय भाव में शुक्र की स्थिति से जातक को भाईयों विशेषकर बहनों का सुख व सहयोग प्राप्त होता है ! जातक पराक्रमी होता है एवं अपने स्वयं के पराक्रम से प्रगति करता है ! तृतीय स्थान पर शुक्र की स्थिति जातक को भाग्यशाली भी बनाती है ! जातक चित्रकारी में विशेष रूचि रखता है ! जातक को पर्यटन में विशेष आनंद आता है !

#चतुर्थ_भाव_में_शुक्र_का_प्रभाव :

स्वभावः
चतुर्थ स्थान में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक सुखी, दीर्घायु, सुसंतानों से युक्त, साहित्य प्रेमी, धनी, यशस्वी, पुत्रवान, अपने मकान की साज-सज्जा में विशेष रुचि रखने वाला और प्रसन्नचित्त होता है ! जातक को उत्तम वाहन सुख प्राप्त होता है !

पूर्ण दृष्टिः
जातक की जन्म पत्रिका में स्थित चतुर्थ भाव के शुक्र की सप्तम दृष्टि दसवें भाव पर पड़ती है जिसके प्रभाव से जातक कला, रंगमंच, मदिरालय (बीयर बार) जुआघर (कैसिनों), सौन्दर्य प्रसाधन व स्त्री उपयोगी वस्तुओं सम्बंधी व्यापार व व्यवसाय में सफल होता है व स्थिति के अनुसार लाभ प्राप्त भी करता है !

मित्र/शत्रु राशिः
मित्र, स्व और उच्च काशि में चतुर्थस्थ शुक्र फलदायक होता है ! जमीन जायदाद, पिता, माता और वाहन का सुख जातक उत्तम प्राकार से प्राप्त करता है ! शत्रु व नीच राशि में व्यर्थ की विलासिता पूर्ण वस्तुओं में जातक अपना अर्जित धन व्यय करता है माता से विशेष प्रेम होने के बाद भी अनबन व वैचारिक मदभेद होने से माता को अपने आप बिना विचार के कष्ट होता है !

भाव विशेषः
चतुर्थस्थ शुक्र के प्रभाव से जातक के माता से अच्छे सम्बंध होते हैं एवं उसे उनका सहयोग सदैव मिलता रहता है ! चतुर्थ स्थान में शुक्र की स्थिति से जातक परोपकारी व व्यवहारकुशल होता है ! जातक पुत्रवान, सुंदर, सुखी एवं दीर्घायु होता है ! जातक को समस्त प्रकार के सुख, उच्च कोटि का मकान, श्रेष्ठ वाहन सुख एवं जमीन-जायदाद का सुख चतुर्थ स्थान में शुक्र की अच्छी स्थिति के कारण प्राप्त होता है !

#पंचम_भाव_में_शुक्र_का_प्रभावः

स्वभावः
पंचम स्थान में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक उदार, कला प्रेमी एवं अनेक संतानों से युक्त होता है ! वह चतुर, दयालु, विद्वान, संगीत प्रेमी, स्नेही स्वभाव वाला और मधुर भाषी भी होता है !

पूर्ण दृष्टिः
पंचम स्थान स्थित शुक्र की सप्तम दृष्टि एकादश स्थान पर होती है, जिसके प्रभाव से जातक की आय में वृद्धि होती है ! जातक का स्त्रियों की सहायता से धनार्जन होता है !

मित्र/शत्रु राशिः
मित्र, स्व व उच्च राशि का शुक्र होने पर जातक को उच्च शिक्षा प्राप्त होती है ! उसे कला सम्बंधी क्षेत्रों में प्रसिद्धि मिलती है ! जातक को संतान का सुख प्राप्त होता है ! जातक विद्वान होता है ! जातक यद्यपि कि बहुत पढ़ा लिखा नही होता पर उसे विद्वानों सा आदर प्राप्त होता है ! जातक सहज और सरल होता है ! शत्रु व नीच राशि का शुक्र होने पर जातक की शिक्षा-दीक्षा में बाधाएँ आती हैं ! उसे कार्यक्षेत्र में असफलता मिलती है !

विशेषः
पंचमस्थ शुक्र के प्रभाव से जातक को परिवार से लाभ होता है ! जातक कला के क्षेत्रो में जैसे संगीत, वादन, इत्यादि में प्रसिद्ध होता है ! सुखी, भोगी एवं लाभवान होता है ! जातक दूसरों का विशेष ख्याल रखता है ! जातक न्या.वान, दानी उदार एवं सद्गुणी होता है ! जातक व्यवसायी एवं प्रतिभाशाली होता है !

