25/03/2026
बुद्ध ने सब छीन लिया। उनकी क्रांति बड़ी मौलिक है। मूल से है। उन्होंने जड़ काट दी। इसलिए बुद्ध पर लोग नाराज भी हुए--ऐसे तुम सब सपने छीन लोगे! ऐसे कोई भ्रम न बचने दोगे!
यहीं तुम समझो। बुद्ध तुमसे यह नहीं कहते कि संसार ही माया है, वे कहते हैं, तुम्हारा परमात्मा भी माया है। तुम्हारी दुकान तो झूठ है ही, तुम्हारा मंदिर भी झूठ है। तुम्हारा पाप भी झूठ है, तुम्हारा पुण्य भी झूठ है। तुम झूठ हो। क्योंकि अब तक तुमने बुनियादी सत्य स्वीकार नहीं किया कि मैं जिम्मेवार हूं। जीवन की क्रांति की शुरुआत इस बात से होती है कि एक आदमी अपनी बागडोर अपने हाथ में ले लेता है; कहता है, बुरा-भला जैसा हूं, मैं जिम्मेवार हूं।
जरा सोचो तो, एक बार तुम्हें यह खयाल आ जाए कि मैं जिम्मेवार हूं, यह तीर तुम्हारे प्राणों में धंस जाए कि मैं जिम्मेवार हूं, यह तुम्हें बात भुलाए न भूले, यह तुम्हारे सोते-जागते चारों तरफ तुम्हें घेरे रहे, यह तुम्हारी हवा में, तुम्हारे वातावरण में समा जाए; यह तुम्हारे मन में जलता हुआ दीया बन जाए कि मैं जिम्मेवार हूं, इतनी आसानी से पाप कर सकोगे जितनी आसानी से अब तक किया? मैं जिम्मेवार हूं। फूंक-फूंककर पैर रखने लगोगे। कहते हैं, दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंककर पीने लगता है।
अगर एक बार तुम्हें स्मरण में आ जाए कि पाप मैंने किए, कौन मुझे छुटकारा देगा? मैं किसकी राह देख रहा हूं, कोई भी नहीं आएगा। कोई न कभी आया है, कोई न कभी आएगा। बंद करो यह द्वार, प्रतीक्षा बंद करो। तुम ही हो। तुम्हीं आए, तुम्हीं गए। कोई और नहीं आया है। तुम्हीं ने किया, तुम्हीं ने अनकिया भी। तुम्हीं ने अच्छा भी, तुम्हीं ने बुरा भी। लेकिन जिम्मेवारी आत्यंतिक है। अल्टीमेट है। कोई इसमें भागीदार नहीं हो सकता। किसी परमात्मा के कंधों पर रखकर तुम बंदूकें मत चलाओ। और किन्हीं तीर्थों की आड़ में पाप मत करो।
आज के सूत्र इसी संबंध में हैं।
'स्वयं से जात, स्वयं से उत्पन्न और स्वयं से किया गया पाप, दुर्बुद्धि मनुष्य को उसी तरह नष्ट करता है, जिस तरह पत्थर से ही पैदा हुआ वज्रमणि पत्थर को काटता है।'
'स्वयं से जात।'
तुमसे ही जन्म होता पाप का।
'स्वयं से उत्पन्न।'
तुमसे ही प्रकट होता पाप। जीता तुम्हारे ही सहारे है। ऊर्जा तुम्हीं देते, शक्ति तुम्हीं देते, साथ तुम्हीं देते।
'स्वयं से किया गया पाप।'
ओशो
एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-058)