#छठवे_भाव_में_शुक्र_का_प्रभावः

स्वभावः
षष्ठ स्थान में शुक्र के प्रभाव से जातक संकीर्ण मनोवृत्ति वाला होता है ! वह गुप्त रोगों से ग्रसित, स्त्री सुख से हीन और फिजूल खर्ची होता है !

पूर्ण दृष्टिः
षष्ठ स्थान पर स्थित शुक्र की पूर्ण दृष्टि द्वादश स्थान पर पड़ती है जिसके प्रभाव से जातक विवादास्पद कार्यो में व्यय करने वाला होता है ! जातक का बीमारियों में अधिक व्यय होता है !

मित्र/शत्रु राशिः
शुक्र के मित्र, स्व व उच्च राशि में होने पर जातक को मध्यम फल प्राप्त होते हैं एवं शत्रु व नीच राशि में होने से अशुभ फल की प्राप्ति होती है ! मित्र राशि में शुक्र के होने पर जातक को मामा पक्ष से लाभ होता है ! जातक के अनेक मित्र होते हैं ! शत्रु राशि के शुक्र से जातक को लाभ होता है ! जातक दुखी एवं अस्वस्थ रहता है ! जातक को गुप्तरोगी, मूत्ररोग व वीर्य सम्बंधी रोग हो सकते हैं !

भाव विशेषः
षष्ठ भाव में स्थित शुक्र को प्रभाव से जातक वैभवहीन व दुखी होता है ! जातक के शत्रु नही होते और यदि होते हैं तो वह जातक से पराजित होते हैं ! जातक स्त्री के प्रति आकर्षित होता है किंतु उसे उसकी पत्नी का सुख पूर्ण प्राप्त नही होता है ! जातक दुराचारी भी हो सकता है एवं अनैतिक कार्यों मे संलग्न रहता है ! स्त्रियों में गर्भाशय सम्बंधी कष्ट होते हैं !

#सप्तम_भाव_में_शुक्र_का_प्रभावः

स्वभावः
सप्तम भाव में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक स्नेही, धनी, सौंदर्य प्रेमी और सुखी होता है ! जातक सुखी वैवाहिक जीवन वाला, साहित्य प्रेमी, जीवन के सभी सुखों का आनंद उठाने वाला होता है ! जातक के अनेक मित्र होते हैं और वह मिलनसार होता है ! सप्तम भाव में शुक्र के प्रभाव से जातक बुद्धिमान, चंचल और वह (विपरीत लिंग के अनुसार) स्त्री या पुरुष प्रेमी भी होता है !

पूर्ण दृष्टिः
शुक्र की पूर्ण दृष्टि लग्न पर होती है जिसके प्रभाव से जातक सुन्दर, भाग्यवान, चतुर, भोग-विलास में रुचि रखने वाला और विपरीत लिंग के व्यक्ति की ओर विशेष आकर्षण रखता है !

मित्र/शत्रु राशिः
मित्र, स्व व उच्च राशि में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक का स्वतंत्र व्यवसाय होता है ! स्त्री राशि का होने पर स्त्री जातक अति सुंदर होती है ! जातक को व्यापार व व्यवसाय दोनों से ही लाभ होता है, परन्तु साझेदारी में प्रायः हानि उठाना पड़ता है ! शत्रु व नीच राशि का शुक्र होने पर जातक चरित्रवान होता है और उसे शत्रुओं से कष्ट उठाने पड़ते हैं ! जातक को स्त्री से सुख में भी कमी-आती है !

भाव विशेषः
सप्तम स्थान के शुक्र की स्थिति से जातक का स्वतंत्र व्यवहार और किसी के दबाव में न रहने का स्वभाव होता है ! जातक सुंदर, आकर्षक व्यक्तित्व और सेक्स के प्रति अधिक रुचि रखता है ! जातक बुद्धिमान, सहज, धैर्यवान और दूसरो के सहज ही मोहित कर लेता है ! जातक उदार और लोकप्रिय होता है ! जातक का भाग्योदय विवाह के बाद होता है ! जातक भाग्यवान, विलासी एवं चंचल होता है !

#अष्टम_भाव_में_शुक्र_का_प्रभावः

स्वभावः
अष्टम भाव में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक कामी स्वभाव का और गुप्त कार्यों में रत रहने वाला होता है ! जातक आलसी होता है पर प्रसिद्धि प्राप्त करता है ! प्रेम सम्बंधों में जातक को प्रायः असफलता प्राप्त होती है ! जातक की रुचि आध्यात्म, तंत्र, मंत्र और गुप्त विद्याओं में होती है !

पूर्ण दृष्टिः
द्वितीय स्थान पर स्थित शुक्र की पूर्ण दृष्टि द्वितीय भाव पर पड़ती है जिसके प्रभाव से जातक परिवार का सुख और धन धान्य को प्राप्त करता है ! जातक क्रोधी एवं निर्दयी भी होता है !

मित्र/शत्रु राशिः
स्व, मित्र एवं उच्च राशियों में अष्टम भाव में शुक्र जातक को सुखी, धनी तथा सहज बनाता है ! जातक का जीवन साथी उससे पूरा सहयोग करता है ! जीतक दीर्घायु होता है ! शत्रु व नीच राशि का शुक्र होने पर जातक को आर्थिक और शारीरिक कष्ट होते हैं ! जातक को व्यवसाय में अव्यवस्था तथा अस्थिरता होती है !

भाव विशेषः
अष्टम भाव स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक ज्योतिष विद्या के प्रति अध्ययनरत रहता है ! जातक मनस्वी होता है ! जातक का परस्त्री से सम्बंध व आकर्षण रहता है ! अष्टम शुक्र जातक को निर्दयी रोगी एवं दुखी बनाता है ! जातक की पर्यटन में विशेष रूचि होती है !

ाव_में_शुक्र_का_प्रभावः

स्वभावः
नवम भाव में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक आस्तिक, गुणी और मनोरंजन प्रिय होता है ! वह यशस्वी, प्रतिभाशाली, उदार एवं सबके प्रति सहानुभूति रखता है ! जातक आशावादी और सर्वसुख प्राप्त करने वाला होता है ! जातक बुद्धिमान, चंचल और भाग्यशाली होता है !

पूर्ण दृष्टिः
नवम भाव में स्थित शुक्र की तृतीय स्थान पर पूर्ण दृष्टि के प्रभाव से जातक महत्वाकाँक्षी, अधिक बहनों वाला, सुखी तथा पराक्रमी होता है !

मित्र/शत्रु राशिः
स्व, मित्र एवं उच्च राशियों में स्थित शुक्र जातक के लिए शुभ फलदायक होता है ! जातक का विवाह के बाद भाग्योदय होता है ! व्यवसाय के लिए महिलाओं सें जातक को विशेष सहयोग प्राप्त होता है ! शत्रु एवं नीच राशिगत नवम शुक्र जातक को भाग्यहीन बनाता है ! जातक को सुख प्राप्त नहीं होता !

भाव विशेषः
जातक नवमस्थ शुक्र के प्रभाव से अत्यंत आशावादी, उच्चाधिकारियों का कृपापात्र और सुखी वैवाहिक जीवन व्यतीत करने वाला होता है ! जातक का भाग्य पूर्ण रूप से उसका साथ देता है ! जातक को नवमस्थ शुक्र के प्रभाव से पत्नी एवं सम्बंधियो द्वारा धन प्राप्त होता है। विदेश से व्यापारिक सम्बंधो से विशेष लाभ होता है ! कलात्मक और साहित्यिक क्षेत्रों में सफलता प्राप्त होती है ! जातक आस्तिक, दयालु, गुणी होता है एवं तीर्थ यात्राएँ करता हैं !

्थान_में_शुक्र_का_प्रभाव :

स्वभावः
दशम भाव में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक विद्वान और तर्क वितर्क में कुशल होता है ! जातक मातृ पितृ भक्त, धार्मिक कार्यो में रुचि रखने वाला, विलासी, भाग्यशाली, पराक्रमी, गुणी, दयालु, न्यायप्रिय, धनी और सम्पत्ति से युक्त होता है !

पूर्ण दृष्टिः
चतुर्थ स्थान में स्थित शुक्र की पूर्ण दृष्टि चतुर्थ भाव पर पड़ती है जिसके प्रभाव से जातक सुखी होता है ! जातक को माता का उत्तम सुख व कृपा प्राप्त होती है ! जातक उत्तम प्रकार के भवन व वाहन का सुख प्राप्त करता है।

मित्र/शत्रु राशिः
स्व, मित्र और उच्च राशि में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक की उन्नति होती है ! स्त्रियों से विशेष कर माता से जातक को धन की प्राप्ति अवश्य होती है ! स्त्री राशि में होने पर जातक का भाग्योदय विवाह के बाद होता है ! जातक स्वयं के व्यवसाय से लाभ प्राप्त करता है ! शत्रु व नीच राशि का शुक्र स्त्रियों द्वारा धनहानि करवाता है ! जातक कई प्रकार के व्यवसाय करना पसंद करता है ! सभी व्यवसायों में जातक को सफलता प्राप्त नही होती ! जातक के पिता से तनावपूर्ण सम्बंध होते हैं !

भाव विशेषः
दशमस्थ शुक्र जातक के राज्य भाव में वृद्धि करता है ! व्यापार व व्यवसाय में स्त्रियों से व स्त्रियों द्वारा लाभ होता है ! जातक को व्यवसाय में अपनी माता से भी सहायता प्राप्त होती है ! सौंदर्य प्रसाधन, अभिनय, इत्यादि सम्बंधी कार्यो में जातक को विशेष सफलता प्राप्त होती है !

#शुक्र_का_ग्यारहवे_भाव_में_प्रभाव :

स्वभावः
ग्यारहवें स्थान में शुक्र के प्रभाव से जातक गुणवान, धनवान, यशस्वी, पुत्रवान, प्रभावशाली, उदार कलाप्रिय और मित्रों से युक्त होता है ! जातक ईश्वर से प्रीति रखने वाला और भौतिक जीवन में सफल होता है !

पूर्ण दृष्टिः
एकादश स्थान पर शुक्र की पूर्ण दृष्टि पंचम स्थान पर पड़ती है, जिसके प्रभाव से जातक संतान और विद्या से परिपूर्ण और कई पुत्रों का पिता होता है ! जातक गुणवान होता है !

मित्र/शत्रु राशिः
मित्र, स्व व उच्च राशि का शुक्र जातक के लिए उन्नति दायक और आय को बढ़ाने वाला होता है ! जातक की आय व खर्च दोनों ही अधिक होते हैं ! जातक अनुशासित जीवन व्यतीत करता है ! शत्रु व नीच राशि में शुक्र होने से आय और यश दोनों में न्यूनता होती है ! जातक अनावश्यक खर्च करता है ! मित्रों से जातक को हानि उठानी पड़ती है !

भाव विशेषः
एकादश भाव स्थित शुक्र जातक को स्थिर लक्ष्मीवान बनाता है ! जातक धनवान, परोपकारी एवं लोकप्रिय होता है ! जातक विलासी एवं कामी भी होता है ! जातक को पुत्र सुख प्राप्त होता है ! जातक को कर्म क्षेत्र में महिला पक्ष का विशेष सहयोग मिलता है, जिससे आय के क्षेत्र में विशेष उन्नति होती है ! ग्यारहवें स्थान में स्थित शुक्र के प्रभाव से कला के विभिन्न क्षेत्रों से जातक धनार्जन करता है ! लेखन, कविता लेखन, पाठन, व्यंगकार, नाटक तथा अभिनय में रुचि रखने वाला होता है ! प्रायः अभिनेता, अभिनेत्री, फिल्म निर्माता तथा इस क्षेत्र से सम्बद्ध लोगों की पत्रिका में एकादश शुक्र होता है ! प्रायः अभिनेता, अभिनेत्री, फिल्म निर्माता तथा इस क्षेत्र से सम्बद्ध लोगों की पत्रिका में एकादश भाव में शुक्र होता है ! श्वेत वस्तुओं तथा रत्नों के व्यापार से भी जातक को लाभ होता है !

#द्वादश_भाव_में_शुक्र_का_प्रभाव :

स्वभावः
द्वादश भाव में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक अत्यंत विलासी पर भाग्यशाली होता है ! जातक मनोरंजन ओर स्त्रियों पर व्यय करता है ! जातक अत्यंत धनी होता है ! साहसी और नित्य नये कार्य करना चाहता है !

पूर्ण दृष्टिः
द्वादश भाव पर स्थित शुक्र की पूर्ण दृष्टि छठे स्थान पर पड़ने से जातक भाग्यशाली एवं शत्रुओं पर विजय पाने वाला होता है ! जातक गुप्त रोगी और वीर्य विकारी होता है !

मित्र/शत्रु राशिः मित्र, स्व व उच्च राशि का शुक्र शुभ फलदायक हो सकता है ! जातक को धन, यश और अन्य सुख प्राप्त होता है ! शत्रु व नीच राशि में शुक्र होने पर जातक गरीब, कामी व्यवसायी, दुर्बुद्धि और स्वार्थी होता है ! उसकी आय से व्यय अधिक होता है ! अतः वह जमीन में कई प्रकार के कष्ट उठाता है !

भव विशेषः
द्वादश भाव में स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक राजा के समान उच्च अधिकार प्राप्त होता है ! धन, मान सम्मान आदि प्रचुर मात्रा में जातक को प्राप्त होता है ! जातक क्षणिक आवेश में बिना सोचे समझे कार्य करता है अतः मानसिक तनाव रहता है ! सेक्स में जातक विशेष रुचि रखता है ! जातक व्यसनी होता है ! जातक कटुभाषी, अविश्वासी एवं आलसी भी होता है

Acharya Bhaskar Shukla


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